Thursday, January 12, 2017

राजकुमारी सुभद्रा का हरण

प्रिय मित्रो,

महाभारत की कहानी की 16 वीं कड़ी प्रस्तुत है। 


किस प्रकार अर्जुन को श्रीकृष्ण की बहन सुभद्रा के प्रति अनुराग होता है और किन परिस्थितियों में उसका हरण होता है, इस कहानी के माध्यम से जाना जा सकता है। 

इसे पढ़ने के लिये नीचे दो लिंक दिये गये हैं। पहला सीधे समाचार पत्र पर ले जाता है तथा दूसरा उसके पीडीएफ पर। कोई भी लिंक पढ़ने के लिये प्रयोग में लाया जा सकता है। 


http://pawanprawah.com/admin/photo/up1868.pdf 

http://pawanprawah.com/paper.php?news=1868&page=10&date=09-01-2017


आपके सुझावों एवं आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।
सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, January 8, 2017

सावित्री की पतिभक्ति

महाभारत की कहानी का पन्द्रहवाँ भाग - ‘‘सावित्री की पतिभक्ति’’।
‘‘पवन प्रवाह’’ एक साप्ताहिक समाचार पत्र है, जो लखनऊ से प्रकाशित है।
आप सभी पढ़ें और अपने विचार प्रकट करें। आपके इस सहयोग का आकांक्षी।
पढ़ने हेतु नीचे दिये लिंक पर क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/paper.php?news=1852&page=10&date=02-01-2017




http://pawanprawah.com/admin/photo/up1852.pdf

विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, December 29, 2016

ओघवती का धर्म

सम्मानित मित्रगण,
महाभारत की कहानी का 13वाँ भाग आपके समक्ष प्रस्तुत है।
इस भाग में पौराणिक कथा ‘‘ओघवती के धर्म’’ के माध्यम से यह कहने का प्रयास किया गया है कि गृहस्थ धर्म यह कहता है कि अतिथि की सेवा ही सबसे बड़ा धर्म है। आज हमारी संस्कृति के इस तत्त्व को हमने लगभग भुला दिया है। अतः पढ़ें और समझें कि हमारी संस्कृति का इस संबंध में क्या विचार है।
पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up1833.pdf

सादर 
सपन

Saturday, December 24, 2016

देवी इन्द्राणी की दुविधा

मित्रो,
महाभारत की कहानी का तेरहवाँ भाग आपके लिये प्रस्तुत है।
देवी इन्द्राणी या शची के जीवन में जब कठिनाई आती है, तो किस प्रकार वे उनका सामना करती हैं। यह कथा महाभारत के उद्योग पर्व का है। इसे पढ़ें और पढ़ कर अपनी प्रतिक्रिया दें।
इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up1817.pdf
 
सादर नमन

Sunday, December 11, 2016

हिडिम्बा का प्यार

मित्रो,
महाभारत की कहानी का अगला भाग - ‘‘हिडिम्बा का प्यार’’। कुछ कहानियाँ बीच में नहीं आ सकीं, जिसका मुझे खेद है। इसे अवश्य पढ़ें और अपने विचार दें कि कैसी लगी? आपके सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।


इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up1785.pdf

सादर
आपका ‘सपन’

Sunday, November 13, 2016

‘‘द्रौपदी के पाँच पतियों का रहस्य’’

महाभारत की कहानी का नौवाँ भाग प्रकाशित।

इस कथा को पढ़ने के लिये, नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/paper.php?news=1866&page=10&date=07-11-2016

आपके विचारों एवं सुझावों की प्रतीक्षा रहेगी।


विश्वजीत ‘सपन’

Wednesday, November 9, 2016

द्रौपदी का स्वयंवर

महाभारत की कहानी का आठवाँ भाग प्रस्तुत है। प्रकाशित एवं पीडीएफ में। कृपया पढ़ें और अपने विचार प्रकट करें कि आपको यह कथा कैसी लगी। आपके सुझाव इसे और सुन्दर पठनीय बनाने में मेरे लिये सहायक होंगे, अतः आपके विचारों की प्रतीक्षा रहेगी। इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।

http://pawanprawah.com/admin/photo/up1850.pdf

आपका
विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, October 9, 2016

दिव्यकन्या सत्यवती


महाभारत कहानी का सातवाँ भाग। पढ़ें और अपने विचार प्रकट करें कि कैसी लगी कहानी। आपके सुझाव मुझे और बेहतर लिखने में मदद करेंगे। इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें। 

http://pawanprawah.com/admin/photo/up1785.pdf

आपका
सपन

Sunday, September 11, 2016

गंगा का विचित्र आचरण

सम्मानित मित्रो,
पवन प्रवाह नाम साप्ताहिक समाचार पत्र मेरी महाभारत की कहानियों को एक धारावाहिक के रूप में प्रकाशित कर रहा है। छठी कहानी ‘‘गंगा का विचित्र आचरण’’ इस बार प्रकाशित हुई है। आप इसे नीचे दिये लिंक पर पढ़ सकते हैं।
http://pawanprawah.com/admin/photo/up1753.pdf
सादर नमन

Sunday, September 4, 2016

राजकुमारी अम्बा की प्रतीज्ञा


महाभारत की कहानी का पाँचवाँ भाग।
मित्रो, इसे पढ़ें और अवश्य अपने विचार, सुझाव दें, ताकि इसे और बेहतर किया जा सके।

इस लिंक को खोलें ---

http://pawanprawah.com/admin/photo/up1737.pdf

आपका
विश्वजीत ‘सपन’


Saturday, June 18, 2016

राजकुमारी सुभद्रा का हरण - कथा 8

वैशम्पायन जी कहते हैं कि बारह वर्षों के लिये अर्जुन वन में रहने लगे और इसी दौरान उन्होंने अनेक स्थलों की यात्रायें कीं। हिमालय की तराई से होते हुए महेन्द्र पर्वत फिर सागर के किनारे चलते हुए प्रभास क्षेत्र में पहुँचे। तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ आकर अर्जुन को द्वारका नगरी लेकर आये।
(महाभारत, आदिपर्व)


8

बहुत समय पहले की बात है। भगवान् श्रीकृष्ण मथुरा में रहते थे। उस समय यादवों का राज्य अत्यधिक सुखी और सम्पन्न था। भाईचारे का वातावरण था। सभी प्रसन्नता से रहते थे। एक बार यादवों ने रैवत पर्वत पर एक बहुत बड़े उत्सव का आयोजन किया। ब्राह्मणों को सहस्रों रत्नों का दान दिया। उत्सव में यदुवंशी सज-धजकर घूम रहे थे। चारों ओर कोलाहल था। बाजे-गाजे बज रहे थे। नाच-गाना हो रहा था। सभी प्रसन्न थे। उसी उत्सव में श्री कृष्ण के साथ पाण्डु के तीसरे पुत्र अर्जुन भी थे। श्रीकृष्ण के बुलाने पर सखा के घर आये थे। 

वहाँ घूमते हुए अर्जुन की दृष्टि कृष्ण की बहन सुभद्रा पर पड़ी। पहली ही दृष्टि में वह उन्हें भा गयी। उसकी मोहिनी सूरत देखकर अर्जुन एकटक देखते रह गये। अर्जुन के मनोभावों को पढ़ते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने चुहलता से पूछा - ‘प्रिय अर्जुन! जो मैं देख रहा हूँ क्या वह सच है?’


अर्जुन सहसा पूछे गये इस प्रश्न से सकपका गये। शर्म के मारे उन्होंने अपना सिर झुका लिया। 


‘भगवन्! आपसे क्या छुपाना। आप तो अंतर्यामी हैं।’ अर्जुन ने सकुचाते हुए कहा।


कृष्ण के लिये इतना संकेत ही अधिक था। वे सुभद्रा के लिये अर्जुन को एक योग्य वर मानते थे। किन्तु सुभद्रा की इच्छा के बारे में उन्हें भी कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए बोले - ‘प्रिय मित्र! स्वयंवर में वह तुम्हें वरेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। यदि तुम सुभद्रा से विवाह करना चाहते हो, तो क्षत्रियों की तरह हरण करके ही कर सकते हो।’


‘लेकिन भगवन् आपके होते हुए, आपकी बहन का हरण कैसे संभव है?’ अर्जुन के लिये यह एक अनबूझ पहेली थी।


‘प्रिय अर्जुन! क्षत्रिय इस तरह से बातें नहीं करते। वे तो शौर्य के प्रतीक होते हैं। फिर तुम्हारे लिये यही सबसे सरल एवं उत्तम उपाय है।’ श्रीकृष्ण ने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए कहा।


कृष्ण की मंशा जानकर और उनकी सलाह पर अर्जुन ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर के पास दूत भेजा। युधिष्ठिर ने दूत से समाचार सुना तो उन्हें अपार प्रसन्नता हुई और वे इस रिश्ते के लिये सहर्ष तैयार हो गये। दूत ने लौटकर जब यह समाचार कहा तो अर्जुन ने योजना बनायी।


एक दिन सुभद्रा रैवत पर्वत पर देव पूजा के लिये गयी। पूजा करने के बाद जब वह द्वारका आ रही थी, तब अवसर देखकर अर्जुन ने बलपूर्वक उसे उठाकर अपने रथ पर बिठा लिया। उसे लेकर अपने नगर की ओर चल पड़े। सैनिकों ने तुरन्त जाकर द्वारका की सभा में यह समाचार बताया, तो यादवों ने इसे अपमान समझा और क्रोध से आगबबूला हो गये। सभापाल ने तत्काल युद्ध का आदेश दे दिया। युद्ध का डंका बजते ही सभी इकट्ठा हो गये और युद्ध की तैयारी करने लगे। 



तब बलराम ने इस बारे में श्रीकृष्ण से बात करने की सलाह दी। सभी श्रीकृष्ण के पास गये और बोले - ‘भगवन्! आपका मित्र समझकर हमने अर्जुन का स्वागत किया। किन्तु, उसने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया। बिना किसी कारण के हमारी बहन का हरण किया। उसे इस करनी का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए।’


सभी यादवों ने इस बात का समर्थन किया। श्रीकृष्ण ने शांत भाव से सबको समझाया - ‘अर्जुन ने हमारे वंश का अपमान नहीं, बल्कि सम्मान किया है। असल में हमारे वंश के महत्त्व को जानकर ही उसने हमारी बहन का हरण किया है।’


‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? अर्जुन के अपराध को अपराध नहीं मान रहे हैं?’ यादवों ने पूछा। 


श्रीकृष्ण बोले - ‘यह अपराध नहीं है, बल्कि उसका यह कार्य उसके क्षत्रिय धर्म के अनुसार ही है। क्षत्रियों में हरण कर विवाह करना मान्य है। उसे स्वयंवर में सुभद्रा को पाने में संदेह था। इसलिए उसने ऐसा किया।’ 


‘किन्तु, भगवन्! वे हमसे बात करके भी हमारी बहन का हाथ माँग सकते थे।’ सभापाल ने कहा।


‘अवश्य, किन्तु आप भूल रहे हैं कि यदि बहन सुभद्रा को यह बात नहीं जँचती तो क्या होता? वैसे भी अर्जुन के साथ नाता जोड़ना हमारे लिये गर्व की बात है।’ श्रीकृष्ण ने पुनः समझाते हुए कहा।


यादवों में असंतोष था और नाना प्रकार से समझाने के पश्चात् ही वे श्रीकृष्ण की बात मान पाये। तब उन्होंने युद्ध करने का निर्णय त्याग दिया। यह समाचार पाकर अर्जुन सुभद्रा के साथ द्वारका वापस लौट आये। उसके बाद बड़ी धूम-धाम के साथ सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ कर दिया गया। एक वर्ष तक अर्जुन द्वारका में ही रहे।


जब एक वर्ष के बाद वे सुभद्रा के साथ इन्द्रप्रस्थ आये, तो उनका बहुत स्वागत हुआ। सुभद्रा ने कुन्ती के पैर छुए, तो उन्होंने आशीर्वाद दिया। द्रौपदी ने बहन कहकर संबोधित किया तो सुभद्रा ने उसके भी पैर छू लिये। द्रौपदी ने उसे गले से लगा लिया।


इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ और द्वारका में बहुत ही घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गया। कुछ वर्षों के बाद सुभद्रा ने एक वीर और सुन्दर बालक को जन्म दिया। उसका नाम अभिमन्यु पड़ा। श्रीकृष्ण ने उसे सब प्रकार की शिक्षा दी और वह गुणों में एक श्रेष्ठ कुमार बना। महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु ने अपनी वीरता से सभी को चकित कर दिया।

 
विश्वजीत ‘सपन’