Wednesday, August 20, 2014

गीता ज्ञान - 7



                               ज्ञान-विज्ञानयोग


छठे अध्याय में अंतिम श्लोक में भगवान् कहते हैं कि जो श्रद्धावान् भक्त हैं और तल्लीन होकर भगवान् के भजन करते हैं, वे ही ईश्वर के मत में सर्वश्रेष्ठ योगी हैं। हम इसे सातवें अध्याय की पूर्वपीठिका के रूप में देख सकते हैं कि भगवान् ने भक्तियोग का संकेत दे दिया है। इस सातवें अध्याय का नाम ज्ञान-विज्ञानयोग है, जिसमें ज्ञान एवं विज्ञान की आध्यात्मिक व्याख्या की गयी है। 

    इस अध्याय में प्रवेश से पूर्व इस बात को समझना बहुत आवश्यक है कि एक सांसारिक मनुष्य में अहंता एवं ममता के भाव रहते हैं, जबकि समता का अभाव रहता है। ‘मैं’ अंहता भाव एवं ‘मेरा’ ममता भाव है। यही ‘मैं’ और ‘मेरा’ माया है। जन्म-मरण, दुःख-सुख, हानि-लाभ, राग-द्वेष, मान-अपमान आदि द्वन्द्व मानव के जीवन में स्वाभाविक हैं। उनसे प्रभावित होकर मानव माया के बंधन में पड़ जाता है। इन सभी में समदृष्टि रखना ही ‘समता’ है। अहंता एवं ममता के भावों को मिटाने एवं समता के भाव को लाने के लिये ही गीता में ज्ञान, कर्म एवं भक्ति ये तीन मार्ग प्रतिपादित किये गये हैं। ज्ञानयोग एवं कर्मयोग के प्रतिपादन के बाद भगवान् भक्तियोग का प्रतिपादन कर रहे हैं, जिसका प्रारंभ इस अध्याय में हुआ है।


    ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषतः।
    यज्ज्ञात्वा नेह भूयोऽन्यज्ज्ञातमव्यमवशिष्यते।।गी.7.2।।


    अर्थात् मैं तुम्हारे निमित्त विज्ञान सहित सम्पूर्ण तत्त्वज्ञान को बताऊँगा, जिसे जानकर संसार में और कुछ जानने की आवश्यकता नहीं रह जाती है। 


    यह संदर्भ सुन्दर एवं विस्तृत प्रकार से इस अध्याय में वर्णित है। भगवान् कहते हैं कि भूमि, जल, अग्नि, वायु, आकाश, मन, बुद्धि एवं अहंकार ये आठ प्रकार की जड़ प्रकृति हैं, जिसे ‘अपरा’ प्रकृति कहा गया है। दूसरी प्रकृति चेतन प्रकृति है, जिसे ‘परा’ प्रकृति कहा गया है। इन दोनों ही प्रकृतियों के संयोग से सम्पूर्ण प्राणि जगत् उत्पन्न हुआ है। इनकी उत्पत्ति एवं प्रलय का मूल कारण ईश्वर ही है। पंचमहाभूतों अर्थात् आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथवी की उत्पत्ति पाँच तन्मात्राओं से होती है, जो हैं शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध। ये पंचमहाभूत उत्पन्न होकर पुनः उन्हीं में विलीन हो जाते हैं और यही सृष्टि एवं प्रलय का रहस्य है।


    भगवान् कहते हैं कि भावनाएँ सत्त्वगुण, राजोगुण एवं तमोगुण से समय-समय पर प्रभावित होती रहती हैं। इन्हीं गुणों से मोहित होकर मनुष्य त्रिगुणातीत परमात्मा को नहीं जान पाता है और जीवन में कष्ट पाता है। अतः भगवान् कहते हैंः


    दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
    मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते।।गी.7.14।।


    अर्थात् त्रिगुणमयी यह मेरी माया अपार एवं अद्भुत है। जो इस संसार को ही सत्य मानकर चलते हैं, इसका पार नहीं पाते हैं, किन्तु जो त्रिगुणातीत मुझ परमात्मा की उपासना करते हैं, वे इस माया का पार पा जाते हैं और उनका उद्धार होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि परमात्मा में ध्यान करने वाला और उसे ही सत्य मानने वाला मुक्त होता है और माया के बंधन से कष्ट नहीं पाता है। इसी क्रम में भगवान् भक्तों के प्रकार बताते हुए कहते हैं।


    चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जन।
    आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ।। गी.7.16।।


    अर्थात् भरतवंशियों में हे श्रेष्ठ अर्जुन! मेरे पुण्यात्मा भक्तों के चार प्रकार हैं - (1) अर्थार्थी - जो सांसारिक सुख-साधनों को प्राप्त करने के लिये मेरे भक्त बनते हैं। (2) आर्त्त - जो संकट निवारण के लिये मेरे भक्त बने हैं। (3) जिज्ञासु - जो मेरे रहस्य एवं मेरी रचना सृष्टि के बोध की जिज्ञासा रखते हैं। (4) ज्ञानी - जो ऐसा मानते हैं कि ईश्वर ही मूल कारण हैं, वे ही सत्य हैं, वे ही एकमात्र ध्येय एवं उपास्य हैं और ऐसा मानकर वे निःस्वार्थ भाव से मेरी उपासना करते हैं। ये ज्ञानी भक्त ही मेरे प्रिय हैं और मैं उनका प्रिय हूँ। वस्तुतः ऐसा ज्ञानी भक्त मेरा ही स्वरूप है। 


    यहीं पर एकदेववाद की स्थापना करते हुए श्रीकृष्ण कहते हैं।


    यो यो यां यां तनुं भक्तः श्रद्धयार्चितुमिच्छति।
    तस्य तस्याचलां श्रद्धां तामेव विदधाम्यहम्।।गी.7.21।।


    अर्थात् जो-जो सकाम भक्त जिस-जिस देवता के स्वरूप को श्रद्धापूर्वक पूजना चाहते हैं, उन-उन सकाम भक्तों की श्रद्धा को मैं उस देवता के प्रति स्थिर करता हूँ। कहने का तत्पर्य यह है कि सभी देवता एक समान हैं और किसी भी देवता की उपासना से उसे वही फल प्राप्त होता है, जो सत्य है। यह एक महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन है, जो एकेश्वरवाद को पूर्णतः स्थापित करता है। इसी के क्रम में वे कह उठते हैं।


    स तया श्रद्धया युक्तस्तस्याराधनमीहते।
    लभते च ततः कामान्मयैव विहितान्हि तान्।।गी.7.22।।


    अर्थात् मेरे द्वारा श्रद्धा से युक्त वह पुरुष जिस देवविशेष की पूजा करता है, वह उस देवता से इच्छित फल पाता है, किन्तु फल-विधान करने वाला कोई दूसरा नहीं है, बल्कि वह मैं ही हूँ। देव भी मेरे द्वारा प्रदत्त वस्तु ही भक्त को देते हैं क्योंकि सबका स्रष्टा मैं ही हूँ। कहने का तात्पर्य यही है कि सभी एक ही हैं और ईश्वर एक ही है। उन्हें केवल अनेक रूपों में पूजा जाता है।


    आगे भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं कि जरा और मृत्यु से छुटकारा पाने के लिये जो भक्त मेरा आश्रय लेकर साधना द्वारा संसारचक्र से मोक्ष पाने के लिये प्रयत्नशील होते हैं, वे उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण आध्यात्म को और सम्पूर्ण कर्म को जान लेते हैं। तब वे तत्त्ववेत्ता ज्ञानी मुझे जान लेते हैं और मुझे प्राप्त कर लेते हैं। इस प्रकार भक्ति को इस अध्याय में सर्वश्रेष्ठ मार्ग के रूप में दर्शाया गया है, जो निश्चित रूप से सर्वकल्याणकारी है।


    इस प्रकार ज्ञान-विज्ञानयोग के इस अध्याय में कहा गया है कि इस सम्पूर्ण जगत् की उत्पत्ति के मूल कारण ईश्वर ही हैं और इसका दृढ़ विश्वास ही ‘ज्ञान’ है। ईश्वर सर्वव्यापी हैं, वे कण-कण में विद्यमान हैं, वे ही अपरा एवं परा प्रकृति हैं, इस जगत् की उत्पत्ति के निमित्त एवं उपादान दोनों के ही कारण हैं - इस बात को मान लेना ही ‘विज्ञान’ है। इसे सरलीकरण करके देखें तो हम कह सकते हैं कि अपने शरीर और उनसे सम्बन्धित व्यक्तियों और वस्तुओं को प्रकृति मान लेना ‘ज्ञानयोग’ है। संसार को मान लेना और उसके अनुसार कर्म करना ही ‘कर्मयोग’ है और ईश्वर की परमसत्ता में दृढ़ विश्वास ही ‘भक्तियोग’ है।

विश्वजीत ‘सपन’

Wednesday, May 21, 2014

गीता ज्ञान - 4


ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

            गीता के चतुर्थ अध्याय में ज्ञानकर्मसंन्यासयोगका वर्णन है। यहाँ ज्ञानशब्द विवेक का बोधक है और कर्म एवं संन्यास के विशेषण के रूप में प्रयुक्त हैए अर्थात् कर्म एवं संन्यासका सम्यक् ज्ञान ही ज्ञानकर्मसंन्यासयोगहै। यहाँ विवेक का अर्थ कर्म के औचित्य एवं अनौचित्य का सूक्ष्म विवेचन और उसका बोध है। यह अध्याय अपने आप में कोई पूर्ण दर्शन न होकर तृतीय अध्याय के परिशिष्ट के रूप में है और पंचम अध्याय की पूर्वपीठिका के रूप में भी। इसे तृतीय अध्याय का ही विस्तार कहें तो भी कोई अत्युक्ति नहीं होगी। कारण कि प्रारंभ में कर्म में निष्कर्मता थी और संन्यास के लिए कर्म-त्याग की कोई आवश्यकता नहीं थी, किन्तु समय के साथ जब यज्ञादि कर्मों में सकामता का प्रवेश हुआ तो कर्म को दोषयुक्त माना गया। तब कर्म-त्याग की अवधारणा विकसित हुई और सांख्य अथवा ज्ञान-मार्ग की स्थापना हुई, जिसके परिणामस्वरूप कर्म मार्ग एवं ज्ञान मार्ग दो भिन्न मार्ग स्थापित हो गए। तृतीय अध्याय में जिस कर्मयोग की स्थापना हुई उसी बात को गीताकार ने आगे बढ़ाया और कहा कि कर्म का ज्ञान कैसे हो? वे कौन से कर्म हैं जो उचित हैं? वर्ण क्या हैं, कौन से यज्ञ क्या फल देते हैं, हमें कैसे कर्म करने चाहिए? ऐसे अनेक प्रश्नों के उत्तर इस अध्याय के माध्यम से दिए गए हैं। वस्तुतः देखा जाए तो इस अध्याय में कुछ बहुत ही महत्त्वपूर्ण बातों पर विमर्श हुए हैं, जो जीवन-क्रम में सफल एवं मंगल हेतु आवश्यक हैं।
            चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः। गी.4.13।।
            अर्थात् मैंने ही गुण एवं कर्मों को आधार बनाकर चार वर्णों की रचना की है। इसे कुछ इस प्रकार से समझा जा सकता है कि मनुष्य की चार प्रकृतियाँ होती हैं, जो केवल मानवमात्र में ही नहीं बल्कि पशु-पक्षियों एवं वनस्पतियों में भी पाई जाती हैं। ये प्रकृतियाँ तीन गुणों पर आधारित हैं - सत्त्वगुण, रजोगुण एवं तमोगुण। सत्त्वगुण की प्रधानता से ब्राह्मण की, रजोगुण की प्रधानता एवं सत्त्वगुण की गौणता से से क्षत्रिय की, रजोगुण की प्रधानता एवं तमोगुण की गौणता से वैश्य की तथा तमोगुण की प्रधानता से शूद्र की उत्पत्ति होती है। इसी प्रकार गोवंश ब्राह्मण-प्रकृतिक, शेर, चीता आदि क्षत्रिय-प्रकृतिक, हाथी, ऊँट आदि वैश्य-प्रकृतिक एवं शूकर आदि शूद्र-प्रकृतिक हैं। हंस, कबूतर आदि ब्राह्मण-प्रकृतिक, बाज आदि क्षत्रिय-प्रकृतिक, चील आदि वैश्य-प्रकृतिक तथा कौवा आदि शूद्र-प्रकृतिक हैं। इतना ही नहीं बल्कि शरीर में सिर ब्राह्मण, हाथ क्षत्रिय, उदर वैश्य एवं पैर शूद्र प्रकृतिक हैं। वस्तुतः यह सारी सृष्टि ही त्रिगुण आधारित है और तदनुसार ही व्यवहार भी करती है। यह सार्वभौमिक व्यवस्था कर्म पर आधारित है। इसे आज जाति आधरित मानकर अनुचित कहा जाता है, किन्तु जो सार्वभौम सत्य और तथ्य है कि ये वस्तुतः मानवीय प्रकृतियाँ हैं और कोई भी मानव अपनी प्रकृति के अनुसार ही कर्म करता है अथवा उसकी रुचि उन्हीं कर्मों में होती है।
            श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म की महत्ता और उसके प्रकार को बहुत विस्तार से समझाते हुए कहा है कि यह ज्ञान नया नहीं है क्योंकि इसे उन्होंने बहुत पहले ही सूर्य को बताया था और सूर्य ने मनु को बताया। उसके बाद मनु ने इक्ष्वाकु को बताया था। यहीं पर वे कर्म, अकर्म और विकर्म की परिभाषा देते हुए सरलता से अपनी बात को स्पष्ट करते हैं। सभी प्रकार के दैनिक कार्य और कर्तव्य कर्म हैं, इनमें सकाम भावना रहती है, अतः यह कर्म का सामान्य रूप है। जब हम वही कर्म हम कर्तव्य समझ कर निर्लिप्त भाव से लोकहित में करते हैं तो वह कर्म अकर्म बन जाता है, जो आदर्श कर्म माना जाता है। तीसरी स्थिति विकर्म की होती है, जो ईर्ष्या-द्वेष, परपीड़न या संकुचित स्वार्थ के लिए किए जाते हैं। ये वस्तुतः निषिद्ध माने जाते हैं और पाप की श्रेणी में आते हैं। अकर्म करने वाला कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाता है। अतः मानव को ईर्ष्या से रहित, द्वन्द्वों से दूर और सफलता-असफलता में सम मनःस्थिति वाला होना चाहिए। ऐसे मनुष्य को कर्म-बन्धन कभी प्रताड़ित नहीं करता है।
            इसी अध्याय में ब्रह्मयज्ञ, देवयज्ञ, ज्ञानयज्ञ, द्रव्ययज्ञ, तपोयज्ञ, योगयज्ञ, स्वाध्याय ज्ञानयज्ञ आदि बारह प्रकार के यज्ञों के वर्णन किए गए हैं। ये सभी यज्ञकर्म ही अपेक्षित हैं। इन्हें करने वाला अकर्म कर्म करता है और पाप-कर्मों से मुक्त हो जाता है। यह तथ्य बहुत सुन्दरता से इस श्लोक में बताया गया है।
            यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुतेऽर्जुन।
            ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि भस्मसात्कुरुते तथा।। गी.4.37।।
            अर्थात् हे अर्जुन! जैसे प्रज्वलित अग्नि ईंधन को पूर्णतः भस्म कर देती है, वैसे ही ज्ञान रूपी अग्नि सम्पूर्ण पाप-कर्मों को पूर्णतः भस्म कर देती है। तात्पर्य यह है कि ज्ञान प्राप्त करने वाला सभी प्रकार के पाप-कर्म से हमेशा के लिए मुक्त हो जाता है। ज्ञान चाहे जब भी प्राप्त हो, यह स्थिति बनी रहती है। अतः मनुष्य को सम्यक ज्ञान की ओर प्रवृत्त होना चाहिए और अकर्म करना चाहिए।
            इसी क्रम में वे कहते हैं -
            यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
            अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। गी.4.7।।
            परित्ऱाणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
            धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवानि युगे युगे।। गी.4.8।।
         अर्थात् हे भरतवंशी अर्जुन! जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब सज्जन पुरुषों के उद्धार के लिए, पापियों के विनाश करने के लिए एवं धर्म की स्थापना के लिए मैं वैसे सभी युगों में प्रकट होता हूँ। ईश्वर इस बात का संकेत देते हैं कि उनका आगमन प्रत्येक उस युग में होता रहेगा, किसी न किसी रूप में, जब-जब मानवता पर संकट आएगा।
            अतः हम सभी को आसक्ति के भाव का त्याग करना चाहिए एवं अपने कर्म इस प्रकार करने चाहिए कि वे अकर्म बन जाएँ। वे स्वयं कहते हैं कि मैंने भी सृष्टि की रचना की किन्तु वह मेरा अकर्म ही है क्योंकि उसके लिए मेरी कोई सकामता नहीं है। और इसलिए हे अर्जुन! तुम हृदय में स्थित इस अज्ञान जनित संशय को तत्त्वज्ञान रूपी तलवार से काट डालो और अपने कर्म करो क्योंकि विवेकहीन एवं संशय रखने व्यक्ति का पतन निश्चित है।

विश्वजीत 'सपन'

Friday, April 18, 2014

गीता ज्ञान - 3




कर्मयोग
            गीता को पढ़ते समय इस बात का अनुभव किया जा सकता है कि गीता के द्वितीय अध्याय का प्रारंभिक भाग वेदान्त दर्शन से प्रभावित है। उस कालखण्ड में सांख्य को ही सर्वोच्च दर्शन माना गया था, जिसमें ज्ञान की महत्ता को उचित और मोक्ष का कारण माना गया था तथा कर्म त्याग को प्रश्रय दिया गया था। हमें इस बात को समझना होगा कि महाभारत काल में सांख्ययोग एवं कर्मयोग की साधनाएँ बहुलता से प्रचलित थीं और वे विपरीत दिशा में गमनशील थीं। स्थितियाँ इतनी विकट थीं कि संन्यासी कर्म नहीं करता था और गृहस्थ संन्यास ग्रहण नहीं कर सकता था। जबकि यह भी सत्य है कि भारतीय दर्शन में कभी भी कर्म की महत्ता को कम नहीं किया गया था। यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म’ (यजु. 1.1) अर्थात् प्रत्येक शुभकर्म यज्ञ है, यह वैदिक काल से ही मान्यता रही थी। किन्तु समय के साथ समाज में परिवर्तन नियम है और एक विचार को अधिक प्रश्रय देना भी स्वाभाविक है। ऐसे में जब समाज दो धड़ों में बँट गया तो एक सामंजस्य स्थापित करना आवश्यक हो गया था और इसी पृष्ठभूमि में कर्म की महत्ता को स्थापित करना गीता का उद्देश्य था। वह कर्म कैसा हो? क्यों हो? यही विस्तार तृतीय अध्याय में मिलता है। अतः अर्जुन की दुविधा मात्र उसकी नहीं है बल्कि समस्त समाज की है और इसलिए जब कर्म-त्याग को प्रश्रय दिया गया और पुनः कर्म करने को कहा गया जो परस्पर विरोधी बातें थीं तो अर्जुन का भ्रमित होना अपेक्षित था।
                    ज्यायसी चेत्कर्मणस्ते मता बुद्धिर्जनार्दन।
          तत्किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव।।गी.3.1।।
          अर्थात् हे जनार्दन, यदि कर्म की अपेक्षा ज्ञान ही श्रेष्ठ है तो हे केशव, मुझे आप युद्ध जैसे भयंकर कर्म में क्यों लगाते हैं?
          अर्जुन का कहना उचित था और प्रश्न भी उचित था कि जब इस संसार में ज्ञान की ही महत्ता है और उसे श्रेष्ठ माना गया है तो फिर युद्धकर्म को किस प्रकार उचित माना जाए। इसमें तो मानव-हत्या का भी दोष है। ऐसे कर्म करने को कहना क्या उचित है? अर्जुन का कथन इसलिए भी उचित प्रतीत होता है क्योंकि जब केवल ज्ञान से ही भ्रम दूर होगा और किसी का कल्याण संभव होगा तो कर्म करने की क्या आवश्यकता है? जब श्रीकृष्ण ने दूसरे अध्याय में पहले ज्ञानयोग और उसके पश्चात् कर्मयोग की बातें कीं तो अर्जुन का इस तरह भ्रमित होना एक सामान्य स्थिति थी और यह वह स्थिति थी जहाँ से कर्म और ज्ञान के समन्वय की स्थापना का बीज बोना था। अतः श्रीकृष्ण ने अर्जुन की भ्रांति का निवारण करते हुए बताया कि कर्मत्याग के निर्देश नहीं हैं बल्कि दोनों ही योगों में कर्म आवश्यक हैं।
                    न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोऽश्नुते।
          न च संन्सनादेव सिद्धिं समधिगच्छति।।गी.3.4।।
          अर्थात् मनुष्य न तो कर्मों को करना बंद करके निष्कामता को प्राप्त कर सकता है और न ही कर्मों के त्यागमात्र से ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है।
          कर्म तो प्राकृतिक हैं और उन्हें करना ही होता है और साथ ही गीता में स्पष्ट कहा गया है कि कर्म तो स्रष्टा का प्रथम आदेश है। इसलिए गीता में कर्म को यज्ञ कहा गया है और यज्ञकर्म करने के बाद अन्न ग्रहण करने वाले को पुण्यात्मा कहा गया है। वस्तुतः यज्ञकर्म में ही ब्रह्म नित्य स्थित है - "तस्मात् ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्" (गी.3.15)। यह इसलिए भी कि कर्म प्रणिमात्र का धर्म है और उसे चाहिए कि वह अच्छे कर्म करके एक आदर्श प्रस्तुत करे ताकि लोग उनका अनुसरण कर सकें - "यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः" (गी.3.21)। यह भी एक सत्य है कि जैसे कर्म बड़े लोग करते हैं, छोटे भी उसी का अनुसरण करते हैं और इसलिए ईश्वर जो सबसे बड़े हैं, उन्हें सबसे अधिक सावधान होकर कर्म करना पड़ता है। किन्तु वे कर्म कैसे हों? इस पर भी विचार गीता के इस अध्याय में विस्तार से किया गया है।
                    यज्ञार्थात्कर्मणोऽन्यत्र लोकोऽयं कर्मबन्धनः।
          तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचार।।गी.3.9।।
          अर्थात् यज्ञ के निमित्त किए जाने वाले कर्मों के अलावा यदि कोई अन्य कर्म करता है तो वह कर्म-बंधन में बँधता है, अतः हे कुन्तीनन्दन! तुम यज्ञ में करणीय कर्म को अनासक्त होकर करो।
          कर्तव्य पालन के कर्म का अर्थ है सभी प्रकार के कार्य अर्थात् खेती-बाड़ी, व्यापार, नौकरी आदि मनुष्य के कर्तव्य-पालन रूपी कर्म हैं। गृहस्थ कर्म तो मानवमात्र का सबसे का धर्म है। ऐसे कर्मों से ही जीवन का निर्धारण होता है, जिसका त्याग ईश्वरीय इच्छा का सम्मान नहीं हो सकता है। केवल इस बात का ध्यान रखना होगा कि मनुष्य को अपने मन से इन्द्रियों पर नियंत्रण करके आसक्ति रहित होकर संयमपूर्वक निष्काम भाव से निर्धारित कर्म करना होगा और जो ऐसे कर्म करेगा, वही श्रेष्ठ मनुष्य है। और इसलिए हे अर्जुन, तुम कर्तव्य के निमित्त किए जाने वाले कर्मों को अनासक्त होकर करो। तुम्हारा कर्म क्षत्रिय धर्म है और जब पाप का विनाश करना हो तो पाप के विरुद्ध युद्ध करना तुम्हारा यज्ञकर्म ही है।
          इस प्रकार श्रीकृष्ण कर्म की महत्ता को समझाते हुए यह कहते हैं कि कर्म-विषयक हमारा दृष्टिकोण शुद्ध होना चाहिए। कर्म में स्वधर्म भी आवश्यक है। मानव को कामरूप शत्रु को अपनी बुद्धि मन एवं इन्द्रियों को संयमित करके नष्ट कर देना चाहिए। तभी निष्काम कर्म संभव है। वस्तुतः शरीर, इन्द्रिय आदि सभी प्रकृति के द्वारा निर्मित हैं किन्तु आत्मा उनसे पृथक है और जब इस तथ्य को समझ कर कोई स्वकर्म करते हुए निर्लिप्त रहते हुए अहंता-ममता से मुक्त रहते हैं तो वे ज्ञानी कहलाते हैं।
विश्वजीत सपन

Wednesday, April 9, 2014

गीता-ज्ञान भाग-२




द्वितीय अध्याय – सांख्ययोग
गीता के द्वितीय अध्याय में सांख्ययोगका वर्णन किया गया है। यह दर्शन का वह उच्च मार्ग है, जो अति-प्राचीन काल से भारत में प्रचलित रहा है। महाभारत के शांतिपर्व में इसके संबंध में कहा गया है - ज्ञानं च लोके यदिहास्ति किचिंत् सांख्यागतं तच्च महन्महात्मन्सांख्यशब्द की व्युत्पत्ति कुछ इस प्रकार है - सम्यक् ख्यानं ज्ञानमिति सांख्यम् जिसका अर्थ है सम्यक् ख्याति और सत्य ज्ञान। एक समय था जब इस दर्शन की मान्यता अत्यधिक थी। इस दर्शन में एक बात पर बल दिया गया था कि कर्म कितना ही क्यों न किया जाए दुःख दूर नहीं हो सकते जब तक कि आध्यात्मिक ज्ञान नहीं होगा। इस दर्शन की सबसे प्रसिद्द उक्ति रही है कि बिना प्रकाश के रस्सी रुपी सर्प का नाश नहीं हो सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकाश के अभाव में हम रस्सी को सर्प समझ लेते हैं और जैसे ही प्रकाश होता है तो हमें ज्ञान होता है कि यह तो रस्सी है। यही ज्ञान आवश्यक हैयहाँ ज्ञान का अर्थ आध्यात्मज्ञान अथवा आत्मज्ञान से है अर्थात् जिस ज्ञान से आत्मवस्तु एवं अनात्मवस्तु का बोध हो।
इसे समझने के लिए हम सरल भाषा में इस प्रकार कह सकते हैं कि मनुष्य भटका हुआ प्राणी है। उसे जीव-जगत् विषयक वास्तविक ज्ञान नहीं है। ऐसे में व्यक्ति कभी-कभी अपने कर्तव्य-पथ से विचलित हो जाता है। तब वह कर्तव्य को अकर्तव्य और अकर्तव्य को कर्तव्य समझ कर स्वधर्म से विचलित हो जाता है। यही बात गीतकार अर्जुन के माध्यम से कहते हैं :
            गुरूनहत्वा हि महानुभावान् श्रेयो भोक्तुं भैक्ष्यमपीह लोके।
            हत्वार्थकामांस्तु गुरूनिहैव भुंजीय भोगान् रुधिरप्रदिग्धान्।।
         अर्थात् अर्जुन कहता है कि महानुभाव गुरुजनों को मार कर जीवन जीने की तुलना में मैं इस लोक में भिक्षान्न से जीवन बिताना अधिक कल्याणकारी समझता हूँ क्योंकि गुरुजनों को मार कर भी इस लोक में रुधिर से सने हुए अर्थ एवं कामरूप भोगों को ही तो भोगूँगा। यह कथन ही क्षत्रिय धर्म से विचलित होने का प्रमाण है। युद्ध अर्जुन का स्वधर्म था और क्षत्रिय-सुलभ कर्म भी था। ऐसे में अज्ञानवश भिक्षाटन कर जीवन जीने का उपक्रम और संन्यासी बन जीवन को जीने कि उसकी लालसा उसका धर्म नहीं हो सकता था। भावनाओं के भाव-सागर में लिप्त अर्जुन को यह भी ज्ञात नहीं रहा कि शरीर तो नश्वर है; उसका विनाश तो अटल है तो फिर मोह कैसा? तब श्रीकृष्ण उसे का सत्य का अवलोकन करवाते हैं और कहते हैं :
            य एनं वेत्ति हन्तारं यश्चैनं मन्यते हतम्।
            उभौ तौ न विजीनीतो नायं हन्ति न हन्यते।।
            अर्थात् जो व्यक्ति इस आत्मा को मारने वाला अथवा मरने वाला मानते हैं, ऐसे दोनों ही सत्य को नहीं जानते क्योंकि यह आत्मा वस्तुतः न तो किसी को मारती है एवं न ही किसी के द्वारा मारी जाती है। सच तो यह है कि आत्मा न कभी जन्म लेती है और न ही कभी मरती है। यह तो अजन्मा, निरंतर रहने वाली, सनातन है। शरीर चाहे मृत हो जाए, किन्तु आत्मा कभी नहीं मर सकती।
            सच तो यह है कि नये शरीर का मिलना जन्म है और पुराने शरीर का छूटना मृत्यु है। जन्म और मृत्यु तो शश्वत नियम हैं। इससे विचलित होना भ्रम है। "नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।"  संसार में केवल दो ही तत्त्व हैं - सत् एवं असत्। सत् का नाश नहीं हो सकता और असत् को विनाश से नहीं बचाया जा सकता। आत्मा सत् है। अतः आत्मा के नाश का दुःख असत् है। आत्मा के सत् होने के साथ ही इस अध्याय में अनेक महत्त्वपूर्ण तथ्यों का संयोजन किया गया है। विचारणीय है कि मैं शरीर हूँ - यह मानना अहंताहै और शरीर से संबंधित व्यक्ति एवं वस्तुएँ मेरी हैं, यह मानना ममताहै। श्रेय-पथ में अहंताएवं ममतादोनों ही बाधक होते हैं। कर्तव्य का स्थान भावना से बहुत ऊँचा होता है। अतः कर्तव्य का पालन ही श्रेष्ठ है। अर्जुन अहंता एवं ममता में पड़ कर स्वधर्म के पालन से विमुख हो रहा था। इसके बाद भी हिंसा तो हिंसा ही है। एक साधारण मनुष्य युद्धजनित हिंसा को भी बुरा मान ही सकता है। तब भगवान् श्रीकृष्ण उसे यह अमर ज्ञान देते हैं कि युद्धजनित हिंसा दोषमुक्त है। यहाँ यह तथ्य भी विचारणीय है कि हिंसा कहते हैं किसे हैं और किसे नहीं। सीमा पर एक सिपाही जब विरोधी सिपाही को मारता है तो क्या वह हिंसा है अथवा वह हिंसा है जो समाज में किसी लाभ अथवा सोद्देश्य की गई हत्या? इसे हम कुछ इस प्रकार समझ सकते हैं कि जिस प्रकार एक न्यायाधीश फाँसी देता है, किन्तु हत्या का दोष उसे नहीं लगता क्योंकि वह निरपेक्ष है, ठीक उसी प्रकार युद्धजनित हिंसा भी निरपेक्ष होता है। वस्तुतः विनाश की क्रिया परमात्मा अथवा प्रकृति द्वारा होती है। मनुष्य तो निमित्तमात्र है।
            यदि ध्यान एवं ज्ञान से देखा जाए तो संसार में पूर्णतः सुखमय अथवा दुःखमय कुछ भी नहीं होता। अनुकूल जहाँ सुख देता हैं, वहीं प्रतिकूल दुःख का कारण बनता है। अतः समदृष्टि आवश्यक है। समत्व ही संतुलित जीवन का पर्याय है और यही साधना मनुष्य को स्थितप्रज्ञता की ओर लेकर जाती है। यही वह स्थिति है जब मनुष्य हर प्रकार के दुःख एवं सुख से पृथक हो जाता है और मात्र स्वधर्म का पालन करता है। इस स्थिति का भान होने पर अर्जुन स्थितप्रज्ञ के बारे में पूछते हैं -
स्थितिप्रज्ञस्य का भाषा समाधिस्थस्य केशव।
स्थितधीः किं प्रभाषेत किमासीत व्रजेत किम्।।
       अर्थात् हे केशव! स्थितप्रज्ञ की क्या परिभाषा है, उसके लक्षण क्या हैं, वे कैसे बोलते हैं, उठते-बैठते कैसे हैं?
भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं -
            प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान्।
            आत्मन्येवात्मना तुष्टः स्थितप्रज्ञस्तदोच्यते।।
            अर्थात् हे अर्जुन! जब मनुष्य मन में स्थित सम्पूर्ण कामनाओं को त्याग देता है और आत्मिक सुख द्वारा आत्मा में संतुष्ट रहता है, तो वह पुरुष स्थितप्रज्ञ कहलाता है।
            यह सर्वथा परमानंद की स्थिति होती है। यह आनंद इतना उत्तम और पूर्ण होता है कि मनुष्य को किसी अन्य आनंद की आवश्यकता ही नहीं रह जाती है। तब उसका समत्वयोग सिद्ध हो जाता है। ऐसी स्थिति में कभी राग, द्वेष, भय, घृणा, कुण्ठा, क्रोधाधि उत्पन्न नहीं होते हैं। इस समय अखण्ड शांति का अनुभव होता है और तब निश्चय ही यह जगत् स्वप्न-संसार की भाँति निस्सार और मिथ्या प्रतीत होता है। यही असल में सत्य है। यही जीवन रहस्य है।
            यहाँ गीता में जिस सांख्ययोग का वर्णन है और जो आत्मतत्त्व का विवेचन है वह वेदान्त का प्रभाव है। यह एक वृहद् विषय है और इस पर चर्चा फिर कभी क्योंकि कपिल द्वारा प्रतिपादित सत्कार्यवाद के सिद्धांत को सांख्ययोग के रूप में देखा जा सकता है और इसके भी दो मत हैं – परिणामवाद और विवर्तवाद। उसके बाद भी कई मत बने जो उस समय प्रासंगिक थे और समाज के कल्याण के लिए आवश्यक थे। एक सम्यक विचार को समाज के कल्याण हेतु प्रस्तुत करते हुए इस अध्याय के माध्यम से श्रीकृष्ण यह संदेश दे रहे हैं कि जीवन एवं मरण शाश्वत सत्य है। इसे लेकर दुःख करना अनावश्यक है। जो भी नष्ट होता है वह परमात्मा की इच्छा से होता है अतः उसके लिए शोक नहीं करना चाहिए। मनुष्य को स्थितप्रज्ञ बनकर जीवन को निरपेक्ष भाव से देखना एवं जीना चाहिए। यहाँ जो उद्देश्य निहित है वह है कि कर्मक्षेत्र में निष्ठापूर्वक समभाव कर्म करना ही सच्चा ज्ञान है। यही ज्ञान उद्धारक है। असल में वर्णाश्रम निहित कर्म ही प्रत्येक मनुष्य का प्रथम धर्म है। और संक्षेप में कहा जाए तो आत्मतत्त्व को भली-भाँति समझकर निर्लिप्त भाव से कर्म करना ही सांख्ययोग है।
           
विश्वजीत 'सपन'