Monday, March 19, 2012

महाभारत की कथाएँ (२)


देवयानी का हठ


(वैशम्पायन जी ने जनमेजय को देवताओं और असुरों के मध्य युद्धों एवं कच के संजीवनी विद्या सीखने के बारे में बताया। इसी कथा के मध्य उन्होंने देवयानी और शर्मिष्ठा के कलह की कथा भी सुनाई।) महाभारत, आदिपर्व

बहुत दिनों पहले की बात है। उन दिनों देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ करते थे। एक बार उनके बीच बहुत ही भयानक युद्ध हुआ। उस युद्ध में देवताओं ने असुरों को बुरी तरह पराजित कर दिया। सारे असुर मारे गए। तब असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से सभी असुरों को जीवित कर दिया। उस समय असुरों के रजा वृषपर्वा हुआ करते थे। गुरु शुक्राचार्य राजा वृषपर्वा के राज्य में ही रहने लगे। राजा उनका बहुत सम्मान करते थे।

शुक्राचार्य की एक बेटी थी। उसका नाम देवयानी था। असुरराज वृषपर्वा की भी एक बेटी थी। जिसका नाम शर्मिष्ठा था। उन दोनों की उम्र एक जैसी थी। उनके स्वभाव भी एक जैसे थे। दोनों ही उग्र थीं। और परस्पर एक दूसरे से ईर्ष्या करती थीं। उन्हें हमेशा ऐसा प्रतीत होता था कि वे दूसरे की तुलना में अधिक श्रेष्ठ हैं। इसलिए उनके बीच में मनमुटाव भी आम बात थी।

एक दिन की बात है। देवयानी और शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ किसी घने वन के एक तालाब में नहाने गए। उसी समय स्वर्ग के राजा इन्द्र उस वन से गुजर रहे थे। उन्होंने इन स्त्रियों को नहाते देखा तो उन्हें शरारत सूझी। अपनी माया से हवा बनकर इन्द्र ने उनके कपड़ों को आपस में मिला दिया। वे स्त्रियाँ जब तालाब से बाहर निकलीं, तो उन्हें पता नहीं चला कि किसके कपड़े कौन-से हैं। भूल से शर्मिष्ठा ने देवयानी के कपड़े पहन लिए। जब देवयानी ने यह देखा तो वह गुस्से से आगबबूला हो गई।

अरे असुर की पुत्री, तुमने मेरे कपड़े कैसे पहन लिए? क्या तुम मेरी बराबरी करना चाहती हो?’ देवयानी ने जोर से कहा ताकि सभी सुन लें। दोनों अक्सर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयत्न में लगी रहती थीं।

वाह री अकड़वाली, तेरे पिता तो प्रजा की तरह मेरे पिता की स्तुति करते हैं और तेरा इतना घमंड !शर्मिष्ठा भी कम नहीं थी।

देख अभी इसी समय मेरे कपड़े उतारकर दे दे। वरना बहुत बुरा होगा।देवयानी उसकी ओर झपटती हुई बोली।

अरे जा बहुत देखी तेरी जैसी। मैं राजकुमारी हूँ। तुझे किसी ने बताया नहीं कि राजा से बड़ा कोई नहीं होता। और सुन अगर मैंने तेरे कपड़े पहन ही लिए तो कोई अनर्थ नहीं हो गया। अगर तूने मेरे कपड़े को छुआ तो देखना।शर्मिष्ठा पैर पटकती हुई बोली।


शर्मिष्ठा का इतना कहना था कि देवयानी गुस्से से तिलमिला उठी। वह शर्मिष्ठा के कपड़े पकड़कर खींचने लगी। और दोनों में हाथापाई हो गई। तब मौका मिलते ही शर्मिष्ठा ने देवयानी को जोर से धक्का दे दिया। बगल में ही एक कुआँ था। देवयानी संभलते-संभलते भी उस कुएँ में जा गिरी। यह देख सारी लड़कियाँ भाग गईं। शर्मिष्ठा भी देवयानी को मरी समझकर वहाँ से भाग गई।

उस कुएँ में पानी नहीं था। इसलिए देवयानी को चोट तो आई, लेकिन उसकी जान बच गई। वह बहुत देर तक उसी कुएँ में बैठी रोती रही। उसी समय उसने निश्चय किया कि वह शर्मिष्ठा से इसका बदला अवश्य लेगी।  

सौभाग्य से उसी समय राजा ययाति शिकार खेलते-खेलते वन में पहुँचे। थकान और प्यास के मारे घोड़े से उतरकर कुएँ के पास गए। कुएँ में झाँका तो उसमें पानी नहीं था, लेकिन एक सुन्दर स्त्री रोती हुई बैठी थी।

राजा ने पूछा - सुन्दरी ! तुम कौन हो? इस कुएँ में क्या रही हो?’

देवयानी ने विनती के स्वर में कहा - मैं महर्षि शुक्राचार्य की पुत्री हूँ। पैर फिसल जाने से कुएँ में गिर गई। मुझे बाहर निकाल दीजिए। आपका बड़ा उपकार होगा।

ययाति ने उसे कुएँ से बाहर निकाल दिया। देवयानी को कुछ खास चोट नहीं थी। थोड़ी देर बातें कर ययाति शिकार पर निकल गए। देवयानी राजा की सुन्दरता पर मोहित हो गई। लेकिन कुछ बोल न सकी। उसने मन ही मन किसी उपयुक्त समय में बात करने का फैसला किया और घर की ओर चल पड़ी। उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था। घर पहुँचते ही पिता से बोली -पिताजी, मैं अब इस नगर में नहीं रह सकती।

क्यों क्या बात हो गई? मेरी बेटी इतने गुस्से में क्यों है?’ शुक्राचार्य ने देवयानी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा।

शुक्राचार्य देवयानी से बहुत प्यार करते थे। उसकी हर बात मानते थे। इस प्रकार प्यार से पूछने पर देवयानी ने उन्हें पूरी घटना बता दी। शुक्राचार्य को लगा कि पूर्वजन्म के किसी कर्म के कारण ही उसकी पुत्री को दुख झेलना पड़ा होगा। अत: उसे तरह-तरह से समझाने लगे। लेकिन देवयानी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी।

मैं यह सब कुछ नहीं जानती। मुझे उस नगर में नहीं रहना है, जहाँ मेरा और मेरे पिता का अपमान होता हो। अगर आप चलने के लिए राजी नहीं हुए तो मैं अभी इसी समय से खाना-पीना छोड़ दूँगी।देवयानी यह कहकर पैर पटकती हुई घर के अंदर चली गई।

शुक्राचार्य के पास उसकी बात मानने के अलावा और कोई चारा न था। दूसरे ही दिन वे वृषपर्वा की सभा में गए और गुस्से से बोले -राजन् ! ये आपके राज्य कैसा अधर्म हो रहा है?

वृषपर्वा चौंककर बोले – ‘ये आप कैसी बातें कर रहे हैं, मुनिवर? क्या हुआ जिसने आपको इतना क्रोधित कर दिया है?’

शुक्राचार्य ने सारी बातें बताकर कहा – -राजन्, अधर्म के साथ अधिक दिनों तक नहीं रहा जा सकता। पहले तुम लोगों ने बृहस्पति के पुत्र और मेरे शिष्य कच की हत्या का प्रयास किया। अब तुमलोगों ने मेरी ही पुत्री की हत्या का प्रयास किया। अब मैं यहाँ नहीं रह सकता। इसलिए तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ।

असुरराज वृषपर्वा यह सुनकर काँप गए। उनके न रहने पर युद्ध में असुरों की हार निश्चित थी। वे क्षमा माँगते हुए गुरु शुक्राचार्य से रुकने का निवेदन करने लगे। लेकिन शुक्राचार्य नहीं माने। उन्होंने कहा कि जहाँ उनकी बेटी का तिरस्कार हो वहाँ उनका रहना संभव नहीं है।

वृषपर्वा पूरी तरह से निराश हो गए। अंतिम आस लेकर देवयानी के पास गए।

बेटी, तुम जो भी चाहो माँग लो लेकिन यहीं रहो।राजा वृषपर्वा ने अपनी झोली फैलाकर देवयानी से भीख माँगी।

देवयानी इसी अवसर की तलाश में थी। उसने पहले से ही योजना बना राखी थी। वह बोली -राजन् ! शर्मिष्ठा एक सहस्र दासियों के साथ मेरी सेवा करे। मैं जहाँ जाऊँ, वह मेरे पीछे-पीछे चले तो मैं और मेरे पिता आपके राज्य में रुक सकते हैं।

वृषपर्वा खुशी-खुशी तैयार हो गया और उस दिन से शर्मिष्ठा देवयानी की दासी बनकर रहने लगी। देवयानी के मन को बहुत संतोष पहुँचा।

एक दिन देवयानी अपनी दासियों और शर्मिष्ठा के साथ वन में खेलने के लिए गई। राजा ययाति भी उसी वन में घूम रहे थे। इन्हें देखकर परिचय जानने के लिए इनके पास आ गए। देवयानी राजा को देखकर बहुत खुश हुई। वह ऐसे ही किसी अवसर की तलाश में थी, जब राजा से अपनी शादी की बात कर सके। उसने कहा - राजन्, याद है आपको एक दिन आपने मेरी जान बचाई थी, जब मैं कुएँ में गिर पड़ी थी। उसी दिन से मैंने आपको अपना पति चुन लिया था। कृपया मुझे स्वीकार कीजिए।

लेकिन मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ। तुम एक ब्राह्मण कन्या हो और तुम्हारे पिता क्षत्रिय के साथ विवाह के लिए राजी नहीं होंगे।ययाति ने विनम्रता से कहा।

देवयानी फिर भी हठ करती रही, लेकिन जब राजा ययाति नहीं माने तो वह उन्हें लेकर अपने पिता के पास गई। शुक्राचार्य बेटी के हठ के सामने झुक गए और उन्होंने विवाह की अनुमति दे दी। बड़े धूमधाम से दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

विवाह के बाद राजा ययाति देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ अपने राज्य लौट गए। देवयानी अन्तःपुर में रही और शर्मिष्ठा के लिए सबसे बड़े बाग में एक घर बनवाया गया। दोनों ही सुख से रहने लगीं। कुछ समय बाद देवयानी के दो पुत्र हुए - यदु और तर्वसु। दोनों ही बालक राज निवास में पलने लगे।

इस बीच एक दिन राजा ययाति बाग में टहलने गए तो शर्मिष्ठा के रूप को देखकर मोहित गए। शर्मिष्ठा भी राजा से प्यार करती थी। उस दिन के बाद दोनों छुप-छुपकर मिलने लगे। कुछ समय बाद शर्मिष्ठा के भी तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पुरु।

कई वर्षों के बाद एक दिन देवयानी और ययाति उसी बाग में टहलने निकले, जहाँ शर्मिष्ठा अपने बच्चों के साथ रहती थी। टहलते समय देवयानी ने उन बच्चों को देखा। उन अनजान बच्चों को बाग में देखकर वह हैरान रह गई। वे बहुत ही सुन्दर और बलवान् थे। उनका रंग-रूप राजा ययाति के जैसा था। यह जानने के लिए कि ये कौन हैं, देवयानी ने उन्हें अपने पास बुलाकर पूछा - तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?’

बच्चों ने इशारा कर कहा - हमारी माँ का नाम शर्मिष्ठा है।

देवयानी समझ गई कि वे राजा के ही पुत्र हैं। उसी क्षण उसने शर्मिष्ठा को बुरा-भला कहा और गुस्से से राजमहल पहुँची।

राजा को देखते ही वह बोली - आपने मुझे अपना प्रिय नहीं माना और मेरी दासी को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यह आपने अच्छा नहीं किया। यह मेरा घोर अपमान है, अत: अब मैं यहाँ नहीं रह सकती। मैं अपने पिता के पास जा रही हूँ।

यह कहकर देवयानी अपने पिता के पास चली आई। ययाति भी उसे मनाते हुए पहुँच गए। शुक्राचार्य ने जब यह सुना कि राजा ने देवयानी के साथ अन्याय किया है तो वे गुस्से से पागल हो गए। उन्होंने राजा को शाप दे दिया कि वह बूढ़ा हो जाए। उनके शाप देते ही राजा बूढ़े हो गये। इस घटना से राजा बहुत लज्जित हुए। उन्होंने गुरु शुक्राचार्य से क्षमा माँगी और शाप वापस लेने का आग्रह किया।

शुक्राचार्य ने कहा - मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। लेकिन तुमने क्षमा माँगी है तो तुम्हें इतनी छूट देता हूँ कि तुम अपना बुढ़ापा किसी दूसरे को दे सकते हो।

राजा ने देवयानी से भी क्षमा माँगी और उसे लेकर राजमहल आ गए। दूसरे ही दिन उन्होंने अपने सभी पुत्रों को अलग-अलग बुलाकर कहा - तुम मेरे बेटे हो। अपने पिता की बात मानकर मेरा बुढ़ापा ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो।

लेकिन उनके चार बेटों ने उनकी नहीं सुनी। केवल पुरु ही ऐसा था, जो अपने पिता की बात मानने के लिए राजी हुआ। राजा ने पुरु को अपना बुढ़ापा देकर उसका यौवन ले लिया।

समय बीतता गया। कई वर्षों तक राजा ययाति पुरु के दिए हुए यौवन से राज्य करते रहे और सुख भोगते रहे। एक दिन उन्होंने पुरु को बुलाकर उसे उसका यौवन लौटा दिया और उसे राजा बनाने की घोषणा कर दी। देवयानी के साथ सारी प्रजा हाहाकार कर उठी कि बड़े बेटे यदु के होते सबसे छोटे बेटे पुरु को राजा बनाना नियम के विरुद्ध था।

तब ययाति ने कहा - जो पुत्र अपने पिता की आज्ञा नहीं मानता वह पुत्र कहलाने योग्य नहीं है। पुत्र वही है, जो अपने माता-पिता की आज्ञा माने, उनका हित करे और उन्हें सुख दे। पुरु ने मेरी आज्ञा मानी और अपना यौवन तक मुझे दे दिया। इसलिए वही मेरा उचित उत्तराधिकारी है।

प्रजा ने राजा की बात समझकर उनकी बात मान ली। शर्मिष्ठा का सिर गर्व से ऊँचा हो गया।
विश्वजीत 'सपन'

Friday, February 17, 2012

शकुंतला का विरह

जनमेजय ने वैशम्पायन जी से देवताओं, दानवों आदि के जन्म की कथा सुनने के बाद कुरुवंश की उत्पत्ति की कथा सुनने की इच्छा प्रकट की। तब वैशम्पायन जी ने इसी क्रम में दुष्यंत एवं शकुन्तला की कथा सुनाई।
महाभारत, आदिपर्व


शकुंतला का विरह



यह उस समय की बात है, जब पुरुवंश के प्रतापी राजा दुष्यंत हस्तिनापुर पर राज किया करते थे। उस समय पशु-पक्षियों का शिकार करना एक मनोरंजन का साधन था। राजसी लोग अक्सर शिकार करने के लिए वनों में जाते रहते थे। 
     एक दिन की बात है। राजा दुष्यंत शिकार खेलने वन में गए। शिकार खेलते-खेलते घने वन में जा पहुँचे। उनकी सेना पीछे छूट गई। किन्तु वे आगे बढ़ते गए। उस वन को पार करने के बाद उन्हें एक उपवन मिला। वह उपवन बहुत ही सुन्दर था। वहाँ चारों ओर फल-फूलों के वृक्ष लगे हुए थे। उन पर तरह-तरह के फल-फूल लदे थे। उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल रही थी। सुन्दर-सुन्दर पक्षी अपने मधुर स्वरों में चहक रहे थे। उस उपवन की शोभा बड़ी निराली थी।
     दुष्यंत को जानने की इच्छा हुई कि वह उपवन किसका था। वे और आगे बढ़े तो सामने ही उन्हें एक आश्रम दिखाई पड़ा। वहाँ जगह-जगह पर ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे। मालिनी नदी के तट पर बसा वह आश्रम ब्रह्मलोक के समान प्रतीत हो रहा था। उन्होंने आश्रम में प्रवेश किया, किन्तु वहाँ पर कोई दिखाई नहीं दिया। निर्मल एवं शांत उस आश्रम के द्वार पर जाकर उन्होंने पुकार लगाई। कुछ देर बाद अप्सरा के सामान अति-सुंदर एक कन्या तपस्विनी के परिधान में बाहर निकली। अतिथि को देखकर आदर से बोली - "हे अतिथि देव, आपका ऋषि कण्व के आश्रम में स्वागत है।"
     राजा ने अपना परिचय दिया तो उस तपस्विनी कन्या ने उन्हें आदरपूर्वक आसन दिया और  एक अतिथि के समान स्वागत-सत्कार करना प्रारंभ कर दिया। वह बड़े मनोयोग से अतिथि की सेवा करती जा रही थी, जैसे उसका प्रतिदिन का नियम हो। दुष्यंत ने अनुभव किया कि उस कन्या के मुख पर अस्वाभाविक तेज था। वह शांत भाव से एक कुशल स्त्री की भाँति कार्य कर रही थी। राजा दुष्यंत एकटक उस परम सुंदरी को देखते रह गए। वैसा अद्भुत एवं अनुपम सौंदर्य उन्होंने उससे पहले कभी नहीं देखा था। उधर वह स्त्री उन्मुक्त भाव से अतिथि सत्कार में लगी हुई थी। उसे न संकोच था और न ही इस बात का भान कि राजा उसकी सुंदरता पर मोहित होते जा रहे थे। 
     अपने सारे काम निपटा कर उस स्त्री ने राजा से पूछा - "राजन्, हमारा आतिथ्य स्वीकार करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ।"
     राजा ने पूछा - "तुम कौन हो देवी? तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?"
     "मैं शकुंतला हूँ और मैं महर्षि कण्व की पुत्री हूँ।" 
     राजा चकित हो गये और पूछा - "हे सुन्दरी, महर्षि कण्व तो अखण्ड ब्रह्मचारी हैं। फिर तुम उनकी पुत्री कैसे हो सकती हो?"
     "राजन्, इसके लिए आपको मेरे जन्म की कहानी सुननी पड़ेगी।" तपस्विनी बोली।
     "हे सुन्दरी, मैं जानना चाहता हूँ।" राजा ने कहा।
     "तो सुनिये राजन्।"
     तपस्विनी कन्या उनके पास ही बैठ गई और कहने लगी - "एक ऋषि के पूछने पर मेरे पिता कण्व ने मेरे जन्म की कथा कुछ इस प्रकार सुनाई थी। एक बार परम तपस्वी विश्वामित्र तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या के कारण इन्द्र का आसन डोलने लगा, तब उनकी तपस्या भंग करने के उद्देश्य से भगवन इन्द्र ने मेनका नामक एक अप्सरा को भेजा था। तपस्वी विश्वामित्र एवं उस अप्सरा के संयोग से मेरा जन्म हुआ। मेरी माता मुझे वन में छोड़कर चली गई। तब शकुन्तों (पक्षियों) ने जंगली पशुओं से मेरी रक्षा की। इसलिए मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। सौभाग्य से महर्षि कण्व उस वन में घूम रहे थे। उन्होंने मुझे वहाँ उस हालत में देखा तो उठाकर आश्रम ले आए। उन्होंने ही मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया। कहते हैं कि जन्म देने वाले, प्राणों की रक्षा करने वाले और अन्न देने वाले पिता कहे जाते हैं। इसलिए महर्षि कण्व मेरे पिता हैं।"
     तपस्विनी ने बड़ी रोचकता से कहानी बताई।
     दुष्यंत को यह जानकर खुशी हुई कि शकुन्तला क्षत्रिय कन्या थी। वे उसकी सुन्दरता पर पहले से ही मोहित थे। इसलिए अब वे विवाह करने को इच्छुक हो गये। बिना समय नष्ट किए राजा ने शकुंतला के सामने गंधर्व-विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
    

Tuesday, February 7, 2012

गीत - सपना कोई आँखों में रहने लगा .....

गीत - पूर्णिमा वर्मन
संगीत - अमित कपूर
स्वर, स्वर रचना, ध्वनि संयोजन, चलचित्र निर्माण एवं निर्देशन - विश्वजीत 'सपन'

यह गीत यूटूब पर भी उपलब्ध है, लिंक है





Tuesday, January 31, 2012

महाभारत की कहानियाँ

प्रिय मित्रों,

महाभारत एक अद्भुत ग्रन्थ है और इसे पढ़ना एक अविस्मरणीय अनुभव इस ग्रन्थ को जितना पढ़ा जाए, उतना ही लाभान्वित हुआ जा सकता है हर बार नये अनुभवों एवं नये विचारों से परिचय होता जाता है खेद का विषय है कि इस महान ग्रन्थ को इसकी जन्मभूमि भारत में उतनी लोकप्रियता नहीं मिल सकी, जीतनी कि मिलनी चाहिए थी। फिर जो मिली उसे भी मूल रूप से पृथक कर देखने के कारण मिली यह एक ऐसा प्रामाणिक ग्रन्थ है, जिसके मूल रूप को अनदेखा नहीं किया जा सकता है अत: आज आवश्यकता है इसके मौलिक स्वरूप को यथावत रखते हुए इसके प्रचार-प्रसार करने की
     इसी महती उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मैंने इस पुस्तक के विभिन्न अंगों को लगभग यथावत ही पाठकों के समक्ष रखने का प्रयास किया है इस ग्रन्थ से अनेक ग्रंथों कि सृष्टि कि गई और उनमें कई प्रकार के बदलाव भी किये गए यहाँ तक कई विश्व प्रसिद्ध लेखक कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृति 'अभिज्ञान शाकुंतलम' भी इसी ग्रन्थ की एक कथा पर आधारित है और इस कथा में भी कई स्थान पर बदलाव देखे जा सकते हैं हो सकता हो कई ऐसे बदलाव आवश्यक हों अथवा यथासमय के लिए समीचीन हों अथवा अधिक उचित प्रतीत होते हों, किन्तु इसे मूल कहानी नहीं कहा जा सकता है अत: इनके मूल स्वरूप को जानने और उसके संरक्ष्ण कई आवश्यकता है
     इस ग्रन्थ पर आधारित प्रचिलत पुस्तकों की भी कमी नहीं है, यथा पंचतंत्र', 'हितोपदेश' आदि आज हम अन्य भाषाओं में अनेक प्रकार के ग्रंथों के अनुकरण के उदाहरण देखते हैं उन पर टीका-टिप्पणी भी पढ़ते हैं उन पर नये प्रकार की वैचारिक सोचों को उभरते भी देखते हैं, किन्तु उनके मूल को जानने से कतरा जाते हैं अथवा हमें ऐसा अवसर ही नहीं होता कि उन्हें जान पायें ऐसे मैं किसी ऐसे ग्रन्थ की मौलिकता का विशेष महत्त्व हो जाता है उसे संजोकर रखना हमारा कर्तव्य भी हो जाता है अत: यह प्रयास इस ग्रन्थ की मौलिकता को यथावत रखते हुए उन्हें ससम्मान पाठकों के रसास्वादन के लिए उपस्थित करने के लिए किया गया है कथा-कहानियों की सामान्य से लेकर विशेष प्रकारों के समावेश के साथ-साथ इसमें अनन्य प्रकार के विचारों, दर्शनों, सूक्तियों, नैतिकताओं आदि के साक्षात् दर्शन प्रत्येक स्थल पर किये जा सकते हैं अत: ऐसी अद्भुत लेखनी को समाज के लिए उपलब्ध करना और उनकी श्रेष्ठ सीखों से परिचय करवाना ही इस लेखनी का पवित्र उद्देश्य है
     और हाँ, एक और बात. ये बहुत शीघ्र ही पुस्तकों के स्वरूप में पाठकों के सामने होंगीं इसकी पहली कड़ी के रूप में एक पुस्तक "एक थी राजकुमारी" के नाम से प्रकाशनाधीन है, जिसमें इस ग्रन्थ के महिला पात्रों से सम्बंधित बीस कहानियाँ सम्मिलित हैं उन्हीं कहानियों को एक कड़ी के रूप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है आशा है की यह आप पाठकों को रुचिकर प्रतीत होंगीं

नोट: ये कहानियाँ एक कड़ी के रूप में एक के बाद एक प्रकाशित की जायेंगीं. प्रति सप्ताह एक कहानी का मेरा प्रयास होगा.

विश्वजीत 'सपन'

Sunday, December 18, 2011

नारी (आलेख)

(यह आलेख वर्ष १९९१ में सर्वप्रथम किरोड़ीमल कालेज की पत्रिका में छपी और उसके बाद कई अन्य पत्र-पत्रिकाओं में इसने प्रवेश पाया था  यह नारी के प्रति मेरे विचारों कि पुष्टि करता है और मुझे उनके उत्थान की ओर कार्य करने को प्रेरित करता है। यह तस्वीर मेरी पूजनीया माँ की है, जिन्हें मैं जी-जान से प्रेम करता हूँ और उनके सम्मान में यह आलेख समर्पित करता हूँ।)
जय हिंद । जय भारत।
नारी

न जाने कितने विचारक नारी के विषय में अपने-अपने विचार प्रामाणिकता अथवा बिना प्रमाण के ही समाज के सामने रख चुके हैं। वस्तुतः विचारकों के विचार प्रामाणिकता के बिना भी तर्क की कसौटी पर खरे उतरते हैं।
इस बारे में शास्त्रों में कहा गया है, ”तर्क्यतेऽनेनेति तर्कः प्रमाणम्“ अर्थात् जिसके द्वारा प्रमेय आदि के बारे में बताना उद्देश्य नहीं है। परन्तु इससे यह सिद्ध तो हो ही जाता है कि जहाँ प्रमाण की अपेक्षा है, वहाँ तर्क निराधार हो जाते हैं। किन्तु प्रमाण केवल प्रत्यक्ष हो, यह अनिवार्य नहीं है। अतः सब प्रकार के अनुमान आदि पर भी विचार करना पड़ता है।


      एक बार महाकवि भर्तृहरि ने नारी के विषय में अपनी जिज्ञासा शांत करने के उद्देश्य से एक संन्यासी से पूछा, "महात्मन्, नारी क्या है ?"

     संन्यासी ने हँसकर कहा - "राजन्, नारी में सब कुछ है और कुछ भी नहीं है। श्रृंगार है उसमें, वैराग्य है, नीति भी ... वह गणिका है, पतिव्रता है, पत्नी है, माँ है, बहिन है, साथी है, आदिशक्ति है और म्लेच्छ भी ... क्या नहीं है।"

     पुनः एक बार अत्यंत ज्ञानी राजा भोज ने माघ पंडित से अन्य प्रश्नों के क्रम में एक यह प्रश्न भी पूछा कि संसार में क्षमतावान् कौन है। तब महाज्ञानी पंडित माघ ने बताया कि इस चराचर जगत् में दो ही क्षमतावान् हैं - एक पृथ्वी और दूसरी नारी।

     परन्तु अनादिकाल से ही नारी एक अनबूझ पहेली रही है। एक ओर यह भर्तृहरि की पहली पत्नी अनंगसेना की तरह विश्वासघातिनी है तो दूसरी ओर दूसरी पत्नी पिंगला की तरह पति की मृत्यु का समाचारमात्र पाकर शरीर त्यागने वाली पतिव्रता स्त्री। एक तरफ प्रचण्ड काली विनाश का प्रतीक है तो दूसरी तरफ सौम्य सरस्वती शान्ति का। वस्तुतः देखा जाए तो अत्यन्त प्राचीन काल से ही नारी के विभिन्न रूपों की चर्चा होती रही है। वैदिक काल में नारी का परिवार में बड़ा ही महत्त्वपूर्ण स्थान था। उस समय सृष्टि की रचना में नारी का प्रकृति के रूप में उल्लेख किया गया है। शतपथ ब्राह्मण आदि में स्त्री को अर्द्धांगिनी के रूप में स्वीकारा गया है। महाभारत के आदि पर्व में कहा गया है - "जिनके पत्नियाँ हैं, वे ही धार्मिक संस्कार सम्पन्न कर सकते हैं। जो गृहस्थ हैं और जिनके पत्नियाँ हैं, वे ही सुखी रह सकते हैं।" अर्थात् कोई भी धार्मिक कार्य व अनुष्ठान ‘दम्पति’ के बिना पूर्ण नहीं होते थे। इसलिए तब नारी को हमेशा यथोचित आदर व सम्मान मिलता था, बल्कि उन्हें पूजनीय माना जाता था - "यत्र नार्यास्तु पूज्यन्ते, रमन्ते तत्र देवताः"। अर्थात् जहाँ नारियों की पूजा होती है, वहीं देवताओं का वास होता है। यहाँ तक कि वैशाली की नगरवधू आम्रपाली को भी उतनी ही श्रद्धा मिलती थी, जितनी अन्य नारियों को। परन्तु, तत्कालीन समय में नारी की क्या गति है, यह सर्वविदित है। वस्तुतः यह स्थिति भी कुछ हद तक हमारे पूर्वजों की ही देन है। ब्राह्मण काल में ही या यों कहें कि जब शासन-तंत्र पर ब्राह्मणों का बोलबाला था, नारी की इस स्थिति की नींव रखी जा चुकी थी। वह नींव इतनी गहरी और मजबूत रखी गई थी कि आज भी उसमें दरार नहीं पड़ पाई है।

Wednesday, November 16, 2011

दुर्घटना (लघु कथा)


भीड़ भरे बाज़ार में जाना बहुधा परेशानी का कारण बन जाता है। उस दिन सरकारी वाहन लेकर बाज़ार गया। आवश्यक काम था। काम निपटा कर वापस चला ही था कि मेरा वाहन एक दोपहिये से टकराते-टकराते बचा। वह दोपहिया वाहन वाला सहम कर वहीं का वहीं जड़ हो गया। मैं भी अवाक्-सा देखता रह गया। कुछ क्षणों तक समझ में नहीं आया कि क्या हुआ और कैसे? क्षण भर में ही मेरे वाहन के पीछे अनेक वाहनों की कतारें लग गईं। तरह-तरह के वाहनों के हार्न की आवाज़ें कान के परदे फाड़े जा रही थी। सभी झुंझलाए हुए थे। मेरा वाहन चालक तब तक बाहर निकल चुका था। उसने उस दोपहिये वाले से कहा कि वह अपना दोपहिया बगल में कर ले। लेकिन उसने मेरे वाहन चालक की बात पर गौर नहीं किया और अपने दोपहिया को वहीं खड़ा कर मुझे घूरता हुआ मेरे पास आया। मैं अभी तक सकते में था कि अगर मेरी गाड़ी उस दोपहिये पर चढ़ जाती तो क्या होता? वह दोपहिया वाला मेरे पास आया और बोला - "भाई साहब, कम से कम गाड़ी से उतर कर देख तो लो कि मुझे कुछ हुआ भी है या नहीं। बड़े लोग हो, फिर भी सान्त्वना के दो बोल तो बोल ही सकते हो।"
    मैं शर्म के मारे धरती में गड़ गया।