‘‘ब्रह्म तेज की महिमा’’
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महाभारत की कथा की 58वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। विश्वामित्र एक प्रतापी राजा हुए। एक बार उन्होंने मुनि वशिष्ठ की गाय नन्दिनी को बलात् ले जाने का प्रयास किया, तो नन्दिनी ने ब्रह्म तेज के प्रताप से सेना की उत्पत्ति की और विश्वामित्र की पूरी सेना को खदेड़ दिया। विश्वामित्र को उस दिन लगा कि ब्रह्म तेज के समक्ष क्षत्रिय तेज का कोई मोल नहीं। इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘छत्र और उपानह की कथा’’
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महाभारत की कथा की 57वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। तब तपती दोपहरी में कोई उपाय न था। जब ऋषि जमदग्नि की पत्नी रेणुका को इससे कष्ट हुआ, तो ऋषि ने सूर्य को ही समाप्त करने का निश्चय किया। इस प्रक्रिया में किस प्रकार छत्र और उपानह के प्रयोग को मान्यता मिली, इसे इस कथा के माध्यम से जाना जा सकता है। साथ ही भगवान् सूर्य ने इनकी महत्ता भी स्थापित की। इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘ब्राह्मणत्व की प्रप्ति’’
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महाभारत की कथा की 56वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
प्राचीन काल में जाति का आधार कर्म हुआ करता था। देवता, मुनि या अपने कर्म के अनुसार व्यक्ति की जाति का निर्धारण होता था। तब कभी वीतहव्य नामक एक राजा हुए, जो बड़े प्रतापी थे। जब उनके ऊपर संकट आया तो वे भागकर ऋषि भृगु की शरण में गये। ऋषि ने उन्हें अभयदान दिया और अपने शिष्यों में सम्मिलित कर लिया। इस प्रकार उन्हें ब्राह्मणत्व की प्राप्ति हुई। इस कथा को विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘मुनि का संकल्प’’
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महाभारत की कथा की 55वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
प्राचीन काल में मुनि गौतम के तीन पुत्रों में एकत और द्वित उतने प्रतिभावान नहीं थे। त्रित बड़े सफल रहे, अतः धन के लोभ में वे दोनों भाई त्रित से छुटकारा पाने का उपाय सोचने लगे। त्रित ने यज्ञादि करके अनेक पशुओं का धन-संचय कर लिया था। ये दोनों भाई चाहते थे कि वह सारा धन इन्हें मिल जाये। दैवयोग से एक दिन वन में उन्हें ऐसा अवसर भी मिल गया। तब वे घर आकर सुख-चैन से रहने लगे। उधर त्रित ने सोमरस के अपने संकल्प को पूरा करने का निर्णय लिया। उसके बाद क्या हुआ इसे जानने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘मुनि का मूल्य’’
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महाभारत की कथा की 54वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
प्राचीन काल में च्यवन नामक मुनि ने जल में रहकर तप करने का निश्चय किया। एक दिन मल्लाहों ने उसी स्थल पर जाल फेंका जहाँ वे तप कर रहे थे। तब मछलियों आदि के साथ मुनि भी जाल में फँसकर बाहर आ गये। यह देख मल्लाह भयभीत हो गये। वे भागे-भागे अपने राजा के पास गये। उसके बाद क्या हुआ इसे जानने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘गुरु की शिक्षा और परीक्षा’’
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महाभारत की कथा की 51वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
प्राचीन काल में गुरु-शिष्य परम्परा के अन्तर्गत शिक्षा दी जाती थी। अनेक बार गुरु अपने शिष्य की परीक्षा लेते थे और उसमें भी शिक्षा छुपी होती थी। इस कथा में अयोद धौम्य ऋषि किस प्रकार अपने शिष्य उपमन्यु की परीक्षा लेते हैं और उसमें भी निरन्तर शिक्षा देते रहते हैं इसका एक सुन्दर उदाहरण दिया गया है।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘तप की महिमा’’ अंतिम भाग
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महाभारत की कथा की 50वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
यह कहानी एक ब्राह्मण की है, जो वेदाध्ययन कर स्वयं को ज्ञानवान मानता है। किन्तु जीवन के क्रम में उसे पता चलता है कि उसका ज्ञान अभी भी अधूरा है। वह इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने की इच्छा में मिथिलानगरी जाता है। अब वह एक धर्मव्याध से मिलता है। बातों के क्रम में वह धर्मव्याध उसे जीवन के तप को करने का सुझाव देता है। वह तप क्या है?
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘तप की महिमा’’ (प्रथम भाग)
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महाभारत की कथा की 49वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
यह कहानी एक ब्राह्मण की है, जो वेदाध्ययन कर स्वयं को ज्ञानवान मानता है। किन्तु जीवन के क्रम में उसे पता चलता है कि उसका ज्ञान अभी भी अधूरा है। वह इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने की इच्छा में मिथिलानगरी जाता है। उसे किस प्रकार इस ज्ञान की प्राप्ति होती है, इस कथा में बताया गया है। साथ वह क्या ज्ञान है, यह भी बताया गया है।
इसे विस्तार से जानने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘गृहस्थ-धर्म की महिमा’’
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महाभारत की कथा की 48वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
हमारी संस्कृति में चार आश्रम बताये गये हैं - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गृहस्थाश्रम को बताया गया है। यह असल में जीवन-कर्म करने का सबसे उपयुक्त समय बताया गया है। बिना इन कर्मों को किये जीवन के अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस कथा में इसी गृहस्थ-धर्म की महत्ता बतायी गयी है। बिना इसकी यात्रा किये सभी प्रकार के तप भी विफल माने गये हैं।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘अन्न-दान की महत्ता’’
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महाभारत की कथा की 47वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
हमारे शास्त्रों में न केवल दान की महत्ता है, बल्कि अन्न-दान की भी अत्यधिक महत्ता है। अपना जीवन सभी जीते हैं, किन्तु जो मनुष्य अपने से अधिक दूसरे के लिये जीता है, असल में वही मनुष्य कहलाने की योग्यता रखता है। इस कथा में एक ब्राह्मण और उसके परिवार की इस बड़े त्याग के बारे में बड़े ही रोचक ढंग से कथाकार ने बताया है। अतिथि के लिये अपने भोजन की वस्तुओं का पूर्णतः दान कर देना मात्र भारतीय संस्कृति में ही संभव है।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘क्षमादान ही महादान’’
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महाभारत की कथा की 46वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
एक बार शक्ति मुनि एवं कल्माषपाद के मध्य झगड़ा हो जाता है। राजा कल्माष्पाद ने क्रोध में आकर शक्ति मुनि को चाबुक दे मारा। मुनि ने उन्हें राक्षस बनने का शाप दे दिया। तब कल्माषपाद ने उन्हें ही खा लिया। मुनि के पुत्र पराशर ने उन्हें नष्ट करने का बीड़ा उठाया। उसके बाद क्या हुआ, यह जानने के लिये इस कथा को पढ़ें और देखें कि क्षमादान का महत्त्व हमारे शास्त्रों में कितना प्रबल है।
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विश्वजीत ‘सपन’