‘‘ब्राह्मणत्व की प्राप्ति’’
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महाभारत की कथा की 71वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
यह एक अनूठी कहानी है, जिसमें प्रतापी राजा गाधि के पुत्र विश्वामित्र की कथा है। किस प्रकार उनकी सेना को पराजय मिलती है और किस प्रकार वे ब्राह्मणत्व की प्रप्ति हेतु तप करते हैं। इस कथा से यह प्रमाण भी मिलता है कि पूर्वकाल में जाति कर्म के आधार पर होती थी न कि जन्म के आधार पर। आप भी पढ़ें और आनन्द लें। इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘पुरुष कोख से उत्पन्न बालक’’
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महाभारत की कथा की 70वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
यह एक अनूठी कहानी है, जिसमें युवनाश्व नामक राजा की भूल के कारण उसे गर्भ ठहर जाता है। उन्हें पुत्र की प्राप्ति करनी थी। उसके बाद क्या होता है, वह अविश्वसनीय है, किन्तु यह कथा अनेक संकेत कर रही है और हमें सोचने पर विवश कर रही है। आप भी पढ़ें और आनन्द लें। इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘विन्ध्याचल का क्रोध’’
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महाभारत की कथा की 69वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
सूर्यदेव प्रतिदिन सुमेरु की प्रदक्षिणा करते थे। यह विन्ध्याचल को अच्छा नहीं लगता था। उसने जब सूर्यदेव से कहा कि वह उसकी भी प्रदक्षिणा करे, किन्तु सूर्यदेव ने कहा कि यह संभव न हो सकेगा, क्योंकि जगत के रचनाकार का बनाया नियम है। तब विन्ध्याचल ने क्रोध में आकर बढ़ना प्रारंभ कर दिया, ताकि सूर्य का मार्ग रोक सके। उसके बाद क्या हुआ, इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘गंगावतरण की कथा’’ का अंतिम भाग
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महाभारत की कथा की 68वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
अभी तक हमने पढ़ा कि राजा सगर ने अपनी शक्ति-प्रदर्शन के लिये अश्वमेध यज्ञ कर अश्व को पृथ्वी पर छोड़ दिया और सगरपुत्रों को उसकी रक्षा में लगा दिया। साठ सहस्र सगरपुत्रों को कपिल मुनि के तेज ने नष्ट कर दिया। उसके बाद राजा सगर एवं उनके वंशज क्या-क्या करते हैं और किस प्रकार सगरपुत्रों को मुक्ति मिलती है, यह इस आगे भाग में वर्णित है। इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘गंगावतरण की कथा’’ का प्रथम भाग
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महाभारत की कथा की 67वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। राजा सगर ने महादेव से पुत्र प्राप्ति का वर लिया। उन्हें एक रानी से एक पुत्र और दूसरी रानी से एक सहस्र पुत्र प्राप्त हुए। तब सगर ने अपनी शक्ति-प्रदर्शन के लिये अश्वमेध यज्ञ कर अश्व को पृथ्वी पर छोड़ दिया और सगरपुत्रों को उसकी रक्षा में लगा दिया। इसके बाद क्या-क्या होता है, इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘धैर्य की परीक्षा’’ अंतिम भाग
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महाभारत की कथा की 66वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। एक बार च्यवन ऋषि राजा कुशिक के धैर्य की परीक्षा लेने के विचार से उनके पास गये और उन्होंने शर्त रखी कि उन्हें मुनि की सभी बातें माननी होगी। उनकी परीक्षा कठिन से कठिन होती चली गयी और प्रजा हाहाकार कर उठी। राजा कुशिक क्या उस परीक्षा में सफल हो पाये? इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘धैर्य की परीक्षा’’ प्रथम भाग
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महाभारत की कथा की 65वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। एक बार च्यवन ऋषि राजा कुशिक के धैर्य की परीक्षा लेने के विचार से उनके पास गये और उन्होंने शर्त रखी कि उन्हें मुनि की सभी बातें माननी होगी। राजा इसके लिये सहर्ष तैयार हो गये, किन्तु च्यवन ऋषि का तरीका हमेशा से ही विचित्र रहा है। यह कथा भी उनकी आश्चर्यजनक घटनाओं एवं तरीकों को सहजता से उजागर करती है। इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘समुद्रशोषण का वृतान्त’’
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महाभारत की कथा की 64वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। वृत्रासुर का आतंक बढ़ा हुआ था। ब्रह्मा जी के आदेश पर एक वज्र से इन्द्र ने वृत्रासुर का वध कर दिया, किन्तु कालकेय इसे अपना अपमान मानते रहे। उन्होंने समुद्र में जाकर शरण ली और रात्रि में आतंक मचाने के बाद पुनः समुद्र में जाकर छिपने लगे। कोई उपाय न देखकर देवतागण अगस्त्य मुनि के पास गये और उनसे समुद्र को पीने का अनुरोध किया। रहस्य एवं रोमांच से भरी यह कथा बड़ी अनूठी है और इससे आगे की कथा का भी जुड़ाव है। इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘मोहिनी तिलोत्तमा’’
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महाभारत की कथा की 63वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। सुन्द एवं उपसुन्द ने किसी और के द्वारा नहीं मारे जाने का वर प्राप्त कर लिष्या था। उसके बाद वे मनमानी करने लगे। परेशान होकर सभी लोग देवताओं के पास गये। देवतालोग ब्रह्मा जी के पास गये, तो उन्होंने तिलोत्तमा के निर्माण का कार्य विश्वकर्मा जी को दिया। तिलोत्तमा ने सुन्द एवं उपसुन्द में अपनी मोहिनी सूरत से फूट डाल दी और उसके बाद क्या हुआ इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘परशुराम का गर्व’’
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महाभारत की कथा की 62वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। परशुराम को अपने पराक्रम पर बड़ा गर्व था। श्रीराम की प्रसिद्धि सुनकर वे उनकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से उनके नगर गये और उनसे अपने धनुष को चढ़ाने को कहा। जब प्रभु श्रीराम ने सरलता से कार्य कर दिया, तब उन्होंने धनुष की डोरी को कान तक खींचने के लिये कहा। प्रभु श्रीराम समझ गये कि उनकी मंशा क्या थी। उसके बाद क्या हुआ इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘मित्रता और कृतघ्नता’’ का द्वितीय एवं अंतिम भाग
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महाभारत की कथा की 61वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। गौतम की सहायता करने के उद्देश्य से बकराज राजधर्मा उसे अपने मित्र विरूपाक्ष के पास भेजता है। विरूपाक्ष उसकी तत्काल सहायता करता है और गौतम प्रसन्न होकर धन के साथ अपने घर लौटने लगता है। मार्ग में उसकी भेंट पुनः राजधर्मा से होती है। उसके बाद क्या होता है, इसे विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘मित्रता और कृतघ्नता’’ का प्रथम भाग
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महाभारत की कथा की 60वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। गौतम नामक एक ब्राह्मण था। उसने वेद का अध्ययन नहीं किया था और वह निर्धन था। दस्युओं की सहायता पाकर वह भी दस्यु जैसा ही व्यवहार करने लगा। अपने एक मित्र के सुझाव पर उसने उचित मार्ग से धन कमाने का प्रयास किया। तभी उसकी भेंट बकराज राजधर्मा से होती है। यह विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’
‘‘अपराध का दण्ड आवश्यक है’’
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महाभारत की कथा की 59वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
महाभारत से भी प्राचीन काल की बात है। शंख एवं लिखित नामक दो भाई थे। लिखित से चोरी का आपराध हो गया। शंख ने उसे राजा के पास जाकर दण्ड प्राप्त करने को कहा। राजा ने पहले दण्ड देने से मना कर दिया। लिखित के अनुरोध पर उसे बड़ा ही कठोर दण्ड दे दिया। उसके बाद लिखित बड़ा दुःखी हुआ। वह अपने भाई के पास गया। फिर उसके भाई ने क्या किया? यह विस्तार से पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।
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विश्वजीत ‘सपन’