Friday, January 18, 2019

महाभारत की लोककथा भाग - 67


महाभारत की कथा की 92 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
 

विपत्ति का समाधान शोक नहीं

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    प्राचीन काल की बात है। कोसल के राजकुमार क्षेमदर्शी को विपत्ति का सामना करना पड़ा। उसकी समस्त सैनिक शक्ति नष्ट हो गयी। वह शोक करने लगा। जब उसे कोई उपाय न सूझा, तो उसने कालकवृक्षीय मुनि से इसके समाधान की आशा में उनके आश्रम गया और बोला - ‘‘मुनिवर! मैं बड़ी विपत्ति में हूँ। मेरी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गयी। मेरे पास धन नहीं रहा, किन्तु उसका मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ। बार-बार प्रयास करने पर मुझे अपना राज्य नहीं मिल पा रहा। सैनिक शक्ति भी नष्ट हो चुकी है। मैं बड़ी सोचनीय अवस्था में पड़ा हूँ। कृपाकर कुछ ऐसा उपाय बतायें कि मुझे सुख एवं शान्ति की प्राप्ति हो सके।’’


    कालकवृक्षीय मुनि को राजकुमार की दशा का पता था। उसे उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता थी, क्योंकि वह मोह में पड़ गया था। ऐसा विचारकर उन्होंने इस प्रकार कहा - ‘‘राजकुमार! सर्वप्रथम जिस वस्तु को तुम समझते हो कि ‘वह है’, उसको समझो कि ‘वह नहीं है’। यदि किसी ने ऐसा समझ लिया, तो उसे विपत्ति आने पर भी शोक नहीं होता। यदि तुम बड़ी सम्पत्ति का मोह त्याग न सको, तो कम से कम उसकी ममता का त्याग कर दो। यदि तुम यह मान लेते तो कि जो वस्तु थी, वह मेरी न थी, तब तुम्हें उसके खोने का दुःख न होगा।’’


    राजकुमार ने पूछा - ‘‘सम्पत्ति तो फिर बनायी जा सकती है, किन्तु घर-परिवार आदि का क्या करें?’’


    मुनि ने कहा - ‘‘आज तुम्हारे पितामह कहाँ है? अनेक नाते-रिश्तेदार नहीं रहे। यह शरीर ही अनित्य है। इसे जाना ही होता है। एक दिन तुम भी न रहोगे। फिर किसके लिये शोक करना? प्रारब्ध बड़ा प्रबल है, वही देता है और छीन भी लेता है। यह धारणा रखो, तो सब ठीक हो जाता है।’’


    राजकुमार बोला - ‘‘उचित कहा आपने। मुझे भी दैवयोग से अनायास ही राज्य प्राप्त हो गया था, जिसे काल ने छीन लिया। अब तो जो कुछ भी मिल जाता है, उन्हीं से जीवन-निर्वाह कर रहा हूँ।’’


    मुनि ने इसका समाधान देते हुए कहा - ‘‘उचित है, क्योंकि प्रारब्ध को कोई बदल नहीं सकता। यद्यपि धन पाना दुर्लभ है तथापि यह अस्थिर है। इसे इसी प्रकार समझकर सत्पुरुष इसका परित्याग कर देते हैं। दैववश जो भी हमें मिलता है, हमें उसमें ही आनन्दित होना चाहिये। दूसरे के धन को देखकर ईर्ष्या करने से शोक होता है। धर्मात्मा एवं धीर पुरुष तो स्वयंमेव राज्यलक्ष्मी एवं पुत्र-पौत्रों का परित्याग कर देते हैं। तुम भी ऐसा ही करो।’’


    राजकुमार ने पूछा - ‘‘तो क्या अर्थ की कामना ही व्यर्थ है?’’


    मुनि ने उत्तर दिया - ‘‘तुम अर्थ को अनर्थ के रूप में समझो। अर्थ से भोग की इच्छा जागृत होती है। भोगजनित इच्छा से अर्थ सम्पादन की इच्छा जागृत होती है। मानव इसमें इतना रम जाते हैं कि उन्हें इससे बड़ा कोई सुख नहीं लगता, किन्तु यह किसी का नहीं होता। जब इसका नाश होता है, तब उसका सारा सम्मान भी नष्ट हो जाता है। कुछ लोग तो ऐसे भी होते हैं कि धन के लोभ में पड़कर अपने प्राण भी गँवा बैठते हैं।’’


    राजकुमार को उपदेश समझ में आ रहा था। उसकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा - ‘‘फिर जीवन क्या है? उसका उद्देश्य क्या है?’’


    मुनि ने समझाते हुए इसका उत्तर दिया - ‘‘धन जीवन का उद्देश्य नहीं है। धन-संग्रह का अंत विनाश होता है। जीवन का अंत मरण है और संयोग का अंत वियोग। इस बात को समझो कि चाहे मनुष्य धन को छोड़ता है अथवा धन उसे छोड़ देता है। धन किसी के पास कभी टिककर नहीं रहता।’’


    राजकुमार ने कहा - ‘‘आपकी बात समझ गया मुनिवर। अब मुझे क्या करना चाहिये?’’


    कालकवृक्षीय मुनि ने कहा - ‘‘इसे समझने का प्रयास करो कि विपत्ति मात्र तुम्हारे ऊपर नहीं आई है। यह किसी के भी ऊपर आ सकती है, अतः मन, वाणी एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण रखो। घबराओ नहीं, तुममें उत्तम ज्ञान है। तुम्हारी इच्छा भी थोड़ी है। तुममें चंचलता भी नहीं है। तुम्हारा हृदय कोमल है एवं तुम्हारी बुद्धि भी निश्चित पर टिकी है। तुम्हें कपट से भरी एवं शास्त्र के विरुद्ध वृत्ति का आश्रय नहीं लेना चाहिये। तुम सर्वस्व का त्याग कर दो। फल, फूल ग्रहण करते हुए, वन में विचरते हुए अपनी जीविका का निर्वाह करो।’’


    राजकुमार क्षेमदर्शी ने कहा - ‘‘किन्तु राज्य की प्राप्ति कैसे हो?’’


मुनि ने कहा - ‘‘काम, क्रोध, हर्ष, भय एवं दम्भ का त्यागकर शत्रुओं की भी सेवा करो। उनसे मेल बढ़ाओ। किसी प्रकार राजा जनक को प्रसन्न करो। बुद्धिमानों का विश्वास-भाजन बनकर शत्रुओं के राज्य में भ्रमण करो। शत्रु का कोष खाली करवा दो। दान करवा के उसकी सम्पत्ति क्षीण कर दो। नीरोग शत्रु को कृत्रिम उपायों से मरवा दो। तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।’’


राजकुमार ने कहा - ‘‘किन्तु मैं कपट से कुछ नहीं करना चाहता। अपना राज्य भी नहीं चाहता। मुझे कोई दूसरा उपाय बताइये।’’


मुनि ने कहा ‘‘तुम सत्य ही गुणों से युक्त हो। अगली बार जब विदेहराज आयेंगे, तो मैं अवश्य तुमसे मित्रता का आदेश दूँगा।’’


उसके उपरान्त उन्होंने विदेहराज को संदेश भिजवाया। वे आये तो उनसे कहा - ‘‘यह राजकुमार उच्च कुल का है। यह धर्मात्मा है। इसमें कोई भी दुर्भावना नहीं है। इससे संधि कर लो।’’


जनक ने कहा - ‘‘आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है। आपने मेरे कल्याण के लिये ही सोचा होगा।’’


फिर उन्होंने कोसल राजकुमार को बुलाकर कहा - ‘‘मैंने धर्म एवं नीति का पालन कर धरती पर विजय पायी है, किन्तु आपने अपने गुणों से मुझे जीत लिया। आप मेरे घर पधारें।’’


उसके उपरान्त दोनों ने मुनि को प्रणाम किया और मिथिला नगरी की ओर प्रस्थान कर गये। राजकुमार के साथ उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। उन्हें धन-सम्पत्ति देकर विदा किया।


शास्त्रों में कहा गया है कि जब राजा मेल से रहते हैं, तो उनकी उन्नति कोई नहीं रोक सकता।


Friday, January 11, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 66)




महाभारत की कथा की 91 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।  

विरोध से किसी का भला नहीं होता
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    यह एक प्राचीन इतिहास है। पूर्वकाल में एक समय था, जब धरती पर राजा पुरूरवा का राज्य था। वे बड़े धर्मज्ञ एवं नीतिपरायण राजा थे। जब भी उन्हें कोई शंका होती थी, तब वे महर्षि कश्यप के पास जाकर उसका समाधान किया करते थे। एक बार ऐसी ही शंकायें लेकर वे कश्यप के पास गये। कश्यप ने उनका आश्रम में स्वागत किया और बोले - ‘‘कहिये राजन्! आप किस प्रयोजन से मेरे आश्रम में पधारे हैं? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’


    पुरूरवा ने कहा - ‘‘मुनिवर! जब ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों एक-दूसरे का परित्याग कर दें, तो दूसरे वर्ण के लोग किसे प्रधान समझें और प्रजा को किसका पक्ष लेना चाहिये? कृपया मेरी इस शंका का समाधान करें।’’


    कश्यप ने कहा - ‘‘राजन्! ब्राह्मण एवं क्षत्रिय में विरोध उचित नहीं। जहाँ क्षत्रिय ब्राह्मण का विरोध करते हैं, वहाँ क्षत्रिय का राज्य नष्ट हो जाता है। उन क्षत्रियों की वृद्धि रुक जाती है। तब क्षत्रिय न यज्ञ कर पाते हैं और न ही वेदाध्ययन। उनका विकास पूरी तरह से रुक जाता है। वे तब अमंगल करने लगते हैं एवं धर्म से विलग हो जाते हैं।’’
    पुरूरवा ने कहा - ‘‘उचित है, मुनिवर। यदि ब्राह्मण क्षत्रिय का विरोध करे, तो क्या होता है?’’


    कश्यप ने कहा - ‘‘राजन्! तब ब्राह्मण की रक्षा नहीं होती। उन्हें भय का जीवन बिताना पड़ता है। उन्हें दान-उपहार नहीं मिलता, तो जीवकोपार्जन उनके लिये कठिन हो जाता है, अतः दोनों को मिलकर रहना चाहिये। ब्राह्मण की उन्नति का आधार क्षत्रिय होता है और क्षत्रिय के अभ्युदय का आधार ब्राह्मण। दोनों जातियाँ एक-दूसरे पर आश्रित हैं, यदि इनकी प्राचीन काल से चली आ रही मित्रता टूट जाती है, तो विनाश प्रारंभ हो जाता है। चारों वर्णों की प्रजा पर मोह छा जाता है। प्रजा अपने मार्ग से भटक जाती है।’’


    पुरूरवा ने कहा - ‘‘क्या ब्राह्मणों को छोड़ देना पापकर्म के समान है?’’


    कश्यप ने कहा - ‘‘महाराज, इसे इस प्रकार समझें। ब्राह्मणरूपी वृक्ष सुख एवं सुवर्ण की वर्षा करता है। यदि उसकी रक्षा न की गयी, तो इससे निरन्तर दुःख एवं पाप की वृद्धि होती है। तब क्षत्रिय न चाहते हुए भी पापियों के संसर्ग में आ जाते हैं। तब उनसे पापकर्म होने लगता है, जिस कारण वे वर्षों तक कष्ट भोगते हुए दौड़ते फिरते हैं। वहीं ब्राह्मण जैसे पुण्यात्माओं के संसर्ग से वे सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को पुण्य लोक की प्राप्ति होती है। जहाँ घी के दिये जलते हैं। अतः ब्राह्मणों का सम्मान करना समाज के हित में होता है।’’


    पुरूरवा ने पूछा - ‘‘उचित कहा आपने गुरुवर। इस संदर्भ में एक राजा का क्या कर्तव्य होना चाहिये?’’


    कश्यप ने उन्हें समझाया - ‘‘राजा को एक बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि विद्वान्, ज्ञानी, तपस्वी ब्राह्मणों का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये। ऐसा होने से राजा को हानि होती है। प्रजा को असह्य दुःख उठाना पड़ता है। एक राजा को चाहिये कि वह एक बहुज्ञ पुरोहित अवश्य बनाये। राज्याभिषेक होने के पूर्व ही एक योग्य पुरोहित का वरण कर लेना चाहिये। इसका कारण यही है कि धर्म के अनुसार ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। वेदवत्ता विद्वानों का कहना है कि सर्वप्रथम ब्राह्मण का जन्म हुआ था, अतः वे सभी वर्णों में ज्येष्ठ, सम्माननीय तथा पूजनीय होते हैं। बलवान् होते हुए भी राजा का कर्तव्य है कि वह धर्मानुसार सभी उत्तम वस्तुओं का निवेदन ब्राह्मण से करे। इस बात में संदेह नहीं कि ब्राह्मण क्षत्रिय को उन्नतिशील बनाते हैं एवं क्षत्रिय ब्राह्मण की उन्नति में कारण होते हैं। राजा का कर्तव्य यही है कि वह सदा ही ब्राह्मण का विशेष सम्मान करे।’’


    पुरूरवा ने सम्मान से महर्षि कश्यप को प्रणाम किया तो कश्यप ने पुनः कहा - ‘‘राजन्! धर्म एवं अर्थ को समझना कठिन होता है, अतः एक राजा को सत्परामर्श के लिये एक बहुज्ञ पुरोहित अवश्य रखना चाहिये। जिस देश में राजा एवं पुरोहित धर्मज्ञ तथा राजनीति के गूढ़ रहस्य को समझने वाले होते हैं, उस राज्य का एवं उसकी प्रजा का भला होता है। ब्राह्मण एवं क्षत्रिय में परस्पर सद्भाव होता है, तो प्रजा को सुख मिलता है। यदि उनमें वैमनस्य होता है, तो उस राज्य एवं उसकी प्रजा का निश्चित ही नाश होता है।’’


    पुरूरवा को समाधान मिल गया था। महर्षि कश्यप के बताये मार्ग पर चलते हुए एवं धर्म का पालन करते हुए उन्होंने अनेक वर्षों तक धरती पर राज्य किया। उनके राज्य में प्रजा सुखी रही एवं भयरहित रही।


    जीवन में परस्पर मिलकर रहने से ही जीवन सुखमय एवं शान्तिमय रहता है। विरोध से कभी किसी का भला नहीं होता। यह मूलमंत्र ही इस कथा का उद्देश्य है।


विश्वजीत 'सपन'

Friday, January 4, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 65)




महाभारत की कथा की 90 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 
 

राजा की आवश्यकता
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किसी भी प्रकार के समाज में एक राजा की आवश्यकता होती है। जिस देश में राजा नहीं होता, उसमें धर्म की स्थिति नहीं होती। तब राज्य में अराजकता फैल जाती है। पापियों द्वारा समस्त प्रजा को कष्ट पहुँचाया जाता है। इसी कारण देवताओं ने प्रजापालन के लिये राजाओं की सृष्टि की है। पूर्वकाल में एक बार ऐसा ही हुआ कि धरती पर धर्म का लोप होने लगा। राजा से हीन धरती नष्ट होने वाली थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि धरती पर प्रजा नहीं होगी। अधर्म का बोलबाला होने लगा था। देवताओं ने जब देखा, तो वे बड़े दुःखी हुए। वे सभी मिलकर ब्रह्मा जी के पास गये एवं उनसे कहा - ‘‘भगवन्! धरती पर विनाश के बादल छा गये हैं। धर्म एवं वेद का लोप हो रहा है। प्रजा मोह में पड़कर अनुचित कार्यों में संलग्न हो रही है। वहाँ कोई राजा नहीं है। आप ही कुछ उपाय करें, अन्यथा समस्त पृथ्वी का विनाश हो जायेगा।’’


    तब ब्रह्मा जी कहा - ‘‘देवतागण, आप लोग चिंता न करें। पृथ्वी की स्थिति मुझे भी ज्ञात है। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। मैं कुछ उपाय करता हूँ।’’


उसके उपरान्त उन्होंने थोड़ी देर तक आपनी आँखें मूँदकर विचार किया। फिर उन्होंने मनु को बुला भेजा।


मनु ने आकर उन्हें प्रणाम किया और बोले - ‘‘भगवन्! आपने मुझे किस प्रयोजन से बुलाया है? आपकी क्या आज्ञा है?’’


ब्रह्मा जी ने कहा - ‘‘जाओ तुम पृथ्वी पर जाकर राजा का कर्म करो तथा नष्ट होती पृथ्वी की रक्षा करो। यह कार्य तुम्हीं कर सकते हो।’’


    मनु के मन में अनेक आशंकायें थीं। वे राजा बनना नहीं चाहते थे। उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा - ‘‘भगवन्! मुझे राजा नहीं बनना है। राजा का कार्य बड़ा कठिन होता है। फिर मैं पाप से अत्यधिक डरता हूँ। विशेषतः मनुष्य जाति में असत्यपूर्ण आचरण अत्यधिक होता है। उनका राजा बनना एक कठिन कार्य है तथा पाप में पड़ने जैसा है, अतः मुझे क्षमा करें।’’


    तब ब्रह्मा जी ने राजा की महत्ता बताते हुए तथा स्वयं ब्रह्मा की भक्ति हेतु प्रेरित करते हुए कहा - ‘‘तुम पापकर्म से मत डरो। जो पाप करेगा, उसे ही पाप लगेगा। इसमें तुम्हें कोई दोष न होगा। राजा तो निष्पक्ष होता है। वह धर्म का पालन करता है। मेरा विश्वास है कि तुम बड़े सुयोग्य राजा होगे। तुम्हारे प्रताप से प्रजा सुखी रहेगी। कोई भी तुम्हें दबा नहीं पायेगा। तुम सर्वदा विजयी होगे। तुम्हारे कारण जो प्रजा सुखी होगी तथा धर्म का कार्य करेगी, तब उसका चतुर्थांश तुम्हें भी मिलेगा। उस धर्म के प्रभाव से तुम्हें ब्रह्मा की भक्ति का प्रसाद मिलेगा। मेरी आज्ञा है कि तुम पृथ्वी पर जाओ एवं शत्रुओं का मानमर्दन करो। प्रजा की रक्षा करो। उनको धर्म में लगाओ। तुम्हें सदा विजय की प्राप्ति हो।’’


    इस प्रकार जब ब्रह्मा जी ने मनु को प्रेरित किया, तो मनु पृथ्वी का राजा बनने के लिये तैयार हो गये। उसके उपरान्त उन्होंने ब्रह्मा जी से आज्ञा ली, उन्हें प्रणाम किया तथा बड़ी भारी सेना लेकर विजय अभियान के लिये निकल पड़े। 


    मनु महाराज ने पृथ्वी पर सर्वत्र घूम-घूमकर पापियों का दमन किया। सभी शत्रु राजाओं को हराकर एक राज्य की स्थापना की। उनके पराक्रम को देखकर सभी दंग रह गये। कुछ ही समय में प्रजा में भय की समाप्ति हुई। वे सुखपूर्वक रहने लगे। मनु ने धर्म का कार्य प्रारंभ किया। धीरे-धीरे प्रजा भी धर्म के कार्यों को करने लगी। समस्त पृथ्वी में शान्ति-व्यवस्था की स्थापना हुई। बुरे एवं अनुचित कर्म करने वालों को उचित दण्ड देकर उन्होंने समाज को उचित मार्ग दिखाया। उन्होंने अपने राजा होने के सभी कर्तव्यों का पालन किया।


    उन्होंने ब्राह्मणों का सत्कार किया। उन्हें दान देकर पुण्य का कार्य किया। ब्राह्मण उन्हें आशीर्वाद देते थे, फलतः उन पर बुरी शक्ति की छाया न पड़ने पाती थी। ऋषि-मुनि निष्कंटक वन में रहने लगे। उनका भय समाप्त हो गया। वे राजा के लिये लिये यज्ञ करने लगे। उनकी प्रजा बड़ी सुखी थी। वे राजा का सम्मान करने लगे। उन्हें प्रतिदिन राजकोष के लिये अनेक प्रकार के उपहार देने लगे। इस प्रकार राजकोष समृद्ध होने लगा। मनु महाराज ने भी उस राजकोष का उचित उपयोग किया। सारा धन वे प्रजा की सेवा, उनकी दरिद्रता आदि को मिटाने में खर्च करने लगे। इससे समस्त प्रजा की दीनता समाप्त हो गयी। प्रजा उनके गुणगान गाने लगी। उनके लिये अपने-अपने घरों में पूजा-अर्चना करने लगे। उनकी लम्बी आयु की प्रार्थना करने लगे। उसके बाद मनु महाराज ने पृथ्वी पर अनेक वर्षों तक राज्य किया। अंततः उनके समस्त कार्यों के कारण उन्हें ब्रह्मा जी का प्रसाद मिला। उनकी भक्ति का फल मिला।


प्रस्तुति - विश्वजीत 'सपन'

Friday, December 28, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 64)



महाभारत की कथा की 89वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
 
राजधर्म का महत्त्व
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    पूर्व काल की बात है। मन्धाता नामक एक राजा था। वह बड़ा गुणवान् और तपस्वी था। श्री नारायण के दर्शन की उसे अभिलाषा थी। वह संन्यास ग्रहण करना चाहता था। इसी उद्देश्य को लेकर उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ समाप्त कर उसने भगवान् विष्णु के दर्शन की इच्छा से अपना ध्यान उनमें लगा दिया। तब भगवान् प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्र का रूप धारण कर उसे दर्शन दिये। मन्धाता ने इन्द्ररूपी विष्णु का विधिवत पूजन किया तब इन्द्र बोले - ‘‘राजन्! तुमने बड़ी श्रद्धा एवं निष्ठा से यज्ञ किया और हमारा पूजन भी। तुम मानव-जाति के राजा हो। अवश्य तुम्हारी मनोकामनायें होंगी। मैं तुम पर बड़ा प्रसन्न हूँ। माँगो, जो भी वर माँगना चाहते हो, मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा।’’


    मन्धाता की जैसे सभी इच्छायें पूर्ण हो गयीं। उसे तो भगवान् विष्णु का दर्शन करना था तथा संन्यास ग्रहण करना था। उसने कहा - ‘‘भगवन्! अब आपसे क्या छुपाना। मैं सिर झुकाकर आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि मुझे भगवान् विष्णु के दर्शन करा दें। मुझे अब भोगों से कुछ भी लगाव न रहा। मैं अब वन गमन करता चाहता हूँ। मेरी प्रवृत्ति आदिदेव श्रीविष्णु में हो गयी है। अब उनके अनुसार ही चलना चाहता हूँ। बस इतनी कृपा कर दीजिये।’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘राजन्! तुम तो राजधर्म त्यागने की बात कर रहे हो, जबकि राजधर्म तो स्वयं श्रीविष्णु से ही प्रवृत्त हुआ है। दूसरे सभी धर्म तो उसी के अंग हैं। असल में सभी धर्मों का अन्तर्भाव क्षात्रधर्म में ही हो जाता है। श्रीविष्णु ने क्षात्रधर्म के द्वारा ही शत्रुओं का दमन करके देवताओं एवं ऋषियों की रक्षा की थी। यदि वे ऐसा न करते तो ब्राह्मणों का नाश होने से पृथ्वी पर चारों वर्णों का लोप हो जाता। संसार में इन धर्मों का अनेक बार लोप हुआ है तथा इसी क्षात्रधर्म के द्वारा इनका उत्थान होता आया है। 


    राजन्! तुम जैसे लोक-हितैषी पुरुषों को सर्वथा क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिये, अन्यथा प्रजा नष्ट हो जायेगी, कर्तव्य-विहीन हो जायेगी। राजा अपनी प्रजा का पुत्रों के समान देखभाल करता है, अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि इसी कारण समस्त प्राणी निर्भय होकर रहते हैं। इस संसार में क्षात्रधर्म ही श्रेष्ठ है, यह सब जीवों का उपकार करने वाला तथा मोक्ष का साधन है। एक राजा का कर्तव्य अपने राजधर्म का पालन करना ही होता है।’’


    मन्धाता को बात में समझ आ गयी। उसने निर्णय लिया कि वह अपने कर्तव्यों से विमुख न होगा। अब उसे अपने कर्तव्य को करने में जो शंकायें थीं, उनका निदान जानना चाहता था। उसने अपनी शंका का समाधान करने के लिये पूछा - ‘‘देवराज! मेरे राज्य में अनेक जातियों के लोग हैं। उन्हें अपने धर्मों का पालन करने के लिये क्या-क्या करना चाहिये?’’ 


इन्द्र ने कहा - ‘‘प्रजापति ने सब प्रकार के मनुष्यों के लिये, सभी जातियों एवं वर्णों के लिये कर्तव्य पूर्व से ही निश्चित कर दिये हैं, उन सभी को उसी प्रकार आचरण करना चाहिये। उन्हें कभी भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिये।’’


मन्धाता ने पूछा - ‘‘देवराज! अनेक लोग हैं जो लूट-पाट करते हैं, उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘जो लोग लूट-पाट करके जीविका चलाते हैं, उनसे माता-पिता, गुरुओं, आश्रमवासियों आदि की सेवा करवानी चाहिये। उनसे धर्म-कर्म एवं पितृश्राद्ध कराने चाहिये, आश्रम आदि बनवाने चाहिये। उन्हें उचित मार्ग पर लाने के प्रयास करने चाहिये।’’


    मन्धाता ने कहा - ‘‘देवेश! मानव-समाज में दस्यु सभी वर्णों एवं आश्रमों में पाये जाते हैं। वे छुपे रहते हैं। उनके लिये क्या उपाय हैं?’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘राजन्! जब दण्डनीति नष्ट हो जाती है, तब सभी प्राणी कर्तव्य-विमूढ़ हो जाते हैं। राजा लोगों का कर्तव्य है कि वे दण्डनीति द्वारा पापियों को रोकें तथा उन्हें उचित मार्ग पर लायें। इसी कारण राजा का दायित्व सबसे महान् होता है। इसी कारण वे लोक में सम्मान पाते हैं। इस प्रकार तुम वन जाने का विचार त्याग दो तथा क्षात्रधर्म में अपना मन लगाओ। यही तुम्हारे लिये सबसे बड़ा कल्याणकारी मार्ग है।’’


    इस इन्द्ररूपी भगवान् विष्णु ने मन्धाता को क्षात्रधर्म पालन करने का उपदेश दिया तथा वे अपने धाम चले गये। राजा मन्धाता पर इस उपदेश का बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने पूरी निष्ठा से क्षात्रधर्म का पालन किया तथा वह एक प्रजापालक राजा के रूप में विख्यात हुआ।


    शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन तीनों आश्रमों के धर्मों का गृहस्थ धर्म में अन्तर्भाव हो जाता है तथा क्षत्रिय के धर्म तीनों वर्णों के आश्रय हैं, क्योंकि समस्त लोक तथा पुण्यकर्मों का आधार राजधर्म ही है।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, December 20, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 63)




महाभारत की कथा की 88वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
(शान्तिपर्व)


दण्डनीति का उद्भव एवं विकास

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    प्राचीन काल की बात है। वह सत्ययुग था। सत्ययुग के प्रारंभ में राज्य अथवा राजा नहीं होते थे, क्योंकि तब कोई अपराध ही नहीं होते थे। एक समय आया जब प्रजा मोह में पड़ गयी। तब उनका विवेक भी भ्रष्ट हो गया। वे कर्तव्य एवं अकर्तव्य का विभेद करने में अक्षम हो गये। धर्म का पतन हो जाने से वेद भी लुप्त होने लगे। समस्त संसार में भय का वातावरण उत्पन्न हो गया। ऐसी स्थिति को देखकर देवतागण को बड़ा कष्ट हुआ। वे ब्रह्मा के पास गये और उनसे कहा - ‘‘भगवन्! मनुष्य लोक में पतन का द्वार खुल गया है। वेद आदि नष्ट होते जा रहे हैं। अधर्म का बोलबाला होता जा रहा है। धर्म संकट में है। ऐसी स्थिति में धर्म की रक्षा कैसे हो? आप ही कुछ उपाय कीजिये, अन्यथा सब-कुछ नष्ट हो जायेगा।’’


    ब्रह्मा ने कहा - ‘‘देवगण! आप भयभीत न हों। यह समय का चक्र है। यह घूमता ही रहता है। आप लोग थोड़ी देर रुकें, मैं कुछ न कुछ उपाय करता हूँ।’’


    उसके उपरान्त ब्रह्मा ने अपनी बुद्धि से एक लाख अध्यायों का एक नीतिशास्त्र रचा। उसमें धर्म, अर्थ एवं काम का वर्णन था, अतः उसका नाम ‘‘त्रिवर्ग’’ रखा गया। इस शास्त्र में साम, दाम, दण्ड, भेद एवं उपेक्षा का वर्णन सविस्तार किया गया। इस नीतिशास्त्र में वह सब-कुछ था, जो एक प्रजापालन में सम्मिलित होना चाहिये। 


    नीतिशास्त्र की रचना करने के उपरान्त ब्रह्मा जी ने कहा - ‘‘देवगण, यह दण्डनीति तीनों लोकों में व्याप्त है। इसी से राज्यव्यवस्था चलती है। इसी से पृथ्वी की कल्याण संभव है। आपलोग इसको ग्रहण करें।’’


    किन्तु वह शास्त्र बड़ा विशाल था। उसका अध्ययन भी कठिन था। देवगण पुनः कठिनाई में थे। उनकी चिंता देखकर भगवान् शंकर ने सर्वप्रथम उस शास्त्र को ग्रहण किया तथा जीवों की घटती आयु को देखते हुए उसे संक्षिप्त किया। तब वह ग्रन्थ ‘वैशालाक्ष’ कहलाया। इसमें दस हज़ार अध्याय थे। पुनः इसे इन्द्र ने ग्रहण किया एवं संक्षिप्त किया। तब इसमें पाँच हज़ार अध्याय रहे गये तथा यह ‘बाहुदन्तक’ कहलाया। तब बृहस्पति जी ने तीन हज़ार अध्यायों तक इसे संक्षिप्त किया तथा वह ‘बार्हस्पत्य’ कहलाया। इसके बाद योगाचार्य गुरु शुक्राचार्य ने इसे संक्षिप्त कर मात्र एक हज़ार अध्यायों का कर दिया। पुनः मनुष्यों की आयु को ध्यान में रखते हुए महर्षियों ने एक छोटा-सा ग्रन्थ बना दिया, जो मनुष्य हेतु प्राप्य एवं प्रजापलन में सहायक हो। यही शास्त्र दण्डनीति कहलाया।


    इसके पश्चात् मृत्यु की मानसी पुत्री सुनीथा से राजा अंग के द्वारा वेन का जन्म हुआ। वह दुराचारी ही रहा। वह राग-द्वेष के अधीन अधर्म करने लगा। तब वेदवादी मुनियों ने उसे अभिमन्त्रित कुशाओं से मार डाला। उसके मरते ही कोई प्रजापालक न रहा। इससे और भी अधिक समस्या उपस्थित हो गयी। इस स्थिति को देखते हुए मुनियों ने वेन के दाहिने हाथ का मंथन किया। उससे इन्द्र के समान तेज वाला वेनपुत्र उत्पन्न हुआ। वह वेद-वेदांगों का ज्ञाता था तथा सभी विद्याओं में पारंगत था। उसका नाम पृथु रखा गया।


    पृथु ने मुनियों से कहा - ‘‘मुनिगण, मुझे धर्म एवं अर्थ के निर्णय की सूक्ष्म बुद्धि है। आपने मुझे जन्म दिया, तो अवश्य ही कोई विशेष कार्य होगा। मुझे बताइये कि मुझे अब क्या करना चाहिये?’’


    मुनियों ने कहा - ‘‘तुम्हें धर्म का पालन करना है और उसे धरती पर पुनः स्थापित करना है। जिस कार्य में धर्म की स्थिति जान पड़े उसे निःशंक करो। सभी जीवों के प्रति समान भाव रखो। जो मनुष्य धर्म से विलग होता दिखाई दे, उसका दमन करो।’’


    पृथु ने कहा - ‘‘मुनिगण, ब्राह्मण तो सर्वदा वन्दनीय हैं, अतः उन्हें छोड़कर मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।’’


    मुनियों ने मान लिया और पृथु ने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। तब पृथ्वी बड़ी ऊँची-नीची थी। पृथु ने पत्थर, मिट्टी आदि डलवाकर उसे समतल किया। सभी देवताओं ने मिलकर पृथु का अभिषेक किया। स्वयं पृथ्वी उनकी सभा में उपस्थित हुई थी। पृथु के संकल्प से करोड़ों हाथी, घोड़े, रथ, पैदल आदि उत्पन्न हो गये। सभी जीवों का भय समाप्त हो गया। वे प्रसन्न होकर अपना जीवन जीने लगे। पृथु ने दण्डनीति का सुन्दर अनुपालन किया और धरती को स्वर्ग बना दिया। उन्होंने समस्त प्रजा का ‘रंजन’ किया एवं इसी कारण उन्हें प्रथम ‘राजा’ होने का गौरव प्राप्त हुआ। ब्राह्मणों का क्षति से त्राण किया, इस कारण वे ‘क्षत्रिय’ कहलाये। उन्होंने धर्मानुसार भूमि को प्रथित (पालित) किया और इसी कारण धरती का नाम ‘पृथ्वी’ पड़ा। 


    उनके शरीर में स्वयं भगवान् विष्णु का आवेश था, अतः सारा संसार उन्हें देवता की भाँति मानकर उनका सम्मान करता था। उन्होंने पहली बार पृथ्वी पर दण्डनीति का पालन किया और समस्त संसार को भयमुक्त किया।


    कहते हैं कि सभी राजा को गुप्तचरों द्वारा दृष्टि रखते हुए दण्डनीति का पालन करना चाहिये। राजा के दण्ड का बड़ा महत्त्व होता है, क्योंकि उसी के कारण समस्त राष्ट्र में नीति एवं न्याय का आचरण होता है। 


विश्वजीत 'सपन'

Monday, December 10, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 62)




महाभारत की कथा की 87वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 
 
परशुराम का जीवन-चरित
 

प्राचीन काल में जह्नु नामक एक राजा हुए। उनके पुत्र का नाम था अज। अज से बलाकाश्व का जन्म हुआ। बलाकाश्व के पुत्र कुशिक बड़े धर्मज्ञ हुए। उन्होंने पुत्र-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या की। तब स्वयं इन्द्र ही उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए एवं उनका नाम पड़ा गाधि। गाधि के कोई पुत्र न था, एक पुत्री हुई, जिसका नाम था सत्यवती। सत्यवती शुद्ध आचरण वाली तपस्विनी स्त्री थी। उसके इस प्रकार के व्यवहार को देखते हुए गाधि ने उसका विवाह मुनि ऋचीक से कर दिया।


मुनि ऋचीक को पता था कि गाधि एवं सत्यवती दोनों को पुत्र प्राप्ति की इच्छा थी। इसको ध्यान में रखते हुए एक दिन उन्होंने राजा गाधि एवं सत्यवती को संतान देने के लिये चरु तैयार किये। सत्यवती को बुलाकर चरु देते हुए उन्होंने कहा - ‘‘देवि! यह दो प्रकार का चरु है। इसमें से यह तुम ले लेना और दूसरा अपनी माँ को दे देना। तुम्हारी माता को एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी, जो बड़े-बड़े क्षत्रियों का संहार करेगा। तुम्हें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण बालक की प्राप्ति होगी, जो तपस्वी एवं धैर्यवान् होगा।’’


ऋचीक मुनि ऐसा कहकर वन को चले गये। तभी तीर्थयात्रा को निकले गाधि अपनी पत्नी सहित ऋचीक के आश्रम पर आये। सत्यवती ने अपनी माता को चरु के बारे में बताया, किन्तु भूलवश चरु बदल गये और उन दोनों के एक-दूसरे के लिये दिये चरु को खा लिया। कुछ समय उपरान्त दोनों को गर्भ ठहर गया। सत्यवती के गर्भ को देखते ही ऋचीक ने पहचान लिया कि चरु खाने में भूल हुई है, वे अपनी पत्नी से बोले - ‘‘यह तो अनुचित हुआ प्रिये, मैंने तुम्हारे चरु में ब्राह्मण का तेज स्थापित किया था, किन्तु अब तुम्हारा पुत्र क्षत्रिय उत्पन्न होगा।’’
 

सत्यवती बोली - ‘‘भगवन्! ऐसा न कहिये। मुझे तो ब्राह्मण पुत्र ही चाहिये।’’

ऋचीक ने कहा - ‘‘मैंने ऐसा संकल्प नहीं किया था, किन्तु चरु के बदल जाने से ऐसा ही होगा।’’


सत्यवती बोली - ‘‘मुनिवर! आप तो इच्छा करते ही सृष्टि रच सकते हैं। कोई उपाय कर मुझे शान्त पुत्र ही दीजिये, चाहे मेरा पौत्र उग्र स्वभाव का क्यों न हो।’’


ऋचीक ने कहा - ‘‘तो फिर ठीक है, जैसा तुम कहती हो, वैसा ही होगा। मैं ऐसा ही वरदान तुम्हें देता हूँ।’’


उसके बाद ऋचीक मुनि के ऐसा संकल्प करने से सत्यवती ने जमदग्नि मुनि को जन्म दिया और राजा गाधि के यहाँ विश्वामित्र पैदा हुए।


विश्वामित्र में ब्राह्मण के गुण हुए और उन्होंने चरु के प्रभाव के कारण ही अंततः ब्राह्मणत्व की प्राप्ति भी की थी। उधर जमदग्नि ने पुत्र अर्थात् सत्यवती के पौत्र परशुराम हुए। उनका स्वभाग उग्र था तथा वे सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञाता हुए।

जब परशुराम बड़े हुए, तब हैहयवंशी क्षत्रियों का स्वामी अर्जुन नामक एक राजा था। अर्जुन राजा कृतवीर्य का पुत्र था। वह बड़ा पराक्रमी था, किन्तु थोड़ा घमण्डी भी था। उसने अश्वमेध यज्ञ से सम्पूर्ण पृथ्वी जीती और उसे ब्राह्मणों को दान में दे दी। उसने दत्तात्रेय की कृपा से सहस्र भुजायें प्राप्त कीं। एक बार अग्नि के भिक्षा माँगने पर उसने अपनी भुजाओं के पराक्रम को बताते हुए उन्हें भिक्षा दी। कुपित अग्नि ने उसके बाणों के अग्रभाग से निकलकर अनेक गाँवों, नगरों आदि का जला दिया। इस आग ने आपव मुनि का आश्रम भी जला दिया। तब कुपित होकर आपव मुनि ने उसे शाप देते हुए कहा - ‘‘तुम्हें जिन भुजाओं पर घमण्ड है, उसका नाश होगा, उन्हें संग्राम में परशुराम जी काट डालेंगे।’’


अर्जुन के पुत्र बड़े बली थे, किन्तु मूर्ख भी थे। वे घमण्डी एवं क्रूर भी थे। एक दिन वे जमदग्नि के आश्रम के पास से निकल रहे थे। उन्होंने उनकी गाय के बछड़े को चुरा लिया। उस बछड़े के लिये बड़ा भयंकर युद्ध हुआ और उस युद्ध में परशुराम ने अर्जुन की भुजाओं को काट दिया। फिर वे बछड़े को लेकर अपने आश्रम चले गये। 


अर्जुन के पुत्र भी चुप रहने वालों में से न थे। एक दिन अवसर पाकर जब परशुराम आश्रम में न थे तथा कुश एवं समिधा लाने वन गये हुए थे, तब अर्जुन के पुत्रों ने जगदग्नि का सिर काटकर उनका वध कर दिया। पिता के वध से क्रोधित होकर परशुराम ने क्षत्रियों के विनाश का संकल्प लिया और अस्त्र उठा लिये। सर्वप्रथम उन्होंने हैहयवंशियों पर आक्रमण किया एवं उन्हें समूल नष्ट कर दिया। इसके बाद भी कुछ क्षत्रिय बच गये थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपना पराक्रम बढ़ाया। जैसे ही परशुराम जी को यह पता चला तो उन्होंने पुनः शस्त्र उठाये एवं क्षत्रियों के बालकों तक को मार दिया। अब क्षत्रिय मात्र गर्भ में ही बचे थे। वे बच्चे भी जब जन्म लेते थे, तो उनका पता लगाकर वे उनका भी वध कर देते थे। इस प्रकार इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करके उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया तथा सम्पूर्ण पृथ्वी को कश्यप जी को दान में दे दी। तब क्षत्रियों की रक्षा करने के उद्देश्य से कश्यप ने परशुराम से कहा - ‘‘परशुराम, तुमने अपना कार्य सम्पन्न कर लिया। तुम अब दक्षिण समुद्र के किनारे चले जाओ और मेरे राज्य में कभी निवास न करना।’’

परशुराम वहाँ से चले गये और समुद्र ने उनके लिये स्थान खाली किया, जो शूर्पारक देश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसे अपरान्त भूमि भी कहते हैं।


विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, December 4, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 61)


महाभारत की कथा की 86वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

मानव धर्म का रहस्य
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प्राचीन काल की बात है। विदेहराज जनक को शोक हुआ। वे इससे मुक्ति पाना चाहते थे। तब उन्होंने विप्रवर अश्मा से पूछा - ‘‘हे विप्रवर! मुझे शोक हुआ है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे में क्या करना चाहिये। कृपा कर अपना कल्याण करने वाले मानव का व्यवहार कैसा होना चाहिये, इसका ज्ञान मुझे दीजिये?’’


अश्मा महान् ज्ञानी एवं तत्त्ववेत्ता थे। वे राजा की दुविधा को समझ रहे थे। उन्होंने कहा - ‘‘राजन्! मानव जीवन को भली-भाँति समझना आवश्यक होता है। इस बात को मन में अच्छी तरह से बिठा लें कि जन्म लेते ही प्रत्येक मानव दुःख एवं सुख का अनुभव करने लगता है। इसी कारण उसका ज्ञान अंधकार में छुप जाता है। जिस प्रकार वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है, ठीक उसी प्रकार ये सुख-दुःख भी मानव के ज्ञान को नष्ट कर देते हैं। असल में सुख एवं दुःख प्रारब्ध के अनुसार आते ही हैं और आयेंगे ही। इनसे मुक्ति संभव नहीं है। विधाता की करनी बड़ी विचित्र है। भूख-प्यास, रोग, आपत्ति, ज्वर, मृत्यु आदि सब के सब जीव के जन्म के समय ही निश्चित हो जाते हैं। नियम के अनुसार समस्त प्राणियों को इनसे होकर ही जाना पड़ता है। इस प्रकार काल के प्रभाव से जीवों का सम्बन्ध इष्ट एवं अनिष्ट दोनों से होता है। यही जीवन है तथा जीवन का यही ज्ञान वास्तविक ज्ञान कहलाता है।’’


जनक ने पूछा - ‘‘हे ब्राह्मण देवता, आपने सही कहा। मुझे यह बताने का कष्ट करें कि क्या मृत्यु पर विजय नहीं पायी जा सकती?’’


अश्मा ने कहा - ‘‘यह संभव नहीं है राजन्, मृत्यु सभी को आनी है, तब वह चाहे आज हो अथवा कल। मनुष्य जब मृत्यु के निकट होता है अथवा जब वह वृद्धावस्था में जाता है, तब कोई औषधि, मन्त्र, होम अथवा पूजा उसे बचा नहीं सकते। मृत्यु का यह लम्बा मार्ग समस्त जीवों को तय करना ही पड़ता है। तपस्वी, दानी एवं बड़े-बड़े यज्ञ करने वाले भी वृद्धावस्था तथा मृत्यु को पार नहीं कर सकते।’’ 


राजा जनक ने कहा - ‘‘उचित है विप्रवर, कृपया ये भी बतायें कि हमारे संबंधी, नाते-रिश्तेदार आदि के संदर्भ में क्या सत्य है? हमारा मोह उनसे लगा ही रहता है।’’


अश्मा ने कहा - ‘‘राजन्! बड़ा ही सुन्दर प्रश्न किया आपने। इसके उत्तर को समझ लेने वाले को कभी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है। ये रिश्ते-नातेदार भी उसी प्रकार मिलते एवं बिछुड़ते रहते हैं, जिस प्रकार समुद्र में दो लक्कड़ मिलते एवं बिछुड़ते रहते हैं। इस संसार में माता-पिता, स्त्री, पुत्र, पुत्री आदि किसके हुए हैं? विचार करें, तो इस जीव का न तो कोई सम्बन्धी हुआ है तथा न कभी होगा। याद कीजिये कि आपके बाप-दादा कहाँ चले गये? अब न वे आपको देख सकते हैं और न आप उन्हें। सब के सब एक दिन मिट जाते हैं। स्वर्ग एवं नरक को मनुष्य अपनी आँखों से कभी देख ही नहीं सकता। उन्हें देखने के लिये सत्पुरुष शास्त्ररूपी नेत्रों से काम लेते हैं। अतः इस बात को समझिये कि यह संसार ही अनित्य है एवं चक्र के समान घूमता रहता है। सभी को आना है तथा पुनः जाना है। यही नियम है, अतः जीव को सभी प्रकार के शोकों को भूल जाना चाहिये। उसे स्वयं से पूछना चाहिये कि शोक किसके लिये करना है? मेरा तो कोई है ही नहीं। किसी के प्रति मोह मात्र जीव का भ्रम है।’’


राजा जनक ने पूछा - ‘‘विप्रवर! यदि यह संसार ही भ्रम है, तो ऐसे में एक मानव का स्वभाव क्या होना चाहिये? उसे किस प्रकार का आचरण करना चाहिये?’’


अश्मा ने कहा - ‘‘जिसे अपने कल्याण की चिंता है, उस मनुष्य को शास्त्रों का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिये। उसे चाहिये कि वह पितरों का श्राद्ध एवं देवताओं के पूजन करे। पहले मनुष्य को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। उसके बाद उसे गृहस्थ आश्रम का पालन करना चाहिये। पितरों एवं देवताओं के ऋण से मुक्त होकर संतान उत्पन्न करना चाहिये तथा यज्ञादि करना चाहिये। उसे हृदय का शोक त्याग कर इहलोक, स्वर्गलोक अथवा परमात्मा की आराधना करनी चाहिये। जो राजा शास्त्र के अनुसार धर्म का आचरण करता है तथा द्रव्य-संग्रह करता है, उसका सम्पूर्ण विश्व में सुयश फैलता है, अतः राजन् तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिये।’’


अश्मा मुनि के इस प्रकार कहने से राजा जनक का शोक दूर हो गया। उन्हें धर्म के रहस्य की प्राप्ति हुई तथा उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी। उनका मनोरथ पूर्ण हुआ और वे प्रसन्नचित्त होकर अपने महल वापस लौट गये। यही जीवन का रहस्य है। यही मानव का धर्म है। जो मानव इस प्रकार अपना जीवन यापन करता है, उसे अंततः अंतिम लक्ष्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, November 25, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 60)




महाभारत की कथा की 85वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

राजा का धर्म
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प्राचीन काल की बात है। मिथिला नगरी में राजा जनक का राज्य था। वे बड़े ही सिद्ध पुरुष थे। उन्हें आत्म-ज्ञान हुआ और वे द्वन्द्वों से बिल्कुल मुक्त हो गये थे। वे जीवन के बारे में हमेशा विचार किया करते थे। समय के साथ उनमें विरक्ति का भाव उत्पन्न हो गया। उन्हें लगा कि जो जीवन वे जी रहे थे, वह वास्तविक जीवन न था। ऐसा विचारकर एक दिन उन्होंने सभी से कहा - ‘‘दूसरों की दृष्टि में मेरे पास अनन्त धन है, राज-पाट है, धन-सम्पदा है। यदि देखा जाये, तो मेरा उसमें कुछ भी नहीं है। यदि समस्त मिथिला जल जाये, तोे मेरा कुछ भी न जलेगा। व्यक्ति अकेला आता है और अकेला ही जाता है। उसके साथ कुछ भी नहीं जाता।’’


इस विरक्ति-भाव के आ जाने पर उन्होंने धन, संतान, स्त्री तथा अग्निहोत्र का भी त्याग कर दिया और एक भिक्षुक की भाँति मुट्ठी भर जौ खाकर रहने लगे। इस प्रकार राजा का व्यवहार देख उनकी रानी को बड़ा कष्ट हुआ। ऐसी प्रवृत्ति से राज्य का भला न होने वाला था, अतः उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने पति को राजा के धर्म से अवगत करायें। इस प्रकार उन्होंने अपने पति को समझाना प्रारंभ किया।


कौसल्या बोली - ‘‘राजन्! आपका एक भिक्षुक की भाँति मुट्ठी भर जौ खाकर रहना उचित नहीं है। यह सर्वथा राजधर्म के विरुद्ध है। आपने अपने कर्मों का त्याग किया है, अतः देवता, अतिथि एवं पितरों ने भी आपका परित्याग कर दिया है। मानव-जीवन में कर्म की महत्ता सर्वविदित है। देखिये, आपके रहते हुए भी आपकी माता पुत्रहीना हुई और मैं पतिविहीना। कभी आप समस्त जीवों की भूख मिटाया करते थे, किन्तु अब मुट्ठी भर जौ के लिये आपको हाथ फैलाना पड़ता है। तब इस त्याग में और राज्य करने में अंतर ही क्या रहा?


जो लगातार दान देता है और दान लेता है, उनके मध्य का अंतर समझिये। इस संसार में साधु-संतों को दान देने वाला राजा होना चाहिये। यदि दान देने वाले राजा न रहे, तो मोक्ष की इच्छा रखने वाले महात्माओं का क्या होगा? अन्न से प्राण की पुष्टि होती है, अतः अन्न देने वाला प्राणदाता होता है। सच्चाई तो यही है कि गृहस्थ-धर्म का त्याग करने वाले भी गृहस्थों के सहारे ही जीवन-यापन करते हैं। मुक्ति तो कर्म से भी संभव है। बहुत से लोग जो गेरुए वस्त्र पहन कर घर से निकल जाते हैं, वे नाना प्रकार के बंधनों में बँधे होकर भोगों की खोज में जीवन बिता देते हैं। ऐसे वस्त्र धारण करने का क्या लाभ? असल में वे अपनी आजीविका चलाने हेतु ही ऐसा करते हैं। ऐसा बनकर जीना कभी भी मोक्ष-प्राप्ति का साधन नहीं बन सकता।


आप समझने का प्रयास कीजिये कि आप साधु-महात्माओं का पालन-पोषण कर सकते हैं। उनके लक्ष्य-प्राप्ति में आप उनके सहायक बन सकते हैं। इसके बाद भी आप जितेन्द्रिय होकर पुण्यलोक के अधिकारी बन सकते हैं। थोड़ा विचार कीजिये कि जो प्रतिदिन गुरु के लिये समिधा लाता है अथवा जो बहुत-सी दक्षिणाओं वाले यज्ञ करता है, उससे बड़ा धर्म परायण कौन हो सकता है? प्रत्येक मानव का अपना धर्म होता है। ठीक उसी प्रकार राजा का भी अपना धर्म होता है। 


आपने एक निष्क्रिय जीवन बिताने का निर्णय किया है। इससे जगत् का क्या भला हो सकता है? आप समझने का प्रयास करें कि जो लोग सर्वदा दान और तप में तत्पर रहकर अपने धर्म का पालन करते हैं, जो दया आदि गुणों से सम्पन्न रहते हैं, काम, क्रोध आदि दोषों का त्याग करते हैं, अच्छी तरह से दान देते हुए प्रजापालन करते हैं तथा वृद्धजन की सेवा करते हुए जीवन यापन करते हैं, उन्हें अभीष्ट लोक की प्राप्ति होती है। यदि हम सत्यभाषी होकर हमेशा देवता, अतिथि और समस्त प्राणियों की सेवा करते हुए ब्राह्मणसेवी बने रहते हैं, तो हमें इष्ट लोक की प्राप्ति का अधिकार प्राप्त हो जाता है, अतः हे प्राणनाथ, आप भी गृहस्थ-धर्म का पालन करते हुए प्रजा के रक्षक बनें। अपने राजधर्म का पालन करना ही राजा का असली धर्म होता है। आप स्वयं को कष्ट न दें, वरन् आप सभी के कष्टहारक बनें।’’


इस प्रकार रानी के कहने पर राजा जनक ने साधु-संतों की भाँति जीवन यापन करने का निर्णय त्याग दिया और वे पुनः प्रजापालक बनकर रहने लगे। कहा गया है कि सभी प्राणियों को अपने धर्म का पालन करना चाहिये। उचित समय पर ही वैराग्य की कामना करनी चाहिये। अपने कर्मों से ही मुक्ति संभव होती है। कर्म-त्याग जीवन का लक्ष्य कभी नहीं हो सकता।


विश्वजीत ‘सपन’

Wednesday, November 14, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग -59)


महाभारत की कथा की 84वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।  

तपस्विनी वृद्धकन्या
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पूर्वकाल की बात है। उस समय तपस्वी कुछ भी करने में सक्षम होते थे। उसी समय कुणिमर्ग नामक एक महान् एवं यशस्वी ऋषि हुए। एक बार की बात है। उन्हें एक कन्या-रत्न की इच्छा हुई। तब उन्होंने बड़ा भारी तप किया एवं अपने इस तप के प्रभाव से एक कन्या को उत्पन्न किया। वह रूप एवं गुण में एक अद्भुत सुन्दरी थी। कुणिमर्ग इससे बड़ा प्रसन्न हुए। उनके ही आश्रम में उस कन्या का पालन-पोषण होने लगा। ऋषि ने उसे प्रत्येक प्रकार की शिक्षा दी और उसका मन भी तप की ओर लगने लगा। समय के साथ ऋषि का जीवन-काल समाप्त हुआ और वे स्वर्गलोक चले गये। तब आश्रम का पूरा भार उस कन्या पर आ पड़ा।


उस कन्या ने ऋषि द्वारा दी गयी शिक्षा के अनुसार अपना जीवन बिताना प्रारंभ किया। वह व्रत, तप आदि करने लगी और देवताओं एवं पितरों की पूजा करने लगी। इस प्रकार एक ब्रह्मचारिणी की भाँति उसका जीवन बीतने लगा। इस प्रकार रहते हुए बहुत समय बीत गया। एक समय आया जब वह बूढ़ी और दुबली हो गयी। तब उसने अपनी स्थिति का ध्यान करते हुए शरीर-त्याग का मन बनाया। उसके इस देह-त्याग की इच्छा को देख नारद जी उसके पास आये और उससे कहा - ‘‘देवि! तुमने कठिन से कठिन तप किया। अपने शरीर का भी ध्यान न रखा और अब देह-त्याग का विचार कर रही हो, किन्तु तुम्हें उत्तम लोक की प्राप्ति संभव नहीं, अतः यह विचार त्याग दो।’’ 


वृद्धा ने पूछा - ‘‘ऐसा क्यों मुनिवर? मैंने तप किया है। नियमादि से जीवन यापन किया है। इसके बाद भी उत्तम लोक की प्राप्ति क्यों न होगी?’’


नारद जी ने कहा - ‘‘उचित है देवी, तुमने बड़ी तपस्या की, किन्तु तुम्हारा अभी संस्कार (विवाह) नहीं हुआ है। मैंने देवलोक में सुना है कि संस्कार न होने से कोई उत्तम लोक का अधिकारी नहीं बन सकता।’’


वृद्धा बोली - ‘‘किन्तु मुनिवर, अब इस आयु में मुझसे कौन विवाह करेगा? इस समस्या का कोई समाधान हो तो बताइये।’’


नारद जी ने कहा - ‘‘देवि! मैंने तो वही बताया, जो सत्य है। आगे तुम्हें ही निर्णय लेना है।’’


ऐसा कहकर नारद जी चले गये। उस वृद्धा ने कुछ समय विचार किया और ऋषियों की एक सभा में जाकर कहा - ‘‘आप सभी जानते ही हैं कि मैंने अपना जीवन तप में लगा दिया, किन्तु मुझे उत्तम लोक का अधिकार नहीं मिल पा रहा। मेरा संस्कार होना आवश्यक है, अतः जो कोई भी मेरा पाणिग्रहण करेगा, उसे मैं अपनी तपस्या का आधा भाग दे दूँगी।’’


ऋषियों ने ये बात सुनी तो सभी विचारमग्न हो गये। कुछ समय के बाद ऋषि गालव के पुत्र शृंगवान् ने कहा - ‘‘हे देवि! मैं इस विवाह प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिये तैयार हूँ, किन्तु मेरी एक शर्त है।’’


वृद्धा बोली - ‘‘बताइये मुनिवर, आपकी क्या शर्त है?’’


शृंगवान् ने कहा - ‘‘आपके विवाह का प्रयोजन मात्र उत्तम लोक की प्राप्ति है, अतः उसके तुरन्त उपरान्त आप देह-त्याग करने की इच्छा रखती हैं। मेरी शर्त यह है कि कम से कम एक रात्रि मेरे साथ अवश्य निवास करें।’’


वृद्धा ने कहा - ‘‘आपकी यह शर्त मुझे स्वीकार है।’’


ऐसा कहकर उस वृद्धा ने अपना हाथ मुनि शृंगवान् के हाथों में रख दिया। तब मुनि ने शास्त्रीय पद्धति से हवन आदि करके उसका पाणिग्रहण स्वीकार किया। वह वृद्धा तपोबल से युक्त थी। रात्रि में वह अपने पूर्व रूप में एक रूपवती तरुणी बनकर मुनि के पास गयी। तब वह अपूर्व सुन्दरी लग रही थी। उसके शरीर पर दिव्य-वस्त्र एवं आभूषण शोभा पा रहे थे। दिव्य हार एवं अंगराग से मोहक सुगन्ध फैल रही थी। उसके शरीर की चमक से चारों ओर प्रकाश फैल रहा था। ऋषि शृंगवान् उसे देखकर मोहित हो गये। ऋषि को अपने निर्णय पर गर्व हुआ। उस तरुणी ने ऋषि के साथ एक रात्रि निवास किया।


प्रातःकाल उसने मुनि से कहा - ‘‘विप्रवर! आपने जो शर्त रखी थी, उसके अनुसार मैंने आपके साथ एक रात्रि निवास कर लिया। अब मुझे जाने की आज्ञा प्रदान कीजिये।’’

शृंगवान् को उस वृद्धा से लगाव उत्पन्न हो गया था। उन्होंने कहा - ‘‘किन्तु प्रिये, क्या आपका जाना टल नहीं सकता?’’


वृद्धा ने कहा - ‘‘मुनिवर! विधि का विधान कभी टल नहीं सकता। मैं अब जाती हूँ। हाँ इतना अवश्य कहना चाहती हूँ कि यह स्थल पवित्र बन चुका है। अपने चित्त को एकाग्र करके, देवताओं को तृप्त करके जो कोई भी इस तीर्थ में एक रात्रि निवास करेगा, उसे अट्ठावन वर्षों के ब्रह्मचर्य पालन का फल मिलेगा।’’


इतना कहकर उस साध्वी ने देह-त्याग कर दिया और स्वर्गलोक को चली गयी। मुनि उसके दिव्य रूप का स्मरण कर बड़े दुःखी हुए। उन्हें वृद्धकन्या के तप का आधा भाग मिल चुका था। उन्होंने वृद्धकन्या की भाँति ही तप में अपना मन लगा लिया और अपना देह-त्याग कर स्वर्गलोक के भागी बने।


पूर्वकाल से ही भारतवर्ष में वैवाहिक संस्कार को पवित्र माना गया है। यह गृहस्थ आश्रम हेतु आवश्यक है एवं इसे ही संसार के सृजन का हेतु माना गया है।


विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, November 8, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 58)



महाभारत की कथा की 83वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

लोभ का फल
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प्राचीन काल की बात है। गौतम नामक एक मुनि हुआ करते थे। वे बड़े धर्मात्मा पुरुष थे। उनके तीन पुत्र थे - एकत, द्वित एवं त्रित। ये तीनों ही वेदवेत्ता थे। सभी तप करते थे, नियम से रहते थे एवं इन्द्रिय-निग्रह के लिये जाने जाते थे। समय के साथ गौतम परलोकवासी हुए, तब यजमानों ने इन तीनों को भी आदर-सम्मान दिये। इनमें त्रित मुनि अपने पिता के समान ही सम्मानित हुए और यजमानों में उनकी प्रसिद्धि स्थापित हुई।


एकत एवं द्वित समय के साथ धन की कामना करने लगे। उनके धन की पूर्ति त्रित से ही संभव थी, अतः उन्होंने विचारकर त्रित से कहा - ‘‘त्रित, तुम सबसे छोटे हो, किन्तु यजमान तुमसे ही यज्ञ करवाना चाहते हैं। हम दोनों तुम्हारी सहायता करेंगे और यजमानों को इसके लिये मनायेंगे, ताकि हम भी धन और पशु प्राप्त कर सकें। उसके उपरान्त हम सभी मिलकर सोमपान करेंगे।’’


त्रित ने कहा - ‘‘ठीक है भइया, आपलोग जैसा कहें।’’


उसके बाद एकत एवं द्वित यजमानों के पास गये और त्रित द्वारा यज्ञ करवाकर उन्होंने असंख्य पशु प्राप्त किये। उन तीनों की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। त्रित मुनि अपनी क्षमता पर प्रसन्न थे, किन्तु एकत एवं द्वित एक अलग ही योजना बना रहे थे। 


एकत ने कहा - ‘‘द्वित, ऐसा कौन-सा उपाय किया जाये कि ये सारे पशु हमारे पास ही रहें और त्रित के पास न जाने पाये?’’


द्वित ने कहा - ‘‘आप उचित कह रहे हैं भइया। त्रित तो विद्वान् है। लोग उसका सम्मान भी करते हैं। वह तो कभी भी यज्ञ करवाकर अपने लिये पशुओं को एकत्रित कर सकता है। हम इन गायों को हाँककर कहीं और चले जाते हैं, त्रित तो अपने लिये धन इकट्ठा कर ही लेगा।’’


एक दिन की बात है। पशुओं के साथ वे तीनों भाई चले जा रहे थे। त्रित सबसे आगे चल रहा था और उसे अपने दोनों भाइयों की योजना की भनक भी न थी। दैवयोग से उसी मार्ग से सहसा एक भेड़िया उनकी ओर आ गया। त्रित मुनि ने भेड़िये को देखा तो वे भय से भागने लगे। भागते-भागते वहीं बगल में एक कुएँ में गिर पड़े। उस कुएँ में पानी न था। बालू अधिक था, तो त्रित को अधिक चोट नहीं आई। सब ओर लताओं से घिरे होने के कारण वह कुआँ ऊपर से दिखाई नहीं देता था। त्रित ने पुकार लगाई, किन्तु एकत एवं द्वित ने उनकी पुकार न सुनी। एक तो उस भेड़िये का भय था तथा लोभ ने भी उनके मन को अपने चंगुल में फँसा रखा था। उन्होंने सोचा कि वे तो त्रित से पीछा छुड़ाने की ही योजना बना रहे थे और दैवयोग से उनकी योजना स्वयमेव पूरी हो गयी। अवश्य ही भूख-प्यास से त्रित की मृत्यु हो जायेगी और सारे पशु अब उनके हो जायेंगे। ऐसा विचारकर त्रित को वहीं कुएँ में छोड़कर वे दोनों भाई अपने स्थान की ओर चले गये।


उधर त्रित को भी भय हुआ कि अब उनकी मृत्यु निश्चित थी, किन्तु सोमपान की इच्छा अभी पूरी न हुई थी। वे सोचने लगे कि नहीं, ऐसा नहीं हो सकता। बुद्धिमान तो थे ही, तो आस-पास की वस्तुओं का निरीक्षण करने लगे। उन्हें उपाय मिल गया। उन्होंने उस बालू के कूप में संकल्प के द्वारा अग्नि की स्थापना की। लता में सोम की भावना से मन ही मन ऋग्, यजुः और साम का चिंतन किया। उसके उपरान्त कंकड़ों में शिला की भावना से उस लता से पीसकर सोमरस निकाला। फिर वेद मन्त्रों से उसकी पूजा की। उनकी वेद-ध्वनि स्वर्ग तक जा पहुँची। 


देव पुरोहित बृहस्पति को वह सुनाई पड़ी, तो उन्होंने देवताओं से कहा - ‘‘त्रित मुनि का यज्ञ हो रहा है। हम सभी को वहाँ चलना चाहिये। वे बड़े तपस्वी हैं, यदि न गये, तो वे क्रोध में आकर दूसरे देवताओं की सृष्टि कर डालेंगे।’’


तब सभी देवतागण देव पुरोहित के साथ त्रित मुनि के पास गये। त्रित मुनि उस कूप में यज्ञ में लीन थे और बड़े तेजस्वी दिखाई दे रहे थे।
देवताओं ने कहा - ‘‘मुनिवर, हम अपना भाग लेने आये हैं।’’
त्रित मुनि मन्त्र पढ़ते हुए विधिपूर्वक देवताओं को अपने भाग अर्पण किये।


देवताओं ने कहा - ‘‘मुनिवर, हम आपसे प्रसन्न हैं। अपनी इच्छानुसार वर माँगिये।’’


त्रित मुनि ने कहा - ‘‘हे देवगण, आप देख ही रहे हैं कि मैं किस गति में पड़ा हूँ। सर्वप्रथम तो इस कूप से मेरी रक्षा कीजिये। साथ ही ऐसा वर दीजिये कि जो इसमें आचमन करे, उसे सोमपान करने वाले की गति प्राप्त हो।’’


उनके इतना कहते ही वह कूप सरस्वती नदी के जल भरने लगा। उस जल के साथ उठकर त्रित मुनि भी कूप से बाहर आ गये। देवताओं ने ‘‘तथाऽस्तु’’ कहकर उनको वरदान दिया और अपने-अपने स्थल पर चले गये।


त्रित मुनि प्रसन्नतापूर्वक अपने घर आ गये। वहाँ अपने भाइयों को देखकर उन्हें बड़ा क्रोध आया। उन्होंने उन्हें शाप देते हुए कहा - ‘‘आपलोगों ने मुझे कूप में मरने के लिये छोड़ दिया और महान् पाप किया। इसका दण्ड आपको मिलना ही चाहिये। आपलोगों ने धन के लोभ ऐसा किया, अतः आप अभी भेड़िये बन जाओ और उन्हीं के समान वन में विचरण करो।’’


त्रित मुनि के ऐसा कहते ही एकत एवं द्वित के मुख भेड़िये के समान दिखने लग गये। वे मुँह छुपाकर वहाँ से भाग खड़े हुए। इसी कारण कहा गया है कि कभी भी लोभ नहीं करना चाहिये। इसका परिणाम बुरा ही होता है।


विश्वजीत ‘सपन’

Wednesday, October 31, 2018

महाभारत की लोककथा भाग - 57



 महाभारत की कथा की 82वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

मुनि जैगीषव्य की लीला
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पूर्वकाल की बात है। देवल नामक एक मुनि हुए। वे गृहस्थ-धर्म का आश्रय लेकर जीवन-यापन करते थे। वे बड़े ही धर्मात्मा एवं तपस्वी थे। मन, वाणी तथा क्रिया से वे समस्त जीवों का समान रूप से सम्मान करते थे। उन्हें क्रोध स्पर्श भी न कर पाता था। प्रतिकूल वचन पर भी वे सामान्य भाव ही प्रदर्शित करते थे। वे सदा ही देवता, ब्राह्मण, अतिथि आदि की सेवा में तत्पर रहा करते थे। 


एक दिन की बात है। महान् धर्मात्मा मुनि जैगीषव्य उनके आश्रम में एक भिक्षुक बनकर आये। वे सिद्धिप्राप्त योगी थे तथा उनकी स्थिति योग में ही बनी रहती थी। मुनि देवल ने उनका आथित्य स्वीकार किया एवं उनकी बड़ी सेवा की। जैगीषव्य मुनि देवल के आतिथ्य से प्रसन्न होकर वहीं रहने लगे, किन्तु वे हमेशा ही योग में लीन रहते थे। वे बोलते भी न थे। उधर मुनि देवल कभी भी योग साधना उनकी उपस्थिति में नहीं करते थे। इस प्रकार अधिक समय बीत गया। 


कुछ समय के बाद जैगीषव्य मुनि बड़ा कम दिखाई देने लगे। मात्र भोजन के समय ही वे देवल मुनि को दिखाई देते थे। मुनि देवल को बात खटकती थी, क्योंकि अब तक उन्होंने देवल से एक शब्द भी कहा न था। यह बात भी मुनि देवल को परेशान करती थी। तब देवल मुनि ने उनके रहस्य को जानने का मन बनाया। वे जानना चाहते थे कि जैगीषव्य का उनके यहाँ आने एवं ऐसा विचित्र व्यवहार करने के पीछे उनका क्या उद्देश्य था? 


इसी क्रम में एक दिन वे सत्य जानने के लिये आकाशमार्ग से समुद्र तट की ओर चल पड़े। जैसे ही वहाँ पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि मुनि जैगीषव्य वहाँ पूर्व से ही उपस्थित थे। मुनि देवल को बड़ा आश्चर्य हुआ कि अभी तो वे आश्रम में थे, किन्तु उनके पहुँचने के पूर्व ही समुद्र तट पर पहुँच गये थे तथा उन्होंने उनसे पूर्व स्नान भी कर लिया था। यह कैसे संभव था? ऐसा विचार करते हुए वे भी स्नानकर आश्रम आये, तो देखा कि मुनि जैगीषव्य पूर्व से ही आश्रम में उपस्थित थे। अब उन्हें यह रहस्य जानने की बड़ी तीव्र इच्छा हुई। उन्हें प्रतीत होने लगा कि जैगीषव्य में कोई न कोई अद्भुत शक्ति अवश्य है।  


ऐसा सोचकर वे आकाश में उनके रहस्य को जानने के लिये उड़ चले। अंतरिक्ष में पहुँचकर उन्होंने सिद्धों को देखा और सबसे बड़े आश्चर्य की बात थी कि वे सिद्ध मुनि जैगीषव्य की पूजा कर रहे थे। उसके उपरान्त तो और भी अद्भुत संयोग हुआ। जैगीषव्य को उन्होंने स्वर्गलोग में जाते देखा, वहाँ से चन्द्रलोक और पुनः चन्द्रलोक से अग्निहोत्रियों के उत्तमलोक में जाते देखा। अब मुनि देवल के आश्चर्य का ठिकाना न रहा, क्योंकि वे जहाँ भी जाते उन्हें मुनि जैगीषव्य के दर्शन हो जा रहे थे। कुछ समय तक ऐसा ही चलता रहा, फिर सहसा वे कहीं अन्तर्धान हो गये। तब मुनि देवल को लगा कि वे अवश्य ही कोई असाधारण प्राणी थे। इस रहस्य को जानने के लिये उन्होंने सिद्धों से पूछा - ‘‘बड़े आश्चर्य की बात है कि मैं जहाँ-जहाँ जाता हूँ, मुनि जैगीषव्य वहाँ-वहाँ दिखाई देते हैं, किन्तु अभी अचानक ही वे कहीं चले गये। इसका क्या रहस्य है। इसे मुझे विस्तार से बतायें।’’


सिद्धों ने कहा - ‘‘मुनिवर! आप व्यथित न हों। जैगीषव्य एक सिद्ध पुरुष हैं। उनकी लीला वे ही जानें, किन्तु अब वे ब्रह्मलोक चले गये हैं। वहाँ आपकी गति नहीं है, अतः आप आश्रम लौट जायें। वे अवश्य आपकी समस्या का समाधान करेंगे।’’


सिद्धों की बात सुनकर मुनि देवल अपने आश्रम की ओर लौट गये, किन्तु उनका मन अशान्त था। वे मन ही मन विचार कर रहे थे कि यदि इस बार उनका सामना मुनि जैगीषव्य से हुआ, तो वे उनसे मोक्षधर्म का मार्ग अवश्य पूछेंगे। ऐसा विचार करते हुए जब वे आश्रम में पहुँचे, तो उनकी दृष्टि आश्रम में पूर्व से ही बैठे मुनि जैगीषव्य पर पड़ी। तत्काल ही उन्होंने जैगीषव्य को प्रणाम किया और बोले - ‘‘भगवन्! मैं आपको पहचान न सका। इस भूल के लिये मुझे क्षमा करें।’’


मुनि जैगीषव्य के मुख पर मात्र मुस्कान थी। देवल मुनि फिर बोले - ‘‘मुनिवर! मैं संन्यास का आश्रय लेना चाहता हूँ। कृपाकर मुझे मोक्षधर्म का मार्ग बतायें।’’


अब मुनि जैगीषव्य को विश्वास हो गया कि मुनि देवल शिक्षा ग्रहण करने हेतु तैयार थे। तब उन्होंने मुनि देवल को ज्ञान का उपदेश दिया। फिर उन्हें योग की विधि बताई और उसके उपरान्त उनको कर्तव्य एवं अकर्तव्य का भी उपदेश दिया।


इस ज्ञान को प्राप्त करने के बाद मुनि देवल ने गृहस्थ-धर्म का परित्याग कर दिया। उन्होंने मोक्ष-धर्म में अपनी प्रीति लगाई। इस प्रकार उन्होंने परा सिद्धि एवं परम योग को प्राप्त किया।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, October 25, 2018

महाभारत की लोककथा भाग- 56



महाभारत की कथा की 81वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 

जीने की चाह
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बहुत पुरानी बात है। किसी गाँव में एक व्यक्ति रहता था। वह बड़ा ही निडर और साहसी था। सभी उसके साहस की प्रशंसा करते थे। इस बात का उसे अभिमान भी था। उसमें उत्साह की भी कोई कमी न थी। काम और नयी वस्तुओं की खोज में वह भटकता रहता था। इस कारण वह अनेक स्थलों का भ्रमण किया करता था। 


एक दिन की बात है। वह किसी बड़े वन में जा रहा था। चलते-चलते वह बड़े ही वीरान और दुर्गम क्षेत्र में पहुँच गया। वहाँ वन बड़ा ही घना था। हर तरफ जंगली जानवरों का संकट मँडरा रहा था। जब उस सुनसान जंगल में भाँति-भाँति की आवाज़ें आने लगीं, तो वह व्यक्ति अत्यधिक भयभीत हो गया। भय के कारण इधर-उधर भागने लगा। उसका साहस जवाब दे रहा था, किन्तु वह मरना नहीं चाहता था। जीने की उसकी चाह उसे भागने और जान बचाने को विवश कर रही थी। वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर भाग रहा था तथा किसी सुरक्षित स्थान की खोज में था, किन्तु उसे ऐसा कोई स्थान नहीं मिल पा रहा था और न ही वह जंगल से बाहर ही निकल पा रहा था। भय का साया जब गहरा जाता है, तो भय उस व्यक्ति के पीछे लग जाता है। भागते-भागते उसने ऊपर की ओर देखा तो आश्चर्यचकित रह गया। वह पूरा का पूरा वन जालों से घिरा हुआ था। निकलने का कोई मार्ग न था। फिर उसने देखा कि एक बड़ी ही भयानक स्त्री उसे अपनी भुजाओं में घेरने के लिये उसकी ओर आगे बढ़ रही थी। वह समझ गया कि यदि वह उस स्त्री की पकड़ में आ गया, तो उसके प्राण नहीं बच सकते थे। उधर वह भयानक स्त्री अट्टहास करती उसकी ओर ही चली आ रही थी। उसने अपनी दृष्टि चारों ओर दौड़ाई तो देखा कि एक बड़ा ही विशाल पाँच सिरवाला नाग भी उसकी ओर अपना जीभ लपलपाते हुए बढ़ा चला आ रहा था। अब उसे अपने बचने का कोई मार्ग नहीं दिख रहा था। वह और वेग से भागने लगा। अब उसे यह पता न था कि वह कहाँ और किस दिशा में भाग रहा था। उस जंगल में झाड़-झंखाड़ों के बीच एक गहरा कुआँ था। उस पर झाड़-झंखाड़ और खर-पतवार उगने से वह दिखाई नहीं दे रहा था। भागता हुआ वह व्यक्ति उसी कुएँ में गिर गया। वह तेजी से गिरने लगा। तब उसे लगा कि वह नहीं बच पायेगा, किन्तु सौभाग्य से लताओं में उसका पैर फँस गया। उसका पैर ऊपर को और सिर नीचे की ओर हो गया और वह बीच में ही लटक गया।


जान बची लाखों पाये वाली कहावत उसे याद आई। किन्तु समस्या यह थी कि उन लताओं से छूटने का कोई उपाय न सूझ रहा था। तभी उसने नीचे की ओर देखा। वहाँ एक बड़ा भारी साँप लपलपाते हुए उसे ही देख रहा था। उसने सोचा कि भला हुआ वह नीचे नहीं गिरा, अन्यथा उस साँप से बचना तो मुश्किल ही था। अब उसने सोचा कि किसी तरह ऊपर की ओर जाना ही उचित होगा। उसने बड़ी मुश्किल से ऊपर की ओर देखा। उसे वहाँ एक बहुत ही विशालकाय हाथी दिखाई पड़ा। उसका शरीर कहीं सफेद और कहीं काला था। उसके छः मुँह और बारह पैर थे। वह बड़ा ही अजीब दिख रहा था। वह धीरे-धीरे कुएँ की ओर ही बढ़ा चला जा रहा था। उस व्यक्ति के ऊपर की ओर जाने की आशा भी कम हो गयी। यदि वह ऊपर गया तो उस हाथी से बच पाना मुश्किल ही था। अब वह क्या करे और क्या न करे की उलझन में था। किन्तु उसके जीने की आशा अब भी बनी हुई थी। अतः उसने चारों ओर देखना प्रारंभ किया कि कुछ तो ऐसा होगा, जिससे उसे जीने में सहायता होगी। तब उसने देखा कि उस कुएँ के किनारे एक वृक्ष था। उसकी शाखाओं पर मधुमक्खियों ने कई छत्ते बना रखे थे। समय-समय पर उससे मधु की धाराएँ नीचे टपक रही थीं। उसने प्रयत्न कर शहद से अपनी भूख और प्यास मिटाने की व्यवस्था कर ली। अब वह शहद पीकर उसी प्रकार जीवन जीने लगा। उस वृक्ष को रात-दिन चूहे काट रहे थे, जिसे देख वह व्यक्ति निराश होता रहता था, किन्तु उसके जीवन की आशा ने उसे बचाये रखा।


इसी कारण से कहा जाता है कि कितनी भी विपरीत परिस्थितियाँ हों, अनेक प्रकार के भय हों, अनेक प्रकार के कष्ट झेलने पड़ रहे हों, यदि मनुष्य जीने की इच्छा रखता है, तो वह अवश्य जी लेता है। वह कैसी भी स्थिति में जीने का मार्ग अवश्य ढूँढ ही लेता है।

Sunday, October 21, 2018

महाभारत की लोककथा भाग-55




महाभारत की कथा की 80वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 
 
श्रुतावती की तपस्या
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प्राचीन काल की बात है। भरद्वाज की एक रूपमती कन्या थी। उसका नाम श्रुतावती था। उसने मन ही मन इन्द्र को अपना पति मान लिया था। फिर उसने इन्द्र को पति के रूप में पाने के लिये बड़ी उग्र तपस्या की। ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करते हुए अत्यन्त ही कठोर नियमादि का पालन करने लगी। अनेक वर्षों की उसकी इस भक्ति और तप को देखकर देवराज इन्द्र प्रसन्न हो गये। उन्होंने श्रुतावती को दर्शन दिया और बोले - ‘‘शुभे! मैं तुम्हारी तपस्या एवं भक्ति से प्रसन्न हूँ। बोलो तुम्हें क्या वर चाहिये?’’


श्रुतावती ने कहा - ‘‘देवेश! मुझे आपकी अर्द्धांगिनी बनने का सौभाग्य प्राप्त करना है। इस वर की पूर्ति हेतु आपसे प्रार्थना है।’’


इन्द्र ने कहा - ‘‘देवि! तुम्हारा मनोरथ अवश्य पूर्ण होगा। इस शरीर का त्याग कर तुम मेरे साथ स्वर्ग में निवास करोगी। तुम जानती हो कि इस बदरपाचन नामक पवित्र तीर्थ में अरुन्धती सप्तर्षियों के साथ रहा करती थी। एक दिन सप्तर्षि उसे अकेला छोड़कर जीविका निर्वाहन हेतु फल-फूल लाने के लिये हिमालय पर चले गये। वहाँ उन्हें जब कुछ भी न मिला तो वे वहीं आश्रम बनाकर रहने लगे। उस समय इस स्थल पर बारह वर्षों से वर्षा नहीं हो रही थी। तब अरुन्धती तपस्या में संलग्न रहने लगी। उसकी तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान् शंकर उससे मिलने एक ब्राह्मण के वेष में आये।’’


शंकर बोले - ‘‘हे देवि! मैं भिक्षा लेने आया हूँ। कुछ खाने को मिलेगा?’’


अरुन्धती ने कहा - ‘‘विप्रवर! अन्न तो समाप्त हो चुका है। मात्र कुछ बेर ही रह गये हैं, यदि आपकी इच्छा है, तो इन्हें खा सकते हैं।’’


शंकर ने कहा - ‘‘ठीक है देवि, जैसा तुम कहो। ऐसा करो कि इन फलों को पकाकर मुझे दो।’’


अरुन्धती ने तब प्रज्वलित अग्नि पर बेरों को पकाना प्रारंभ किया। उसी समय उसे पवित्र एवं दिव्य कथायें सुनाई देने लगीं। वह बिना कुछ खाये ही उन बेरों को पकाती रही और कथायें सुनती रही। सहसा बारह वर्षों की वह अनावृष्टि समाप्त हो गयी। इतना अधिक समय बीत गया, किन्तु उसे वह एक दिन के समान ही प्रतीत हुआ। तब तक सप्तर्षि भी फल-फूल लेकर लौट आये।


शंकर भगवान् ने प्रसन्न होकर कहा - ‘‘हे धर्म को जानने वाली देवि, अब तुम पूर्व की भाँति इन ऋषियों की सेवा करो। तुम्हारे तप से मैं प्रसन्न हूँ।’’


यह कहकर शंकर जी ने स्वयं को प्रकट कर दिया। मुनियों सहित अरुन्धती ने उन्हें विधिवत प्रणाम किया तो वे मुनियों से बोले - ‘‘मुनिवर, आप लोगों ने हिमालय में रहकर जिस तप का उपार्जन किया है, अरुन्धती ने यहीं रहकर कर लिया, और तो और उसने बारह वर्षों तक बिना कुछ खाये, बेर पकाते हुए यह कठिन तप किया है, उसका तप आपसे भी श्रेष्ठ है।’’


उसके पश्चात् भगवान् शंकर ने अरुन्धती से कहा - ‘‘हे देवि, तुम्हारा कल्याण हो। यदि तुम्हारी कोई मनोकामना हो, तो बोलो। मैं तुम्हारी अभिलाषा पूर्ण करूँगा।’’


अरुन्धती ने कहा - ‘‘हे देवों के देव महादेव, यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो यह स्थान बदरपाचन तीर्थ हो जाये। जो भी मनुष्य इस स्थल पर पवित्रतापूर्वक तीन रात्रि तक निवास तथा उपवास करे, उसे बारह वर्षों के तीर्थ सेवन का फल प्राप्त हो।’’


शंकर भगवान् ने कहा - ‘‘ऐसा ही होगा देवि।’’


फिर सप्तर्षियों ने शंकर की स्तुति की और वे अपने धाम चले गये। अरुन्धती इतने वर्षों तक भूखी-प्यासी रही, किन्तु न तो वह थकी और न ही मुख मलिन हुआ। ऋषिगण भी यह देखकर आश्चर्य कर रहे थे।
‘‘तो देवि, यहीं पर अरुन्धती को परम सिद्धि प्राप्ति हुई थी, तुमने भी अरुन्धती की भाँति ही तप का पालन किया है, अतः तुम्हारे सभी मनोरथ अवश्य पूर्ण होंगे।’’ 


ऐसा कहकर इन्द्र अपने धाम को चले गये। उनके जाते ही वहाँ फूलों की वर्षा होने लगी। देवताओं की दुन्दुभी बज उठी। सुगन्धित वायु चलने लगी। उसी समय श्रुतावती ने देह त्याग कर दिया और स्वर्ग में इन्द्र की पत्नी के रूप में रहने लगी।


कहते हैं कि जो भी बदरपाचन तीर्थ में स्नान करके तथा एकाग्रचित्त होकर एक रात्रि निवास करता है, उसे देह त्याग करने के पश्चात् दुर्लभ लोकों की प्राप्ति होती है।



विश्वजीत 'सपन'