Sunday, March 24, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग-73)




महाभारत की कथा की 98 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

कामत्याग की महिमा

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पुरातन काल की बात है। मंकि नामक एक व्यक्ति था। वह धन प्राप्त करना चाहता था, किन्तु उसका प्रत्येक प्रयास असफल हो जाता था। इस प्रकार उसका जीवन कष्टमय था। बार-बार के प्रयास के असफल हो जाने से वह बड़ा दुःखी रहता था और हमेशा कुछ नया करने पर विचार करता रहता था। बड़ा सोच-विचारकर उसने निर्णय लिया कि वह दो बछड़ों को खरीदेगा। उन बछड़ों को पाल-पोसकर बड़ा करेगा और फिर उनसे धनोपार्जन करेगा। ऐसा विचार कर उसने अपने बचे-खुचे धन से दो बछड़े खरीद लिये। उन्हें बड़े स्नेह से पालने लगा। समय बीतता गया।


एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अब इन्हें प्रशिक्षित किया जाये, ताकि धन उपार्जित करने का अवसर मिले। यही सोचकर उसने उन्हें साधने के लिये जुए में जोत दिया। मार्ग में चलते समय उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक ऊँट बैठा हुआ था। बछड़े पहली बार जुए में जुते थे। उन्हें इस तरह बँधना अच्छा नहीं लग रहा था। पता नहीं उन्हें क्या सूझाी कि वे उस ऊँट को बीच में करके उसकी ओर दौड़ने लगे। मंकि को लगा कि वे ऊँट से टकरा जायेंगे। उसने बड़ा प्रयास किया कि बछड़ों की दिशा ठीक हो, किन्तु वे बछड़े भी हठ में थे और माने नहीं। जब वे ऊँट की गर्दन के पास आये, तो ऊँट भी घबरा गया। वह उठ गया और भागने लगा। इस प्रकार वे दोनों बछड़े ऊँट की गर्दन में लटक गये। बछड़ों के इस प्रकार के अपहरण से एवं गर्दन दबने से उनको मरते देखकर मंकि ने कहा - ‘‘मनुष्य कितना भी चतुर क्यों न हो, किन्तु जो उसके भाग्य में नहीं होता तो प्रयत्न करने पर भी उसे धन की प्राप्ति नहीं हो सकती।’’


बेचारा मंकि बस देख रहा था। वह ऊँट उसके दो बछड़ों को अपने गले में लटकाये इधर-उधर भागा जा रहा था। बछड़ों के गले की घण्टी से और भी घबरा रहा था। मंकि यह सब देखकर विचार करने लगा कि यह सब दैव-लीला ही है। यदि किसी को कुछ मिलता है, तो खोजने पर दैव का ही किया जान पड़ता है। यदि कुछ नहीं मिलता तो उनकी ही कृपा के कारण होता है। दैव ने मुझे धन से मुक्ति लेने का संदेश दिया है। मुझे इस इच्छा से मुक्ति पा लेनी चाहिये। कहते हैं कि यदि सुख की इच्छा हो तो वैराग्य का आश्रय लेना चाहिये। जो मनुष्य धन की इच्छा त्याग देता है, वही सुख की नींद सोता है। सही है, शुकदेव मुनि ने कहा था - ‘जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओं को पा लेता है और जो उसका सर्वथा त्याग कर देता है, तो उन दोनों में कामनाओं को पाने वाले की अपेक्षा त्याग करने वाला ही श्रेष्ठ होता है।’


मंकि अपने घर वापस लौट गया और विचार करने लगा कि उसे अब क्या करना चाहिये? उसे शुकदेव जी की उक्ति के अनुसार ही विषयासक्ति को छोड़ देनी चाहिये, क्योंकि उसने बार-बार प्रयास किया, किन्तु उसकी अर्थवासना ने मात्र छकाया ही। उसे प्रतीत होने लगा कि अर्थवासना का वह खिलौना बना हुआ है। धन निश्चय ही संकल्प से उपजता है, तो उसे इस संकल्प को ही छोड़ देना चाहिये, ताकि वह समूल नष्ट हो जाये। उसे आज समझ आया कि यह संकल्प ही दुःख का कारण है। यदि प्राप्त हो जाये तो चिंता बनी रहती है और बढ़ती भी रहती है। यदि मिल जाये तो और भी पाने की तृष्णा बढ़ती जाती है। इसका कोई अंत नहीं है। फिर यदि धन होने का संदेह हो तो लुटेरे उस धन को पाने के लिये मार डालते हैं अथवा नाना प्रकार की पीड़ायें देते हैं। इससे तो धन का न होना ही श्रेयस्कर जान पड़ता है। 


मंकि ने निश्चय किया और मन ही मन कहा - ‘‘अरे काम, तेरा पेट भरना बड़ा कठिन कार्य है। तू पाताल से समान दुष्पूर है। तू मुझे दुःखों में फँसाना चाहता है। मैं तेरे बनाये इस जाल में नहीं फँस सकता। आज दैववश मेरे धन का नाश हो गया, किन्तु आज ही मुझे वैराग्य प्राप्त हुआ। मैं जान गया कि भोगों की इच्छा ने मुझे बाँध रखा था, किन्तु अब नहीं। आज के बाद से मैं तृप्त और स्वस्थचित्त रहूँगा। जो कुछ अनायास ही प्राप्त होगा, उसी से निर्वाह कर लूँगा। अब काम, लोभ, तृष्ण या कृपणता का प्रभाव मुझ पर नहीं हो सकता। मैं आज से ही सत्त्वगुण में स्थित हो गया हूँ। मैं अब अज्ञानियों की भाँति लोभ में पड़कर दुःख नहीं पाऊँगा। सच तो यही है कि मनुष्य जिस-जिस कामना को छोड़ देता है, उसी की ओर से सुखी हो जाता है और कामना के वशीभूत होकर ही दुःख पाता है। आज से मैं परब्रह्म में प्रतिष्ठित हूँ, पूर्णतया शान्त हूँ। मुझे असीम आनन्द का अनुभव हो रहा है।’’


इस प्रकार की बुद्धि पाकर मंकि विरक्त हो गया। उसने सभी प्रकार की कामनाओं का त्याग कर दिया एवं ब्रह्मानन्द को प्राप्त किया। दो बछड़ों के नाश से ही उसे अमरत्व की प्राप्ति हुई। उसने काम की जड़ें काट दीं और अत्यन्त सुखी हो गया।


यदि मनुष्य को नाना प्रकार से उद्योग करने पर भी धन की प्राप्ति न हो, तो उसे इन पाँच बातों का अनुसरण करना चाहिये - सबके प्रति समताभाव रखना, धनादि के लिये विशेष उपक्रम न करना, सत्य भाषण करना, भोगों से विरक्त रहना एवं कर्म में आसक्त न होना। ऐसा करने से उसे सर्वथा सुख की प्राप्ति होती है। यही शास्त्र कहते हैं।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, March 14, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 72)




महाभारत की कथा की 97 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

जीवन क्या है?

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एक प्रचीन इतिहास है। किसी स्वाध्यायशील ब्राह्मण का मेधावी नामक एक पुत्र था। मेधावी अपने नाम के गुणों वाला था। वह धर्म, अर्थ एवं मोक्ष को भली-भाँति जानने-समझने वाला था। एक दिन की बात है। उसने अपने पिता से कहा - ‘‘पिताजी, मनुष्य की आयु बड़ी तेजी से बीतती जा रही है। उसके पास कम समय होता है। ऐसे में उसे धर्माचरण के लिये क्या करना चाहिये?’’


    पिता ने समझाते हुए कहा - ‘‘बेटा, मनुष्य को चारों आश्रमों का पालन करना चाहिये। सर्वप्रथम उसे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना चाहिये, उसके उपरान्त गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर अपने पितरों की सद्गति के लिये पुत्र उत्पन्न करना चाहिये, फिर यज्ञादि करना चाहिए। कुछ समय बाद उसे वानप्रस्थ आश्रम का पालन करना चाहिये तथा अंत में संन्यास ग्रहण कर वन-गमन करना चाहिये। यही जगत का नियम है एवं शास्त्रों के अनुसार जीवन यापन करने का मूल सिद्धान्त हैं।’’


    मेधावी इस अनित्य जगत् को सत्य नहीं मानता था। उसने पूछा - ‘‘पिताजी, आपकी बात शास्त्रों के अनुसार उचित है, किन्तु मुझे तो यह लोक बड़ा ही ताड़ित तथा सब ओर से घिरा हुआ प्रतीत होता है। इसमें अमोघ वस्तुओं का पतन हो रहा है। इस प्रकार की बातों से जीवन-यापन कैसे किया जा सकता है?’’


    पुत्र की बात सुनकर पिता को आश्चर्य भी हुआ एवं गर्व भी। पिता ने कहा - ‘‘पुत्र, तुमको यह लोक ताड़ित कैसे लग रहा है?’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘पिताजी, मृत्यु को देखिये वह किसी को नहीं छोड़ती। प्रत्येक रात्रि के बीतने पर आयु क्षीण हो रही है। मेरे अथवा आपके कहने पर भी मृत्यु नहीं रुक सकती। हम निरन्तर भोगों के संग्रह में लगे रहते हैं, किन्तु मृत्यु हमें उठाकर ले जाती है। बुढ़ापा सबको आना ही है। अमोघ रात्रियाँ नित्य ही आती हैं एवं चली जाती हैं। पिताजी, इस जगत में मृत्यु, जरा, व्याधि तथा अनेक प्रकार होने वाले दुःखों का ताँता लगा ही रहता है, तो यह लोक इतना अधिक ताड़ित है। यह जीवन की विधि नहीं हो सकती। हम तो सब ओर से घिरे हुए लगते हैं।’’


    पिता ने पूछा - ‘‘और ऐसा क्या है, जो हमें सब ओर से घेरे हुए हैं? इनमें कौन-कौन-सी अमोघ वस्तुओं के पतन हो रहे हैं? इसे थोड़ा विस्तार से बताओ।’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘पिताजी, मनुष्य मोह में घिरा रहता है। उसे भोग की इच्छा घेरे रहती है। उसके पास पुत्र एवं पशुओं की अधिकता होती है तथा उन्हीं में उसका मन आसक्त रहता है। अनेक प्रकार की वस्तुओं की लालसा उसे पूर्णतः घेरे रहती है। स्त्री एवं पुत्रों में आसक्ति तो जीव को बाँधने वाली रस्सी के समान ही है। मात्र पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं। पापी पुरुष इसे काट नहीं सकते। यह संसार जैसा दिखाई देता है, वैसा कदापि नहीं है।’’


    पिता ने पुत्र की बात को समझकर पूछा - ‘‘तुम्हारी बात उचित है पुत्र, किन्तु तब एक मनुष्य को क्या करना चाहिये? उसे किस प्रकार का जीवन जीना चाहिये? शास्त्रगत जीवन ही तो उचित होना चाहिये।’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘सत्य ही जीवन का आधार होना चाहिये। मनुष्य को सत्ययोग में तत्पर रहना चाहिये, क्योंकि सत्य में ही अमृततत्त्व है। उसे अपनी इन्द्रियों का दमन करना चाहिये। अमृत एवं मृत्यु दोनों ही एक शरीर में विद्यमान होते हैं। मोह से मृत्यु प्राप्त होती है, जबकि सत्य से अमरत्व प्राप्त होता है। हमें हमेशा ही सत्य की खोज करनी चाहिये। हिंसा से दूर रहना चाहिये। काम एवं क्रोध को मन से निकाल देना चाहिये। सुख-दुःख में समान रहना चाहिये। जिसमें दूसरों को सुख मिले, ऐसा आचरण करना चाहिये, तब वह मृत्यु के भय से मुक्त हो सकता है। यह भय से मुक्ति ही समस्त प्रकार के अज्ञान के अंधकार को दूर कर देता है। यही जीवन का मूल आधार है।’’


    पिता ने कहा - ‘‘यह सब जानते हुए भी मनुष्य ऐसा आचरण क्यों नहीं करता?’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘पिताजी, यह सब अज्ञानता के कारण होता है। ज्ञान के समान कोई नेत्र नहीं एवं सत्य के समान कोई तप नहीं। राग के समान कोई दुःख नहीं एवं त्याग के समान कोई सुख नहीं। सत्य तो यही है कि एक ब्राह्मण के लिये एकान्तवास, समता, सत्य-भाषण, सदाचार, अहिंसा, सरलता तथा सब प्रकार के काम्य कर्मों से निवृत्ति से बढ़कर कोई धन नहीं होता। ऐसे में किसी अन्य प्रकार के धन की प्रवृत्त होना ही अनुचित है।


    एक बार सोचिये। कल जो थे, आज नहीं हैं। आज जो हैं, वे कल नहीं रहेंगे। फिर धन, स्वजन, स्त्री, पुत्र आदि से हमें क्या लेना-देना? हमें तो अपने अन्तःकरण में स्थित आत्मा को खोजना चाहिये। यही एक ब्राह्मण एवं किसी भी मनुष्य का ध्येय होना चाहिये।’’ 


    इस प्रकार मेधावी ने अपने पिता को बताया कि वास्तविक जीवन क्या है तथा हमें किस प्रकार का जीवन जीना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह जीवन को समझे तथा सत्य की खोज करते हुए जीवन को उचित मार्ग पर लेकर चले, ताकि मृत्यु जैसे सत्य का भय दूर हो सके एवं जीवन का सुख प्राप्त हो सके। मनुष्य जीवन ईश्वर का वरदान है। इसे ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिये।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, February 28, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 71)



महाभारत की कथा की 96 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

शोकाकुल चित्त की शान्ति

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    प्राचीन काल की बात है। सेनजित् नामक एक राजा था। उसका जीवन बड़ा सुखमय था। दैवयोग से एक दिन उसे पुत्र वियोग हो गया। उसका पुत्र कहीं चला गया। प्रयास करने पर भी न मिला। तब वह शोकातुर हो गया। इस प्रकार उसे देखकर एक ब्राह्मण ने उससे कहा - ‘‘राजन्! आप एक मूढ़ मनुष्य की भाँति मोहित हो रहे हैं। यह किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण नहीं हैं। आपको शोक नहीं करना चाहिये।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘आपकी बात उचित जान पड़ी है ब्राह्मण देवता, किन्तु मनुष्य इस शोक से कैसे छुटकारा पा सकता है? आप ही कुछ उपाय बतायें।’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘सुनिये राजन्, मैं इस शरीर अथवा पृथ्वी को अपनी नहीं मानता। यह जैसी दूसरों की है, वैसे ही मेरी भी है। इस प्रकार सोचने से मुझे व्यथा नहीं होती।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘किन्तु, मेरा पुत्र मुझसे बिछड़ गया है। वह मेरा अपना है। इस दुःख से कैसे छुटकारा मिल सकता है?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘जिस प्रकार समुद्र में दो लकड़ियाँ मिलती हैं और पुनः अलग-अलग हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार मानव के जीवन में अनेक लोग आते हैं और अलग हो जाते हैं। यह क्रम चलता रहता है। आपका पुत्र किसी अज्ञात स्थान से आया था और किसी अज्ञात स्थान को चला गया। यही नियम है। संसार में विषयतृष्णा से जो व्याकुलता होती है, उसी का नाम दुःख है। इस दुःख का नाश ही सुख है।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘ऐसी स्थिति क्यों होती है देव? क्या यह सभी के साथ होती है अथवा किसी विशेष कारण से होती है?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘मनुष्य अनेक प्रकार के बंधनों में फँसे होते हैं। जल में बालू का पुल बनाने वालों की भाँति अपने कार्यों में असफल होने दुःख पाते हैं। जिस प्रकार एक बूढ़ा हाथी दलदल में फँसकर अपने प्राण खो बैठता है, ठीक उसी प्रकार मानव पुत्र, स्त्री, कुटुम्ब आदि की आसक्ति में फँसकर शोक के समुद्र में डूबे रहते हैं। जब पुत्र, धन अथवा बन्धु-बान्धवों का नाश होता है, तो वे दुःख के सागर में गोते लगाने लगते हैं। उसे जान लेना चाहिये कि सुख-दुःख एवं जीवन-मृत्यु सब दैव के अधीन होता है।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘इसे कैसे समझें और इसे समझने वाली आप जैसी बुद्धि हमें किस प्रकार आ सकती है? कृपया विस्तार से बतायें।’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘राजन्! आपने उचित कहा। संसार की गति को कोई बुद्धिमान ही समझ सकता है। बुद्धियोग का सुख जिन्हें प्राप्त है, उन्हें हर्ष अथवा शोक छू भी नहीं सकता। शोक के सहस्रों स्थल हैं, भय के सैंकड़ों अवसर हैं, किन्तु बुद्धिमानों पर इनका प्रभाव नहीं पड़ता। जो बुद्धिमान, विचारशील, शास्त्राभ्यासी, ईर्ष्याहीन, संयमी एवं जितेन्द्रिय होता है, उसे शोक स्पर्श भी नहीं कर सकता।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘इस प्रकार शोकहीन बनने के लिये हमें क्या करना चाहिये ब्राह्मण देवता?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘राजन्! एक बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि वह सुख या दुःख, प्रिय अथवा अप्रिय जो-जो भी प्राप्त हो उनका सामना उत्साह से करे, कभी भी हिम्मत न हारे। उसे अपने निश्चय पर डटा रहना चाहिये एवं संयत चित्त से व्यवहार करना चाहिये। जब सत्य एवं असत्य, शोक एवं आनन्द, भय एवं अभय तथा प्रिय एवं अप्रिय इन सभी का कोई त्याग कर देता है, तब वह परम शान्तचित्त हो जाता है।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘आपने उचित कहा ब्राह्मण देवता, किन्तु ऐसा दुःख हमें होता ही क्यों है? इसका अंत कब होता है?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘सुनिये राजन्, मनुष्य बु़िद्धमान हो अथवा मूर्ख, शूरवीर हो अथवा कायर, उसे अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारण शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के फल भोगने ही होते हैं। इस प्रकार जीवों को प्रिय एवं अप्रिय तथा सुख एवं दुःख बारी-बारी से प्राप्त होते ही रहते हैं। जब दुःख का नाश होता है, तब सुख का उदय होता है। इस सुख-दुःख का चक्र हमेशा ही घूमता रहता है। आज आपको दुःख है, तो कल आपको सुख मिलेगा। यह निश्चित है। सबसे बड़ी बात है कि जो प्राणों के साथ जाने वाला रोग है, उस तृष्णा का जो त्याग देता है, वह सुखी हो जाता है। इस सम्बन्ध में पिंगला की गाथा प्रसिद्ध है। उसे सुनिये आपका दुःख दूर हो जायेगा।


पिंगला नाम की एक वेश्या थी। वह एक बार अपने प्रेमी की प्रतीक्षा में बड़ी देर तक बैठी रही। उसका प्रेमी नहीं आया। तब उसने विचार किया कि इतने दिनों तक मैं अपने प्रेम को पहचान न सकी। मेरा प्रेमी मेरे पास था, किन्तु मुझे ज्ञात न हो सका। तो यह कामना ही व्यर्थ है। आज से मैं समस्त कामनाओं को तिलांजलि देती हूँ। भोगों का रूप धारण करके ये नरकरूपी धूर्त मनुष्य अब मुझे धोखा नहीं दे सकते। मुझे अब कोई आशा नहीं रह गयी। अब मैं सुख की नींद सो सकती हूँ। इस प्रकार विचारकर पिंगला ने अपना जीवन सुखमय कर लिया था। ठीक उसी प्रकार आपको भी समस्त आशाओं का त्याग कर अपने जीवन को सुखमय बनाना होगा।’’


ब्राह्मण की बातें सुनकर सेनजित् का दुःख सदा के लिये चला गया। कहते हैं कि मानव-जीवन में शोक होना अवश्यम्भावी होता है, किन्तु उससे संतप्त होने वाला कभी सुखी नहीं रहता। अतः दुःख का त्याग करना ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिये।


विश्वजीत 'सपन'

Wednesday, February 20, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 70)


महाभारत की कथा की 95 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

प्रायश्चित्त ही पाप का निवारण

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पूर्वकाल की बात है। राजा परिक्षित का पुत्र जनमेजय बड़ा पराक्रमी राजा था। एक दिन की बात है, उसे बिना जाने ही ब्रह्महत्या का पाप लग गया। पुरोहित एवं ब्राह्मणों ने उसका त्याग कर दिया। इस प्रकार वह अकेला हो गया। उससे राज्य का कार्य भी अच्छी तरह से देखा न जाता था। वह पाप की अग्नि में जलने लगा। कुछ उपाय न जानकर इस पाप से मुक्ति के लिये वह वन में जाकर तप करने लगा। अनेक वर्षों तक उसने तप किया, किन्तु उसे संतुष्टि न मिली। तदुपरान्त वह इधर-उधर भटकने लगा। उसने इस दौरान अनेक लोगों से अपने पाप के प्रायश्चित्त के बारे में पूछा, किन्तु उसे कोई समाधान न मिला। हाँ एक सुझाव मिला कि वह महातपस्वी शुनकवंशी इन्द्रोक्त मुनि के पास जाये। वही उनका कल्याण कर सकते थे। तब वह दीन-हीन बनकर मुनि इन्द्रोक्त के आश्रम गया।


मुनि ने उसे देखते ही कहा - ‘‘अरे महापापी, ब्राह्मण को मारने के कारण तेरा चित्त अशुद्ध हो गया है। तुम्हारा जीवन व्यर्थ है। तू अभी यहाँ से चला जा। तेरे जैसे पापी का इस आश्रम में कोई कार्य नहीं। तू नीच है, पापी है।’’


जनमेजय ने कहा - ‘‘मुने! मैं अवश्य ही धिक्कार के योग्य हूँ। मैं पापी हूँ, किन्तु इसकी चिंता करते हुए मुझे तनिक भी चैन नहीं है। आपके पास इस कारणवश आया हूँ कि आप इससे मुक्ति का कोई उपाय बतायें। मेरी रक्षा कीजिये। आप तो ज्ञानी हैं। आपको मेरे जैसे पापी को क्षमा कर देना चाहिये। मुनियों का धर्म ही क्षमा करना होता है।’’
इन्द्रोक्त मुनि कुछ शान्त हुए तथा बोले - ‘‘ठीक है, तुमने उचित कहा। यदि तुम सच में इससे मुक्ति की कामना रखते हो, तो जाओ ब्राह्मणों की शरण लो। उनसे ही तुम्हारे परलोक की रक्षा होगी। यदि तुम अपने पापों का पश्चात्ताप करते हो, तो अपनी गति धर्म में रखो। ऐसे कर्म करो जिससे तुम्हें शान्ति मिले।’’


जनमेजय ने कहा - ‘‘उचित कहा आपने मुनिवर। मैं अपने पापकर्म से संतप्त हूँ। मैं आज के बाद से कभी भी धर्म का लोप नहीं करूँगा। किसी भी अवस्था में धर्म का पालन करूँगा। मुझे कल्याण की इच्छा है तथा इसी कारण आपकी शरण में आया हूँ। मुझ पर कृपा कीजिये। आपकी कृपा के बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। इस पाप के कारण मेरा जीना भी व्यर्थ है।’’


इन्दोक्त मुनि कहा - ‘‘तुम बदल गये लगते हो। इसी कारण मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहो। धर्म को कभी न छोड़ो। ब्राह्मणों के प्रति हमेशा सद्भव रखो। आज यह प्रतिज्ञा करो कि ब्राह्मणों से कभी द्रोह न करूँगा।’’


जनमेजय ने कहा - ‘‘हे गुरुवर, मैं आपके चरणों को स्पर्श करके प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब कभी भी मन, वचन या कर्म से ब्राह्मणों के प्रति द्रोह नहीं करूँगा।’’


मुनि इन्द्रोक्त ने राजा के चरण-स्पर्श पर उसको आशीर्वाद देते हुए कहा - ‘‘राजन्! तुम्हारा चित्त बदल गया है। अतः अब मैं तुम्हें धर्म का उपदेश दूँगा। इसे ध्यान से सुनो।


यदि राजा दुश्चरित्र हो तो वह समस्त राज्य को संतप्त कर डालता है। एक मनुष्य उदार, सम्पन्न अथवा कृपण या तपस्वी कुछ भी हो सकता है। इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि बिना विचार के किये गये कर्म से दुःख ही मिलता है। यज्ञ, दान, दया, वेद एवं सत्य - ये पाँचों पवित्र हैं। इसके अलावा विधिपूर्वक किया गया तप परम-पवित्र है। यही किसी राजा को पूर्णतः पवित्र करने वाला होता है। पवित्र स्थलों की यात्रा से भी पुण्य मिलता है। सरस्वती नदी सबसे पवित्र है। इसमें स्नान करो एवं स्वयं को पवित्र करो। नियम बना लो कि तुम कभी ब्राह्मणों का तिरस्कार न करोगे। तुमने पश्चात्ताप किया, तो तुम्हें उस पाप से आवश्य मुक्ति मिलेगी। कभी दुबारा पाप हो जाये, तो पुनः उचित रूप से उसका पश्चात्ताप करना चाहिये। अग्नि की उपासना एक वर्ष तक करो। तुम्हारा पाप दूर हो जायेगा। कहा गया है कि जिस मनुष्य ने जितने प्राणियों की हिंसा की हो, यदि वह उतने प्राणियों की प्राण-रक्षा करता है, वह पापमुक्त हो जाता है। मनु जी का कहना है कि जल में डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्र का जाप करने से उसी प्रकार पाप नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ के बाद अवभृथ स्नान करने से होता है। बृहस्वति जी का कहना है कि यदि कोई मनुष्य बिना जाने कोई पाप कर देता है, तो उसे बुद्धिपूर्वक पुण्यकर्म करने चाहिये। इस प्रकार उसका पूर्व का पाप नष्ट हो जाता है।’’


इस प्रकार समाधान बताने के बाद मुनि इन्द्रोक्त ने राजा जनमेजय से विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ करवाया, जिससे उसके सारे पाप धुल गये। उसके बाद उसने धर्म में अपनी गति रखी तथा अनेक वर्षों तक सच्ची निष्ठा से प्रजा की सेवा करते रहे।


पाप चाहे जान-बूझकर हो अथवा अनजाने में, उसका निवारण करना ही उचित होता है। पाप धुलने के उपरान्त पुनः पापकर्म न हो, तभी जीवन सुखमय रहता है तथा ईश्वर की कृपा बनी रहती है। 


विश्वजीत 'सपन'

Friday, February 8, 2019

महाभारत की लोककथा - (भाग 69)




महाभारत की कथा की 94 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

पाप का निवारण
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प्राचीन काल की बात है। तब राजा को यदि कुछ शंका होती थी, तो वे अपने राज्य के ऋषि-मुनियों से उसका समाधान पूछते थे। वे ऋषि-मुनि भी उनकी समस्याओं अथवा पृच्छाओं के उचित समाधान किया करते थे। एक बार राजा अंगरिष्ठ को इसी प्रकार की शंका हुई, तो कामन्दक ऋषि के पास गये। ऋषि ने आश्रम पर उनका अतिथि के समान उचित स्वागत एवं सत्कार किया और बोले - ‘‘कहिये राजन्, हमारे आश्रम पर आपके आने का प्रयोजन क्या है? मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ।’’


राजा ने कहा - ‘‘मुनिवर! आप सभी तो जीवन से विलग होकर अपना जीवन यापन करते हैं, अतः आपसे कोई अनुचित कर्म नहीं होता, किन्तु हम सभी एक सामान्य जीवन जीते हैं, ऐसे में अनेक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता है।’’


ऋषि ने कहा - ‘‘आपकी बात उचित है महाराज। आपने जीवन की सच्चाई का अनुभव किया है। बताइये आपकी शंका क्या है?’’


राजा ने कहा - ‘‘धर्म, अर्थ एवं काम का निर्णय कैसे करना चाहिये? ये कहीं एक साथ मिले हुए एवं कहीं अलग-अलग क्यों रहते हैं?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘जब मनुष्यों का चित्त शुद्ध होता है तथा वे धर्मपूर्वक किसी अर्थ की प्राप्ति में प्रवृत्त होते हैं, तो उस समय धर्म, अर्थ एवं काम तीनों ही एक साथ मिले हुए प्रतीत होते हैं। धर्म, अर्थ का कारण होता है एवं काम, अर्थ का फल कहा जाता है। यहाँ दर्शनीय बात यह है कि इन तीनों का मूल कारण संकल्प होता है। संकल्प ही विषय होते हैं, जो इन्द्रियों के उपभोग करने के लिये बने होते हैं। फल की इच्छा धर्म का मल होता है। साथ ही छुपाकर धन को रखना, उसका कोई उपयोग न करना, स्वार्थ-सिद्धि हेतु उपभोग कराना आदि अर्थ का मल होता है। संतान की उत्पत्ति के आलावा आमोद-प्रमोद करना काम का मल होता है। इनसे मुक्ति पाना ही मनुष्यों का कर्तव्य होना चाहिये।’’


राजा ने पूछा - ‘‘धर्म, अर्थ एवं काम से जीवन का उद्देश्य किस प्रकार साधा जा सकता है?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘फलेच्छा को त्यागना आवश्यक होता है राजन्। जब बिना परिणाम की इच्छा करते हुए इस त्रिवर्ग का सेवन किया जाये, तो अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि अर्थ के लिये धर्मानुष्ठान करने पर कभी अर्थ की सिद्धि होती है तथा कभी नहीं। कभी-कभी कामों से भी अर्थ की सिद्धि संभव है, किन्तु अर्थ नष्ट भी होते रहते हैं। नष्ट नहीं होने वाला कार्य मोक्ष है। इसी को ध्यान में रखकर जीवन जीना चाहिये।’’


राजा ने कहा - ‘‘जीवन में हमें किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिये कि पाप न हो?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘राजन्! जो धर्म एवं अर्थ का परित्याग कर देता है तथा मात्र काम का ही सेवन करने लगता है, तब उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। यही मोह है, जो धर्म एवं अर्थ दोनों को नष्ट कर देता है। इसी कारण से व्यक्ति में नास्तिकता आ जाती है तथा वह दुराचारी हो जाता है। अतः सभी प्रकार के मोहों से बचने की आवश्यकता होती है।’’
राजा ने कहा - ‘‘मुनिवर, हम सावधानी रखें, फिर भी पाप हो जाता है। ऐसे में हमें क्या उपाय करना चाहिये?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘उचित है महाराज, मनुष्य इन्द्रियों का दास होता है। यदि हमने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं किया, तो पापाचार होने की संभावना बनी ही रहती है। एक मनुष्य को चाहिये कि कभी भी इन्द्रियों का दास न बने।’’


राजा ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर, मान लीजिये कि कभी एक राजा काम एवं मोह के वशीभूत होकर पाप कर बैठे, किन्तु बाद में उसे पश्चात्ताप भी हो, तो ऐसे पाप को दूर करने का क्या उपाय हो सकता है?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘सर्वप्रथम तो एक राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यदि वह पापाचार करता है, तो प्रजा उसका साथ नहीं देती। साधु एवं ब्राह्मण भी उसका साथ छोड़ देते हैं। उसका अंत कभी भी भला नहीं होता। अतः उसे अपने पापों की निंदा करनी चाहिये। उसे निरन्तर वेदों का अध्ययन करना चाहिये तथा ब्राह्मणों का सत्कार करना चाहिये। उसे अपना मन धर्म में लगाना चाहिये। उसे उदार एवं क्षमाशील बनकर प्रजा की सेवा करनी चाहिये। जल में खड़ा होकर गायत्री मंत्र का जाप करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये। उसे पापियों को राज्य से बाहर निकलवाकर धर्मात्माओं के साथ सत्संग करना चाहिये। मीठी वाणी एवं उत्तम कर्म के द्वारा सभी को प्रसन्न करना चाहिये। गुणवान् लोगों की प्रशंसा करनी चाहिये तथा गुणहीनों की निन्दा। राजन्, जो भी राजा अपना आचारण इस प्रकार का बना लेता है, उसे शीघ्र ही प्रजा का सम्मान प्राप्त हो जाता है। ऐसा आचरण करते रहने से वह निष्पाप हो जाता है एवं प्रजावत्सल कहलाता है।’’ 


इसके बाद राजा अंगरिष्ठ ने मुनि को प्रणाम किया और अपनी राजधानी लौट गये। उनकी शंका का समाधान हो चुका था। उन्होंने मुनि के बताये गये मार्ग का पालन किया और अनेक वर्षों तक सुख से प्रजा-पालन करते रहे।
 

विश्वजीत 'सपन'

Friday, February 1, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 68)




महाभारत की कथा की 93 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

दण्ड की उत्पत्ति
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    प्राचीन काल की बात है। अंगदेश के राजा वसुहोम थे। वे बड़े ही धर्मात्मा थे। उनका ध्यान हमेशा धर्म में लगा रहता था। एक बार वे हिमालय पर मुंजपृष्ठ नामक स्थल पर गये। यह वही शिखर है, जहाँ कभी परशुराम ने अपनी जटायें बाँधी थी। इसी कारण इसका नाम ‘मुंजपृष्ठ’ पड़ा। वहाँ जाकर उन्होंने वेदोक्त गुणों को अपनाया एवं अपनी रानी के साथ रहने लगे। उनके तप का प्रताप दूर-दूर तक फैलने लगा। वे महर्षि के तुल्य हो गये।


    एक दिन की बात है। राजा मन्धाता उनके दर्शन करने के लिये गये। उन्हें दण्ड की उत्पत्ति के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता थी। महाराज वसुहोम उस समय ध्यानमग्न थे। राजा मन्धाता विनीत होकर वहीं खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे। जब वसुहोम का ध्यान टूटा, तो उन्होंने मन्धाता को देखा। उनको पूरा सम्मान देकर उनसे कुशल-क्षेम पूछा। समस्त प्रजा का हाल पूछने के उपरान्त उन्होंने मन्धाता से कहा - ‘‘महाराज! मुझे बताइये कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं?’’


    मन्धाता ने कहा - ‘‘राजन्! आपने बृहस्पति के सिद्धान्तों का अध्ययन किया है, साथ ही शुक्राचार्य की नीति का भी। कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि दण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई?’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘महाराज! कहा जाता है कि एक बार पितामह ब्रह्मा जी ने यज्ञ की इच्छा की, किन्तु उन्हें कोई योग्य ऋत्विज् दिखाई न पड़े। तब उन्होंने मस्तक पर एक गर्भ धारण किया। वह गर्भ हजार वर्षों तक उनके मस्तक पर रहा। हजारवें वर्ष के पूर्ण होने पर ब्रह्मा जी को छींक आई। उस छींक के साथ ही वह गर्भ भी नाक के मार्ग से बाहर आ गिरा। उससे एक बालक प्रकट हुआ, जो प्रजापति क्षुप के नाम से विख्यात हुए एवं ब्रह्मा जी के यज्ञ के ऋत्विज् बने। यज्ञ प्रारम्भ हुआ तथा ब्रह्मा जी ने दीक्षा ली। दीक्षा लेने पर ब्रह्मा जी विनीत हो गये। उनमें शान्ति के गुण आ गये। तब उनके शासन में उग्रता न रही। इसी कारण दण्ड अदृश्य हो गया। दण्ड के लुप्त होते ही प्रजा में व्यभिचार बढ़ने लगा। बलवान् निर्बल को सताने लगे। चारों ओर अराजकता फैल गयी। स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। ब्रह्मा जी को चिंता हुई कि अब क्या होगा? फिर उन्होंने विचारकर वरदानी भोलेनाथ के पास जाकर कहा - ‘‘भगवन्! अब आप ही कृपा कीजिये एवं प्रजा को इस वर्णसंकरता से छुटकारा दिलाइये, अन्यथा अनर्थ हो जायेगा।’’


    कुछ देर विचार कर महादेव ने एक दण्ड प्रकट किया। कुछ ही समय में दण्ड ने अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ किया। प्रजा में धर्माचरण होने लगा, जिसे देखकर माता सरस्वती ने दण्डनीति की रचना की। तब शिवशंकर ने एक-एक समूह का राजा बनाया। इन्द्र को देवताओं का, यम को पितरों का, कुबेर को धन एवं राक्षसों का, मेरु को पर्वतों का, समुद्र को सरिताओं का, वरुण को जल एवं असुरों का, मृत्यु को प्राणों का, वसिष्ठ को ब्राह्मणों का, अग्नि को वसुओं का, सूर्य को तेज का, चन्द्रमा को ताराओं एवं औषधियों का, कार्तिकेय को भूतों का तथा काल को सबका राजा बना दिया। स्वयं महादेव रुद्रों के राजा हुए। बृहस्पति पुत्र क्षुप को समस्त प्रजाओं का राजा बना दिया। यज्ञ समाप्त होने के बाद महादेव ने विष्णु का स्मरण कर वह दण्ड उन्हें सौंप दिया।’’


    मन्धाता ने पूछा - ‘‘उसके बाद क्या हुआ महाराज?’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘उसके बाद विष्णु ने उसे अंगिरा को दिया। अंगिरा ने इन्द्र एवं मरीचि को, मरीचि ने भृगु को, भृगु ने ऋषियों को, ऋषियों ने लोकपालों को, लोकपालों ने क्षुप को तथा क्षुप ने वैवस्वत मनु को वह दण्ड सौंपा। मनु ने धर्म की रक्षा के लिये उसे अपने पुत्रों को दिया। इस प्रकार यह दण्ड निरन्तर चलता जा रहा है।’’


    मन्धाता की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा - ‘‘इस दण्ड का उद्देश्य क्या है? इसका कार्य क्या है? किस कारण से इसे बनाया गया? इसे भी विस्तार से बतायें।’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘महाराज! दण्ड सम्पूर्ण जगत् को नियम के अन्दर रखने का कार्य करता है। यह धर्म का सनातन आत्मा है। इसका उद्देश्य प्रजा को उद्दण्डता से बचाना है। दुष्टों का दमन करना भी इसका एक उद्देश्य है। दण्ड ही सबको वश में रखता है। यह कालरूप दण्ड सृष्टि के आदि, मध्य एवं अंत में सतत् जागरुक रहता है। यही वस्तुतः सम्पूर्ण लोकों का ईश्वर है, उसका प्रजापति है। बस इतना समझ लीजिये कि यह साक्षात् भगवान् शंकर का स्वरूप है।’’


    मन्धाता ने पूछा - ‘‘किन्तु महाराज, यह अंततः क्षत्रियों के पास कैसे पहुँचा?’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘वैवस्वत मनु ने प्रजा की रक्षा में इसका उपयोग किया और अपने पुत्रों को दिया। तब ब्राह्मण ही लोकरक्षा किया करते थे। उसके उपरान्त राज्य की रक्षा का भार क्षत्रियों पर आया, तब ब्राह्मणों ने यह दण्ड क्षत्रियों को दिया। उसके बाद से आज तक यह क्षत्रियों के पास ही रहता आया है और वे ही इसके पालक रहे हैं।’’


     कहते हैं कि जो भी वसुहोम एवं मन्धाता के सम्वाद के रूप में दण्ड के सिद्धान्त को सुनता एवं तदनुसार धर्माचरण करता है, उसकी सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।




विश्वजीत 'सपन'

Friday, January 18, 2019

महाभारत की लोककथा भाग - 67


महाभारत की कथा की 92 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
 

विपत्ति का समाधान शोक नहीं

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    प्राचीन काल की बात है। कोसल के राजकुमार क्षेमदर्शी को विपत्ति का सामना करना पड़ा। उसकी समस्त सैनिक शक्ति नष्ट हो गयी। वह शोक करने लगा। जब उसे कोई उपाय न सूझा, तो उसने कालकवृक्षीय मुनि से इसके समाधान की आशा में उनके आश्रम गया और बोला - ‘‘मुनिवर! मैं बड़ी विपत्ति में हूँ। मेरी सारी सम्पत्ति नष्ट हो गयी। मेरे पास धन नहीं रहा, किन्तु उसका मोह नहीं छोड़ पा रहा हूँ। बार-बार प्रयास करने पर मुझे अपना राज्य नहीं मिल पा रहा। सैनिक शक्ति भी नष्ट हो चुकी है। मैं बड़ी सोचनीय अवस्था में पड़ा हूँ। कृपाकर कुछ ऐसा उपाय बतायें कि मुझे सुख एवं शान्ति की प्राप्ति हो सके।’’


    कालकवृक्षीय मुनि को राजकुमार की दशा का पता था। उसे उचित मार्गदर्शन की आवश्यकता थी, क्योंकि वह मोह में पड़ गया था। ऐसा विचारकर उन्होंने इस प्रकार कहा - ‘‘राजकुमार! सर्वप्रथम जिस वस्तु को तुम समझते हो कि ‘वह है’, उसको समझो कि ‘वह नहीं है’। यदि किसी ने ऐसा समझ लिया, तो उसे विपत्ति आने पर भी शोक नहीं होता। यदि तुम बड़ी सम्पत्ति का मोह त्याग न सको, तो कम से कम उसकी ममता का त्याग कर दो। यदि तुम यह मान लेते तो कि जो वस्तु थी, वह मेरी न थी, तब तुम्हें उसके खोने का दुःख न होगा।’’


    राजकुमार ने पूछा - ‘‘सम्पत्ति तो फिर बनायी जा सकती है, किन्तु घर-परिवार आदि का क्या करें?’’


    मुनि ने कहा - ‘‘आज तुम्हारे पितामह कहाँ है? अनेक नाते-रिश्तेदार नहीं रहे। यह शरीर ही अनित्य है। इसे जाना ही होता है। एक दिन तुम भी न रहोगे। फिर किसके लिये शोक करना? प्रारब्ध बड़ा प्रबल है, वही देता है और छीन भी लेता है। यह धारणा रखो, तो सब ठीक हो जाता है।’’


    राजकुमार बोला - ‘‘उचित कहा आपने। मुझे भी दैवयोग से अनायास ही राज्य प्राप्त हो गया था, जिसे काल ने छीन लिया। अब तो जो कुछ भी मिल जाता है, उन्हीं से जीवन-निर्वाह कर रहा हूँ।’’


    मुनि ने इसका समाधान देते हुए कहा - ‘‘उचित है, क्योंकि प्रारब्ध को कोई बदल नहीं सकता। यद्यपि धन पाना दुर्लभ है तथापि यह अस्थिर है। इसे इसी प्रकार समझकर सत्पुरुष इसका परित्याग कर देते हैं। दैववश जो भी हमें मिलता है, हमें उसमें ही आनन्दित होना चाहिये। दूसरे के धन को देखकर ईर्ष्या करने से शोक होता है। धर्मात्मा एवं धीर पुरुष तो स्वयंमेव राज्यलक्ष्मी एवं पुत्र-पौत्रों का परित्याग कर देते हैं। तुम भी ऐसा ही करो।’’


    राजकुमार ने पूछा - ‘‘तो क्या अर्थ की कामना ही व्यर्थ है?’’


    मुनि ने उत्तर दिया - ‘‘तुम अर्थ को अनर्थ के रूप में समझो। अर्थ से भोग की इच्छा जागृत होती है। भोगजनित इच्छा से अर्थ सम्पादन की इच्छा जागृत होती है। मानव इसमें इतना रम जाते हैं कि उन्हें इससे बड़ा कोई सुख नहीं लगता, किन्तु यह किसी का नहीं होता। जब इसका नाश होता है, तब उसका सारा सम्मान भी नष्ट हो जाता है। कुछ लोग तो ऐसे भी होते हैं कि धन के लोभ में पड़कर अपने प्राण भी गँवा बैठते हैं।’’


    राजकुमार को उपदेश समझ में आ रहा था। उसकी उत्सुकता बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा - ‘‘फिर जीवन क्या है? उसका उद्देश्य क्या है?’’


    मुनि ने समझाते हुए इसका उत्तर दिया - ‘‘धन जीवन का उद्देश्य नहीं है। धन-संग्रह का अंत विनाश होता है। जीवन का अंत मरण है और संयोग का अंत वियोग। इस बात को समझो कि चाहे मनुष्य धन को छोड़ता है अथवा धन उसे छोड़ देता है। धन किसी के पास कभी टिककर नहीं रहता।’’


    राजकुमार ने कहा - ‘‘आपकी बात समझ गया मुनिवर। अब मुझे क्या करना चाहिये?’’


    कालकवृक्षीय मुनि ने कहा - ‘‘इसे समझने का प्रयास करो कि विपत्ति मात्र तुम्हारे ऊपर नहीं आई है। यह किसी के भी ऊपर आ सकती है, अतः मन, वाणी एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण रखो। घबराओ नहीं, तुममें उत्तम ज्ञान है। तुम्हारी इच्छा भी थोड़ी है। तुममें चंचलता भी नहीं है। तुम्हारा हृदय कोमल है एवं तुम्हारी बुद्धि भी निश्चित पर टिकी है। तुम्हें कपट से भरी एवं शास्त्र के विरुद्ध वृत्ति का आश्रय नहीं लेना चाहिये। तुम सर्वस्व का त्याग कर दो। फल, फूल ग्रहण करते हुए, वन में विचरते हुए अपनी जीविका का निर्वाह करो।’’


    राजकुमार क्षेमदर्शी ने कहा - ‘‘किन्तु राज्य की प्राप्ति कैसे हो?’’


मुनि ने कहा - ‘‘काम, क्रोध, हर्ष, भय एवं दम्भ का त्यागकर शत्रुओं की भी सेवा करो। उनसे मेल बढ़ाओ। किसी प्रकार राजा जनक को प्रसन्न करो। बुद्धिमानों का विश्वास-भाजन बनकर शत्रुओं के राज्य में भ्रमण करो। शत्रु का कोष खाली करवा दो। दान करवा के उसकी सम्पत्ति क्षीण कर दो। नीरोग शत्रु को कृत्रिम उपायों से मरवा दो। तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा।’’


राजकुमार ने कहा - ‘‘किन्तु मैं कपट से कुछ नहीं करना चाहता। अपना राज्य भी नहीं चाहता। मुझे कोई दूसरा उपाय बताइये।’’


मुनि ने कहा ‘‘तुम सत्य ही गुणों से युक्त हो। अगली बार जब विदेहराज आयेंगे, तो मैं अवश्य तुमसे मित्रता का आदेश दूँगा।’’


उसके उपरान्त उन्होंने विदेहराज को संदेश भिजवाया। वे आये तो उनसे कहा - ‘‘यह राजकुमार उच्च कुल का है। यह धर्मात्मा है। इसमें कोई भी दुर्भावना नहीं है। इससे संधि कर लो।’’


जनक ने कहा - ‘‘आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है। आपने मेरे कल्याण के लिये ही सोचा होगा।’’


फिर उन्होंने कोसल राजकुमार को बुलाकर कहा - ‘‘मैंने धर्म एवं नीति का पालन कर धरती पर विजय पायी है, किन्तु आपने अपने गुणों से मुझे जीत लिया। आप मेरे घर पधारें।’’


उसके उपरान्त दोनों ने मुनि को प्रणाम किया और मिथिला नगरी की ओर प्रस्थान कर गये। राजकुमार के साथ उन्होंने अपनी पुत्री का विवाह कर दिया। उन्हें धन-सम्पत्ति देकर विदा किया।


शास्त्रों में कहा गया है कि जब राजा मेल से रहते हैं, तो उनकी उन्नति कोई नहीं रोक सकता।


Friday, January 11, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 66)




महाभारत की कथा की 91 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।  

विरोध से किसी का भला नहीं होता
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    यह एक प्राचीन इतिहास है। पूर्वकाल में एक समय था, जब धरती पर राजा पुरूरवा का राज्य था। वे बड़े धर्मज्ञ एवं नीतिपरायण राजा थे। जब भी उन्हें कोई शंका होती थी, तब वे महर्षि कश्यप के पास जाकर उसका समाधान किया करते थे। एक बार ऐसी ही शंकायें लेकर वे कश्यप के पास गये। कश्यप ने उनका आश्रम में स्वागत किया और बोले - ‘‘कहिये राजन्! आप किस प्रयोजन से मेरे आश्रम में पधारे हैं? मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’


    पुरूरवा ने कहा - ‘‘मुनिवर! जब ब्राह्मण एवं क्षत्रिय दोनों एक-दूसरे का परित्याग कर दें, तो दूसरे वर्ण के लोग किसे प्रधान समझें और प्रजा को किसका पक्ष लेना चाहिये? कृपया मेरी इस शंका का समाधान करें।’’


    कश्यप ने कहा - ‘‘राजन्! ब्राह्मण एवं क्षत्रिय में विरोध उचित नहीं। जहाँ क्षत्रिय ब्राह्मण का विरोध करते हैं, वहाँ क्षत्रिय का राज्य नष्ट हो जाता है। उन क्षत्रियों की वृद्धि रुक जाती है। तब क्षत्रिय न यज्ञ कर पाते हैं और न ही वेदाध्ययन। उनका विकास पूरी तरह से रुक जाता है। वे तब अमंगल करने लगते हैं एवं धर्म से विलग हो जाते हैं।’’
    पुरूरवा ने कहा - ‘‘उचित है, मुनिवर। यदि ब्राह्मण क्षत्रिय का विरोध करे, तो क्या होता है?’’


    कश्यप ने कहा - ‘‘राजन्! तब ब्राह्मण की रक्षा नहीं होती। उन्हें भय का जीवन बिताना पड़ता है। उन्हें दान-उपहार नहीं मिलता, तो जीवकोपार्जन उनके लिये कठिन हो जाता है, अतः दोनों को मिलकर रहना चाहिये। ब्राह्मण की उन्नति का आधार क्षत्रिय होता है और क्षत्रिय के अभ्युदय का आधार ब्राह्मण। दोनों जातियाँ एक-दूसरे पर आश्रित हैं, यदि इनकी प्राचीन काल से चली आ रही मित्रता टूट जाती है, तो विनाश प्रारंभ हो जाता है। चारों वर्णों की प्रजा पर मोह छा जाता है। प्रजा अपने मार्ग से भटक जाती है।’’


    पुरूरवा ने कहा - ‘‘क्या ब्राह्मणों को छोड़ देना पापकर्म के समान है?’’


    कश्यप ने कहा - ‘‘महाराज, इसे इस प्रकार समझें। ब्राह्मणरूपी वृक्ष सुख एवं सुवर्ण की वर्षा करता है। यदि उसकी रक्षा न की गयी, तो इससे निरन्तर दुःख एवं पाप की वृद्धि होती है। तब क्षत्रिय न चाहते हुए भी पापियों के संसर्ग में आ जाते हैं। तब उनसे पापकर्म होने लगता है, जिस कारण वे वर्षों तक कष्ट भोगते हुए दौड़ते फिरते हैं। वहीं ब्राह्मण जैसे पुण्यात्माओं के संसर्ग से वे सुख एवं समृद्धि की प्राप्ति करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को पुण्य लोक की प्राप्ति होती है। जहाँ घी के दिये जलते हैं। अतः ब्राह्मणों का सम्मान करना समाज के हित में होता है।’’


    पुरूरवा ने पूछा - ‘‘उचित कहा आपने गुरुवर। इस संदर्भ में एक राजा का क्या कर्तव्य होना चाहिये?’’


    कश्यप ने उन्हें समझाया - ‘‘राजा को एक बात का ध्यान अवश्य रखना चाहिये कि विद्वान्, ज्ञानी, तपस्वी ब्राह्मणों का कभी तिरस्कार नहीं करना चाहिये। ऐसा होने से राजा को हानि होती है। प्रजा को असह्य दुःख उठाना पड़ता है। एक राजा को चाहिये कि वह एक बहुज्ञ पुरोहित अवश्य बनाये। राज्याभिषेक होने के पूर्व ही एक योग्य पुरोहित का वरण कर लेना चाहिये। इसका कारण यही है कि धर्म के अनुसार ब्राह्मण सर्वश्रेष्ठ है। वेदवत्ता विद्वानों का कहना है कि सर्वप्रथम ब्राह्मण का जन्म हुआ था, अतः वे सभी वर्णों में ज्येष्ठ, सम्माननीय तथा पूजनीय होते हैं। बलवान् होते हुए भी राजा का कर्तव्य है कि वह धर्मानुसार सभी उत्तम वस्तुओं का निवेदन ब्राह्मण से करे। इस बात में संदेह नहीं कि ब्राह्मण क्षत्रिय को उन्नतिशील बनाते हैं एवं क्षत्रिय ब्राह्मण की उन्नति में कारण होते हैं। राजा का कर्तव्य यही है कि वह सदा ही ब्राह्मण का विशेष सम्मान करे।’’


    पुरूरवा ने सम्मान से महर्षि कश्यप को प्रणाम किया तो कश्यप ने पुनः कहा - ‘‘राजन्! धर्म एवं अर्थ को समझना कठिन होता है, अतः एक राजा को सत्परामर्श के लिये एक बहुज्ञ पुरोहित अवश्य रखना चाहिये। जिस देश में राजा एवं पुरोहित धर्मज्ञ तथा राजनीति के गूढ़ रहस्य को समझने वाले होते हैं, उस राज्य का एवं उसकी प्रजा का भला होता है। ब्राह्मण एवं क्षत्रिय में परस्पर सद्भाव होता है, तो प्रजा को सुख मिलता है। यदि उनमें वैमनस्य होता है, तो उस राज्य एवं उसकी प्रजा का निश्चित ही नाश होता है।’’


    पुरूरवा को समाधान मिल गया था। महर्षि कश्यप के बताये मार्ग पर चलते हुए एवं धर्म का पालन करते हुए उन्होंने अनेक वर्षों तक धरती पर राज्य किया। उनके राज्य में प्रजा सुखी रही एवं भयरहित रही।


    जीवन में परस्पर मिलकर रहने से ही जीवन सुखमय एवं शान्तिमय रहता है। विरोध से कभी किसी का भला नहीं होता। यह मूलमंत्र ही इस कथा का उद्देश्य है।


विश्वजीत 'सपन'

Friday, January 4, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 65)




महाभारत की कथा की 90 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 
 

राजा की आवश्यकता
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किसी भी प्रकार के समाज में एक राजा की आवश्यकता होती है। जिस देश में राजा नहीं होता, उसमें धर्म की स्थिति नहीं होती। तब राज्य में अराजकता फैल जाती है। पापियों द्वारा समस्त प्रजा को कष्ट पहुँचाया जाता है। इसी कारण देवताओं ने प्रजापालन के लिये राजाओं की सृष्टि की है। पूर्वकाल में एक बार ऐसा ही हुआ कि धरती पर धर्म का लोप होने लगा। राजा से हीन धरती नष्ट होने वाली थी। ऐसा प्रतीत हो रहा था कि धरती पर प्रजा नहीं होगी। अधर्म का बोलबाला होने लगा था। देवताओं ने जब देखा, तो वे बड़े दुःखी हुए। वे सभी मिलकर ब्रह्मा जी के पास गये एवं उनसे कहा - ‘‘भगवन्! धरती पर विनाश के बादल छा गये हैं। धर्म एवं वेद का लोप हो रहा है। प्रजा मोह में पड़कर अनुचित कार्यों में संलग्न हो रही है। वहाँ कोई राजा नहीं है। आप ही कुछ उपाय करें, अन्यथा समस्त पृथ्वी का विनाश हो जायेगा।’’


    तब ब्रह्मा जी कहा - ‘‘देवतागण, आप लोग चिंता न करें। पृथ्वी की स्थिति मुझे भी ज्ञात है। आप थोड़ी देर प्रतीक्षा करें। मैं कुछ उपाय करता हूँ।’’


उसके उपरान्त उन्होंने थोड़ी देर तक आपनी आँखें मूँदकर विचार किया। फिर उन्होंने मनु को बुला भेजा।


मनु ने आकर उन्हें प्रणाम किया और बोले - ‘‘भगवन्! आपने मुझे किस प्रयोजन से बुलाया है? आपकी क्या आज्ञा है?’’


ब्रह्मा जी ने कहा - ‘‘जाओ तुम पृथ्वी पर जाकर राजा का कर्म करो तथा नष्ट होती पृथ्वी की रक्षा करो। यह कार्य तुम्हीं कर सकते हो।’’


    मनु के मन में अनेक आशंकायें थीं। वे राजा बनना नहीं चाहते थे। उन्होंने ब्रह्मा जी से कहा - ‘‘भगवन्! मुझे राजा नहीं बनना है। राजा का कार्य बड़ा कठिन होता है। फिर मैं पाप से अत्यधिक डरता हूँ। विशेषतः मनुष्य जाति में असत्यपूर्ण आचरण अत्यधिक होता है। उनका राजा बनना एक कठिन कार्य है तथा पाप में पड़ने जैसा है, अतः मुझे क्षमा करें।’’


    तब ब्रह्मा जी ने राजा की महत्ता बताते हुए तथा स्वयं ब्रह्मा की भक्ति हेतु प्रेरित करते हुए कहा - ‘‘तुम पापकर्म से मत डरो। जो पाप करेगा, उसे ही पाप लगेगा। इसमें तुम्हें कोई दोष न होगा। राजा तो निष्पक्ष होता है। वह धर्म का पालन करता है। मेरा विश्वास है कि तुम बड़े सुयोग्य राजा होगे। तुम्हारे प्रताप से प्रजा सुखी रहेगी। कोई भी तुम्हें दबा नहीं पायेगा। तुम सर्वदा विजयी होगे। तुम्हारे कारण जो प्रजा सुखी होगी तथा धर्म का कार्य करेगी, तब उसका चतुर्थांश तुम्हें भी मिलेगा। उस धर्म के प्रभाव से तुम्हें ब्रह्मा की भक्ति का प्रसाद मिलेगा। मेरी आज्ञा है कि तुम पृथ्वी पर जाओ एवं शत्रुओं का मानमर्दन करो। प्रजा की रक्षा करो। उनको धर्म में लगाओ। तुम्हें सदा विजय की प्राप्ति हो।’’


    इस प्रकार जब ब्रह्मा जी ने मनु को प्रेरित किया, तो मनु पृथ्वी का राजा बनने के लिये तैयार हो गये। उसके उपरान्त उन्होंने ब्रह्मा जी से आज्ञा ली, उन्हें प्रणाम किया तथा बड़ी भारी सेना लेकर विजय अभियान के लिये निकल पड़े। 


    मनु महाराज ने पृथ्वी पर सर्वत्र घूम-घूमकर पापियों का दमन किया। सभी शत्रु राजाओं को हराकर एक राज्य की स्थापना की। उनके पराक्रम को देखकर सभी दंग रह गये। कुछ ही समय में प्रजा में भय की समाप्ति हुई। वे सुखपूर्वक रहने लगे। मनु ने धर्म का कार्य प्रारंभ किया। धीरे-धीरे प्रजा भी धर्म के कार्यों को करने लगी। समस्त पृथ्वी में शान्ति-व्यवस्था की स्थापना हुई। बुरे एवं अनुचित कर्म करने वालों को उचित दण्ड देकर उन्होंने समाज को उचित मार्ग दिखाया। उन्होंने अपने राजा होने के सभी कर्तव्यों का पालन किया।


    उन्होंने ब्राह्मणों का सत्कार किया। उन्हें दान देकर पुण्य का कार्य किया। ब्राह्मण उन्हें आशीर्वाद देते थे, फलतः उन पर बुरी शक्ति की छाया न पड़ने पाती थी। ऋषि-मुनि निष्कंटक वन में रहने लगे। उनका भय समाप्त हो गया। वे राजा के लिये लिये यज्ञ करने लगे। उनकी प्रजा बड़ी सुखी थी। वे राजा का सम्मान करने लगे। उन्हें प्रतिदिन राजकोष के लिये अनेक प्रकार के उपहार देने लगे। इस प्रकार राजकोष समृद्ध होने लगा। मनु महाराज ने भी उस राजकोष का उचित उपयोग किया। सारा धन वे प्रजा की सेवा, उनकी दरिद्रता आदि को मिटाने में खर्च करने लगे। इससे समस्त प्रजा की दीनता समाप्त हो गयी। प्रजा उनके गुणगान गाने लगी। उनके लिये अपने-अपने घरों में पूजा-अर्चना करने लगे। उनकी लम्बी आयु की प्रार्थना करने लगे। उसके बाद मनु महाराज ने पृथ्वी पर अनेक वर्षों तक राज्य किया। अंततः उनके समस्त कार्यों के कारण उन्हें ब्रह्मा जी का प्रसाद मिला। उनकी भक्ति का फल मिला।


प्रस्तुति - विश्वजीत 'सपन'

Friday, December 28, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 64)



महाभारत की कथा की 89वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
 
राजधर्म का महत्त्व
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    पूर्व काल की बात है। मन्धाता नामक एक राजा था। वह बड़ा गुणवान् और तपस्वी था। श्री नारायण के दर्शन की उसे अभिलाषा थी। वह संन्यास ग्रहण करना चाहता था। इसी उद्देश्य को लेकर उसने एक यज्ञ किया। यज्ञ समाप्त कर उसने भगवान् विष्णु के दर्शन की इच्छा से अपना ध्यान उनमें लगा दिया। तब भगवान् प्रसन्न हुए और उन्होंने इन्द्र का रूप धारण कर उसे दर्शन दिये। मन्धाता ने इन्द्ररूपी विष्णु का विधिवत पूजन किया तब इन्द्र बोले - ‘‘राजन्! तुमने बड़ी श्रद्धा एवं निष्ठा से यज्ञ किया और हमारा पूजन भी। तुम मानव-जाति के राजा हो। अवश्य तुम्हारी मनोकामनायें होंगी। मैं तुम पर बड़ा प्रसन्न हूँ। माँगो, जो भी वर माँगना चाहते हो, मैं उसे अवश्य पूरा करूँगा।’’


    मन्धाता की जैसे सभी इच्छायें पूर्ण हो गयीं। उसे तो भगवान् विष्णु का दर्शन करना था तथा संन्यास ग्रहण करना था। उसने कहा - ‘‘भगवन्! अब आपसे क्या छुपाना। मैं सिर झुकाकर आपसे निवेदन करना चाहता हूँ कि मुझे भगवान् विष्णु के दर्शन करा दें। मुझे अब भोगों से कुछ भी लगाव न रहा। मैं अब वन गमन करता चाहता हूँ। मेरी प्रवृत्ति आदिदेव श्रीविष्णु में हो गयी है। अब उनके अनुसार ही चलना चाहता हूँ। बस इतनी कृपा कर दीजिये।’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘राजन्! तुम तो राजधर्म त्यागने की बात कर रहे हो, जबकि राजधर्म तो स्वयं श्रीविष्णु से ही प्रवृत्त हुआ है। दूसरे सभी धर्म तो उसी के अंग हैं। असल में सभी धर्मों का अन्तर्भाव क्षात्रधर्म में ही हो जाता है। श्रीविष्णु ने क्षात्रधर्म के द्वारा ही शत्रुओं का दमन करके देवताओं एवं ऋषियों की रक्षा की थी। यदि वे ऐसा न करते तो ब्राह्मणों का नाश होने से पृथ्वी पर चारों वर्णों का लोप हो जाता। संसार में इन धर्मों का अनेक बार लोप हुआ है तथा इसी क्षात्रधर्म के द्वारा इनका उत्थान होता आया है। 


    राजन्! तुम जैसे लोक-हितैषी पुरुषों को सर्वथा क्षात्रधर्म का पालन करना चाहिये, अन्यथा प्रजा नष्ट हो जायेगी, कर्तव्य-विहीन हो जायेगी। राजा अपनी प्रजा का पुत्रों के समान देखभाल करता है, अतः इसमें कोई संदेह नहीं कि इसी कारण समस्त प्राणी निर्भय होकर रहते हैं। इस संसार में क्षात्रधर्म ही श्रेष्ठ है, यह सब जीवों का उपकार करने वाला तथा मोक्ष का साधन है। एक राजा का कर्तव्य अपने राजधर्म का पालन करना ही होता है।’’


    मन्धाता को बात में समझ आ गयी। उसने निर्णय लिया कि वह अपने कर्तव्यों से विमुख न होगा। अब उसे अपने कर्तव्य को करने में जो शंकायें थीं, उनका निदान जानना चाहता था। उसने अपनी शंका का समाधान करने के लिये पूछा - ‘‘देवराज! मेरे राज्य में अनेक जातियों के लोग हैं। उन्हें अपने धर्मों का पालन करने के लिये क्या-क्या करना चाहिये?’’ 


इन्द्र ने कहा - ‘‘प्रजापति ने सब प्रकार के मनुष्यों के लिये, सभी जातियों एवं वर्णों के लिये कर्तव्य पूर्व से ही निश्चित कर दिये हैं, उन सभी को उसी प्रकार आचरण करना चाहिये। उन्हें कभी भी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं होना चाहिये।’’


मन्धाता ने पूछा - ‘‘देवराज! अनेक लोग हैं जो लूट-पाट करते हैं, उनके साथ कैसा व्यवहार करना चाहिये?’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘जो लोग लूट-पाट करके जीविका चलाते हैं, उनसे माता-पिता, गुरुओं, आश्रमवासियों आदि की सेवा करवानी चाहिये। उनसे धर्म-कर्म एवं पितृश्राद्ध कराने चाहिये, आश्रम आदि बनवाने चाहिये। उन्हें उचित मार्ग पर लाने के प्रयास करने चाहिये।’’


    मन्धाता ने कहा - ‘‘देवेश! मानव-समाज में दस्यु सभी वर्णों एवं आश्रमों में पाये जाते हैं। वे छुपे रहते हैं। उनके लिये क्या उपाय हैं?’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘राजन्! जब दण्डनीति नष्ट हो जाती है, तब सभी प्राणी कर्तव्य-विमूढ़ हो जाते हैं। राजा लोगों का कर्तव्य है कि वे दण्डनीति द्वारा पापियों को रोकें तथा उन्हें उचित मार्ग पर लायें। इसी कारण राजा का दायित्व सबसे महान् होता है। इसी कारण वे लोक में सम्मान पाते हैं। इस प्रकार तुम वन जाने का विचार त्याग दो तथा क्षात्रधर्म में अपना मन लगाओ। यही तुम्हारे लिये सबसे बड़ा कल्याणकारी मार्ग है।’’


    इस इन्द्ररूपी भगवान् विष्णु ने मन्धाता को क्षात्रधर्म पालन करने का उपदेश दिया तथा वे अपने धाम चले गये। राजा मन्धाता पर इस उपदेश का बड़ा प्रभाव पड़ा। उसने पूरी निष्ठा से क्षात्रधर्म का पालन किया तथा वह एक प्रजापालक राजा के रूप में विख्यात हुआ।


    शास्त्रों में कहा गया है कि ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं संन्यास, इन तीनों आश्रमों के धर्मों का गृहस्थ धर्म में अन्तर्भाव हो जाता है तथा क्षत्रिय के धर्म तीनों वर्णों के आश्रय हैं, क्योंकि समस्त लोक तथा पुण्यकर्मों का आधार राजधर्म ही है।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, December 20, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 63)




महाभारत की कथा की 88वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
(शान्तिपर्व)


दण्डनीति का उद्भव एवं विकास

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    प्राचीन काल की बात है। वह सत्ययुग था। सत्ययुग के प्रारंभ में राज्य अथवा राजा नहीं होते थे, क्योंकि तब कोई अपराध ही नहीं होते थे। एक समय आया जब प्रजा मोह में पड़ गयी। तब उनका विवेक भी भ्रष्ट हो गया। वे कर्तव्य एवं अकर्तव्य का विभेद करने में अक्षम हो गये। धर्म का पतन हो जाने से वेद भी लुप्त होने लगे। समस्त संसार में भय का वातावरण उत्पन्न हो गया। ऐसी स्थिति को देखकर देवतागण को बड़ा कष्ट हुआ। वे ब्रह्मा के पास गये और उनसे कहा - ‘‘भगवन्! मनुष्य लोक में पतन का द्वार खुल गया है। वेद आदि नष्ट होते जा रहे हैं। अधर्म का बोलबाला होता जा रहा है। धर्म संकट में है। ऐसी स्थिति में धर्म की रक्षा कैसे हो? आप ही कुछ उपाय कीजिये, अन्यथा सब-कुछ नष्ट हो जायेगा।’’


    ब्रह्मा ने कहा - ‘‘देवगण! आप भयभीत न हों। यह समय का चक्र है। यह घूमता ही रहता है। आप लोग थोड़ी देर रुकें, मैं कुछ न कुछ उपाय करता हूँ।’’


    उसके उपरान्त ब्रह्मा ने अपनी बुद्धि से एक लाख अध्यायों का एक नीतिशास्त्र रचा। उसमें धर्म, अर्थ एवं काम का वर्णन था, अतः उसका नाम ‘‘त्रिवर्ग’’ रखा गया। इस शास्त्र में साम, दाम, दण्ड, भेद एवं उपेक्षा का वर्णन सविस्तार किया गया। इस नीतिशास्त्र में वह सब-कुछ था, जो एक प्रजापालन में सम्मिलित होना चाहिये। 


    नीतिशास्त्र की रचना करने के उपरान्त ब्रह्मा जी ने कहा - ‘‘देवगण, यह दण्डनीति तीनों लोकों में व्याप्त है। इसी से राज्यव्यवस्था चलती है। इसी से पृथ्वी की कल्याण संभव है। आपलोग इसको ग्रहण करें।’’


    किन्तु वह शास्त्र बड़ा विशाल था। उसका अध्ययन भी कठिन था। देवगण पुनः कठिनाई में थे। उनकी चिंता देखकर भगवान् शंकर ने सर्वप्रथम उस शास्त्र को ग्रहण किया तथा जीवों की घटती आयु को देखते हुए उसे संक्षिप्त किया। तब वह ग्रन्थ ‘वैशालाक्ष’ कहलाया। इसमें दस हज़ार अध्याय थे। पुनः इसे इन्द्र ने ग्रहण किया एवं संक्षिप्त किया। तब इसमें पाँच हज़ार अध्याय रहे गये तथा यह ‘बाहुदन्तक’ कहलाया। तब बृहस्पति जी ने तीन हज़ार अध्यायों तक इसे संक्षिप्त किया तथा वह ‘बार्हस्पत्य’ कहलाया। इसके बाद योगाचार्य गुरु शुक्राचार्य ने इसे संक्षिप्त कर मात्र एक हज़ार अध्यायों का कर दिया। पुनः मनुष्यों की आयु को ध्यान में रखते हुए महर्षियों ने एक छोटा-सा ग्रन्थ बना दिया, जो मनुष्य हेतु प्राप्य एवं प्रजापलन में सहायक हो। यही शास्त्र दण्डनीति कहलाया।


    इसके पश्चात् मृत्यु की मानसी पुत्री सुनीथा से राजा अंग के द्वारा वेन का जन्म हुआ। वह दुराचारी ही रहा। वह राग-द्वेष के अधीन अधर्म करने लगा। तब वेदवादी मुनियों ने उसे अभिमन्त्रित कुशाओं से मार डाला। उसके मरते ही कोई प्रजापालक न रहा। इससे और भी अधिक समस्या उपस्थित हो गयी। इस स्थिति को देखते हुए मुनियों ने वेन के दाहिने हाथ का मंथन किया। उससे इन्द्र के समान तेज वाला वेनपुत्र उत्पन्न हुआ। वह वेद-वेदांगों का ज्ञाता था तथा सभी विद्याओं में पारंगत था। उसका नाम पृथु रखा गया।


    पृथु ने मुनियों से कहा - ‘‘मुनिगण, मुझे धर्म एवं अर्थ के निर्णय की सूक्ष्म बुद्धि है। आपने मुझे जन्म दिया, तो अवश्य ही कोई विशेष कार्य होगा। मुझे बताइये कि मुझे अब क्या करना चाहिये?’’


    मुनियों ने कहा - ‘‘तुम्हें धर्म का पालन करना है और उसे धरती पर पुनः स्थापित करना है। जिस कार्य में धर्म की स्थिति जान पड़े उसे निःशंक करो। सभी जीवों के प्रति समान भाव रखो। जो मनुष्य धर्म से विलग होता दिखाई दे, उसका दमन करो।’’


    पृथु ने कहा - ‘‘मुनिगण, ब्राह्मण तो सर्वदा वन्दनीय हैं, अतः उन्हें छोड़कर मैं आपकी आज्ञा का पालन करूँगा।’’


    मुनियों ने मान लिया और पृथु ने अपना कार्य आरम्भ कर दिया। तब पृथ्वी बड़ी ऊँची-नीची थी। पृथु ने पत्थर, मिट्टी आदि डलवाकर उसे समतल किया। सभी देवताओं ने मिलकर पृथु का अभिषेक किया। स्वयं पृथ्वी उनकी सभा में उपस्थित हुई थी। पृथु के संकल्प से करोड़ों हाथी, घोड़े, रथ, पैदल आदि उत्पन्न हो गये। सभी जीवों का भय समाप्त हो गया। वे प्रसन्न होकर अपना जीवन जीने लगे। पृथु ने दण्डनीति का सुन्दर अनुपालन किया और धरती को स्वर्ग बना दिया। उन्होंने समस्त प्रजा का ‘रंजन’ किया एवं इसी कारण उन्हें प्रथम ‘राजा’ होने का गौरव प्राप्त हुआ। ब्राह्मणों का क्षति से त्राण किया, इस कारण वे ‘क्षत्रिय’ कहलाये। उन्होंने धर्मानुसार भूमि को प्रथित (पालित) किया और इसी कारण धरती का नाम ‘पृथ्वी’ पड़ा। 


    उनके शरीर में स्वयं भगवान् विष्णु का आवेश था, अतः सारा संसार उन्हें देवता की भाँति मानकर उनका सम्मान करता था। उन्होंने पहली बार पृथ्वी पर दण्डनीति का पालन किया और समस्त संसार को भयमुक्त किया।


    कहते हैं कि सभी राजा को गुप्तचरों द्वारा दृष्टि रखते हुए दण्डनीति का पालन करना चाहिये। राजा के दण्ड का बड़ा महत्त्व होता है, क्योंकि उसी के कारण समस्त राष्ट्र में नीति एवं न्याय का आचरण होता है। 


विश्वजीत 'सपन'

Monday, December 10, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 62)




महाभारत की कथा की 87वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 
 
परशुराम का जीवन-चरित
 

प्राचीन काल में जह्नु नामक एक राजा हुए। उनके पुत्र का नाम था अज। अज से बलाकाश्व का जन्म हुआ। बलाकाश्व के पुत्र कुशिक बड़े धर्मज्ञ हुए। उन्होंने पुत्र-प्राप्ति हेतु कठोर तपस्या की। तब स्वयं इन्द्र ही उनके पुत्र के रूप में अवतरित हुए एवं उनका नाम पड़ा गाधि। गाधि के कोई पुत्र न था, एक पुत्री हुई, जिसका नाम था सत्यवती। सत्यवती शुद्ध आचरण वाली तपस्विनी स्त्री थी। उसके इस प्रकार के व्यवहार को देखते हुए गाधि ने उसका विवाह मुनि ऋचीक से कर दिया।


मुनि ऋचीक को पता था कि गाधि एवं सत्यवती दोनों को पुत्र प्राप्ति की इच्छा थी। इसको ध्यान में रखते हुए एक दिन उन्होंने राजा गाधि एवं सत्यवती को संतान देने के लिये चरु तैयार किये। सत्यवती को बुलाकर चरु देते हुए उन्होंने कहा - ‘‘देवि! यह दो प्रकार का चरु है। इसमें से यह तुम ले लेना और दूसरा अपनी माँ को दे देना। तुम्हारी माता को एक तेजस्वी पुत्र की प्राप्ति होगी, जो बड़े-बड़े क्षत्रियों का संहार करेगा। तुम्हें एक श्रेष्ठ ब्राह्मण बालक की प्राप्ति होगी, जो तपस्वी एवं धैर्यवान् होगा।’’


ऋचीक मुनि ऐसा कहकर वन को चले गये। तभी तीर्थयात्रा को निकले गाधि अपनी पत्नी सहित ऋचीक के आश्रम पर आये। सत्यवती ने अपनी माता को चरु के बारे में बताया, किन्तु भूलवश चरु बदल गये और उन दोनों के एक-दूसरे के लिये दिये चरु को खा लिया। कुछ समय उपरान्त दोनों को गर्भ ठहर गया। सत्यवती के गर्भ को देखते ही ऋचीक ने पहचान लिया कि चरु खाने में भूल हुई है, वे अपनी पत्नी से बोले - ‘‘यह तो अनुचित हुआ प्रिये, मैंने तुम्हारे चरु में ब्राह्मण का तेज स्थापित किया था, किन्तु अब तुम्हारा पुत्र क्षत्रिय उत्पन्न होगा।’’
 

सत्यवती बोली - ‘‘भगवन्! ऐसा न कहिये। मुझे तो ब्राह्मण पुत्र ही चाहिये।’’

ऋचीक ने कहा - ‘‘मैंने ऐसा संकल्प नहीं किया था, किन्तु चरु के बदल जाने से ऐसा ही होगा।’’


सत्यवती बोली - ‘‘मुनिवर! आप तो इच्छा करते ही सृष्टि रच सकते हैं। कोई उपाय कर मुझे शान्त पुत्र ही दीजिये, चाहे मेरा पौत्र उग्र स्वभाव का क्यों न हो।’’


ऋचीक ने कहा - ‘‘तो फिर ठीक है, जैसा तुम कहती हो, वैसा ही होगा। मैं ऐसा ही वरदान तुम्हें देता हूँ।’’


उसके बाद ऋचीक मुनि के ऐसा संकल्प करने से सत्यवती ने जमदग्नि मुनि को जन्म दिया और राजा गाधि के यहाँ विश्वामित्र पैदा हुए।


विश्वामित्र में ब्राह्मण के गुण हुए और उन्होंने चरु के प्रभाव के कारण ही अंततः ब्राह्मणत्व की प्राप्ति भी की थी। उधर जमदग्नि ने पुत्र अर्थात् सत्यवती के पौत्र परशुराम हुए। उनका स्वभाग उग्र था तथा वे सम्पूर्ण विद्याओं के ज्ञाता हुए।

जब परशुराम बड़े हुए, तब हैहयवंशी क्षत्रियों का स्वामी अर्जुन नामक एक राजा था। अर्जुन राजा कृतवीर्य का पुत्र था। वह बड़ा पराक्रमी था, किन्तु थोड़ा घमण्डी भी था। उसने अश्वमेध यज्ञ से सम्पूर्ण पृथ्वी जीती और उसे ब्राह्मणों को दान में दे दी। उसने दत्तात्रेय की कृपा से सहस्र भुजायें प्राप्त कीं। एक बार अग्नि के भिक्षा माँगने पर उसने अपनी भुजाओं के पराक्रम को बताते हुए उन्हें भिक्षा दी। कुपित अग्नि ने उसके बाणों के अग्रभाग से निकलकर अनेक गाँवों, नगरों आदि का जला दिया। इस आग ने आपव मुनि का आश्रम भी जला दिया। तब कुपित होकर आपव मुनि ने उसे शाप देते हुए कहा - ‘‘तुम्हें जिन भुजाओं पर घमण्ड है, उसका नाश होगा, उन्हें संग्राम में परशुराम जी काट डालेंगे।’’


अर्जुन के पुत्र बड़े बली थे, किन्तु मूर्ख भी थे। वे घमण्डी एवं क्रूर भी थे। एक दिन वे जमदग्नि के आश्रम के पास से निकल रहे थे। उन्होंने उनकी गाय के बछड़े को चुरा लिया। उस बछड़े के लिये बड़ा भयंकर युद्ध हुआ और उस युद्ध में परशुराम ने अर्जुन की भुजाओं को काट दिया। फिर वे बछड़े को लेकर अपने आश्रम चले गये। 


अर्जुन के पुत्र भी चुप रहने वालों में से न थे। एक दिन अवसर पाकर जब परशुराम आश्रम में न थे तथा कुश एवं समिधा लाने वन गये हुए थे, तब अर्जुन के पुत्रों ने जगदग्नि का सिर काटकर उनका वध कर दिया। पिता के वध से क्रोधित होकर परशुराम ने क्षत्रियों के विनाश का संकल्प लिया और अस्त्र उठा लिये। सर्वप्रथम उन्होंने हैहयवंशियों पर आक्रमण किया एवं उन्हें समूल नष्ट कर दिया। इसके बाद भी कुछ क्षत्रिय बच गये थे। धीरे-धीरे उन्होंने अपना पराक्रम बढ़ाया। जैसे ही परशुराम जी को यह पता चला तो उन्होंने पुनः शस्त्र उठाये एवं क्षत्रियों के बालकों तक को मार दिया। अब क्षत्रिय मात्र गर्भ में ही बचे थे। वे बच्चे भी जब जन्म लेते थे, तो उनका पता लगाकर वे उनका भी वध कर देते थे। इस प्रकार इक्कीस बार क्षत्रियों का संहार करके उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया तथा सम्पूर्ण पृथ्वी को कश्यप जी को दान में दे दी। तब क्षत्रियों की रक्षा करने के उद्देश्य से कश्यप ने परशुराम से कहा - ‘‘परशुराम, तुमने अपना कार्य सम्पन्न कर लिया। तुम अब दक्षिण समुद्र के किनारे चले जाओ और मेरे राज्य में कभी निवास न करना।’’

परशुराम वहाँ से चले गये और समुद्र ने उनके लिये स्थान खाली किया, जो शूर्पारक देश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उसे अपरान्त भूमि भी कहते हैं।


विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, December 4, 2018

महाभारत की लोककथा (भाग - 61)


महाभारत की कथा की 86वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

मानव धर्म का रहस्य
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प्राचीन काल की बात है। विदेहराज जनक को शोक हुआ। वे इससे मुक्ति पाना चाहते थे। तब उन्होंने विप्रवर अश्मा से पूछा - ‘‘हे विप्रवर! मुझे शोक हुआ है। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा है कि ऐसे में क्या करना चाहिये। कृपा कर अपना कल्याण करने वाले मानव का व्यवहार कैसा होना चाहिये, इसका ज्ञान मुझे दीजिये?’’


अश्मा महान् ज्ञानी एवं तत्त्ववेत्ता थे। वे राजा की दुविधा को समझ रहे थे। उन्होंने कहा - ‘‘राजन्! मानव जीवन को भली-भाँति समझना आवश्यक होता है। इस बात को मन में अच्छी तरह से बिठा लें कि जन्म लेते ही प्रत्येक मानव दुःख एवं सुख का अनुभव करने लगता है। इसी कारण उसका ज्ञान अंधकार में छुप जाता है। जिस प्रकार वायु बादलों को छिन्न-भिन्न कर देती है, ठीक उसी प्रकार ये सुख-दुःख भी मानव के ज्ञान को नष्ट कर देते हैं। असल में सुख एवं दुःख प्रारब्ध के अनुसार आते ही हैं और आयेंगे ही। इनसे मुक्ति संभव नहीं है। विधाता की करनी बड़ी विचित्र है। भूख-प्यास, रोग, आपत्ति, ज्वर, मृत्यु आदि सब के सब जीव के जन्म के समय ही निश्चित हो जाते हैं। नियम के अनुसार समस्त प्राणियों को इनसे होकर ही जाना पड़ता है। इस प्रकार काल के प्रभाव से जीवों का सम्बन्ध इष्ट एवं अनिष्ट दोनों से होता है। यही जीवन है तथा जीवन का यही ज्ञान वास्तविक ज्ञान कहलाता है।’’


जनक ने पूछा - ‘‘हे ब्राह्मण देवता, आपने सही कहा। मुझे यह बताने का कष्ट करें कि क्या मृत्यु पर विजय नहीं पायी जा सकती?’’


अश्मा ने कहा - ‘‘यह संभव नहीं है राजन्, मृत्यु सभी को आनी है, तब वह चाहे आज हो अथवा कल। मनुष्य जब मृत्यु के निकट होता है अथवा जब वह वृद्धावस्था में जाता है, तब कोई औषधि, मन्त्र, होम अथवा पूजा उसे बचा नहीं सकते। मृत्यु का यह लम्बा मार्ग समस्त जीवों को तय करना ही पड़ता है। तपस्वी, दानी एवं बड़े-बड़े यज्ञ करने वाले भी वृद्धावस्था तथा मृत्यु को पार नहीं कर सकते।’’ 


राजा जनक ने कहा - ‘‘उचित है विप्रवर, कृपया ये भी बतायें कि हमारे संबंधी, नाते-रिश्तेदार आदि के संदर्भ में क्या सत्य है? हमारा मोह उनसे लगा ही रहता है।’’


अश्मा ने कहा - ‘‘राजन्! बड़ा ही सुन्दर प्रश्न किया आपने। इसके उत्तर को समझ लेने वाले को कभी कष्ट का सामना नहीं करना पड़ता है। ये रिश्ते-नातेदार भी उसी प्रकार मिलते एवं बिछुड़ते रहते हैं, जिस प्रकार समुद्र में दो लक्कड़ मिलते एवं बिछुड़ते रहते हैं। इस संसार में माता-पिता, स्त्री, पुत्र, पुत्री आदि किसके हुए हैं? विचार करें, तो इस जीव का न तो कोई सम्बन्धी हुआ है तथा न कभी होगा। याद कीजिये कि आपके बाप-दादा कहाँ चले गये? अब न वे आपको देख सकते हैं और न आप उन्हें। सब के सब एक दिन मिट जाते हैं। स्वर्ग एवं नरक को मनुष्य अपनी आँखों से कभी देख ही नहीं सकता। उन्हें देखने के लिये सत्पुरुष शास्त्ररूपी नेत्रों से काम लेते हैं। अतः इस बात को समझिये कि यह संसार ही अनित्य है एवं चक्र के समान घूमता रहता है। सभी को आना है तथा पुनः जाना है। यही नियम है, अतः जीव को सभी प्रकार के शोकों को भूल जाना चाहिये। उसे स्वयं से पूछना चाहिये कि शोक किसके लिये करना है? मेरा तो कोई है ही नहीं। किसी के प्रति मोह मात्र जीव का भ्रम है।’’


राजा जनक ने पूछा - ‘‘विप्रवर! यदि यह संसार ही भ्रम है, तो ऐसे में एक मानव का स्वभाव क्या होना चाहिये? उसे किस प्रकार का आचरण करना चाहिये?’’


अश्मा ने कहा - ‘‘जिसे अपने कल्याण की चिंता है, उस मनुष्य को शास्त्रों का उल्लंघन कभी नहीं करना चाहिये। उसे चाहिये कि वह पितरों का श्राद्ध एवं देवताओं के पूजन करे। पहले मनुष्य को ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिये। उसके बाद उसे गृहस्थ आश्रम का पालन करना चाहिये। पितरों एवं देवताओं के ऋण से मुक्त होकर संतान उत्पन्न करना चाहिये तथा यज्ञादि करना चाहिये। उसे हृदय का शोक त्याग कर इहलोक, स्वर्गलोक अथवा परमात्मा की आराधना करनी चाहिये। जो राजा शास्त्र के अनुसार धर्म का आचरण करता है तथा द्रव्य-संग्रह करता है, उसका सम्पूर्ण विश्व में सुयश फैलता है, अतः राजन् तुम्हें भी ऐसा ही करना चाहिये।’’


अश्मा मुनि के इस प्रकार कहने से राजा जनक का शोक दूर हो गया। उन्हें धर्म के रहस्य की प्राप्ति हुई तथा उनकी बुद्धि शुद्ध हो गयी। उनका मनोरथ पूर्ण हुआ और वे प्रसन्नचित्त होकर अपने महल वापस लौट गये। यही जीवन का रहस्य है। यही मानव का धर्म है। जो मानव इस प्रकार अपना जीवन यापन करता है, उसे अंततः अंतिम लक्ष्य अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति होती है।


विश्वजीत 'सपन'