Saturday, June 18, 2016

राजकुमारी सुभद्रा का हरण - कथा 8

वैशम्पायन जी कहते हैं कि बारह वर्षों के लिये अर्जुन वन में रहने लगे और इसी दौरान उन्होंने अनेक स्थलों की यात्रायें कीं। हिमालय की तराई से होते हुए महेन्द्र पर्वत फिर सागर के किनारे चलते हुए प्रभास क्षेत्र में पहुँचे। तब भगवान् श्रीकृष्ण स्वयं वहाँ आकर अर्जुन को द्वारका नगरी लेकर आये।
(महाभारत, आदिपर्व)


8

बहुत समय पहले की बात है। भगवान् श्रीकृष्ण मथुरा में रहते थे। उस समय यादवों का राज्य अत्यधिक सुखी और सम्पन्न था। भाईचारे का वातावरण था। सभी प्रसन्नता से रहते थे। एक बार यादवों ने रैवत पर्वत पर एक बहुत बड़े उत्सव का आयोजन किया। ब्राह्मणों को सहस्रों रत्नों का दान दिया। उत्सव में यदुवंशी सज-धजकर घूम रहे थे। चारों ओर कोलाहल था। बाजे-गाजे बज रहे थे। नाच-गाना हो रहा था। सभी प्रसन्न थे। उसी उत्सव में श्री कृष्ण के साथ पाण्डु के तीसरे पुत्र अर्जुन भी थे। श्रीकृष्ण के बुलाने पर सखा के घर आये थे। 

वहाँ घूमते हुए अर्जुन की दृष्टि कृष्ण की बहन सुभद्रा पर पड़ी। पहली ही दृष्टि में वह उन्हें भा गयी। उसकी मोहिनी सूरत देखकर अर्जुन एकटक देखते रह गये। अर्जुन के मनोभावों को पढ़ते हुए भगवान् श्रीकृष्ण ने चुहलता से पूछा - ‘प्रिय अर्जुन! जो मैं देख रहा हूँ क्या वह सच है?’


अर्जुन सहसा पूछे गये इस प्रश्न से सकपका गये। शर्म के मारे उन्होंने अपना सिर झुका लिया। 


‘भगवन्! आपसे क्या छुपाना। आप तो अंतर्यामी हैं।’ अर्जुन ने सकुचाते हुए कहा।


कृष्ण के लिये इतना संकेत ही अधिक था। वे सुभद्रा के लिये अर्जुन को एक योग्य वर मानते थे। किन्तु सुभद्रा की इच्छा के बारे में उन्हें भी कोई जानकारी नहीं थी। इसलिए बोले - ‘प्रिय मित्र! स्वयंवर में वह तुम्हें वरेगी या नहीं, कहा नहीं जा सकता। यदि तुम सुभद्रा से विवाह करना चाहते हो, तो क्षत्रियों की तरह हरण करके ही कर सकते हो।’


‘लेकिन भगवन् आपके होते हुए, आपकी बहन का हरण कैसे संभव है?’ अर्जुन के लिये यह एक अनबूझ पहेली थी।


‘प्रिय अर्जुन! क्षत्रिय इस तरह से बातें नहीं करते। वे तो शौर्य के प्रतीक होते हैं। फिर तुम्हारे लिये यही सबसे सरल एवं उत्तम उपाय है।’ श्रीकृष्ण ने हमेशा की तरह मुस्कुराते हुए कहा।


कृष्ण की मंशा जानकर और उनकी सलाह पर अर्जुन ने अपने बड़े भाई युधिष्ठिर के पास दूत भेजा। युधिष्ठिर ने दूत से समाचार सुना तो उन्हें अपार प्रसन्नता हुई और वे इस रिश्ते के लिये सहर्ष तैयार हो गये। दूत ने लौटकर जब यह समाचार कहा तो अर्जुन ने योजना बनायी।


एक दिन सुभद्रा रैवत पर्वत पर देव पूजा के लिये गयी। पूजा करने के बाद जब वह द्वारका आ रही थी, तब अवसर देखकर अर्जुन ने बलपूर्वक उसे उठाकर अपने रथ पर बिठा लिया। उसे लेकर अपने नगर की ओर चल पड़े। सैनिकों ने तुरन्त जाकर द्वारका की सभा में यह समाचार बताया, तो यादवों ने इसे अपमान समझा और क्रोध से आगबबूला हो गये। सभापाल ने तत्काल युद्ध का आदेश दे दिया। युद्ध का डंका बजते ही सभी इकट्ठा हो गये और युद्ध की तैयारी करने लगे। 



तब बलराम ने इस बारे में श्रीकृष्ण से बात करने की सलाह दी। सभी श्रीकृष्ण के पास गये और बोले - ‘भगवन्! आपका मित्र समझकर हमने अर्जुन का स्वागत किया। किन्तु, उसने जिस थाली में खाया उसी में छेद किया। बिना किसी कारण के हमारी बहन का हरण किया। उसे इस करनी का दण्ड अवश्य मिलना चाहिए।’


सभी यादवों ने इस बात का समर्थन किया। श्रीकृष्ण ने शांत भाव से सबको समझाया - ‘अर्जुन ने हमारे वंश का अपमान नहीं, बल्कि सम्मान किया है। असल में हमारे वंश के महत्त्व को जानकर ही उसने हमारी बहन का हरण किया है।’


‘यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? अर्जुन के अपराध को अपराध नहीं मान रहे हैं?’ यादवों ने पूछा। 


श्रीकृष्ण बोले - ‘यह अपराध नहीं है, बल्कि उसका यह कार्य उसके क्षत्रिय धर्म के अनुसार ही है। क्षत्रियों में हरण कर विवाह करना मान्य है। उसे स्वयंवर में सुभद्रा को पाने में संदेह था। इसलिए उसने ऐसा किया।’ 


‘किन्तु, भगवन्! वे हमसे बात करके भी हमारी बहन का हाथ माँग सकते थे।’ सभापाल ने कहा।


‘अवश्य, किन्तु आप भूल रहे हैं कि यदि बहन सुभद्रा को यह बात नहीं जँचती तो क्या होता? वैसे भी अर्जुन के साथ नाता जोड़ना हमारे लिये गर्व की बात है।’ श्रीकृष्ण ने पुनः समझाते हुए कहा।


यादवों में असंतोष था और नाना प्रकार से समझाने के पश्चात् ही वे श्रीकृष्ण की बात मान पाये। तब उन्होंने युद्ध करने का निर्णय त्याग दिया। यह समाचार पाकर अर्जुन सुभद्रा के साथ द्वारका वापस लौट आये। उसके बाद बड़ी धूम-धाम के साथ सुभद्रा का विवाह अर्जुन के साथ कर दिया गया। एक वर्ष तक अर्जुन द्वारका में ही रहे।


जब एक वर्ष के बाद वे सुभद्रा के साथ इन्द्रप्रस्थ आये, तो उनका बहुत स्वागत हुआ। सुभद्रा ने कुन्ती के पैर छुए, तो उन्होंने आशीर्वाद दिया। द्रौपदी ने बहन कहकर संबोधित किया तो सुभद्रा ने उसके भी पैर छू लिये। द्रौपदी ने उसे गले से लगा लिया।


इस प्रकार इन्द्रप्रस्थ और द्वारका में बहुत ही घनिष्ठ संबंध स्थापित हो गया। कुछ वर्षों के बाद सुभद्रा ने एक वीर और सुन्दर बालक को जन्म दिया। उसका नाम अभिमन्यु पड़ा। श्रीकृष्ण ने उसे सब प्रकार की शिक्षा दी और वह गुणों में एक श्रेष्ठ कुमार बना। महाभारत के युद्ध में अभिमन्यु ने अपनी वीरता से सभी को चकित कर दिया।

 
विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, March 12, 2016

गीता ज्ञान - 18 (अंतिम भाग)




अथाष्टादशोऽध्यायः


 (मोक्षसंन्यास योग)


 (भाग-4)
    

   
अठारहवें अध्याय का यह अंतिम भाग है और इसके बाद गीता ज्ञान समाप्त हो जायेगा। इस भाग में शेष बचे श्लोंकों की व्याख्या की जायेगी। भक्तियोग की बात बताकर भगवान् ने अर्जुन के माध्यम से संदेश दिया है कि मानव को ईश्वर की शरण में चला जाना चाहिए। यह श्लोक ही गीता के उपदेश का सार है।

    सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।
    अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः।।गी.18.66।।


    अर्थात् सम्पूर्ण धर्मों का आश्रय छोड़ कर, केवल मेरी शरण में आ जाओ, मैं तुम्हें सम्पूर्ण पापों से मुक्त कर दूँगा, चिंता मत कर।


    स्वयं भगवान् के शरणागत हो जाना - यह सम्पूर्ण साधनों का सार है। इसमें शरणगत भक्त को कुछ भी करना शेष नहीं रहता है। भगवान् के साथ कर्मयोगी का ‘नित्य’ संबंध होता है, ज्ञानयोगी का ‘तात्त्विक’ संबंध होता है और शरणागत भक्त का ‘आत्मीय’ संबंध होता है। नित्य संबंध में संसार के अनित्य संबंध का त्याग है, तात्त्विक संबंध में तत्त्व के साथ एकता (तत्त्वबोध) है और आत्मीय संबंध में भगवान् के साथ अभिन्नता (प्रेम) है। नित्य संबंध में शान्त रस है, तात्त्विक संबंध में अखण्ड रस है और आत्मीय संबंध में अनन्त रस है। इस अनन्त रस के बिना शरणगति की प्राप्ति नहीं होती। यह शरणागति ही गीता का सार है। केवल पापों से मुक्ति ही शरणागति का फल नहीं है। यह ईश्वर की प्राप्ति है। कहा भी गया है कि कुछ चाहने से कुछ ही मिलता है, किन्तु कुछ न चाहने से सब-कुछ (अनन्त) मिलता है। शरणागत भक्त के वश भी स्वयं ईश्वर भी हो जाते हैं। इसी शरणागति में गीता के उपदेश की पूर्णता होती है। यहाँ भक्तियोग की सगुणता का प्रतिपादन बड़ी सुन्दरता से हुआ है। यही सर्वाधिक सरल मार्ग है ईश्वर-प्राप्ति का। इसी पूर्ण शरणागति को प्रपत्तिवाद भी कहते हैं। 


    इसके बाद गीताकार भगवान् के श्रीमुख से गीतोपदेश की अपात्रता के बारे में कहते हैं कि गीता का यह गूढ़ रहस्य अतपस्वी को नहीं कहना चाहिए, भक्तिहीन को नहीं कहना चाहिए तथा जो नहीं सुनना चाहता है, उसे भी नहीं कहना चाहिए। साथ ही जो ईश्वर में दोष-दृष्टि रखते हैं उन्हें भी नहीं कहना चाहिए। जो भगवान् से प्रेम करके, परम रहस्य को उनके भक्तों से कहेगा, वह ईश्वर को प्राप्त होगा। अर्थात् वह ईश्वर को प्राप्त करेगा। ऐसा करने वाला ही उनका सबसे परम प्रिय होगा। भगवान् को भक्त प्रिय होते ही हैं और जो गीताशास्त्र का प्रचार-प्रसार करेगा, वह भक्त तो अति प्रिय होगा ही। सभी इसका अध्ययन नहीं कर सकते, तब उन्हें बताने वाला भी होना चाहिए। तो न केवल इसका अध्ययन करने वाला, बल्कि इसे दूसरों के कल्याण के लिये बताने वाला भी ईश्वर-भक्ति करता है। साथ ही जो इसका श्रवण करता है, वह ईश्वर-भक्ति करता है। 


जो इस धर्ममय गीताशास्त्र का अध्ययन करेगा, उसके इस ज्ञानयज्ञ द्वारा ईश्वर की ही पूजा होगी। तात्पर्य इसका अध्ययन ईश्वर की पूजा से कम नहीं है। दोष-दृष्टि से रहित जो श्रद्धालु इस गीताशास्त्र का श्रवण करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर शुभ लोकों को प्राप्त करेगा। इस प्रकार गीता-ज्ञान और उसका माहात्म्य बताकर श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि हे पार्थ! क्या तुमने इस गीता-ज्ञान को ध्यान से सुना? क्या तुम्हारा अज्ञान जनित मोह भंग हुआ? अर्थात् अर्जुन का युद्ध न करने का जो निर्णय था, जो उसका भ्रम था, क्या वह दूर हुआ।


    तब अर्जुन ने कहा कि हे अच्युत! आपकी की कृपा से मेरा मोह नष्ट हो गया और मैंने कर्तव्य विषयक अपनी स्मृति प्राप्त कर ली है। मेरा सन्देह मिट गया है, मैं स्थिर हो गया हूँ और आपके आदेश वचनों का पालन करूँगा। तात्पर्य यह कि अर्जुन ने अपने स्व-स्वभाव कर्म अर्थात् क्षात्र-धर्म के पालन का निर्णय ले लिया, क्योंकि ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसा उसका अज्ञान अब दूर हो चुका था। उसे भगवान् से मिले आदेश का पालन करना था। वह जान चुका था कि कर्ता वह नहीं बल्कि स्वयं ईश्वर हैं। 


    ये बातें बताने के बाद संजय ने धृतराष्ट्र से कहा कि तो इस प्रकार मैंने वासुदेव श्रीकृष्ण एवं महात्मा अर्जुन के इस अद्भुत रोमांचक संवाद को सुना। श्रीव्यास जी की कृपा से दिव्यदृष्टि (अर्जुन को श्रीकृष्ण की कृपा से एवं संजय को श्रीव्यास जी की कृपा से दिव्यदृष्टि मिली थी, अतः संजय व्यास जी को कृतज्ञता प्रकट करते हैं) पाकर मैंने इस परम गोपनीय योग को अर्जुन के प्रति कहते हुए स्वयं योगेश्वर श्रीकृष्ण से प्रत्यक्ष सुना है। हे राजन! इस पवित्र और अद्भुत संवाद को पुनः-पुनः स्मरण करके मैं पुनः-पुनः अत्यन्त हर्षित हो रहा हूँ। श्रीकृष्ण के विलक्षण रूप को स्मरण करके मुझे पुनः-पुनः महान् आश्चर्य हो रहा है। 


गीता के आरम्भ में धृतराष्ट्र का प्रश्न था कि युद्ध का परिणाम क्या होगा? तो उसके उत्तर में संजय गीता के अंतिम श्लोक में कहते हैं कि जहाँ योगेश्वर श्रीकृष्ण हैं और जहाँ गाण्डीवधारी अर्जुन हैं, वहीं पर श्री, विजय, विभूति और अचल नीति है।
 

इति  

विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, February 14, 2016

गीत ज्ञान 18 (भाग -3)



अथाष्टादशोऽध्यायः


(मोक्षसंन्यास योग)
 
(भाग-3)
    

हमने देखा कि भगवान् त्याग की महत्ता बताते समय कहते हैं कि नियत कर्मों के त्याग उचित नहीं हैं। साथ ही सांख्ययोग की दृष्टि से उन्होंने सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि में पाँच हेतु भी बताये। अब आगे के प्रकरण में भक्तियोग की बात बताने के लिये वे कहते हैं कि किन-किन वर्णों के लिये कौन-कौन से कर्म नियत किये गये हैं।

    ब्राह्मणक्षत्रियविशां शूद्राणां च परंतप।
    कर्माणि प्रविभक्तानि स्वभावप्रभवैर्गुणैः।।गी.18.41।।


    अर्थात् हे परंतप! ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र के कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए तीनों गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं। यहाँ समझना होगा कि भगवान् ने पूर्व में कहा था कि चारों वर्णों की रचना गुणों एवं कर्मों के विभाव के अनुसार की गयी है - ‘‘गुणकर्मविभागशः (4.13)’’। अब वे कहते हैं - ‘‘स्वभावप्रभवैर्गुणैः’’ अर्थात् चारों वर्णों के कर्म स्वभाव से उत्पन्न हुए तीनों गुणों के द्वारा विभक्त किये गये हैं। इस प्रकार चतुर्थ अध्याय में चारों वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन है, जबकि यहाँ बताते हैं कि इन चारों वर्णों के कर्म क्या-क्या होने चाहिए।


    मन का निग्रह करना, इन्द्रियों को वश में करना, धर्म पालन के लिये कष्ट सहना, बाहर-भीतर से शुद्ध रहना, दूसरों के अपराध को क्षमा करना, शरीर, मन आदि में सरलता रखना, वेद, शास्त्र आदि का ज्ञान होना, यज्ञविधि को अनुभव में लाना और परमात्मा, वेद आदि में आत्मिक भाव रखना, ये सभी ब्राह्मण के स्वाभाविक कर्म हैं। 


    शूरवीरता, तेज, धैर्य, प्रजा के संचालन आदि की विशेष चतुरता तथा युद्ध में पीठ न दिखाना, दान करना और शासन करने का भाव, ये सभी क्षत्रिय के स्वाभाविक कर्म हैं। खेती करना, गायों की रक्षा करना और व्यापार करना, वैश्यों के स्वाभाविक कर्म हैं, जबकि चारों वर्णों की सेवा करना शूद्र का स्वाभाविक कर्म हैं। इन्हें स्वाभाविक कर्म कहने का तात्पर्य यह है कि वैसे तो चेतन जीवात्मा और जड़ प्रकृति का स्वाभाव भिन्न है, किन्तु चेतन जीवात्मा ने जड़ प्रकृति से संबंध मान लिया है। इसी को गुणों का संग कहते हैं, जो जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है - ‘‘कारणं गुणसंगोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु (गी.13.21)’’। इसी संग के कारण गुणों के तारतम्य से जीव का जन्म विभिन्न वर्णों में होता है। इन स्वाभाविक कर्मों को करने में इन्हें श्रम नहीं करना पड़ता, क्योंकि वे उनके स्वाभाव के अनुसार कर्म हैं। इनमें ही इनकी रुचि होती है। 


    स्वभावज कर्मों के वर्णन का प्रयोजन क्या है? यह बात बताते हुए वे कहते हैंः-


    यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
    स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः।।गी.18.46।।


    अर्थात् जिस परमात्मा से सम्पूर्ण प्राणियों की उत्पत्ति होती है, जिससे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है, उस परमात्मा का अपने कर्म के द्वारा पूजन करके मनुष्यमात्र सिद्धि को प्राप्त हो जाता है।


    तात्पर्य यह कि समस्त मानव जाति को ऐसी परमसत्ता का पूजन करना चाहिए। यह स्वभावज कर्म करना ही पूजन है। जिस प्रकार रस्सी में साँप का भ्रम मिटने से साँप का लोप हो जाता है, किन्तु रस्सी तो रहती ही है, ठीक उसी प्रकार अपने कर्मों से एवं पदार्थों से भगवान् की पूजा करने से संसार तो लुप्त हो जाता है, किन्तु भगवान् रह जाते हैं और यही स्वरूप तब ईश्वरमय हो जाता है। यदि ऐसे कर्मों में कोई कमी भी रह जाये, तो वह पाप का भागी नहीं होता, क्योंकि वह स्वाभाविक कार्य है।


    यहाँ एक शंका उत्पन्न होती है कि एक कसाई के घर में उत्पन्न व्यक्ति किस प्रकार अपने स्वभावज कार्य से मुक्ति पायेगा? इसका समाधान यह है कि स्वभावज कर्म का अर्थ अहितकारी कर्म से कभी नहीं है। ये कर्म शास्त्रसम्मत ही होने चाहिए। किसी प्राणि की हत्या शास्त्रनिषिद्ध है, अतः ऐसे कर्म का त्याग ही उचित है। 


    इसके बाद संक्षेप में सांख्ययोग का वर्णन करते हुए सर्वप्रथम इसके अधिकारी के बारे में बताते हैं कि जिसकी बुद्धि सर्वत्र आसक्तिरहित है, जिसने शरीर को वश में कर रखा है, जो छोटी-छोटी इच्छाओं से रहित है, वह मनुष्य इसका अधिकारी कहलाता है। ऐसा अधिकारी ही बह्म को प्राप्त करता है। यह किस प्रकार बह्म की प्राप्ति करता है, इसके बारे में वे अगले तीन श्लोकों में इसे बताते हैं।


    जो विशुद्ध सात्त्विकी बुद्धि से युक्त, वैराग्य के आश्रित, एकान्त का सेवन करने वाला और नियमित भोजन करने वाला, धैर्यपूर्वक रहित होकर इन्द्रियों का नियमन करके, शरीर-वाणी-मन को वश में करके, शब्द आदि विषयों का त्याग करके और राग-द्वेष को छोड़कर, ममता रहित तथा शान्त होकर निरन्तर ध्यानयोग के परायण हो जाता है, वह अहंकार, दर्प, बल, काम, क्रोध और परिग्रह से ब्रह्मप्राप्ति का पात्र हो जाता है। ऐसा साधक पूर्णतः मुझे प्राप्त हो जाता है अर्थात् ब्रह्म में लीन हो जाता है। ऐसे भक्त मुझे जानकर इस पराभक्ति के द्वारा मुझमें प्रविष्ट हो जाते हैं। 


    इसके बाद शरणागति की प्रधानता वाले भक्तियोग के संदर्भ में भगवान् कहते हैं कि मेरा आश्रय लेने वाला भक्त सभी कर्म करता हुआ भी मेरी कृपा से शाश्वत, अविनाशी पद को प्राप्त हो जाता है। तात्पर्य यह कि जहाँ ज्ञानयोगी के लिये सब विषयों का त्याग करना, निरन्तर ध्यान करना और अहंता, ममता, काम, क्रोध आदि का त्याग आवश्यक होता है, वहीं भक्तियोग में अपने स्वभावज कर्मों को करते हुए यदि वह भगवान् का आश्रय लेता है, तो उसे परमपद की प्राप्ति होती है। इसमें भक्तों को सुगमता होती है, क्योंकि उसे मात्र स्वयं को ईश्वर के आश्रय में रख देना होता है। 


    इस प्रकार भक्तियोग की महत्ता बताकर भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! तुम अपने समस्त कर्मों को मन से मुझे अर्पित कर दे, स्वयं को मेरे अर्पित कर दे, समता का आश्रय लेकर इस संसार से संबंध-विच्छेद कर ले और मेरे परायण होकर मेरे में चित्त लगा। अर्थात् तू यह मान ले कि मन, बुद्धि, इन्द्रियाँ, शरीर आदि और संसार के व्यक्ति, घटना, परिस्थिति आदि सब भगवान् के ही हैं। इनमें कोई भी वस्तु किसी की व्यक्तिगत नहीं है। इन वस्तुओ के सदुपयोग के लिये ईश्वर ने मात्र अधिकार दिया है। इस दिये हुए अधिकार को भी ईश्वर को अर्पित कर दे। 


    विशेष बात यह है कि चित्त से सब कर्म भगवान् को अर्पण करने से नित्य-वियोग हो जाता है और भगवान् के परायण होने से नित्य-योग हो जाता है। नित्य-योग में योग, नित्य-योग में वियोग, वियोग में नित्य-योग एवं वियोग में वियोग - ये चार अवस्थायें चित्त की वृत्तियों को लेकर होती हैं। इन्हें कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है। यथा, श्रीकृष्ण एवं श्रीराधा का मिलन - ‘नित्य-योग में योग’ है। मिलन होने पर भी जब हृदय में बात उठती है कि ‘‘तुम कहाँ चले गये?’’ तो ‘नित्य-योग में वियोग’ होता है। श्यामसुन्दर सामने नहीं हैं, किन्तु मन को ऐसा प्रतीत होता है कि वे प्रत्यक्ष हैं, तो यह ‘वियोग में नित्य-योग’ है। श्यामसुन्दर थोड़े समय के लिये सामने नहीं आये, तो मन में भाव उठते हैं कि अब क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? उनसे कैसे मिलूँ? तो यह ‘वियोग में वियोग’ है। वास्तव में इन चारों अवस्थाओं में भगवान् के साथ नित्य-योग बना रहता है। वियोग तो कभी होता ही नहीं है। यह ‘नित्य-योग’ ही ‘प्रेम’ है। इस प्रेम में चार प्रकार का रस अथवा रति होती है - दास्य, सख्य, वात्सल्य और माधुर्य। इन रसों में दास्य से साख्य, साख्य से वात्सल्य और वात्सल्य से माधुर्य रस श्रेष्ठ है, क्योंकि इनमें ईश्वर के ऐश्वर्य की विस्मृति क्रमशः अधिक होती चली जाती है। किन्तु इनमें से कोई एक रस भी यदि पूर्णता में पहुँच जाता है, तो अन्य रसों की स्वयमेव पूर्ति हो जाती है। इन रसों को कुछ इस प्रकार समझा जा सकता है।


    दास्य रति में भक्त का भगवान् के प्रति यह भाव होता है कि वे उनके स्वामी हैं और वे सेवक। उनका पूर्ण अधिकार होता है कि चाहे उनसे कोई भी कार्य करवा लें। मेरे से अत्यधिक प्रेम रखने के कारण ही वे बिना मेरी सम्मति के ही सब-कुछ विधान करते हैं।


    सख्य रति में भक्त का भगवान् के प्रति सखा भाव रहता है। वो सोचते हैं कि वे मुझे प्रेम करते हैं और मैं उन्हें प्रेम करता हूँ। उनका मेरे ऊपर पूरा अधिकार है, तो मेरा भी उन पर पूरा अधिकार है। अतः मैं जो कहूँ उन्हें मानना होगा।


    वात्सल्य रति में भक्त मानता है कि वह ईश्वर का माता-पिता अथवा गुरु है। उसे उनकी रक्षा करनी है। उनका ध्यान रखना है। ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार नन्द और यशोदा श्रीकृष्ण का घ्यान रखते थे कि उन्हें कुछ नुकसान न हो जाये।


    माधुर्य रति में भक्त को भगवान् के ऐश्वर्य की विस्मृति होती है। उन्हें प्रतीत होता है कि ईश्वर की सुख-सुविधायें जुटाना उनका कार्य है। इसमें भगवान् के साथ अभिन्नता होती है। 

       
    तात्पर्य यह है कि शाश्वत पद की प्राप्ति के लिये साधक को दो ही विशेष कार्य करने हैं - संसार के सम्बन्ध का त्याग और भगवान् के साथ प्रेम का सम्बन्ध। भक्त का कार्य भगवान् का आश्रय लेना है, भगवान् का ही चिंतन करना है। तब भगवान् भक्त पर विशेष कृपा करके उसके साधन की समस्त विघ्न-बाधाओं को दूर कर देते हैं और स्वयं की प्राप्ति भी करा देते हैं। कोई यदि अहंकारवश स्वयं को कर्ता मान लेता है, तो वह परमार्थ से भ्रष्ट हो जाता है। अतः वे अर्जुन से कहते हैं कि हे अर्जुन! अहंकारवश ‘मैं युद्ध नहीं करूँगा’ ऐसा विचार मिथ्या है, क्योंकि तुम्हारा क्षत्रियत्व तुम्हें हठात् ही युद्ध में लगा देगा। इसका कारण यह है कि जिस प्रकार मनुष्य गंगा जी के प्रवाह को रोक नहीं सकता, किन्तु उसे घुमा सकता है, ठीक उसी प्रकार अपने स्वभाव के कर्म को छोड़ नहीं सकता, किन्तु ईश्वर भक्ति के द्वारा उन्हें निर्मल बना सकता है।


    यह स्वभाव हो तरह का होता है - विहित कर्मों का स्वभाव एवं निषिद्ध कर्मों का स्वभाव। इनमें विकहत कर्मों का स्वभाव तो स्वतः होने से ‘स्व-स्वभाव’ है, जबकि निषिद्ध कर्मों का स्वभावा आगन्तुक होने ‘पर-स्वभाव’ है। ‘स्व-स्वभाव’ सजातीय होने से ‘जन्य’ नहीं है, जबकि ‘पर-स्वभाव’ विजातीय होने से जन्य है। मानव का कर्तव्य है कि वह निषिद्ध कर्मों के स्वभाव का त्याग करके विहित कर्मों के स्वभाव के अुनसार कार्य करे। 


    अतः अर्जुन को वे बताते हुए कहते हैं कि ईश्वर सभी प्रणियों के अंदर ही शोभा पाता है। वह अपनी मायाशक्ति से घुमा रहा है। अतः उस परमात्मा की शरण में जाओ। उसकी कृपा से ही तुम परमशक्ति तथा परमधाम को प्राप्त करोगे। इतना कह कर भगवान् कहते हैं कि जो भी गोपनीय बातें थीं, मैंने तुम्हें बता दीं। अब तुम स्वयं इस पर विचार करो कि तुम्हें क्या करना है। फिर भी इस बात से इंकार नहीं कि मैं परम हितकर वच नही तुमसे कहूँगा, क्योंकि तुम मेरे प्रिय हो। अतः मुझ परमेश्वर की शरण में आ जाओ। मैं तुम्हें मुक्त कर दूँगा। तुम शोक मत करो।

विश्वजीत ‘सपन’
क्रमशः

Saturday, January 16, 2016

गीता ज्ञान - 18 (भाग-2)


अथाष्टादशोऽध्यायः

(मोक्षसंन्यास योग)
(भाग-2)


प्रथम श्लोक में अर्जुन ने ज्ञानयोग एवं कर्मयोग के तत्त्वों को जानने की इच्छा प्रकट की थी। अतः भगवान् ने बारहवें श्लोक तक कर्मयोग तथा उसके बाद ज्ञानयोग की बातें बताई हैं।
   
गीताकार भगवान् के श्रीमुख से सांख्यशास्त्र (ज्ञानयोग) सिद्धान्त का प्रतिपादन करवाते हैं, ये वे पाँच कारण हैं जो सम्पूर्ण कर्मों की सिद्धि के लिये कारक हैं।


    अधिष्ठानं तथा कर्ता करणं च पृथिग्विम्।
    विविधाश्च पृथक्चेष्टा दैवं चैवात्र पंचमम्।। गी.18.14।।


    इस श्लोक में कर्मों की सिद्धि में पाँच कारण बताये गये हैं - अधिष्ठान, कर्ता, करण, चेष्टा और दैव। अधिष्ठान का अर्थ है आश्रयस्थल। समस्त क्रियायें प्रकृति एवं प्रकृति के कार्यों द्वारा ही होती हैं। अविवेकी पुरुष जब इन क्रियाओं को अपना मान लेता है, तो वह ‘कर्ता’ बन जाता है। ‘करण’ कुल तेरह हैं और इनकी चेष्टायें इस प्रकार हैं - पाणि (हाथ अर्थात् आदान-प्रदान करना), पाद (पैर अर्थात् चलना-फिरना), वाक् (बोलना), उपस्थ (मूत्र-त्याग करना) एवं पायु (गुदा अर्थात् मल का त्याग करना) ये पाँच कर्मेन्द्रियाँ हैं। श्रोस्त्र (सुनना), चक्षु (देखना), त्वक् (स्पर्श करना), रसना (चखना) एवं घ्राण (सूँघना) - ये पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ हैं। और ये दस बहिःकरण हैं। इनके साथ तीन अन्तःकरण हैं - मन (मनन करना), बुद्धि (निश्चय करना) एवं अहंकार (मैं ऐसा हूँ अथवा वैसा हूँ का अभिमान करना)। इन सभी की अपनी-अपनी चेष्टायें हैं। पाँचवाँ कारण ‘दैव’ है अर्थात् संस्कार। मनुष्य जैसा कर्म करता है, उसके अन्तःकरण पर वैसा ही संस्कार पड़ता है। पूर्वकृत शुभाशुभ कर्मों का नाम ही दैव अथवा भाग्य है। 


तात्पर्य यह है कि मनुष्य मन, शरीर, वाणी से शास्त्र के अनुरूप अथवा उसके विरुद्ध जो भी कर्म करता है उसके ये ही पूर्वोक्त कारण होते हैं। किन्तु जो मनुष्य इस वास्तविकता को नहीं देखता और शुद्ध-स्वरूप आत्मा को ही कर्ता मान लेता है वह अज्ञानी है। उसे यथार्थ का पता नहीं है। इसके विपरीत जिसमें अहं भाव नहीं है और जिस पुरुष के अन्तःकरण में ‘मैं कर्ता नहीं हूँ’ ऐसा भाव दृढ़ हो गया है तथा जिसकी बुद्धि सांसारिक पदार्थों और कर्मों में लिप्त नहीं है, वह पाप-दोष से निर्मुक्त रहता है। अर्जुन ये समझते हैं कि आततायियों को एवं गुरुओं को मारने से वध का पाप लगेगा, तो भगवान् कहते हैं कि इनको मारने से पाप नहीं लगेगा, क्योंकि पाप लगने में कारण अहंता और बुद्धि की लिप्तता है। वर्षा से कई जीव-जन्तुओं के प्राण चले जाते हैं और कई की प्राण-रक्षा होती है तब वर्षा को पाप नहीं लगता। ठीक उसी प्रकार युद्ध में मार डाले गये शत्रुओं से पाप नहीं लगता। पाप तब लगता है, जब हम स्वयं को कर्ता मान लेते हैं।


इसी बात को आगे बढ़ाते हुए वे कहते हैं कि ज्ञान, ज्ञेय और परिज्ञाता ये तीन प्रकार की कर्म-प्रेरणा है। ज्ञान का अर्थ इस प्रकार समझा जा सकता है कि पुरुष की कोई प्रवृत्ति जब होती है, तो उससे पूर्व ज्ञान होता है, जैसे जल पीने के पहले प्यास का ज्ञान होता है। जल यहाँ ज्ञेय है और जिसको इसका ज्ञान होता है वह परिज्ञाता है। तो इन तीनों से ही कर्म करने की प्रेरणा होती है, अन्यथा नहीं। यदि इनमें से कोई एक भी न रहे, तो कर्म की प्रेरणा नहीं होती है। वे पुनः कहते हैं कि कर्म-संग्रह के तीन कारण होते हैं - कर्ता, कर्म और करण। जिन साधनों से कर्ता कर्म करता है, वे करण हैं और इन करण से जो चेष्टायें होती हैं, वे कर्म हैं। इनको करने वाला कर्ता होता है। इन तीनों के सहयोग से ही कर्म पूरा होता है। 


वे आगे कहते हैं कि सांख्यशास्त्र में ज्ञान, कर्म और कर्ता के गुणों के भेद से तीन प्रकार बताये गये हैं - ये सत्त्वगुण प्रेरित, रजोगुण प्रेरित और तमोगुण प्रेरित कहे गये हैं। इनका वर्णन आगे विस्तार से बताया गया है।


जिस ज्ञान के द्वारा मनुष्य पृथक्-पृथक् समस्त प्राणियों में एक विभागरहित परमात्मा भाव को समभाव से स्थित देखता है, उसे सात्त्विक ज्ञान कहते हैं। इस सात्त्विक ज्ञान को इस प्रकार समझा जा सकता है कि मैं, तू, यह और वह सभी किसी प्रकाश में कार्य करते हैं। इन चारों के अन्तर्गत सभी प्राणी आ जाते हैं, जो विभक्त हैं, किन्तु इनका भी प्रकाशक है, जो अविभक्त है। यही ज्ञान सात्त्विक कहलाता है। किन्तु राजस ज्ञान के द्वारा सभी प्राणियों में भेद-भाव से भरा अलग-अलग देखने की भेद-दृष्टि आती है। राजस ज्ञान में राग की मुख्यता होती है। यह राग आसक्ति उत्पन्न करता है और प्राणियों में रहने वाली अविनाशी आत्मा को तत्त्व से अलग समझता है। राजस ज्ञान में जड़-चेतन का विभेद नहीं रहता है। जिस ज्ञान द्वारा प्रकृति के कार्यरूप शरीर को ही मनुष्य अपना सर्वस्व मानता है, उसी में आसक्त रहता है और शास्त्रसम्मत ज्ञान की वास्तविकता को नहीं मानता है, वह तुच्छ ज्ञान तामस कहलाता है। इसे भगवान् ज्ञान नहीं कहते हैं, क्योंकि यह असल में अज्ञान ही है।


सात्त्विक कर्म वह है, जो शास्त्रसम्मत है, कर्ता के अभिमान से और फलासक्ति से रहित है और बिना किसी राग-द्वेष से किया गया है। परन्तु जो कर्म भोगों की इच्छा से अथवा अहंकार से ग्रस्त परिश्रमपूर्वक किया जाता है, वह राजस कर्म कहलाता है। जो कर्म परिणाम, हानि, हिंसा और सामर्थ्य का बिना विचार किये अज्ञानपूर्वक किया जाता है, वह तामस कर्म कहलाता है। 


जो कर्ता अनासक्त है, अहंकारयुक्त वचनों को नहीं बोलता है, धैर्य एवं उत्साहयुक्त है, कार्य सिद्ध होने अथवा न होने पर भी हर्ष-शोकादि विचारों से रहित है, वह सात्त्विक कर्ता है। जो कर्ता आसक्ति से युक्त है, कर्मफल की इच्छा वाला लोभी है तथा दूसरों को कष्ट देने वाला, अपवित्र आचरण करने वाला और हर्ष-शोकादि में लिप्त है, वह राजस कर्ता है। जो कर्ता असावधान, अशिक्षित, गर्वीला, हठी, अपकारी का उपकार करने वाला, आलसी, विषादी और किसी भी कार्य को बहुत देर से करने वाला, तामस कर्ता कहलाता है। कहने का तात्पर्य यह कि जैसा कर्ता होगा, उसका कर्म भी वैसा ही होगा। सात्त्विक कर्ता अपने विवेक से सात्त्विक कर्म करके परमात्मा से अभिन्न हो जाता है, जबकि राजस और तामस कर्ता का ध्येय परमात्मा नहीं होता है, बल्कि स्वयं का सुख-दुःख आदि होता है, अतः वह परमात्मा से अभिन्न नहीं हो सकता है।


सभी कर्म विचारपूर्वक किये जाते हैं। उन कर्मों के विचार में बुद्धि एवं धृति नामक करणों की प्रधानता होती है, अतः आगे इनके प्रकारों पर विचार किया गया है। बुद्धि एवं धृति के भी तीन प्रकार के भेद होते हैं।


सात्त्विकी बुद्धि वह है जो प्रवृत्ति एवं निवृत्ति को, कर्तव्य एवं अकर्तव्य को, भय एवं अभय को, बन्धन तथा मोक्ष को यथार्थ रूप से जानती है, वह सात्त्विक बृद्धि होती है। प्रवृत्ति और निवृत्ति ये दो अवस्थायें साधक की होती हैं। जब कोई संसार का काम-धंधा करता है, तो यह प्रवृत्ति है, जब सांसारिक कार्यों को छोड़कर भजन आदि में लिप्त होता है, तो यह निवृत्ति है। यहाँ इस बात को समझना होगा कि सांसारिक कामना सहित निवृत्ति भी प्रवृत्ति होती है। जैसे कोई निवृत्ति इस कारण से करता है कि उसका मान-सम्मान होगा, आदर-सत्कार होगा तो यह निवृत्ति नहीं होगी, बल्कि प्रवृत्ति होगी। अतः साधक को कामना-वासनारहित प्रवृत्ति और निवृत्ति को ही ग्रहण करना चाहिए।


जो मनुष्य अपनी जिस बुद्धि के द्वारा धर्म और अधर्म को, कर्तव्य एवं अकर्तव्य को ठीक-ठाक नहीं जानता, उसे राजस बुद्धि कहते हैं। शास्त्रों में जो भी विधान हैं, वे सभी धर्म हैं और उसके विपरीत सभी अधर्म। अपना कथित कर्तव्य करना ही उचित है, किन्तु लोग सच्चाई से ये कर्तव्य कर्म नहीं करते। ऐसे व्यक्ति राजस बुद्धि वाले कहे गये हैं। तमोगुण से घिरी हुई जो बुद्धि अधर्म को भी धर्म मान ले और इसी प्रकार की विपरीत धारणा करने वाली होती है, वह तामसी बुद्धि कहलाती है। 


अब भगवान् धृति के संबंध में कहते हैं। यह धृति क्या है? इसे जान लेना आवश्यक है। साधारण रूप से देखने पर धृति भी बुद्धि एक गुण प्रतीत होती है, किन्तु इनमें अंतर होता है। धृति बुद्धि से अलग और विलक्षण है, क्योंकि यह कर्ता में ही रहती है और इसी कारण से कर्ता बुद्धि का उचित उपयोग कर सकता है। असल में बुद्धि में जो धारणात्मक स्थिरता रहती है, वही धृति है। इसके भी तीन प्रकार होते हैं।


समता से युक्त अर्थात् सांसारिक लाभ-हानि, जय-पराजय, सुख-दुःख आदि में सम रहने वाला, अव्यभिचारिणी धृति के द्वारा अर्थात् इस लोक एवं परलोक सुख, भोग आदि किंचित मात्र भी इच्छा न रखते हुए परमात्मा को चाहने वाला, मन, प्राण एवं इन्द्रियों को संयमित करने वाली धृति ही सात्त्विकी धृति कहलाती है। किन्तु फल की कामना से अत्यन्त आसक्तिपूर्वक धर्म, अर्थ एवं काम को जो धारण करता है, वह धृति राजसी होती है। तथा दुष्ट बुद्धिवाला मनुष्य जिस धृति के द्वारा निद्रा, भय, चिन्ता, दुःख और घमण्ड को नहीं छोड़ता है, वह धृति तामसी कहलाती है। 


इस प्रकरण के अंत में वे सुख के प्रकार बताते हैं, क्योंकि मनुष्यों में सुख के लोभ से कर्मों में प्रवृत्ति होती है। तात्पर्य यह कि सुख कर्म-संग्रह का कारण है।


जिस सुख से साधक मनुष्य भजन, ध्यान और सेवा आदि के अभ्यास के परिणामस्वरूप आनन्दित होता है और जिसके कारण दुःखों का अन्त हो जाता है। साथ ही जो आरम्भ में भले ही विष के समान प्रतीत हो, किन्तु परिणाम में अमृत के समान हो जाये, वह परमात्मा-विषयक बुद्धि की प्रसन्नता से उत्पन्न होने वाला सुख सात्त्विक सुख कहलाता है। किन्तु जो सुख विषय एवं इन्द्रियों के संयोग से उत्पन्न होने वाला है और भोगकाल में अमृत के समान तथा परिणामकाल में विष के समान है, वह राजस सुख कहलाता है। इसके साथ ही जो सुख भोगकाल के साथ-साथ परिणाम में भी अज्ञान में भटकाता है, वह निद्रा, आलस्य और प्रमाद से उत्पन्न सुख तामस कहलाता है।
इस प्रकरण में भगवान् के कहने का तात्पर्य यह है कि प्रकृति और पुरुष दोनों ही अनादि हैं और दो हैं। यह विवेक पुरुष के अन्दर होता है। जब कोई पुरुष इस विवेक का अनादर करते हुए प्रकृति से संबंध जोड़ लेता है, तो पुरुष में राग उत्पन्न हो जाता है। इसी राग के कारण उसमें प्रकृतिजन्य आसक्ति पैदा हो जाती है। इसी आसक्ति के कारण जब वह सात्त्विक सुख प्राप्त करना चाहता है, तो राजस और तामस सुख का त्याग करना कठिन हो जाता है। जब यह राग मिट जाता है, तो अमृत के समान आनंद की अनुभूति होती है। 


इस प्रकरण का उपसंहार वे इस श्लोक में करते हैं।


न तदस्ति पृथिव्यां वा दिवि देवेषु वा पुनः।
सत्त्वं प्रकृतिजैर्मुक्तं यदेभिः स्यात्त्रिभिर्गुणैः।।गी.18.40।।


पृथ्वी में, स्वर्ग में या देवताओं में तथा इनके अतिरिक्त और कहीं भी ऐसी कोई वस्तु नहीं है, जो इन तीनों गुणों की परिधि से बाहर हो। सभी के प्रकार बताने के बाद भगवान् ने उस सुख की बात की जो सर्वोत्तम है, जिसे सात्त्विक सुख कहा गया। किन्तु इसे भी ‘आत्मबुद्धिप्रसादजम्’ कहा, इसे जन्य माना तो यह भी नित्य नहीं हो सकता। तात्पर्य यह कि इस जन्य सुख से भी ऊपर उठने की बात है। प्रकृति एवं प्रकृति के तीनों गुणों से रहित होकर उस परमतत्त्व को प्राप्त करना है। यह सबका अपना स्वाभाविक स्वरूप है। यह गुणातीत है, विलक्षण है, अलौकिक है। ‘संसार की कोई भी वस्तु इन तीनों गुणों से रहित नहीं है’ - तत्त्वज्ञानी ऐसा नहीं मानते, बल्कि अज्ञानी मानते हैं। तत्त्वज्ञानी स्वाभाविक स्वरूप को मानते हैं जो ‘निर्गुण’, निराकार ब्रह्म हैं।

विश्वजीत ‘सपन’
क्रमशः

Thursday, December 24, 2015

गीता ज्ञान -18 (भाग-1)


अथाष्टादशोऽध्यायः
 
(मोक्षसंन्यास योग)
(भाग-1)

यह अध्याय गीता का अंतिम अध्याय है, अतः उपसंहारात्मक है। उपसंहार में पूर्व कथ्यों पर विहंगम दृष्टि, रचनाकार के मत की स्थापना अथवा निष्कर्ष होता है। इसी कारण से यह गीता का सबसे बड़ा अध्याय है। इसका नामकरण ‘‘मोक्षसंन्यास योग’’ किया गया है, क्योंकि इसमें मोक्ष का भी संन्यास अर्थात् त्याग हो जाता है। इस अध्याय का समापन प्रपत्तिवाद के साथ होता है। प्रपत्ति का अर्थ पूर्ण शरणागति है। इसमें भक्त भगवान् पर पूर्णरूपेण आश्रित होकर चिन्ता-निर्मुक्त हो जाता है। अध्याय बड़ा होने के कारण इसे कुछ भागों में इस ब्लॉग पर प्रस्तुत किया जायेगा, ताकि पाठक को आसानी हो सके।


इस अध्याय में त्याग, ज्ञान, कर्म, कर्त्ता, बुद्धि, धृति, सुख, वर्ण-व्यवस्था में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र के लक्षण, कर्म की महत्ता, परब्रह्म-प्राप्ति का सहज साधन, गीता के पठन एवं श्रवण का माहात्म्य आदि के बारे में कथन उपलब्ध है। अतः इस अध्याय को गीता-सार के रूप में समझने में भी कोई हानि नहीं होगी। चूँकि यह सार-संक्षेप है, अतः इसकी व्याख्या विस्तार से की जायेगी। 


इस अध्याय के प्रारंभ में अर्जुन ने संन्यास एवं त्याग के तत्त्व को जानने का आग्रह किया, तो भगवान् कहते हैं कि कुछ विद्वान् काम्य कर्मों के त्याग को संन्यास कहते हैं और कुछ विद्वान् सम्पूर्ण कर्मों के फल-त्याग को त्याग कहते हैं। कई विद्वान् कहते हैं कि कर्मों को दोष की भाँति त्याग देना चाहिए, जबकि कई विद्वान् कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप रूपी कर्मों का त्याग नहीं करना चाहिए। यहाँ पर यह कहना उचित होगा कि त्याग से सम्बन्धित चार सिद्धान्त हैंः-


1) काम्य कर्मों का त्याग - अर्थात् इष्ट की प्राप्ति एवं अनिष्ट की निवृत्ति के लिये जो कर्म किये जाते हैं, उनका त्याग संन्यास है।


2) फल की कामना का त्याग अर्थात् फल की इच्छा न कर कर्मों को करते रहना ही त्याग है।


3) कर्म मात्र का त्याग अर्थात् कर्म को ही दोष के समान जानकर उनका त्याग करना चाहिए।


4) यज्ञ, दान, तप आदि का त्याग न करना अर्थात् इनके अलावा अन्य कर्मों के त्याग करना।


इस विषय में मनुष्य को यह तथ्य जानना बहुत आवश्यक है कि यज्ञ, दान और तपरूपी कर्मों के त्याग नहीं करने चाहिए। ये तो पवित्र करने वाले होते हैं। इनमें जो आसक्ति है और फल की कामना है, उसका त्याग करना चाहिए। नियत कर्मों का त्याग उचित नहीं है। त्याग सात्त्विक, राजस और तामस तीन श्रेणियों का होता है। नियत कर्मों का मूढ़ता के कारणवश त्याग करना तामस त्याग कहा गया है, क्योंकि नियत कर्मों से छुटकारा संभव नहीं है और यह उचित भी नहीं है। यज्ञ, दान आदि कर्म करने में अनेक कष्टों को उठाना पड़ता है। अनेक प्रकार के दुःख सहने पड़ते हैं। किसी कर्म को, कि वह दुःख है, ऐसा समझकर किसी शारीरिक क्लेश के कारण कर्तव्य कर्मों का त्याग राजस त्याग कहलाता है। ऐसे त्याग से वास्तविक त्याग का फल नहीं मिलता है। 


इसके बाद सात्त्विक त्याग के बारे में भगवान् कहते हैं कि जो कर्म शास्त्रसम्मत है, जब उसे कर्तव्य भाव से आसक्ति एवं फल-त्याग करके किया जाता है, तो वह सात्त्विक त्याग कहलाता है। शरीरधारी पुरुष सम्पूर्ण कर्मों का त्याग चाहकर भी नहीं कर सकता है, अतः जो कर्मफलासक्ति का त्याग करता है, वही सच्चा त्यागी है। जो मनुष्य कर्मफल का त्याग नहीं करता है, उसे मृत्यु के बाद भी तीन प्रकार के फल मिलते हैं। ये हैं इष्ट, अनिष्ट और मिश्रित। इष्ट कर्म वे हैं, जिस परिस्थिति को मनुष्य चाहता है और जिस परिस्थिति को नहीं चाहता वे अनिष्ट कर्म हैं। साथ ही कुछ कर्म ऐसे होते हैं, जिनमें इष्ट एवं अनिष्ट का मिश्रण होता है। ऐसे कर्मों के फल उन सभी को भोगने ही पड़ते हैं, यदि उन्होंने कर्मफल का त्याग नहीं किया है। 


कर्म के बारे में समझने के लिये हमें समझना होगा कि पुरुष एवं प्रकृति भिन्न हैं। पुरुष में कभी परिवर्तन नहीं होता, जबकि प्रकृति कभी भी परिवर्तन रहित नहीं होती। जब यह पुरुष प्रकृति के साथ संबंध जोड़ लेता है, तब प्रकृति की क्रिया पुरुष का कर्म बन जाती है। ये कर्म तीन प्रकार के होते हैं - क्रियमाण, संचित और प्रारब्ध। जो वर्तमान में कर्म किये जाते हैं, वे क्रियमण कर्म हैं। वर्तमान से पहले इस जन्म में किये गये तथा अन्य मनुष्य जन्मों के किये गये कर्म संचित कर्म कहलाते हैं। इस संचित कर्मों से जो कर्मफल देने के लिये उन्मुख हो गये हैं, वे प्रारब्ध कर्म कहलाते हैं।


क्रियमाण कर्म दो प्रकार के होते हैं - शुभ और अशुभ। जो कर्म शास्त्रानुसार विधि-विधान से किये जाते हैं, वे शुभ कर्म कहलाते हैं। इसके विपरीत काम, क्रोध, लोभ, आसक्ति से प्रेरित शास्त्रनिषिद्ध कर्म अशुभ कर्म कहलाते हैं। इन समस्त क्रियमण कर्म के एक तो फल-अंश बनता है और दूसरा संस्कार-अंश। इस फल-अंश के दो भाग होते हैं - दृष्ट और अदृष्ट। इसमें दृष्ट के भी दो भेद होते हैं - तात्कालिक और कालान्तरिक। जैसे भोजन करने के समय उसका रस आदि दृष्ट कर्म का तात्कालिक फल है, जबकि उसे भोजन के कारण आयु, बल, आरोग्य आदि का बढ़ना कालान्तरिक फल है। इसी प्रकार अदृष्ट फल-अंश के भी दो प्रकार होते हैं - लौकिक और पारलौकिक। अपने जीवन में ही यज्ञादि कर्मों के द्वारा पुत्र, धन, यश आदि का मिलना लौकिक फल है। जबकि यज्ञादि कर्मों से जब स्वर्गादि की प्राप्ति होती है तो वह पारलौकिक फल है। यहाँ इस बात को समझना होगा कि इस जीवन में धरती पर भोगे गये फल को लौकिक फल कहते हैं। मनुष्य अपने पापकर्मों को यहीं कैद, जुर्माना, अपमान आदि के रूप में भोगने के बाद यह समझने लगता है कि अब उसे कुछ नहीं भोगना है, किन्तु मनुष्य को यह गणना नहीं होती कि उसने पूरा फल होगा है अथवा अधूरा। ईश्वर को इसकी गणना होती है और फिर उसे वे फल भी भोगने ही पड़ते हैं। चाहे यहाँ इस लोक में अथवा परलोक में। 


क्रियमाण कर्म के संस्कार-अंश भी दो प्रकार के होते हैं - शुद्ध एवं पवित्र संस्कार तथा अशुद्ध एवं अपवित्र संस्कार। शास्त्र विहित कर्म करने से जो संस्कार बनते हैं वे पवित्र संस्कार कहलाते हैं और शास्त्रनिषिद्ध कर्म करने से जो संस्कार बनते हैं, वे अपवित्र संस्कार कहलाते हैं। 


संचित कर्म के भी फल-अंश और संस्कार-अंश दो होते हैं। संचित कर्म के फल-अंश से मनुष्य का प्रारब्ध बनता है और संस्कार-अंश से स्फुरणा होती रहती है। ये स्फुरणायें मनुष्य को प्रदत्त कार्य करने को विवश करती रहती हैं। यह तब तक होती रहती हैं, जब तक कि मनुष्य परमात्मा प्राप्ति नहीं कर लेता है। परमात्मा की प्राप्ति पर ये स्फुरणायें नहीं आती हैं। अतः जीवनमुक्त महापुरुष के मन में अपवित्र विचार कभी नहीं आते।


प्रारब्ध कर्म उसे कहते हैं, जो संचित कर्म के फल देने के सम्मुख होते हैं। इन प्रारब्ध कर्मों के फल अनुकूल अथवा प्रतिकूल परिस्थितियों के रूप में सामने आते हैं, किन्तु इन प्रारब्ध कर्मों के भोगने के लिये मनुष्य की प्रवृत्ति के तीन प्रकार होते हैं - (1) स्वेच्छापूर्वक (2) अनिच्छापूर्वक और (3) परेच्छापूर्वक। इन स्थितियों को उदाहरण से समझा जा सकता है।


एक व्यापारी धन लगाकर व्यापार करता है और उसे लाभ होता है। दूसरा व्यापारी धन लगाकर व्यापार करता है और उसे हानि होती है। तो यहाँ लाभ और हानि प्रारब्ध के कर्मों के फल हैं, जबकि धन लगाना स्वेच्छापूर्वक है। 


किसी व्यक्ति को गड़ा हुआ धन मिल गया। उधर एक व्यक्ति घोड़े से गिरकर अपने पाँव तुड़वा बैठा। धन मिलना एवं पाँव का टूटना शुभ-अशुभ कर्मों से बने हुए प्रारब्ध के फल हैं, किन्तु धन का मिलना और पाँव का टूटना अनिच्छापूर्वक है। 


किसी व्यक्ति ने एक बच्चे को गोद ले लिया, तो उस व्यक्ति का सारा धन उस बालक को मिल गया, जिसे बाद में चोरों ने चुरा लिया। यहाँ बच्चे को धन मिलना और चोरों द्वारा चुरा लेना शुभ-अशुभ कर्मों के फल हैं, किन्तु गोद में जाना अथवा चोरी होना परेच्छापूर्वक है।


यहाँ जो बात समझने वाली है कि कर्मों का फल कर्म नहीं होता है, बल्कि परिस्थिति होती है। तात्पर्य यह कि प्रारब्ध कर्मों के फल परिस्थिति के रूप में सामने आते हैं। प्रारब्ध कर्म से मिलने वाले फल भी प्राप्त फल एवं अप्राप्त फल दो प्रकार के होते हैं। जो अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियाँ आ रही हैं, वे प्राप्त फल हैं और जो आगे आने वाली हैं, वे अप्राप्त फल हैं। जब तक संचित कर्म रहते हैं, प्रारब्ध की परिस्थितियाँ बनती ही रहती हैं। यहाँ सामान्य मानव-मन में प्रारब्ध और करने वाले कर्म के मध्य शंका उपस्थित होती है। यदि सभी परिस्थितियाँ प्रारब्ध के कर्मफल के अनुसार ही हों, तो नये कर्म का क्या अर्थ? ऐसे में प्रारब्ध और पुरुषार्थ को जानना आवश्यक हो जाता है। 


मनुष्य में चाहना चार प्रकार की होती है - धन की, धर्म की, भोग की और मुक्ति की। इन्हें सरल शब्दों अर्थ, धर्म, काम एवं मोक्ष की कामना कहा जाता है। इनमें अर्थ और काम में प्रारब्ध की मुख्यता और पुरुषार्थ की गौणता है, जबकि धर्म और मोक्ष में पुरुषार्थ की मुख्यता और प्रारब्ध की गौणता होती है। प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो अलग-अलग क्षेत्र हैं और इनमें भिन्नता है। प्रारब्ध निश्चित है, क्योंकि यह संचित कर्म के फल के रूप में प्राप्त होता है। पुरुषार्थ व्यक्ति द्वारा किया गया कर्म है, जिसका फल उस कर्म के अनुसार प्राप्त होता है। यह शरीर पुरुषार्थ के लिये मिला है। इसी पुरुषार्थ से धर्मादि कार्यों के द्वारा मोक्ष की प्राप्ति की जा सकती है। मानव-शरीर सुख-दुख भोगने के लिये नहीं है, क्योंकि उसके लिये स्वर्ग-नरक आदि हैं। यह तो कर्मयोनि है, जहाँ उसे कर्म करना है, जिसका लक्ष्य मुक्ति प्राप्त करना है, ताकि वह जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो सके।

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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, November 5, 2015

गीता ज्ञान - 17




                                                         अथ सप्तदशोऽध्यायः
                                                         श्रद्धात्रय-विभागयोग

 

सोलहवें अध्याय के तेईसवें श्लोक में भगवान् ने कहा कि जो पुरुष शास्त्र-विधि का उल्लंघन कर मनमाने ढंग से आचरण करता है, वह सिद्धि, सुख एवं परम गति को प्राप्त नहीं कर सकता है। इसी बात पर सतरहवें अध्याय की भूमिका रखी जाती है, जब अर्जुन प्रश्न करते हैं कि ऐसे आराधकों की क्या गति होती है। इस पर भगवान् उन्हें विस्तार से श्रद्धा के सभी वर्गों के बारे में बताते हैं, यज्ञ, तप एवं दान के वर्गीकरण भी बताते हैं और बाद में ओम्, तत् एवं सत् शब्दों की व्याख्या भी करते हैं। 

श्रद्धा ही व्यक्ति के व्यक्तित्व का मूलाधार है। श्रद्धा ही साधना और सिद्धि का द्वार है। मनुष्य श्रद्धा प्रधान है - ‘श्रद्धामयोऽये पुरुषः’। श्रद्धा के अनुसार ही क्रिया में प्रवृत्ति होती है। सभी मनुष्य दुःख से मुक्ति और सुख से संयोग की कामना रखते हैं, किन्तु इस प्रयोजन हेतु क्रिया में प्रवृत्ति उनकी श्रद्धा के अनुसार होती है। इन्हीं के वर्गीकरण को इस प्रकार बताते हैं।


त्रिविधा भवित श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा।
सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृणु।।गी.17.2।।


भगवान् कहते हैं कि स्वभाव से उत्पन्न श्रद्धा सात्त्विकी, राजसी तथा तामसी इन तीनों प्रकार की होती है। सभी मनुष्यों की श्रद्धा उनके अन्तःकरण के अनुरूप होती है। अस्तु जो जैसी श्रद्धा करता है, वैसा ही बन जाता है। इस प्रकार इस अध्याय में श्रद्धा का वर्गीकरण किया गया है और उनके बारे में सविस्तार बताया गया है।


सात्त्विक पुरुष देवोपासक होते हैं, राजस पुरुष यक्ष और राक्षसों के, जबकि तामस पुरुष भूत-प्रेतों के उपासक होते हैं। भोजन भी प्रकृति के अनुसार सात्त्विक, राजस और तामस होते हैं। वैसे ही यज्ञ, तप और दान की भी तीन श्रेणियाँ होती हैं। सात्त्विक आहार आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य, सुख और प्रीति को बढ़ाने वाले रसयुक्त, चिकने और स्थिर रहने वाले होते हैं। कड़वे, खट्टे, नमकीन, बहुत गरम, तीखे, रूखे, जलन पैदा करने वाले, दुःख, चिंता एवं रोगोत्पादक आहार राजस कहलाते हैं। अधपका, रसहीन, दुर्गन्ध युक्त, बासी और उच्छिष्ट एवं अपवित्र आहार तामस कहलाते हैं। 


ठीक उसी प्रकार शास्त्र-विहित, कर्तव्य भावना से प्रेरित और फल की आसक्ति से रहित यज्ञ सात्त्विक कहलाता है। प्रदर्शन के लिये और फल की आसक्ति से सम्पन्न यज्ञ राजसी यज्ञ कहलाता है। शास्त्र-विध से विहीन, अन्न-दान रहित, बिना मंत्र और दक्षिणा के तथा बिना श्रद्धा से किये गये यज्ञ तामस कहलाते हैं। 


देवता, ब्राह्मण एवं गुरुजनों के पूजन से युक्त, पवित्रता, सरलता, ब्रह्मचर्य और अहिंसा से प्रेरित सम्पन्न होने वाले कार्य शरीर-सम्बन्धी तप कहा जाता है। मनःप्रसाद, सौम्यता, मौन, आत्मनिग्रह एवं अत्नःकरण के भावों की पूर्ण पवित्रता मन सम्बन्धी तप कहे जाते हैं। ये तीनों प्रकार के तप सात्त्विक कहे गये हैं। सत्कार, मान और पूजा के लिये, अन्य किसी स्वार्थ की पूर्ति के लिये घमण्ड से किया गया, अनिश्चित एवं क्षणिक फल वाला तप राजस कहलाता है। मूढ़ता एवं हठपूर्वक, कष्टसहित अथवा दूसरों का अनिष्ट करने के लिये किया गया तप तामस कहलाता है।


देश, काल एवं पात्रता को ध्यान में रखकर निःस्वार्थ भाव से दिया गया दान सात्त्विक कहा गया है। क्लेशपूर्वक तथा प्रत्युपकार के प्रयोजन से अथवा फल की दृष्टि से किया गया दान राजस कहा गया है। तिरस्कारपूर्वक अथवा बिना सत्कार के देश, काल और पात्रता को ध्यान में न रखकर कुपात्र को दिया गया दाप तामस कहा गया है।
इसके पश्चात् ओम्, तत् एवं सत् की महिमा के बारे में इस अध्याय में बताया गया है।


ऊँ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृतः।
ब्राह्मणस्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा।।गी.17.23।।


अर्थात् ‘ऊँ तत् सत्’ इन तीन शब्दों को ब्रह्म का नाम कहा गया है। उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेद तथा यज्ञादि रचे गये।


‘ओम’ परमात्मा का ही नाम है। अतः शास्त्र-विहित यज्ञ, दान और तप की क्रियायें सदा ही ‘ओम’ नाम के उच्चारण करके ही प्रारम्भ होती है। तैतिरीय उपनिषद के अष्टम अनुवाक् में कहा गया है - ‘ओमिति ब्रह्म, ओमिति सर्वम्’। ‘तस्य वाचकः प्रणवः’। प्रणव परमात्मा का वाचक है। ऊँ और प्रणव समानार्थी हैं। जो प्राणों के साथ संचरण करे, वह प्रणव है, अतः प्रत्येक मन्त्र के पूर्व प्रणव अथवा ओम जोड़ा जाता है। ‘तत्’ शब्द परमसत्ता परमेश्वर का संकेत-सूचक है, अर्थात् ‘तत्’ नामधारी परमात्मा का ही सब-कुछ है। मेरा कुछ नहीं, सभी उसी परमात्मा का है। इस भाव से फल की कामना न करते हुए यज्ञादि क्रियायें कर्मबन्धन से मुक्ति पाने वाले द्वारा की जाती है। ‘सत्’ परमात्मा की नित्यता और श्रेष्ठता का सूचक है। वही सर्वोपरि है, वही सर्वोत्तम है। इस प्रकार से परमात्मा का नाम जानकर सत्य भाव में ‘सत्’ का प्रयोग किया जाता है। यज्ञ, तप और दान में जो स्थिति आती है, वह भी ‘सत्’ ही है। परमात्मा को समर्पित किया गया कर्म भी ‘सत्’ ही है। इसके विपरीत बिना श्रद्धा के किया हुआ हवन, दिया हुआ दान और किया गया तप ‘असत्’ है। ओम, तत् और सत् इन तीनों शब्दों में पूरा अध्यात्म सिमटा हुआ है।


जो मनुष्य शास्त्र-विधि से रहित केवल मनःकल्पित घोर तपस्या करते हैं तथा दम्भ और अहंकार से युक्त कामना, आसक्ति और बल के अभिमान से भरे हैं, वे आसुरी स्वभाव वाले कहे गये हैं। अतः श्रद्धाहीन कर्म न तो जीवन-काल में और नहीं मृत्यु के बाद ही श्रेयस्कर होता है। इस प्रकार भगवान् अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देते हैं।


विश्वजीत ‘सपन’

Monday, August 24, 2015

गीता ज्ञान - 16



 
 अथ षोडशोऽध्यायः

दैवासुसम्पद्विभागयोग



सोलहवें अध्याय में दैव एवं असुर सम्पदाओं का बड़ा ही स्पष्ट और सुन्दर वर्णन है। गीता के तेरहवें से पन्द्रहवें अध्यायों तक जीव-जगत्, प्रकृति, ब्रह्म विषयक दार्शनिक विचारों के चिंतन मिलते हैं, वहीं सोलहवें अध्याय में व्यावहारिक, नैतिक एवं अध्यात्म प्रधान विचारों को दैवी सम्पदा और उनके विपरीत विचारों को आसुरी सम्पदा के रूप में प्रस्तुत किया गया है। 

द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च।
दैवो विस्तरशः प्रोक्त आसुरं पार्थ मे शृणु।।गी. 16.6।।


अर्थात् हे अर्जुन! इस लोक में मानव-समुदाय दो वर्गों में विभक्त है। प्रथम दैवी प्रकृति वाला और द्वितीय आसुरी प्रकृति वाला। उन दैवी एवं आसुरी प्रकृति वाले मानव-समुदाय के लक्षण तुम सविस्तार सुनो।


सर्वप्रथम दैवी प्रकृति वाले पुरुष का वर्णन इस अध्याय के प्रथम तीन श्लोकों में किया गया है और बाद में विस्तार से आसुरी सम्पदा का वर्णन विशेष है। दैवी-सम्पदा के लक्षण हैं - भय का सर्वथा अभाव अर्थात् अभय। यह भय दो प्रकार का होता है। बाहर का एवं भीतर का। चोर, डाकू, सर्प आदि का भय बाहरी भय है, जबकि मानव जब पाप, अन्याय अत्याचार करता है, तब उसे भीतर का भय होता है। जब ईश्वर से संबंध जुड़ जाता है तब यह भय समाप्त हो जाता है। 


इनमें अन्तःकरण की शुद्धि होती है। तत्त्वज्ञान के लिये ध्यान में दृढ़ स्थिति होती है एवं इनका ज्ञान सात्त्विक होता है। ये इन्द्रियों का दमन करना जानते हैं। ये यज्ञ, स्वाध्याय और तप में लीन रहते हैं। इनमें अन्तःकरण की सरलता होती है। इनमें अहिंसा, सत्य, अक्रोध, त्याग, शान्ति आदि के गुण होते हैं। ये निन्दा, चुगली आदि नहीं करते। ये प्राणियों पर दया करते हैं। ये अनाशक्त होते हैं। इनका स्वभाव कोमल होता है। ये बुरे कार्यों को करने में लज्जा का अनुभव करते हैं। ये व्यर्थ चेष्टा नहीं करते। इनमें तेज और धैर्य होता है। इनमें शत्रुता का भी अभाव होता है। ये पवित्र होते हैं और स्वयं में पूज्यता के अभिमान का अभाव रखते हैं। ऐसा व्यक्ति दैवी सम्पदा से युक्त होता है। 


इसके विपरीत आसुरी प्रकृति वाले मानव प्रवृत्ति और निवृत्ति को नहीं जानते। वे नहीं जानते कि क्या करना है और क्या नहीं। अतः उनमें न शुद्धि, न सदाचार और न ही सत्य का सन्निवेश रहता है। ये जगत् को आश्रयरहित, असत्य और निरीश्वर मानते हैं। इनका लक्ष्य केवल काम होता है और इसी से संसार की उत्पत्ति मानते हैं। ये दूसरों का अहित करने वाले, क्रूरकर्मी तथा जगत् की हानि करने के लिये ही जन्म लेते हैं। इनमें दम्भ, मान, मद पूर्णतः होता है। ये अज्ञान से मिथ्या सिद्धान्तों को ग्रहण करके, अपवित्र धारणाओं को धारण करके संसार में विचरण करते हैं। ये विषय भोगों को ही सुख मानते हैं। ये धनादि के संग्रह में विश्वास करते हैं। ये धन के पीछे भागते रहते हैं। ये स्वयं को सिद्ध, बलवान् और सुखी मानते हैं। मेरे समान कोई दूसरा नहीं है, ऐसा अभिमान इनका रहता है। शत्रुओं को मारकर ये स्वयं को बड़ा सिद्ध करते हैं। स्वयं श्रेष्ठ मानने वाले ये घमण्डी धन और मान के मद से युक्त केवल नाममात्र के यज्ञों द्वारा पाखण्ड से शास्त्र-विधि से रहित यजन करते हैं। ऐसे असुरी प्रकृति वाले पुनः-पुनः संसार के इन्हीं आसुरी योनियों में जन्म लेते हैं। बार-बार आसुरी योनि में गिरकर बाद में और भी अधोगति को प्राप्त होते हैं और घोर नरक में गिरते हैं।


त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः।
कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतस्त्रयं त्यजेत।।गी. 16.21।।


अर्थात् काम, क्रोध तथा लोभ ये तीन प्रकार के नरक के द्वार हैं। ये आत्मा को अधोगति में डालकर उसके आनन्द तत्त्व को नष्ट कर देने वाले हैं, अस्तु इन तीनों को त्याग देना चाहिए।


तात्पर्य यह कि इन तीनों नरक के द्वारों से मुक्त पुरुष स्वयं के कल्याण का कार्य कर लेता है और इस प्रकार वह ईश्वर को प्राप्त कर परमगति को प्राप्त हो जाता है। 


भौतिकवादी अहं-प्रेरित महत्त्वाकांक्षा व्यक्ति और समाज के हित में नहीं है। इसके द्वारा व्यक्ति में अशान्ति और तनाव तथा समाज में ध्वंसात्मकता का प्रचार-प्रसार होता है। आसुरी सम्पद् वाले पुरुष रजोगुण प्रधान होने के कारण भौतिक वैभव अर्जन करते हैं। वे दूसरों के दुःख पर अपने सुख का निर्माण करते हैं, अतः नरक में जाते हैं। जबकि दैवी सम्पद् वाले पुरुष दूसरों को सुखी देखना चाहते हैं। कहते हैं कि दूसरों को सुखी देखने की चाह वाला कभी दुःखी नहीं हो सकता। अतः दैवी सम्पद् को अपना कर अपना कार्य सिद्ध करना चाहिए। यही गीता के इस अध्याय का संदेश है।


विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, August 4, 2015

गीता ज्ञान - 15


अथ पञ्चदशोऽध्यायः

पुरुषोत्तमयोग

पन्द्रहवें अध्याय को पुरुषोत्तम योग कहा गया है। इस अध्याय में जगत्, जीवात्मा और परमात्मा के स्वरूप का वर्णन किया गया है। संसार के स्वरूप को पीपल के वृक्ष के प्रतीक के रूप में समझाने की चेष्टा की गयी है, जो अति-विलक्षण वृक्ष है।


ऊर्ध्वमूलमधःशाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम्।
छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित्।। गी. 15.1।।


सामान्य वृक्ष की जड़ें नीचे होती हैं और शाखायें ऊपर, किन्तु इस संसार वृक्ष की जड़ें ऊपर की ओर और शाखायें नीचे की ओर हैं। इसके मूल में परमात्मा का वास है तथा इसकी उत्पत्ति का कारण परमात्मा ही हैं। इसके पत्ते वेद हैं। वेद का अर्थ ज्ञान होता है। ज्ञान के कारण प्राणी जीवित है और वेद वर्णित ज्ञान ही संसार के विकास का प्रमुख साधन है। इस वृक्ष को जिसने जान लिया, उसने समस्त वेदों को जान लिया। इसकी शाखायें सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण से सिंचित होकर बढ़ती आयी हैं। इनमें जो कोंपलें हैं, वे ही विषय हैं। इसमें कर्मबंधन वाली अहंता (मैं-पन), ममता (मेरा-पन) और वासनारूपी जड़ें और ऊपर सभी लोकों में फैली हुई हैं।


इस संसार रूपी वृक्ष की गति भी विलक्षण है। इसका स्वरूप असल में भिन्न है, जैसा इसे देखा अथवा बताया गया है। तत्त्वज्ञान होने पर इसका स्वरूप भिन्न दिखायी देता है। यह संसार प्रतिपल परिवर्तनशील है। इस संसार में व्यक्ति, वस्तु अथवा प्राणियों का विकास-क्रम समाप्त नहीं होता है। वह अनादि काल से चलता आ रहा है और अनन्त काल तक चलता ही रहेगा। इस संसार में दो प्रकार के पुरुष हैं, क्षर (नाशवान्) तथा अक्षर (अनश्वर), इनमें प्राणियों का शरीर क्षर है और जीवात्मा का अक्षर। यही अपरा और परा प्रकृति है। यही क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ भी कहा गया है।


ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः।
मनःषष्ठानीन्द्रियाणि प्रकृतिस्थनि कर्षति।। गी.15.7।।


अर्थात् इस देह में स्थित जीवात्मा जो सनातन है, वह मेरा ही अंश है, परन्तु प्रकृति में स्थित होने पर वही मन एवं इन्द्रियों को आकर्षित करता है तथा उन्हें सजातीय मान लेता है। तात्पर्य यह कि जीवात्मा तो परमात्मा का ही अंश है, किन्तु वह मन एवं इन्द्रियों से अपनत्व जोड़ लेता है, जबकि यह वास्तविकता नहीं है। वास्तव में मात्र एक ही सत्य है, परमात्मा। इसी कारण मनुष्य नव शरीर धारण करता है, क्योंकि वह जिस शरीर का त्याग करता है, उसके समस्त संस्कारों को समेट लेता है। साथ ही इन्द्रियों द्वारा विषयों का सेवन करता है। शरीर को त्याग कर तीनों गुणों से युक्त आत्मा को अज्ञानीजन नहीं जान पाते हैं, क्योंकि उन्होंने अपने अन्तःकरण को शुद्ध नहीं किया होता है। मोहवश वे इन्द्रियों के बंधन में बंध जाते हैं और नवीन शरीर धारण करते हैं, किन्तु विवेकशील ज्ञानी इस आत्मा को तत्त्वपूर्वक जान लेते हैं। 


इसके पश्चात् भगवान् परमात्मा का वर्णन करते हुए कहते हैं कि हे अर्जुन! जो तेज सम्पूर्ण जगत् का प्रकाशक है तथा जो तेज सूर्य, अग्नि और चन्द्रमा में व्याप्त है, वह परमात्मा का ही हैं। वे ही पृथ्वी में प्रवेश करके अपनी शक्ति से सम्पूर्ण जगत् को धारण करते हैं और वे ही रसरूप चन्द्रमा होकर सम्पूर्ण औषधियों को पुष्ट करते हैं। वे समस्त प्राणियों के हृदय में सूक्ष्म रूप से स्थित होते हैं और उनसे ही स्मृति, ज्ञान और बुद्धि में रहने वाले संशय दूर होते हैं। वे ही परब्रह्म और वेदज्ञ हैं। 


उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृत।
यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः।। गी.15.17।।


श्री भगवान् कहते हैं कि इस संसार में नाशवान् और अनश्वर दो प्रकार के पुरुष हैं और इन दोनों से उत्तम परमपुरुष वह है, जो इनसे पृथक् तीनों लोकों में प्रवेश करके सबका पोषण करता है, जो अविनाशी, परमेश्वर, परमात्मा नामों से पुकारा जाता है। वह नश्वर जड़वर्ग ‘क्षेत्र’ से सर्वथा अतीत हैं और जीवात्मा से भी उत्तम हैं। अस्तु वे लोक और वेद में ‘पुरुषोत्तम’ नाम से प्रसिद्ध हैं। जो भी ज्ञानी उन्हें इस प्रकार तत्त्वपूर्वक से पुरुषोत्तम रूप में जानता है, वह सर्वज्ञ पुरुष सब प्रकार से निरन्तर वासुदेव परमेश्वर को ही भजता है। पुरुषोत्तम में भक्ति जीव की मुक्ति का कारण है। यही परमात्मा अथवा ईश्वर है और यही सत्य है।

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विश्वजीत ‘सपन’ 

Saturday, June 13, 2015

गीता ज्ञान -14


 
अथ चतुर्दशोऽध्यायः

 
गुणत्रयविभाग योग


 
प्रस्तुत 14वाँ अध्याय ‘गुणत्रयविभाग योग’ कहलाता है। 13वें अध्याय के अंत में भगवान् ने कहा कि ज्ञानचक्षु से क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ के भेद को देखने वाला परमात्मा को प्राप्त हो जाता है। तब प्रश्न उठता है कि वह ज्ञान क्या है? उसका स्वरूप क्या हैं? उसे प्राप्त करने के उपाय क्या हैं? इन्हीं प्रश्नों के उत्तर हमें इस अध्याय में प्राप्त होते हैं और इसमें प्रकृति के तीन विशेष गुणों के संदर्भ में विस्तार से बताया गया है। 

इस अध्याय के प्रारम्भ के दो श्लोकों में इसी ज्ञान की महिमा बताई गयी है कि संसार में प्रकृति-पुरुष के भेद बताने वाला ज्ञान किसी भी प्रकार के ज्ञान से उत्तम है। इस ज्ञान से मुनिजन इस संसार से मुक्त होकर परम सिद्धि को प्राप्त हो गये हैं। सभी योनियों से जितने शरीरधारी प्राणी उत्पन्न होते हैं उनकी योनि तो प्रकृति है और ईश्वर बीज की स्थापना करने वाला पिता है अर्थात् परमात्मा ही पिता है और प्रकृति माता, जिनके संसर्ग से सृष्टि का विकास होता है। समस्त प्राणियों और जड़जंगम की उत्पत्ति होती है। यही ज्ञान सर्वश्रेष्ठ ज्ञान है। इसी प्रकृति के गर्भ से तीन गुण उत्पन्न होते हैं - सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण।


सत्त्वं रजस्तम इति गुणाः प्रकृतिसम्भवाः।
निबध्नन्ति महाबाहो देहे देहिनमव्ययम्।।गी.14.5।।


अर्थात् हे महाबाहो! प्रकृति के गर्भ से तीन गुण उत्पन्न होते हैं - सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण। ये तीनों गुण अक्षय हैं और जीवात्मा को शरीर में बाँधकर परवश कर देते हैं।


सत्त्वगुण निर्मल होने के कारण प्रकाशक और निर्विकार है। वह सुख और ज्ञान के आकर्षण के सम्बन्ध से जीव को बाँधता है। सृष्टि में जो दीप्ति, प्रकाश, ज्ञान एवं सात्त्विकता का अंश है, उसका कारण सत्त्वगुण ही है। 


रजोगुण रागात्मक है। यह विषयों के प्रति तृष्णा और आसक्ति से उत्पन्न होता है और जीवात्मा को उसके कर्मों के फल की आसक्ति के द्वारा बाँधता है। जो गति, प्रकृति अथवा क्रियाशीलता है, उसका कारण रजोगुण है। 


तमोगुण भटकाने वाला है। यह जीवात्मा को प्रमाद, आलस्य और निद्रा के द्वारा बाँधता है। अर्थात् जो आलस्य, प्रमाद, जड़ता, अज्ञान, अंधकार है, उसका कारण तमोगुण ही है। और इस प्रकार प्रकृति त्रिगुणात्मिका है। इस विषय पर गीताकार विस्तृत व्याख्या करते हैं।


रजोगुण एवं तमोगुण को दबाकर सत्त्वगुण, सत्त्वगुण और तमोगुण को दबाकर रजोगुण तथा सत्त्वगुण और रजोगुण को दबाकर तमोगुण की अभिवृद्धि होती है। सत्त्वगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में चेतना और विवेकशक्ति उत्पन्न होती है। मन शुद्ध होता है। रजोगुण के बढ़ने पर लोभ, स्वार्थ और बुद्धि से कर्मों को सकाम भाव से आरम्भ करने की प्रवृत्ति जगती है। तमोगुण के बढ़ने पर अन्तःकरण और इन्द्रियों में अज्ञान का अंधकार, कर्तव्य कर्मों में अप्रवृत्ति और निद्रादि वृत्तियाँ उत्पन्न होती हैं। इस प्रकार कहा जाये, तो सत्त्वगुण से ज्ञान, रजोगुण से लोभ और तमोगुण से प्रमाद एवं मोह उत्पन्न होते हैं।


ऐसे गुणों वाले मानव की मृत्यु होने पर क्या-क्या संभव है, इस पर गीताकार विचार व्यक्त करते हुए कहते हैं कि सत्त्वगुण के वृद्धिकाल में शरीर छोड़ने वाले को स्वर्गादि लोक प्राप्त होते हैं, रजोगुण के वृद्धिकाल में शरीर छोड़ने वाले मर्त्यलोक में रहते हैं, वे कर्मासक्त घरों में पैदा होते हैं। तमोगुण के वृद्धिकाल में शरीर छोड़ने वाले नरकादि में जाते हैं और कीट, पशु आदि योनियों में उनके जन्म होते हैं।
इन गुणों के कारण ही व्यक्ति के आचरण में अच्छाई या बुराई, तृष्णा या त्याग, प्रवृत्ति या निवृत्ति, चेतना या आलस्य के रूप में विशेषतायें आती हैं। ये गुण स्वभाव बनाते हैं। मनुष्य उसी प्रकार के स्वभाव से बँधा रहता है। सत्त्वगुण का लौकिक परिणाम और स्वरूप श्रेष्ठ माना जाता है, किन्तु वह भी ‘मैं अच्छा हूँ’, ‘मैं महान हूँ’, ‘मैं गुणी हूँ’, ‘मैं त्यागी हूँ’, आदि सात्त्विक अभिमान से बाँधता है। गुण शब्द ही बंधनकारक है। अतः गुणातीत की बात बताई गयी है। पातंजल योगसूत्र के अनुसार भी गुणातीत को ही कैवल्य का अधिकारी बताया गया है। यहाँ भगवान् भी यही कहते हैं।


गुणानेतानतीत्य त्रीन् देही देहसमुद्भवान्।
जन्ममृत्युजरादुःखैर्विमुक्तोऽमृतमश्नुते।।गी.14.20।।


अर्थात् यह सम्पूर्ण शरीर, मन-बुद्धि आदि और इन्द्रियों के उपभोग विषय और वस्तुयें, प्रकृति से उत्पन्न होने वाले तीनो गुणों आदि के ही कार्य हैं और जो ऐसा समझकर गुणातीत जीवन बिताता है, वह जन्म-मृत्यु आदि दोषों से मुक्त हुआ परमानन्द को प्राप्त होता है।


कहने का अर्थ यह है कि जो इन गुणों से उत्पन्न होने वाले प्रभावों में विचलित नहीं होता है, ‘‘मैं आत्मा हूँ’’ ऐसा निरन्तर भाव रखता है, मान-सम्मान, निन्दा-स्तुति में समान भाव वाला रहता है, परमात्मा पर दृढ़ निश्चयपूर्वक आश्रित रहता है, वह पुरुष गुणातीत कहलाता है। ऐसा पुरुष जब भगवान् में पूर्ण समर्पण भाव से लिप्त होता है, तो वह जन्म-मृत्यु आदि दुःख-दोषों से मुक्त होकर परमानन्द को प्राप्त होता है।
 

*** विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 5, 2015

गीता ज्ञान - अध्याय 13


                                                                     


  
                                     अथ त्रयोदशोऽध्यायः

                                                                     
                                                                   क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभाग योग
   

गीता की अध्याय योजना अनुपम है। जीवन-दर्शन को इतनी सरलता, सहजता एवं तारतम्य से समझाया गया है कि देखते ही बनता है। इस तेरहवें अध्याय को क्षेत्र-क्षेत्रज्ञविभागयोग कहा गया है। यह बहुत महत्त्वपूर्ण अध्याय है, जहाँ भगवान् आत्मतत्त्व-ज्ञान की ओर पुनः उन्मुख होते हैं। हमने पूर्व में जाना कि ज्ञान, कर्म एवं भक्ति क्या है? उनका महत्त्व क्या है? इस अध्याय में उस ज्ञान को संक्षेप में बताया गया है, जिसका भ्रम ही मानव को परमात्मा के मिलन से दूर रखता है। अध्याय के प्रथम श्लोक में ही क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ के इस संदर्भ में बताया गया है।
 

इदं शरीरं कौन्तेय क्षेत्रमित्यभिधीयते।
एतद्यो वेत्ति तं प्राहुः क्षेत्रज्ञ इति तद्विदः।।गी.13.1।।

 

अर्थात् हे अर्जुन! यह शरीर ‘क्षेत्र’ नाम वाला कहा गया है और जो इसको जानता है, ज्ञानीजन उसे ही ‘क्षेत्रज्ञ’ कहते हैं। तो यह शरीर ही ‘क्षेत्र’ है और शरीरी आत्मा ही ‘क्षेत्रज्ञ’ है।
 

इसके बाद भगवान् क्षेत्र का स्वरूप, क्षेत्रज्ञ की स्थिति, प्रकृति-पुरुष आदि का वर्णन करते हुए सगुण-निर्गुण बह्म आदि के सम्यक् ज्ञान द्वारा प्ररब्रह्म की प्राप्ति को बताते हैं। यह अध्याय सूक्ष्म रूप से तत्त्वज्ञान को प्रतिपादित करता है।
 

क्षेत्र का स्वरूप बताते हुए भगवान कहते हैं कि संक्षेप में पंच महाभूत - आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी, दस इन्द्रियाँ, बुद्धि, अहंकार और मूल प्रकृति, एक मन और पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ - शब्द, स्पर्श, रूप, रस एवं गंध तथा इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल देहपिण्ड, चेतनाशक्ति और धृति इनका समूह ही क्षेत्र कहा जाता है। इन सभी को ही सत्य मान लेना मानव-भ्रम है। इनसे छुटकारा पाकर ही मनुष्य ज्ञान का अधिकारी होता है। इस विषय पर वे कहते हैंः-
 

कार्यकरणकर्तृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते।
पुरुषः सुखदुःखानां भोक्तृत्वे हेतुरुच्यते।। गी.13.20।।

 

क्षेत्र के स्वरूप को जान लेने के बाद यह समझना आसान होगा कि जो भी होता है, वह ‘कार्य’ है, जिसके माध्यम से कार्य होता है, वह ‘करण’ अथवा साधन है। ये पंच महाभूत और उसके पाँच गुण - दस ‘कार्य’ हैं और पाँच कर्मेन्द्रियाँ, पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ तथा मन-बुद्धि-अहंकार - ये तेरह ‘करण’ हैं। ये तेईस तत्त्व प्रकृति से सम्बन्धित हैं। इनसे भिन्न पुरुष होता है, जो अजर-अमर है। जो भी मानवीय विकार आदि होते हैं, वे इसी प्रकृति में होते हैं और पुरुष जब इसे अपना लेता है, तो वह कष्ट पाता है। जो प्रकृतिस्थ (प्रकृति द्वारा प्रदत्त शरीर को अपना मान लेना) होता है अर्थात् प्रकृतिजन्य त्रिगुणात्मक का भोक्ता बनता है तथा सत्त्व, रजस् एवं तमस् गुणों से प्रभावित होता है, वही विभिन्न योनियों में जन्म लेता रहता है और अनेक योनियों में फँसकर कष्ट पाता रहता है।
 

वास्तव में इस शरीर में यह पुरुष (आत्मा) ही परमात्मा है। अतः जो मनुष्य प्रकृति को गुणों सहित और पुरुष को जान जाता है, वह कर्म-बन्धन से मुक्त होकर जन्म-मरण के चक्र से सदा के लिये छूट जाता है।
 

यहीं पर ईश्वर पुनः कहते हैं कि ईश्वर प्राप्ति के अनेक साधन हैं। कोई ध्यान से उनमें मन लगता है (ध्यानयोग), तो कई अन्य ज्ञानयोग द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं और भी कई अन्य कर्मयोग द्वारा उन्हें प्राप्त करते हैं। कितने तो ऐसे भी हैं, जो इनसे भी मंदबुद्धि वाले होते हैं और तत्त्वज्ञ (ज्ञानीजन) की बातें सुनकर तदनुसार उपासना करके इस संसार-सागर को पार कर जाते हैं। लक्ष्य एक ही है - ईश्वर-प्राप्ति। साधन अनेक हो सकते हैं, किन्तु यह ज्ञान होना भी आवश्यक हैं कि जितने भी जड़-चेतन जीव उत्पन्न होते हैं, वे क्षेत्र एवं क्षेत्रज्ञ के संयोग से ही होते हैं। यथार्थ द्रष्टा वही है, जो विनाशशील चराचर भूतों में उस एक परमेश्वर को समभाव से देखता है, जो समस्त क्रियाओं को प्रकृति द्वारा किया हुआ देखता है अर्थात् अपनी आत्मा को अकर्ता देखता है, जो समस्त प्राणियों के पृथक् भावों को एक परमात्मा में स्थित और परमात्मा से ही समस्त प्राणियों का विस्तार देखता है।
 

क्योंकि परमब्रह्म अनादि है, अनंत है और सत्-असत् से परे अत्यन्त सूक्ष्म है। उसके ही आकार-प्रकार सर्वत्र विद्यमान हैं, वह इस संसार में सबमें व्याप्त होकर स्थित है। वह समस्त इन्द्रियों से रहित भी इन इन्द्रिय-विषयों का ज्ञाता है। वह अनासक्त होने पर भी सबका भरण-पोषण करता है। वह निर्गुण है, किन्तु गुणों का भोक्ता है। वह वैसे तो समस्त चराचर के भीतर परिपूर्ण है और चर-अचर समस्त रूप में स्थित भी है, किन्तु अति-सूक्ष्म होने से मानव-मन और बुद्धि की पकड़ से बाहर रह जाता है। यही परमात्मा जानने के योग्य है और यही तत्त्वज्ञान के द्वारा प्राप्त है।
 

इस प्रकार यदि हम इस अध्याय के सार-तत्त्व को संक्षेप में कहें, तो आध्यात्म ज्ञान ही सर्वश्रेष्ठ है।
 

अध्यात्मज्ञाननित्यत्वं तत्त्वज्ञानार्थदर्शनम्।
एतज्ज्ञानमिति प्रोक्तमज्ञानं यदतोऽन्यथा।। गी.13.11।।

 

अर्थात् अध्यात्म ज्ञान में नित्य स्थिति और तत्त्वज्ञान के प्रयोजन के रूप में परमात्मा को सर्वत्र देखने की प्रवृत्ति ही ‘ज्ञान’ है और इसके विपरीत सभी अज्ञान है। यही ज्ञान क्षेत्र (शरीर), क्षेत्रज्ञ (आत्मा) और उसकी भ्रान्ति के कारण उत्पन्न विकारों से मुक्ति का उपादान है। इस ज्ञान का ज्ञेय और कोई नहीं, श्रेष्ठ, अजर-अमर, अनासक्त परमात्मा ही है। वह परम-सत्ता अविभक्त होते हुए भी विभक्त दिखाई देती है, क्योंकि विकार मन उस सूक्ष्म को नहीं जान पाता है। यही मानव के जानने योग्य ज्ञान है और यही ईश्वर प्राप्ति का साधन है।
 

विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, January 31, 2015

गीता ज्ञान - अध्याय 12

                                               अथ द्वादशोऽध्यायः
 



गीता के सातवें अध्याय से ग्यारहवें अध्याय तक भक्त, भक्ति, आराधना, आराधक, उपासना आदि विषयों पर व्यापक विचार हुआ है। बारहवें अध्याय में साकार एवं निराकार उपासना के प्रकार एवं निराकार ब्रह्म के स्वरूप के साथ-साथ ईश्वर प्राप्ति के उपाय और भक्त के लक्षण को महत्ता दी गयी है। इस अध्याय में यह भी बताया गया है कि साकार उपासना किस प्रकार सहज और सुलभ है।

गीताकार ने अर्जुन के प्रश्न द्वारा सगुण और निर्गुण दोनों प्रकार के उपासकों की जिज्ञासा रखी है कि एक ओर कुछ ऐसे लोग हैं, जो ईश्वर के अनन्य प्रेमी हैं। वे निरन्तर ध्यान करके प्रभु के साकार स्वरूप की उपासना करते हैं, जबकि दूसरी ओर ऐसे भी लोग हैं, जो अव्यक्त और निराकार स्वरूप की उपासना करते हैं। ऐसा क्यों है और इनमें श्रेष्ठ कौन हैं?


इस स्वाभाविक प्रश्न का उत्तर भगवान् इस प्रकार देते हैं -
 

मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः।।गी.12.2।।


अर्थात् मुझमें ध्यान द्वारा मन को एकाग्र करके, परम श्रद्धा से युक्त होकर, मेरे सगुण रूप की जो उपासना करते हैं, मेरे मत से वे ही अधिक उत्तम हैं।


विचारणीय है कि सगुण उपासना सहज एवं सरल है। सकारोपासना की सहजता इस तथ्य पर निर्भर है कि मनुष्य की प्रवृत्ति में आसक्ति का भाव सहज है। जीवन-क्रम में इसी आसक्ति से सांसारिक बंधन में वह बँधा रहता है और यही आसक्ति उसे इष्ट की ओर सहजता से मोड़ देती है, क्योंकि साकार भक्ति में वात्सल्य, सख्य, कान्ता, दास्य आदि भाव हमेशा ही उपस्थित रहते हैं। निराकार उपासना में वैराग्य की परमावश्यकता होती है, जबकि साकार उपासना अपने कर्म के साथ, अपने कर्तव्य के साथ एक आम जीवन में जीकर भी संभव है। ईश्वर निराकार उपासना में भी मिलते हैं, किन्तु कठिन मार्ग का अनुसरण आम व्यक्ति के लिये कठिनाइयों के आमंत्रण ही कहे जायेंगे। निराकारोपासना में चंचल मन को आसक्ति-रहित करना अति आवश्यक हो जाता है, जो एक आसक्ति भरे चित्त वाले व्यक्ति के लिये संभव करना आसान नहीं होता है। अत्यधिक तप आदि से और सांसारिक माया-मोहों के त्याग करना सहज ही दुष्कर कार्य है। इसमें आलम्बन के सूक्ष्म होने से साधक को मन-इन्द्रियों को टिकाने का आधार मिलना कठिन होता है। सगुण उपासक अपनी भावना के अनुसार ईश्वर से जुड़ जाते हैं, अपने अनुसार उनके स्वरूप को अपना लेते हैं, वे चाहे किसी भी देवी-देवता का स्वरूप हो और अपने सभी कर्म उन्हें समर्पित कर देते हैं, तो यह अनन्य भक्ति में साध्य का मिलना तय है। उन्हें आवश्यकता होती है केवल ध्यान लगाने की।


ध्यान किस प्रकार लगाना चाहिये, तो इसके बारे में ईश्वर बताते हुए कहते हैं कि व्यक्ति को ईश्वर में मन और बुद्धि को लगाकर एकाग्रता प्राप्त करनी चाहिये, क्योंकि इसी ध्यानावस्था की प्रगाढ़ता में ध्याता-ध्येय का भेद मिट जाता है और मात्र ध्येय ही शेष रह जाते हैं। यह प्रगाढ़ता सरलता से नहीं आती, किन्तु मनुष्य निरन्तर अभ्यास से इसे प्राप्त कर सकता है। कभी अभ्यास में भी समय लग सकता है, तो इससे निराश न होकर अपने कर्म करते जाना चाहिये, क्योंकि वे कर्म ही उनके कर्तव्य होने से ईश्वर के निकट लाने का साधन बनते हैं। निष्काम कर्मयोग ही मनुष्य-जीवन का आधार होना चाहिये।


श्रेयो हि ज्ञानमभ्यासाज्ज्ञानाद्धयानं विशिष्यते।
ध्यानात्कर्मफलत्यागस्त्यागाच्छान्तिरनन्तरम्।।गी.12.12।।


अर्थात् तत्त्वज्ञान के अभ्यास से तत्त्वज्ञान श्रेष्ठ है, ज्ञान से ध्यान श्रेष्ठ है, ध्यान से सब कर्मों के फल का त्याग श्रेष्ठ है, क्योंकि त्याग से तत्काल ही परमशान्ति प्राप्त होती है।


इसके बाद गीताकार भक्त के लक्षण आठ श्लोंकों में इस प्रकार बताते हैं -


जो किसी से द्वेष नहीं करता, स्वार्थरहित होकर सबसे प्रेम करता है, बिना किसी हेतु के दयालु है, ममता एवं अहंकाररहित है, सुख-दुःख की प्राप्ति में सम एवं क्षमाशील है, वह योगी जो निरन्तर सन्तुष्ट है, मन, बुद्धि, इन्द्रियों को वश में करने वाला है, ईश्वर में दृढ़-विश्वासी है और उन्हें मन और बुद्धि को समर्पित करने वाला है, जो कभी उद्विग्न, भयभीत या परेशान नहीं होता, जिससे कोई उद्विग्न, भयभीत या परेशान नहीं होता, जो हर्ष, अमर्ष (ईर्ष्या), भय और उद्वेग से रहित है, जो कोई अपेक्षा या आकांक्षा नहीं रखता, बाहर-भीतर पवित्र है, तटस्थ, व्यथारहित तथा सांसारिक प्रपंचों का परित्याग करता है, जो शत्रु और मित्र में मान एवं सम्मान का समभाव रखता है, जो सभी प्रकार के द्वन्द्वों में सम रहता है, निंदा या स्तुति को समान समझता है, मननशील है, जीवन-क्रम में प्राप्य में ही संतुष्ट रहता है, जिसकी बुद्धि स्थिर है अर्थात् स्थितप्रज्ञ है और भक्तियुक्त है, वही सच्चा भक्त है और ईश्वर को प्रिय है।


इस अध्याय का मूलाधार सगुण एवं निराकार उपासना का भेद बतलाना है। लोगों को ईश्वर-प्राप्ति का साधन बतलाना, भक्त के लक्षण बतलाना और भक्तिमार्ग को प्रशस्त करना ही है। यह अध्याय इस आवश्यकता को भी प्रमाणित करता है कि मनुष्य स्वयं को ईश्वर को पूर्ण रूप से समर्पित कर दे। उनमें तल्लीन कर ले। यही भक्ति-मार्ग है और यही जीवन के लिये उपयुक्त एवं सरल मार्ग है।


विश्वजीत ‘सपन’