Thursday, December 19, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग -95)
महाभारत की कथा की 120 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
प्राणदण्ड
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प्राचीन काल की बात है। द्युमत्सेन नामक एक राजा था। उसका पुत्र सत्यवान् बड़ा दयालु एवं बुद्धिमान था। वह अहिंसा का पुजारी था। एक दिन की बात है। सत्यवान् ने देखा कि उसके पिता की आज्ञा पर अनेक अपराधियों को वध हेतु ले जाया जा रहा था। उसे बड़ा कष्ट हुआ। उसने निश्चय किया कि वह इस सम्बन्ध में अपने पिता से बात करेगा। ऐसा विचारकर उसने अपने पिता से कहा - ‘‘पिताजी, इसमें संदेह नहीं कि कभी अधर्म जैसा दिखाई देने वाला कार्य भी धर्म हो जाता है तथा कभी धर्म जैसा प्रतीत होने वाला कार्य भी अधर्म हो जाता है। तथापि किसी का भी प्राण लेना धर्म नहीं हो सकता, चाहे वह अपराधी ही क्यों न हो।’’
बेटे की बात सुनकर पिता समझ गया कि पुत्र मोह में फँसा है। उसने कहा - ‘‘बेटे, अपराधी का वध करना यदि अधर्म है, तो धर्म क्या है? यह कलियुग है। यहाँ सभी दूसरे की सम्पत्ति हड़पना चाहते हैं। दूसरे को कष्ट पहुँचाकर स्वयं के सुख की कामना करते हैं। उन्हें उचित मार्ग पर लाने के लिये दण्ड का मार्ग अपनाना ही पड़ता है, यही लोकहित में है। यदि तुम्हारे पास दण्ड के सिवा भी कोई उपाय हो, तो उसे बताओ।’’
पिता की बात सुनकर सत्यवान् ने कहा - ‘‘पिताजी, सभी वर्णों को ब्राह्मण के अधीन कर देना चाहिये एवं उन्हें धर्म में बाँध देना चाहिये। यदि वे बात न मानें, तब ब्राह्मण को राजा को बताना चाहिये, किन्तु प्राणदण्ड तब भी नहीं होना चाहिये। जब किसी का वध होता है, तब उसके साथ अनेक निरपराध भी काल का ग्रास बन जाते हैं। तात्पर्य है यह कि उसके माता-पिता, उसकी स्त्री, उसके बच्चे सभी दुःख झेलते हैं, जबकि उनका कोई दोष नहीं होता। वस्तुतः ऐसे अपराधियों को सुधरने का अवसर अवश्य देना चाहिये। अनेक बार सत्संग से उन्हें सुधरते देखा गया है। यदि कोई बार-बार अपराध करे, तभी उसे दण्ड देना चाहिये, अन्यथा नहीं।’’
द्युमत्सेन को प्रतीत हुआ कि पुत्र को वास्तविकता की जानकारी कम है, अतः उन्होंने कहा - ‘‘बेटे, प्रजा को धर्म की मर्यादा के भीतर रखना राजा का कर्तव्य है। यदि लुटेरों का वध न किया गया, तो वे प्रजा को कष्ट पहुँचाते हैं। जो बातें तुमने कहीं, वे पहले के लोगों के लिये उचित थीं, क्योंकि तब उनके स्वाभाव कोमल हुआ करते थे, वे सत्य में रुचि रखते थे; उनमें क्रोध एवं द्रोह की मात्रा कम थी। अब अपराधी प्रवृत्ति बढ़ने लगी है। पहले जुरमाने का दण्ड देकर उन्हें उचित मार्ग पर लाने का नियम था, क्योंकि वे मात्र भटके पथिक थे, किन्तु अब सब-कुछ सुनियोजित है। अपराध करने वाला अपनी प्रवृत्ति के कारण अपराधी है। वह अपने मार्ग से हटने को तैयार नहीं, अतः वध का दण्ड ही उनके लिये कहा गया है, ताकि अन्य उनके मार्ग का अनुसरण न करें। जो लुटेरे मरघट में जाकर मुर्दे के भी जेवर उतार लेते हैं, उनसे क्या अपेक्षा की जा सकती है। भला उन्हें किस प्रकार उचित मार्ग पर लाया जा सकता है? उन पर विश्वास करना तो मूर्खता ही होगी।’’
पिता की व्यावहारिक बातें सुनने के बाद भी सत्यवान् अपने विचारों से डिगा नहीं, क्योंकि उसके विचार से हिंसा से किसी समस्या का समाधान उचित न था। उसने कहा - ‘‘पिताजी, यदि आप वध के अलावा उन्हें सत्पुरुष बनाने में असफल हैं, तो आपको वैकल्पिक मार्गों को खोजना चाहिये। श्रेष्ठ राजा वही होते हैं, जो अपराधियों के बिना प्राण लिये ही उन्हें सत्मार्ग पर ले चलते हैं। यदि स्वयं राजा का उत्तम आचरण होता है, तो प्रजा भी उन्हीं का अनुसरण करती है।
पिताजी, एक ब्राह्मण ने मुझसे कहा था कि सत्ययुग में जब धर्म अपने चारों चरणों से उपलब्ध रहता है, तब एक राजा को अंहिसामय दण्ड का विधान ही करना चाहिये। त्रेतायुग आ जाने पर धर्म एक चौथाई कम हो जाता है, तब अर्थदण्ड ही विधान होना चाहिये। अभी तो कलियुग है। इसमें धर्म का चतुर्थ भाग ही शेष रह जाता है, तब इस समय मनुष्यों की आयु, शक्ति एवं काल का विचार करके ही दण्ड का विधान करना चाहिये। स्वयम्भुव मनु ने जीवों पर अनुग्रह करके बताया था कि मनुष्य को कभी भी अहिंसामय धर्म का ही पालन करना चाहिये, चाहे कोई भी युग हो। इसका कारण यह है कि यदि वह सत्यस्वरूप परमात्मा को प्राप्त करना चाहता है, तो उसके फल की प्राप्ति अहिंसा धर्म से ही संभव है।’’
द्युमत्सेन ने अपने बेटे की बात को समझा और कहा - ‘‘सत्य कहा तुमने पुत्र, जीवन लेने का अधिकार मनुष्य को नहीं है, तब चाहे वह अपराधी ही क्यों न हो। दण्ड आवश्यक है, क्योंकि अपराधियों को भय होना चाहिये, किन्तु अहिंसापूर्ण मार्ग से श्रेष्ठ कोई मार्ग नहीं हो सकता। सद्व्यवहार से ही प्रजा पर अधिक समय तब शासन किया जा सकता है।’’
अहिंसा का मार्ग सर्वोत्तम कहा गया है। यह सामाजिक जीवन हेतु आवश्यक माना गया है। जब तक आवश्यक न हो जाये, प्राणदण्ड से बचना ही श्रेष्ठ माना गया है।
विश्वजीत 'सपन'
Thursday, December 5, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 94)
शासन हेतु मनुष्यों की पहचान आवश्यक
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प्राचीन काल की बात है। कोसल देश में राजा क्षेमदर्शी थे। उनके राज्य में सब-कुछ अच्छा नहीं चल रहा था। उनकी मदद करने के लिये कालकवृक्षीय नामक एक मुनि उस राज्य में आये। वे समस्त राज्य का कई बार चक्कर लगा चुके थे। उनके पास बंद पिंजरे में एक कौआ था। वे कहते थे - ‘‘सज्जनो! यह कौआ बहुत गुणी है। यह भूत और भविष्य की बातें बता सकता है। यदि आप जानना चाहते हैं, मुझे बतायें।’’
ऐसा प्रचार कर वे एक दिन राजा के महल में गये। वहाँ जाकर राजमन्त्री से बोले - ‘‘मेरा कौआ कहता है कि राजा के खजाने से चोरी हुई है। किसने-किसने की है, उनके नाम भी बताता है, अतः राजा के पास चलकर सभी अपना अपराध स्वीकार करें।’’
मुनि की बात सुनकर जो भी अपराधी थे, वे डर गये और उन्होंने एक रात्रि मुनि के कौअे को मरवा दिया। प्रातःकाल जब मुनि उठे, तो पिंजड़े में उन्हें अपना कौआ मरा पड़ा मिला। वे क्रोधित तो न हुए, किन्तु सीधे राजा क्षेमदर्शी के पास जाकर बोले - ‘‘राजन्, आपके किसी मंत्री ने मेरे कौए को मार डाला, क्या आप उसे दण्ड नहीं देंगे?’’
क्षेमदर्शी ने कहा - ‘‘यदि हमारे किसी व्यक्ति ने अपराध किया है, तो उसे अवश्य दण्ड दिया जायेगा, किन्तु यह मामला क्या है? आप मुझे विस्तार से बतायें।’’
तब कालकवृक्षीय मुनि ने कहा - ‘‘राजन्, यदि आप सभी कुछ जानना चाहते हैं, तो एकान्त में चलें। मैं सभी बातें विस्तार से बताता हूँ।’’
एकान्त में जाकर कालकवृक्षीय मुनि ने कहा - ‘‘राजन्, मेरा नाम कालकवृक्षीय मुनि है तथा मैं आपके पिता का मित्र हूँ। जब इस राज्य पर संकट आया था तथा आपके पिता का देहान्त हो गया था, तब मैंने समस्त कामनाओं का त्याग करके तप का निर्णय लिया था। इधर जब पुनः आपके राज्य में संकट आया देखा, तो आपके पास आपको सब-कुछ बताने आया हूँ।’’
राजा क्षेमदर्शी ने मुनि को प्रणाम करके कहा - ‘‘मुनिवर, यह तो मेरा अहोभाग्य है कि आप मेरे यहाँ पधारे हैं। आप बतायें कि मैं क्या सेवा कर सकता हूँ।’’
कालकवृक्षीय मुनि ने कहा - ‘‘मुझे किसी सेवा की आवश्यकता नहीं राजन्। मैं तो आपको सावधान करने आया हूँ कि आपके राज्य के मंत्रीगण आपकी दृष्टि से छुपकर अनेक प्रकार के अनाचार कर रहे हैं। उन्हें दण्डित किये बिना आपका साम्राज्य उन्नति नहीं कर सकता। यदि आप सुनने को तैयार हैं, तो मैं आपको आपके हित की बातें बता सकता हूँ।’’
राजा क्षेमदर्शी ने कहा - ‘‘मुनिवर, मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि आपके कहे अनुसार ही कार्य करूँगा। आप जो कुछ भी कहना चाहते हैं, उन्हें निःसंकोच कहें।’’
तब कालकवृक्षीय ने कहा - ‘‘राजन्, आपके कर्मचारियों में कौन अपराधी है तथा कौन निरपराध, साथ ही आपके सेवकों में से किसकी ओर से आपको भय होगा, उनका पता लगाकर आपको बताने आया हूँ। एक राजा के जितने मित्र होते हैं, उतने ही शत्रु भी। जिस प्रकार जलती हुई आग से एक व्यक्ति सचेत होकर रहता है, ठीक उसी प्रकार एक राजा को हमेशा सावधानी से रहना चाहिये। आपको पता नहीं कि मेरा कौआ आपके ही कार्य में मारा गया है। जो लोग आपके ही घर में रहकर आपका खजाना लूटते हैं, वे कभी भी प्रजा की भलाई करने वाले नहीं हैं। उन्हीं लोगों ने मेरे साथ भी शत्रुता कर ली है। मैं किसी कामना से नहीं आया, इसके बाद भी षड्यन्त्रकारियों ने कपट करने की इच्छा से मेरे कौए को मार दिया, क्योंकि इससे उनका अहित होने वाला था। आपने जिन्हें मंत्री बनाया है, वे ही आपका अहित करने की योजना बना रहे हैं। अतः आपको सावधान हो जाना चाहिये, किन्तु अब मेरा यहाँ रहना उचित नहीं, क्योंकि इससे मेरे प्राण का संकट है।’’
राजा क्षेमदर्शी ने कहा - ‘‘हे ब्राह्मणश्रेष्ठ, आप कहीं न जाइये, यहीं रहिये। मैं आपकी सुरक्षा का भार लेता हूँ। जो आपको नहीं रहने देना चाहते, अब वे ही नहीं रहेंगे। उन लोगों के साथ क्या व्यवहार करना चाहिये, इसके बारे में मेरा मार्गदर्शन करें। आप जो भी कहेंगे, मेरे कल्याण के लिये ही कहेंगे, अतः वह मार्ग बतायें, जिन पर चलकर मेरा तथा मेरी प्रजा का कल्याण हो।’’
इस प्रकार राजा के कहने पर कालकवृक्षीय मुनि को संतोष हुआ। उन्होंने कहा - ‘‘राजन्, सर्वप्रथम तो कौए को मारने का जिन्होंने अपराध किया है, इस बात को प्रकट किये ही बिना ही उन सभी के अधिकार छीनकर उन्हें दुर्बल कर दीजिये। उसके उपरान्त अपराध का पता लगाकर एक-एक कर उनके वध कर दीजिये। एक-एक कर इसी कारण से, क्योंकि जब अनेक लोगों पर एक ही तरह के अपराध का दोष लगाया जाता है, तो वे सब मिलकर एक हो जाते हैं। गुप्त रूप से उनको दण्ड देने से संकट टला रहता है तथा कार्य भी बिना किसी विघ्न के पूर्ण होता है।’’
राजा क्षेमदर्शी ने उसी प्रकार किया जिस प्रकार कालकवृक्षीय मुनि ने कहा। धीरे-धीरे उनके समस्त शत्रुओं का नाश हो गया। कालकवृक्षीय मुनि ने अपनी बृद्धि के बल से कोसल नरेश को पृथ्वी का एकछत्र सम्राट बना दिया। कौसल्यराज ने भी उनकेे हितकारी वचन सुने तथा उनकी आज्ञा के अनुसार ही कार्य किये, इससे आगे चलकर उन्होंने समस्त भूमण्डल पर विजय प्राप्त कर ली।
विश्वजीत 'सपन'
Thursday, November 14, 2019
महाभारत की लोक कथा (भाग - 93)
महाभारत की कथा की 118 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
पुरोहित की शक्ति
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प्राचीन काल में मरुत्त नाम के एक राजा हुए। वे बड़े ही यशस्वी और धर्म के ज्ञाता थे। उनका पराक्रम इन्द्र के समान था। इन्द्र इस बात से जलते थे और राजा मरुत्त को नीचा दिखाने का प्रयत्न करते रहते थे। एक बार मरुत्त ने हिमालय के उत्तरी भाग में मेरु पर्वत के पास एक यज्ञशाला बनवाई और यज्ञ का कार्य प्रारम्भ किया। उस यज्ञ के लिये उन्हें पुरोहित की आवश्यकता हुई। बहुत सोच-विचारकर उन्होंने महर्षि अंगिरा के पुत्र बृहस्पति को पुरोहित बनाने का मन बनाया, किन्तु इन्द्र के बहकावे में आकर बृहस्पति ने उनका पुरोहित होना स्वीकार न किया।
राजा मरुत्त को यह बात अच्छी न लगी और वे अपने प्राण का त्याग करने चल दिये। मार्ग में उन्हें नारद जी मिले और उन्होंने सलाह दी कि महर्षि अंगिरा के दूसरे पुत्र संवर्त उनके पुरोहित बनने के योग्य हैं। अतः वे निराशा को छोड़कर उनके पास जाकर यज्ञ करवाने का आग्रह करें।
बृहस्पति संवर्त के बड़े भाई थे और उन्हें अकारण ही तंग किया करते थे। अपने बड़े भाई के इस व्यवहार से दुखी होकर संवर्त मोह का त्याग कर दिगम्बर बनकर वन में रहने लगे थे। उन्हें ढूँढना सहज ही कठिन कार्य था। अतः राजा ने नारद जी से उनसे मिलने का उपाय पूछा तो नारद जी ने कहा - ‘‘वे इस समय काशी नगरी में भगवान् विश्वनाथ जी के दर्शन की इच्छा से पागल बनकर गये हुए हैं। आप मंदिर के प्रवेश-द्वार पर कहीं से एक मुर्दे का प्रबंध करें। जो व्यक्ति उस मुर्दे को देखकर पीछे लौट जाये, उन्हें ही संवर्त समझिये।’’
यह कहकर नारद जी चले गये। राजा मरुत्त काशी नगरी गये और उन्होंने ठीक वैसा ही किया, जैसा नारद जी ने करने को कहा था। संवर्त मुर्दे को देखकर पीछे मुड़कर जाने लगे तब राजा ने प्रणाम किया तो उन्होंने पूछा - ‘‘मुझे यहाँ कोई नहीं जानता। तुमने मुझे कैसे पहचान लिया?’’
राजा ने नारद जी की बात बताई और अपने आने का प्रयोजन बताया तो वे बोले - ‘‘तुम्हें पता है कि मैं अपनी तरह से काम करता हूँ। तुम्हारे यज्ञ करवाने से बृहस्पति और इन्द्र दोनों ही मुझसे कुपित हो जायेंगे। यदि उस समय तुम मेरे पक्ष का समर्थन लेने की शपथ लेते हो तो मुझे स्वीकार है।’’
मरुत्त ने शपथ ले ली, तो संवर्त ने अलौकिक रूप से यज्ञ करवाना प्रारम्भ कर दिया। इससे मरुत्त को असीमित धन-सम्पदाओं की प्राप्ति होने लगी। एक के बाद एक यज्ञों से सारा संसार विस्मित रह गया। इन्द्र का सिंहासन भी डोलने लगा। बृहस्पति को यह बात पता चली तो उन्होंने इन्द्र से यह बात बताई और उनसे कहा कि वे किसी प्रकार संवर्त को राजा मरुत्त का यज्ञ करवाने से रोकने का प्रबन्ध करें।
इन्द्र ने अग्निदेव को अपना दूत बनाकर राजा मरुत्त के पास भेजा। दूत ने संदेश दिया - ‘‘राजन्, देवराज इन्द्र ने कहलवा भेजा है कि बृहस्पति आपके गुरु हैं और आपको उन्हीं से यज्ञ करवाना चाहिये।’’
मरुत्त ने कहा - ‘‘प्रणाम अग्निदेव, पहले मैं उनके ही पास गया था, किन्तु उन्होंने यह कहकर यज्ञ करवाने से मना कर दिया था कि वे देवताओं के पुरोहित हैं और मरणधर्मा मनुष्य के यज्ञ नहीं करवा सकते।’’
तब अग्निदेव ने कहा - ‘‘यदि आप यज्ञ रोक दें, तो बृहस्पति ने आपको अमर बना देने का वचन दिया है। इतना बड़ा कल्याण आप कैसे छोड़ सकते हैं?’’
मरुत्त समझ गये कि उन्हें प्रलोभन दिया जा रहा है। उन्होंने कहा - ‘‘क्षमा करें। वे देवराज इन्द्र के पुरोहित हैं। अतः मुझ मनुष्य के यज्ञ कराना उन्हें शोभा नहीं देता।’’
अग्निदेव ने कहा - ‘‘आप समझने का प्रयत्न करें। यदि बृहस्पति आपका यज्ञ कराते हैं तो इन्द्र आपसे प्रसन्न होंगे और इन्द्र प्रसन्न हुए तो तीनों लोक आपके लिये सुलभ हो जायेंगे।’’
किन्तु मरुत्त फिर भी तैयार न हुए, तब संवर्त ने कहा - ‘‘सावधान! तुमने जितना प्रयास करना था कर लिया। अब जाओ अन्यथा मुझे क्रोध आ गया तो जलाकर भस्म कर दूँगा।’’
अग्निदेव डरकर सीधे इन्द्र के पास गये और उन्हें बताया कि मरुत्त किसी भी प्रकार उनकी बात सुनने को तैयार नहीं हुए और उन्होंने यह भी कहा है कि संवर्त जी ही उनका यज्ञ करायेंगे। संवर्त जी ने भी मुझे भस्म करने की चेतावनी दी है।
तब इन्द्र ने गंधर्वराज को राजा मरुत्त को डराने के उद्देश्य से उनके पास भेजा। गंधर्वराज ने भी पहले मरुत्त को मनाने का प्रयत्न किया। जब वे न माने तो उन्होंने कहा - ‘‘महाराज! मैंने आपसे विनती की, किन्तु आप न माने। अब आप इन्द्र के कोप का भाजन बनें। देखिये आकाश में यह भयंकर सिंहनाद सुनिये।’’
तभी आकाश में भयंकर सिंहनाद सुनाई दिया। ऐसा लग रहा था कि इन्द्र किसी भी क्षण अपने वज्र का प्रहार करने ही वाले थे। राजा मरुत्त डर गये और संवर्त जी की शरण में जाकर बोले - ‘‘हे ब्राह्मण देवता! अब मैं आपकी शरण में हूँ। आप मुझे अभयदान दें।’’
संवर्त ने कहा - ‘‘तुम अकारण ही चिंतित हो रहे हो। मैं अभी स्तम्भिनी विद्या का प्रयोग कर तुम्हारे ऊपर आने वाले सभी संकटों को दूर कर देता हूँ। उसके बाद कोई वज्र भी तुम्हारा कुछ नहीं बिगाड़ सकता।’’
संवर्त ने वैसा ही किया और यज्ञ में लग गये। मरुत्त भी निडर होकर यज्ञशाला में हवन करने लगे। तब संवर्त ने अपने मन्त्र-बल से देवताओं का आवाहन किया। कुछ ही देर में स्वयं इन्द्र सुन्दर जुते हुए घोड़ों वाले रथ में सवार होकर यज्ञशाला में पहुँच गये। संवर्त ने एक-एककर सभी देवताओं का आवाहन किया और वे सभी यज्ञशाला में आये और उन्होंने सोमपान किया। इन्द्र ने प्रसन्न होकर मरुत्त को अत्यधिक धन-सम्पदा प्रदान दी। देवताओं के जाने के बाद राजा मरुत्त ने ब्राह्मणों आदि को धन-धान्य देकर संतुष्ट किया और संवर्त जी से आज्ञा लेकर राजधानी वापस आ गये।
विश्वजीत ‘सपन’
Sunday, October 20, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 92)
महाभारत की कथा की 117 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
श्रद्धाहीन कर्म व्यर्थ है
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प्राचीन काल में जाजलि नामक एक ऋषि हुआ करते थे। वे अपनी कठोर एवं उग्र तपस्या हेतु प्रसिद्ध थे। एक बार की बात है। तपस्या करते समय उनके बाल भीगे होने के कारण उलझकर जटा में परिणत हो गये। तब उन्हें कोई ठूँठ समझकर एक चिड़िया के जोड़े ने उसमें अपना एक घोंसला बना लिया। जाजलि बड़े दयालु थे। वे हिले-डुले नहीं तथा उन्होंने चिड़िया के घोंसले को भी नहीं हटाया एवं उसी प्रकार खड़े रहे। वे दोनों पक्षी वहीं सुख से रहने लगे। चार महीने बीत गये, फिर महर्षि के मस्तक पर ही उन्होंने अण्डे भी दिये। कुछ समय के बाद उन अण्डों से चिड़िया के बच्चे भी बाहर निकले तथा वे भी वहीं पलने-बढ़ने लगे। कुछ समय बाद बच्चों के पर निकल आये और वे उड़ने लगे, तो महर्षि को बड़ा हर्ष हुआ। वे हिलते-डुलते नहीं थे। कुछ समय बाद चिड़ियों के माँ-बाप अकेले ही बाहर जाने लगे तथा वे बच्चे भी अपनी आवश्यकताओं के अनुसार आने-जाने लगे। अब वे दिन भर बाहर रहते तथा सन्ध्या ही वापस आते थे। फिर एक दिन वे सभी कहीं चले गये तथा महीनों तक वापस नहीं आये। मुनि को आश्चर्य भी हुआ, किन्तु वे स्वयं को सिद्ध समझने लगे। उन्हें लगा कि उन्होंने बड़ा पुण्य का कार्य किया।
एक दिन उन्हीं बातों को याद करके उन्होंने मन ही मन कहा - ‘‘मैंने धर्म को प्राप्त कर लिया है।’’
उनके ऐसा कहते ही आकाशवाणी हुई - ‘‘जाजलि, तुम नहीं जानते कि धर्म पालन के संदर्भ में काशीनगरी के तुलाधार वैश्य की बराबरी कोई नहीं कर सकता।’’
मुनि को बड़ा अमर्ष हुआ तथा वे तत्काल ही तुलाधार से मिलने चल दिये। काशी नगरी में उन्होंने देखा कि तुलाधार अपनी दुकान पर बैठा व्यापार कर रहा था। जाजलि को देखते ही उसने कहा - ‘‘प्रणाम मुनिवर, आपने समुद्र तट पर बड़ी भारी तपस्या की। आपके मस्तक पर चिड़ियों ने अण्डे दिये। वे जब चले गये, तो अपने स्वयं को बड़ा धर्मात्मा समझा। तभी आकाशवाणी हुई तथा उसी के कारण आप यहाँ आये हैं। बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ।’’
जाजलि विस्मित हो गये और पूछा - ‘‘आश्चर्य है कि तुम व्यापार करते हुए भी इतना कुछ जानते हो। बताओ तुम्हें ऐसी बुद्धि किस प्रकार प्राप्त हुई।’’
तुलाधर ने कहा - ‘‘मुनिवर, मैं सनातन धर्म के रहस्यों को जानता हूँ। किसी भी प्राणी से द्रोह न करके जीविका चलाना धर्म माना गया है। मैं उसी धर्म के अनुसार जीवन-निर्वाह करता हूँ। मैं समस्त प्राणियों के प्रति एक समान भाव रखता हूँ। यही मेरा व्रत है। धर्म तत्त्व अत्यन्त सूक्ष्म है तथा कोई भी धर्म निष्फल नहीं होता। व्यवसाय ही मेरा धर्म है। उसका पालन करना मेरा कर्तव्य।’’
जाजलि ने कहा - ‘‘तुम व्यवसाय करते हुए धर्म का उपदेश दे रहे हो। तुम्हारी बातें नास्तिक की भाँति हैं। कर्म करना उचित है, किन्तु ईश्वरीय सत्ता को मानना पड़ता है।’’
तुलाधार ने कहा - ‘‘मैं नास्तिक नहीं हूँ, मैं यज्ञादि का विरोध नहीं करता, बल्कि धर्म के स्वरूप को भली-भाँति जानता हूँ। धन कमाना अनुचित नहीं, किन्तु वैदिक वचनों के तात्पर्य न समझकर मिथ्या यज्ञों का प्रचार व्यर्थ है। शुभ कर्म द्वारा जिस हविष्य का संग्रह किया जाता है, देवता उसी के होम से प्रसन्न होते हैं। कामना के वशीभूत यज्ञ करना, बगीचा बनवाना, तालाब खुदवाना उचित नहीं। उस कामना से उत्पन्न संतान भी लोभी होती है। समदर्शी कोई कामना नहीं करता, क्योंकि उसकी कामनायें स्वतः पूर्ण हो जाती हैं। असल में ज्ञानी पुरुष तो अपने को ही यज्ञ का उपकरण मानकर मानसिक यज्ञ का अनुष्ठान करते हैं। कर्म का त्याग करने वाले ही लोक-संग्रह के लिये मानसिक यज्ञ में प्रवृत्त होते हैं।’’
जाजलि ने कहा - ‘‘मानसिक यज्ञ मैंने नहीं सुना तथा यह कठिन भी प्रतीत होता है। जो मानसिक यज्ञ का अनुष्ठान नहीं कर सकते, उनकी क्या गति होती है?’’
तुलाधार ने कहा - ‘‘मुनिवर, श्रद्धालु पुरुष घी, दूध, दही तथा पूर्णाहुति से ही अपना यज्ञ पूर्ण कर लेते हैं। यह आत्मा ही प्रधान तीर्थ है। इसके लिये जगह-जगह भटकना आवश्यक नहीं। अहिंसा-प्रधान धर्म का पालन करना ही धर्म का अनुपालन है। आदरणीय, ये जो पक्षी आकाश में उड़ रहे हैं, उनमें से अनेक आपके मस्तक से उत्पन्न हुए हैं। आप उनके पितालुल्य हैं। मेरी बात छोड़िये तथा उन्हें बुलाइये। वे ही अहिंसा-प्रधान धर्म की बातें आपसे कहेंगे।’’
जाजलि ने आश्चर्य मिश्रित पुकार से उन्हें बुलाया तो वे आये एवं मनुष्य की भाँति स्पष्ट बोली में बोलने लगे। उन्होंने कहा - ‘‘ब्रह्मन्, हिंसा की भावना से रहित जो कर्म किये जाते हैं, वे ही इस लोक एवं परलोक में कल्याणकारी होते हैं। हिंसा श्रद्धा का नाश करती है, जो मनुष्य का सर्वनाश करती है। श्रद्धा सबकी रक्षा करती है। उसके ही प्रभाव से विशुद्ध जन्म प्राप्त होता है। ध्यान एवं जप से भी अधिक श्रद्धा का महत्त्व है। असल में श्रद्धाहीन कर्म व्यर्थ हो जाता है। अश्रद्धा सबसे बड़ा पाप है। आपने हमारे लिये जो भी किया उसमें श्रद्धा का अभाव था, क्योंकि आपको अपने धर्म पर गर्व था न कि उस श्रद्धा से कि जो आपने किया वह उचित था।’’
जाजलि को अब समझ में आया कि आकाशवाणी का क्या अर्थ था। तालाब खुदवाना देना, अन्न वितरण कर देना अथवा किसी को शरण देना तब तक तो ठीक है, जबकि उन्हें श्रद्धा से किया गया हो, अन्यथा वह व्यर्थ है। दम्भ से किया गया उपकार, उपकार न होकर पाप बन जाता है।
विश्वजीत 'सपन'
Wednesday, October 2, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 91)
महाभारत की कथा की 116 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
(शान्तिपर्व)
अध्यात्म ज्ञान एवं उसके साधन
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जीवन में ज्ञान एवं कर्म के अंतर समझ लेने के बाद शुकदेव जी ने अपने पिता व्यास जी से कहा - ‘‘पिताजी, सत्य है कि कर्म एवं ज्ञान में कोई विरोध नहीं है। एक बार संन्यासी के जीवन में प्रवेश करने पर अध्यात्म ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिये। यह क्या है और इसके साधन क्या हैं?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश - ये पंचमहाभूत सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हैं। ये सर्वत्र एक-से हैं, किन्तु समस्त प्राणियों में भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं। असल में यह समस्त चराचर जगत् पंचभूतमय ही है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राणियों के कर्मों के अनुसार न्यूनाधिक रूप में उनमें सन्निवेश किया है। इसी पंचभूतों से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है एवं इसी में उनका लय भी होता है।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘जी पिताजी। शरीर के अवयवों में जो न्यूनाधिक रूप में इन पंचमहाभूतों का सन्निवेश हुआ है, उसकी पहचान कैसे होती है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘उनके गुणों के कारण। श्रवण, शब्द, श्रोतेन्द्रिय एवं शरीर के समस्त छिद्र आकाश से उत्पन्न हुए हैं। प्राण, चेष्टा एवं स्पर्श की उत्पत्ति वायु से हुई है। रूप, नेत्र एवं जठरानल की उत्पत्ति अग्नि से हुई है। रस, रसना एवं स्नेह की उत्पत्ति जल से हुई है तथा गन्ध, नासिका एवं शरीर की उत्पत्ति भूमि से हुई है। इस प्रकार शब्द आकाश का, स्पर्श वायु का, रूप तेज का, रस जल का एवं गन्ध भूमि का कार्य हैं। जिनमें जिन-जिन गुणों का संन्निवेश जितना होगा, उनमें वे-वे गुण प्रखर होंगे।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘शरीर में इन्द्रियाँ भी हैं और गुण भी। इनके कार्यों एवं ज्ञान के बारे में मुझे विस्तार से बताइये।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, बुद्धि ही समस्त गुणों को धारण करती है और मनसहित समस्त इन्द्रियाँ भी बुद्धिरूप ही हैं। मनुष्य के शरीर में पाँच इन्द्रियाँ हैं, छठा मन है एवं सातवीं तत्त्वबुद्धि है और आठवाँ क्षेत्रज्ञ है। इसे इस प्रकार समझो कि नेत्र देखने का कार्य करती हैं, मन संदेह करता है तथा बुद्धि उसका निश्चय करती है, किन्तु क्षेत्रज्ञ सबका साक्षी कहलाता है। सत्त्व, रज एवं तम - ये तीनों ही गुण मन से उत्पन्न हुए हैं। इनकी पहचान मनुष्य के अपने कर्मों के कारण ही होती है। हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता एवं स्वस्थचित्त का विकास हो, तो सत्त्वगुण की वृद्धि समझनी चाहिये। यदि अभिमान, असत्य-भाषण, लोभ, मोह एवं असहनशीलता का विकास हो, तो ये रजोगुण के चिह्न होते हैं। मोह, प्रमाद, निद्रा, आलस्य एवं अज्ञान का विकास हो, तो ये तमोगुण के चिह्न होते हैं।’’
शुकदेवजी ने कहा - ‘‘जी पिताजी, कर्मों में हमारी प्रवृत्ति किस प्रकार होती है।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, इसे इस प्रकार समझो कि मन में नाना प्रकार के भाव उठते हैं, उसके उपरान्त बुद्धि उस पर निर्णय लेती है एवं उसके बाद हृदय उनकी अनुकूलता अथवा प्रतिकूलता पर विचार करता है। इसके उपरान्त ही कर्म में प्रवृत्ति होती है।’’
शुकदेव जी ने पूछा - ‘‘फिर इन्द्रिय किसे कहते हैं?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘भिन्न-भिन्न विषयों को ग्रहण करने के लिये बुद्धि ही विकृत होकर नाना प्रकार के रूप धारण करती है। वही जब सुनती है, तो श्रोत्र कहलाती है, स्पर्श करते समय स्पर्श, देखते समय दृष्टि, रसास्वादन करते समय रसना एवं गन्ध ग्रहण करते समय घ्राण कहलाती है। इस प्रकार बुद्धि के इन विकारों को ही इन्द्रिय कहते हैं। जब कोई मनुष्य किसी बात की अथवा वस्तु की इच्छा करता है, तब उसकी बुद्धि मन के रूप में परिणत हो जाती है। इसी कारण कहा गया है कि एक मनुष्य को अपने मन को वश में रखना चाहिये।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘इसका अर्थ है कि गुण प्रधान है और उसके अनुसार ही मन में विकार उत्पन्न होते हैं। इन गुणों की सृष्टि कौन करता है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘इसे इस प्रकार समझो कि गुण आत्मा को नहीं समझते, किन्तु आत्मा उन्हें सदा जानता है। इसका कारण यह है कि आत्मा ही गुणों का द्रष्टा है। यही गुण एवं आत्मा में अन्तर है। गुणों की सृष्टि प्रकृति करती है, क्योंकि आत्मा तो उदासीन है, वह पूर्णतः पृथक होकर उन्हें देखता रहता है।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘पिताजी, किस ज्ञान से मोक्ष संभव है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘इस सन्दर्भ में दो प्रकार के मत हैं, उन्हें सुनो। एक मत है कि तत्त्वज्ञान से जब गुणों का नाश कर दिया जाता है, तब वे पुनः उत्पन्न नहीं होते। उनका कोई चिह्न दिखाई नहीं देता और इसी कारण वे भ्रम या अविद्या के निवारण को ही मुक्ति मानते हैं। दूसरा मत यह है कि त्रिविध दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है। इन दोनों मतों पर अपनी बुद्धि के अनुसार विचार करके किसी एक सिद्धान्त का निश्चय करना चाहिये। उसके उपरान्त उसे महत्स्वरूप में स्थित हो जाना चाहिये। इस बात का ध्यान रखना अत्यावश्यक है कि आत्मा आदि-अन्त से रहित है।’’
विश्वजीत ‘सपन’
(शान्तिपर्व)
अध्यात्म ज्ञान एवं उसके साधन
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जीवन में ज्ञान एवं कर्म के अंतर समझ लेने के बाद शुकदेव जी ने अपने पिता व्यास जी से कहा - ‘‘पिताजी, सत्य है कि कर्म एवं ज्ञान में कोई विरोध नहीं है। एक बार संन्यासी के जीवन में प्रवेश करने पर अध्यात्म ज्ञान की ओर अग्रसर होना चाहिये। यह क्या है और इसके साधन क्या हैं?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, पृथ्वी, जल, तेज, वायु एवं आकाश - ये पंचमहाभूत सभी प्राणियों के शरीर में स्थित हैं। ये सर्वत्र एक-से हैं, किन्तु समस्त प्राणियों में भिन्न-भिन्न दिखाई देते हैं। असल में यह समस्त चराचर जगत् पंचभूतमय ही है। सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी ने प्राणियों के कर्मों के अनुसार न्यूनाधिक रूप में उनमें सन्निवेश किया है। इसी पंचभूतों से सभी प्राणियों की उत्पत्ति होती है एवं इसी में उनका लय भी होता है।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘जी पिताजी। शरीर के अवयवों में जो न्यूनाधिक रूप में इन पंचमहाभूतों का सन्निवेश हुआ है, उसकी पहचान कैसे होती है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘उनके गुणों के कारण। श्रवण, शब्द, श्रोतेन्द्रिय एवं शरीर के समस्त छिद्र आकाश से उत्पन्न हुए हैं। प्राण, चेष्टा एवं स्पर्श की उत्पत्ति वायु से हुई है। रूप, नेत्र एवं जठरानल की उत्पत्ति अग्नि से हुई है। रस, रसना एवं स्नेह की उत्पत्ति जल से हुई है तथा गन्ध, नासिका एवं शरीर की उत्पत्ति भूमि से हुई है। इस प्रकार शब्द आकाश का, स्पर्श वायु का, रूप तेज का, रस जल का एवं गन्ध भूमि का कार्य हैं। जिनमें जिन-जिन गुणों का संन्निवेश जितना होगा, उनमें वे-वे गुण प्रखर होंगे।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘शरीर में इन्द्रियाँ भी हैं और गुण भी। इनके कार्यों एवं ज्ञान के बारे में मुझे विस्तार से बताइये।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, बुद्धि ही समस्त गुणों को धारण करती है और मनसहित समस्त इन्द्रियाँ भी बुद्धिरूप ही हैं। मनुष्य के शरीर में पाँच इन्द्रियाँ हैं, छठा मन है एवं सातवीं तत्त्वबुद्धि है और आठवाँ क्षेत्रज्ञ है। इसे इस प्रकार समझो कि नेत्र देखने का कार्य करती हैं, मन संदेह करता है तथा बुद्धि उसका निश्चय करती है, किन्तु क्षेत्रज्ञ सबका साक्षी कहलाता है। सत्त्व, रज एवं तम - ये तीनों ही गुण मन से उत्पन्न हुए हैं। इनकी पहचान मनुष्य के अपने कर्मों के कारण ही होती है। हर्ष, प्रेम, आनन्द, समता एवं स्वस्थचित्त का विकास हो, तो सत्त्वगुण की वृद्धि समझनी चाहिये। यदि अभिमान, असत्य-भाषण, लोभ, मोह एवं असहनशीलता का विकास हो, तो ये रजोगुण के चिह्न होते हैं। मोह, प्रमाद, निद्रा, आलस्य एवं अज्ञान का विकास हो, तो ये तमोगुण के चिह्न होते हैं।’’
शुकदेवजी ने कहा - ‘‘जी पिताजी, कर्मों में हमारी प्रवृत्ति किस प्रकार होती है।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, इसे इस प्रकार समझो कि मन में नाना प्रकार के भाव उठते हैं, उसके उपरान्त बुद्धि उस पर निर्णय लेती है एवं उसके बाद हृदय उनकी अनुकूलता अथवा प्रतिकूलता पर विचार करता है। इसके उपरान्त ही कर्म में प्रवृत्ति होती है।’’
शुकदेव जी ने पूछा - ‘‘फिर इन्द्रिय किसे कहते हैं?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘भिन्न-भिन्न विषयों को ग्रहण करने के लिये बुद्धि ही विकृत होकर नाना प्रकार के रूप धारण करती है। वही जब सुनती है, तो श्रोत्र कहलाती है, स्पर्श करते समय स्पर्श, देखते समय दृष्टि, रसास्वादन करते समय रसना एवं गन्ध ग्रहण करते समय घ्राण कहलाती है। इस प्रकार बुद्धि के इन विकारों को ही इन्द्रिय कहते हैं। जब कोई मनुष्य किसी बात की अथवा वस्तु की इच्छा करता है, तब उसकी बुद्धि मन के रूप में परिणत हो जाती है। इसी कारण कहा गया है कि एक मनुष्य को अपने मन को वश में रखना चाहिये।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘इसका अर्थ है कि गुण प्रधान है और उसके अनुसार ही मन में विकार उत्पन्न होते हैं। इन गुणों की सृष्टि कौन करता है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘इसे इस प्रकार समझो कि गुण आत्मा को नहीं समझते, किन्तु आत्मा उन्हें सदा जानता है। इसका कारण यह है कि आत्मा ही गुणों का द्रष्टा है। यही गुण एवं आत्मा में अन्तर है। गुणों की सृष्टि प्रकृति करती है, क्योंकि आत्मा तो उदासीन है, वह पूर्णतः पृथक होकर उन्हें देखता रहता है।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘पिताजी, किस ज्ञान से मोक्ष संभव है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘इस सन्दर्भ में दो प्रकार के मत हैं, उन्हें सुनो। एक मत है कि तत्त्वज्ञान से जब गुणों का नाश कर दिया जाता है, तब वे पुनः उत्पन्न नहीं होते। उनका कोई चिह्न दिखाई नहीं देता और इसी कारण वे भ्रम या अविद्या के निवारण को ही मुक्ति मानते हैं। दूसरा मत यह है कि त्रिविध दुःखों की आत्यन्तिक निवृत्ति ही मोक्ष है। इन दोनों मतों पर अपनी बुद्धि के अनुसार विचार करके किसी एक सिद्धान्त का निश्चय करना चाहिये। उसके उपरान्त उसे महत्स्वरूप में स्थित हो जाना चाहिये। इस बात का ध्यान रखना अत्यावश्यक है कि आत्मा आदि-अन्त से रहित है।’’
विश्वजीत ‘सपन’
Friday, September 13, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 90)
महाभारत की कथा की 115 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
कर्म एवं ज्ञान का अन्तर
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शुकदेव जी अपने पिता व्यास जी से वार्ता कर रहे थे तथा जीवन-दर्शन को भी समझ रहे थे। योग की महत्ता जानने के बाद उन्होंने पूछा - ‘‘पिताजी, वेदों में कर्म करने एवं उन्हें त्यागने का भी विधान मिलता है। मनुष्यों को कर्म करने का क्या फल मिलता है तथा ज्ञान के द्वारा कर्म त्याग देने से उसे किस प्रकार का फल मिलता है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, बहुत ही महत्त्वपूर्ण प्रश्न किया तुमने। मानव-जीवन के लिये यह बहुत उपयोगी है। ज्ञान अविनाशी है, जबकि कर्म विनाशी है। वेदों में इन्हीं दो मार्गों के वर्णन हैं। एक है प्रवृत्तिधर्म का मार्ग तथा दूसरा निवृत्तिधर्म का मार्ग। इसे इस प्रकार समझो कि कर्म अर्थात् अविद्या से मनुष्य बन्धन में पड़ता है, जबकि ज्ञान से वह मुक्त हो जाता है। कर्म करने से पुनः जन्म प्राप्त होता है तथा सोलह तत्त्वों से बने इस शरीर की प्राप्ति होती है। इसके विपरीत ज्ञान से मनुष्य नित्य, अव्यक्त परमात्मा को प्राप्त होता है। कर्म का फल है दुःख-सुख तथा जन्म-मृत्यु, किन्तु ज्ञान से उस स्थान की प्राप्ति होती है, जहाँ समस्त प्रकार के शोक से मुक्ति मिल जाती है। ऐसा मनुष्य पुनः संसार में लौटकर नहीं आता।’’
‘‘जी पिताजी,’’ शुकदेव ने कहा - ‘‘ज्ञानी की बड़ी महत्ता है। इसकी क्या गति होती है, उसे भी बतायें।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटे, कर्म में आसक्त एवं ज्ञानी में बड़ा अन्तर होता है। वेद कहता है कि ज्ञानी का कभी क्षय नहीं होता, जबकि कर्मासक्त चन्द्रमा की कला के समान बढ़ता-घटता रहता है। वह इन्द्रियरूप ग्यारह विकारों से युक्त पुनः जन्म धारण करता है। उधर ज्ञानी उस अवस्था में पहुँच जाता है, जहाँ सुख-दुःख आदि द्वन्द्व कोई बाधा नहीं पहुँचाते। उसका ब्रह्म से साक्षात्कार हो जाता है तथा वह क्षेत्रज्ञ (परमात्मा) बन जाता है।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘पिताजी मैं धन्य हुआ। आपके उपदेश से मैं पवित्र हो गया। इस संसार में संत लोग कैसा व्यवहार करते हैं? मैं भी वही करना चाहता हूँ। कृपया इसे विस्तार से बतायें।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, ब्रह्माजी ने जो विधान बताया है, उसी का पालन सभी मनुष्य को करना चाहिये। सर्वप्रथम ब्रह्मचर्य का पालन कर आत्मबल प्राप्त करना चाहिये। उसके बाद गार्हस्थ्य धारण करना चाहिये, जो अपनी आयु का दूसरा भाग होना चाहिये। जब अपने सिर के बाल श्वेत दिखाई दे, शरीर में झुर्रियाँ दिखाई पड़े और पुत्र की प्राप्ति हो जाये तब जीवन का तीसरा भाग वानप्रस्थ आश्रम में बिताना चाहिये। तथा संन्यासी व्रत का पालन करना चाहिये। संन्यासी बनकर भिक्षाटन करते हुए आत्म-चिंतन करना चाहिये, जिससे ब्रह्म-तत्त्व की प्राप्ति होती है।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी, कर्म करना चाहिये एवं कर्म का त्याग भी करना चाहिये, ये दोनों तो परस्पर विरोधी प्रतीत होते हैं।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘ये विरोधी नहीं हैं। आयु की अवस्था के अनुसार कर्म निर्धारित किये गये हैं और उसी के अनुसार सभी मनुष्य के लिये कर्म हैं। असल में ब्रह्मचर्य, गार्हस्थ्य एवं वानप्रस्थ आश्रम में मनुष्य कर्म के अधिकारी होते हैं। मात्र संन्यासी ही कर्मों का त्याग करते हैं। सभी आश्रमों के अनुसार जीवन-यापन करने वाला ही परमगति को प्राप्त होता है। ये चारों आश्रम ही सीढ़ी के समान ब्रह्म प्राप्ति के साधन कहे गये हैं। हमें इन चारों आश्रमों के पालन नियमपूर्वक करने चाहिये, क्योंकि ये चारों आश्रम ब्रह्म में ही प्रतिष्ठित हैं। कर्म से किसी का पीछा नहीं छूटता। वह उसे करना ही होता है। समझने वाली बात यह है कि ज्ञान से मुक्ति मिलती है। यह ज्ञान मात्र संन्यासी के लिये ही कहे गये हैं। उस अवस्था में पहुँचकर हमें राग-द्वेष को भुलाकर ज्ञान-प्राप्ति के लिये उपक्रम करना चाहिये। इस प्रकार कर्म एवं ज्ञान में कोई विरोध नहीं है।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी, तो यह ज्ञान किस प्रकार प्राप्त किया जा सकता है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटा, यह उपदेश नहीं है, बल्कि परमात्मा का ज्ञान कराने वाला शास्त्र है। सम्पूर्ण उपनिषदों का रहस्य है यह। केवल अनुमान से या अगम से इसका ज्ञान कठिन है। इसका उचित ज्ञान अनुभव से ही होता है। इतना समझ लो कि धर्म एवं सत्य के जितने उपाख्यान हैं, उन सबका यह सारभूत है। तुम व्रतधारी स्नातक हो, इसी कारण मैंने तुम्हें यह उपदेश दिया, जो वेदों की दस सहस्र ऋचाओं के मंथन के बाद ही मैंने पाया है। यह ज्ञान उन लोगों के लिये कदापि नहीं है, जो अशान्त मन वाले होते हैं। कर्म आवश्यक है, किन्तु यदि परमतत्त्व को अथवा आत्म-ज्ञान को प्राप्त करना है, तो अंत में ज्ञान-मार्ग का अनुसरण ही करना पड़ता है। यही वेदों का सार है और यही जीवन का रहस्य है, जिसे जानना सभी मनुष्यों के लिये अत्यावश्यक है।’’
विश्वजीत 'सपन'
Tuesday, September 3, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 89)
महाभारत की कथा की 114 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
योग की महत्ता
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प्राचीन इतिहास है। शुकदेव अपने पिता व्यास जी से ज्ञानार्जन कर रहे थे। उसी क्रम में उन्होंने अपने पिता से पूछा - ‘‘पिताजी, योग के बारे में बड़ा सुना है। इसकी महत्ता क्या है? इसके संदर्भ में थोड़ा विस्तार से बताइये।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पुत्र, इन्द्रिय, मन एवं बुद्धि की वृत्तियों को रोक कर व्यापक आत्मा के साथ उनकी एकता स्थापित करना ही योग का ज्ञान है। एक योगी को शम, दम आदि से सम्पन्न होना चाहिये। उसे अध्यात्म का चिंतन करना चाहिये तथा शास्त्रविहित कर्मों का निष्काम भाव से अनुष्ठान करना चाहिये। काम, क्रोध, लोभ, भय एवं स्वप्न - ये पाँच योग के दोष कहे गये हैं। इनका निवारण करके उसे योग्य अधिकारी बनना चाहिये। उसके बाद गुरु से ज्ञान का उपदेश ग्रहण करना चाहिये। यही एक योगी के कर्तव्य होते हैं।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘इन पाँचों दोषों से बचने के क्या उपाय हैं, पिताजी? ये कार्य कठिन प्रतीत होते हैं।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘कार्य कठिन या सरल नहीं होते। निश्चित मन से करने से सभी कार्य सरल हो जाया करते हैं। मन को वश में करने से क्रोध को तथा संकल्प का त्याग करने से काम को जीता जा सकता है। सत्त्वगुण का आश्रय लेने से निद्रा पर विजय निश्चित है। धैर्य का आश्रय लेने से विषयभोग एवं भोजन की चिंता मिटती है। नेत्र के द्वारा हाथ एवं पैरों की, मन के द्वारा नेत्र की तथा कानों एवं कर्म के द्वारा मन और वाणी की रक्षा होती है। सावधानी के द्वारा भय एवं विद्वानों की सेवा से दम्भ का त्याग करना चाहिये। इस प्रकार एक योग साधक को आलस्य का त्याग कर योग सम्बन्धी दोषों पर विजय प्राप्त करने का प्रयत्न करना चाहिये।’’
शुकदेव जी ने कहा - ‘‘किन्तु पिताजी, यह सुनने में जितना सरल लगता है, उतना है नहीं। इन समस्त प्रकारों की विजय कैसे सरल की जा सकती है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘उचित कहा तुमने पुत्र। इसके लिये साधक को इस प्रकार के उपाय करने चाहिये। इन्हें विस्तार से सुनो। योगी को सर्वप्रथम अग्नि, ब्राह्मण एवं देवताओं की पूजा करनी चाहिये। उसके उपरान्त उसे अहिंसा वाणी का व्रत लेना चाहिये। ध्यान, वेदाध्ययन, क्षमा, शौच, आचारशुद्धि एवं इन्द्रिय निग्रह से तेज की वृद्धि करनी चाहिये। उसे सम्पूर्ण प्राणियों में समान भाव रखना चाहिये।
रात्रि के पूर्व एवं पिछले प्रहर में ध्यानस्थ होकर मन को आत्मा में लगाना चाहिये। इस बात का ध्यान रखना अति आवश्यक है कि जिस प्रकार घड़े में एक छोटा छेद होने पर जल बह जाता है, ठीक उसी प्रकार पाँचों इन्द्रियों में से एक भी यदि विषय की ओर प्रवृत्त हुई, तो साधक का तप भंग हो जाता है। सर्वप्रथम उसे मन को वश में करना चाहिये। उसके उपरान्त कान, आँख, जिह्वा तथा नासिका को वश में करना चाहिये। फिर पाँचों इन्द्रियों को मन में स्थापित कर इन्द्रिय सहित मन को बुद्धि में लीन करना चाहिये। इससे इन्द्रियों की मलिनता दूर होती है और वे निर्मल हो जाती हैं। उसी समय ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है। जो योगी इस प्रकार एकान्त में बैठकर योगाभ्यास करता है, समस्त नियमों का पालन करता है, तो उसे थोड़े ही समय में अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है।
योग साधना में अग्रसर होने पर मोह, भ्रम एवं आवर्त आदि विघ्न प्राप्त होते हैं। दिव्य सुगन्ध आती है। दिव्य रूपों के दर्शन होते हैं। नाना प्रकार के अद्भुत रस एवं स्पर्श के अनुभव होते हैं। इच्छानुकूल सर्दी एवं गर्मी के अनुभव होते हैं। हवा की भाँति आकाश-गमन की शक्ति आ जाती है। अनेक दिव्य पदार्थ स्वयमेव उपस्थित हो जाते हैं, जिनका त्याग कर योगी को आत्मा में लीन होने का प्रयत्न करना चाहिये। उसे हमेशा प्रयास करना चाहिये कि चंचल मन उसके वश में हो। उसे कभी भी मन को उद्विग्न नहीं होने देना चाहिये।
उसे प्रशंसा एवं निन्दा को समान देखना चाहिये। वायु के समान सर्वत्र विचरण करता हुआ भी असंग रहना चाहिये। इस प्रकार यदि कोई साधक स्वस्थचित्त एवं समदर्शी रहकर छः महीने तक योगाभ्यास करता है, तो उसे ब्रह्म का साक्षात्कार होता है।
इसकी महत्ता इस बात से प्रमाणित होती है कि कोई भी व्यक्ति हो, चाहे वह नीच वर्ण का ही क्यों न हो, यदि उसे धर्म सम्पादन करने की इच्छा हो, तो योग मार्ग का सेवन करना चाहिये। इसके सेवन से उसे परमगति की प्राप्ति होती है। इस बात का ज्ञान होना आवश्यक है कि जिसने अपने मन को वश में कर लिया है, वह उस अजन्मा, नित्यमुक्त, अणु से भी अणु और महान् से भी महान् आत्मा का दर्शन कर सकता है।’’
इस प्रकार व्यास जी ने अपने पुत्र शुकदेव जी को योगाभ्यास की महत्ता एवं उसके करने के उपायों को विस्तार से बताया, जो समस्त प्राणियों के कल्याण के लिये हैं। इसी कारण कहा गया है कि योग किसी धर्म अथवा जाति हेतु प्रमाणित नहीं है, अपितु यह समस्त प्राणियों के कल्याण का मार्ग है। इसे धर्म अथवा जाति से जोड़कर देखना बुद्धिहीन वर्ग की कपोल कल्पना मात्र है।
विश्वजीत ‘सपन’
Monday, August 26, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 88)
महाभारत की कथा की 113 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
सृष्टि, काल और युग
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महर्षि व्यास अपने पुत्र को समय-समय पर उपदेश देते रहते थे। एक दिन उनके पुत्र शुकदेव ने उनसे पूछा - ‘‘पिताजी, इस जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्म ही था। यह तेजोमय ब्रह्म ही सबका बीज है। इसी से समस्त जगत् की उत्पत्ति हुई है। उस एक ही भूत से स्थावर एवं जंगम दोनों की उत्पत्ति होती है। ब्रह्मा जी अपने दिन के प्रारंभ में जागकर सृष्टि की रचना करते हैं। सर्वप्रथम माया से महतत्त्व प्रकट होता है, उससे स्थूल सृष्टि का आधारभूत मन उत्पन्न होता है। सृष्टि से प्रेरित होकर मन नाना प्रकार के आकार धारण करता है, उससे शब्द गुण वाले आकाश की उत्पत्ति होती है। जब आकाश में विकार होता है, तो उससे पवित्र वायुतत्त्व का आविर्भाव होता है। वायु के विकृत होने पर ज्योतिमय अग्नितत्त्व प्रकट होता है। इस तेज में विकार होने पर रसमय जलतत्त्व की उत्पत्ति होती है। फिर जल से पृथ्वी का प्रादुर्भाव होता है।
पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ एवं मन, इन सोलह तत्त्वों से शरीर का निर्माण हुआ है। इनका आश्रय लेने के कारण ही इसे देह कहते हैं। शरीर के उत्पन्न होने पर उनमें अपने-अपने कर्मों के साथ सूक्ष्म महाभूत प्रवेश करते हैं। समस्त जीव की उत्पत्ति ब्रह्मा ही करते हैं।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘यह काल का स्वरूप क्या है पिताजी?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पंद्रह निमेष की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला तथा तीन काष्ठा का एक मुहूर्त एवं तीस मुहूर्त का एक रात-दिन कहा जाता है। तीस दिन का एक मास एवं बारह मास का एक वर्ष कहा जाता है। एक वर्ष में दो अयन होते हैं - उत्तरायण एवं दक्षिणायन। मनुष्य के एक मास में पितरों का एक दिन-रात होता है। शुक्ल पक्ष उनका दिन और कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि होती है। मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है अर्थात् उत्तरायण उनका दिन और दक्षिणायन उनकी रात्रि होती है। देवताओं के बारह हजार वर्षों का एक चतुर्युग होता है। एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। साथ ही एक हजार चतुर्युग की उनकी एक रात्रि होती है। ब्रह्मा अपने दिन के प्रारंभ में सृष्टि की रचना करते हैं और जब प्रलय का समय होता है, तो रात्रि में सबको अपने में लीन करके योगनिद्रा में आश्रय लेकर सो जाते हैं।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘पिताजी, युगों की महत्ता क्या है? उसमें क्या-क्या विभेद हैं?’’
व्यास जी ने बताया - ‘‘देवताओं के चार हजार वर्षों का एक सत्ययुग होता है। इसमें चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या एवं उतने ही का संध्यांश होता है। इस प्रकार सत्ययुग की आयु अड़तालीस सौ दिव्य वर्षों की होती है। त्रेता युग में यह घटकर छत्तीस सौ वर्षों की, द्वापर में चैबीस सौ वर्षों की तथा कलियुग में बारह सौ वर्षों की रह जाती है।
सत्ययुग में धर्म एवं सत्य के चारों चरण उपलब्ध होते हैं एवं इनका पूर्णतः पालन किया जाता है। कोई भी अधर्म में प्रवृत्त नहीं होता। इनमें मनुष्यों की आयु चार सौ वर्षों की होती है। त्रेता में यह आयु घटकर तीन सौ वर्षों की, द्वापर में दो सौ वर्षों की तथा कलियुग में सौ वर्षों की रह जाती है। इसका कारण धीरे-धीरे अधर्म में वृद्धि है। स्वाध्याय एवं वेदाध्ययन कम होता जाता है, कामनाओं की पूर्ति में बाधा आने लगती है। इन युगों में धर्म भी भिन्न-भिन्न होते हैं। सत्ययुग में तप को सबसे बड़ा धर्म माना गया है, त्रेतायुग में ज्ञान को उत्तम बताया गया है, द्वापरयुग में यज्ञ को श्रेष्ठ बताया गया है जबकि कलियुग में एकमात्र दान को ही धर्म बताया गया है।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘पिताजी, तप का इतना प्रभाव क्यों कहा गया है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटे, तप का मूल है शम एवं दम। मनुष्य अपनी जिन-जिन कामनाओं की इच्छा करता है, उन्हें वह तप के माध्यम से पूर्ण कर लेता है। परमात्मा की प्राप्ति भी तप से ही होती है। तपशक्ति से सम्पन्न होकर ही ब्रह्मा जी ने वेद-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया तथा उन्हें ऋषि-मुनियों तक फैलाया। तप से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘परब्रह्म का साक्षात्कार कैसे होता है? युगों में मनुष्यों की कैसी स्थिति रहती है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पुत्र, ब्रह्म के दो स्वरूप होते हैं - एक शब्दब्रह्म एवं दूसरा परब्रह्म। इन दोनों का ज्ञान आवश्यक है। जिसे शब्दब्रह्म का पूर्ण ज्ञान हो जाता है, वह सरलता से परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। सत्ययुग में लोग वेदोक्त धर्मों के अनुसार तप, यज्ञादि करते हैं। उसके बाद त्रेतायुग में भी वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान एवं वर्ण-आश्रम परम्परा का पालन हुआ करता है, किन्तु द्वापर युग में आयु की न्यनता के कारण इन बातों की कमी होने लगती है तथा कलियुग में अधर्म के कारण यज्ञ, वेदादि लुप्त हो जाते हैं। यही सृष्टि का चक्र है।’’
इस प्रकार महर्षि व्यास ने अपने पुत्र शुकदेव को सृष्टि की उत्पत्ति, काल के स्वरूप के बारे में बताया जो ब्रह्मा के मुख से चलकर ऋषि-मुनियों के पास आया और सम्पूर्ण जगत् में ज्ञान के रूप में व्याप्त हुआ।
विश्वजीत 'सपन'
सृष्टि, काल और युग
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महर्षि व्यास अपने पुत्र को समय-समय पर उपदेश देते रहते थे। एक दिन उनके पुत्र शुकदेव ने उनसे पूछा - ‘‘पिताजी, इस जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्म ही था। यह तेजोमय ब्रह्म ही सबका बीज है। इसी से समस्त जगत् की उत्पत्ति हुई है। उस एक ही भूत से स्थावर एवं जंगम दोनों की उत्पत्ति होती है। ब्रह्मा जी अपने दिन के प्रारंभ में जागकर सृष्टि की रचना करते हैं। सर्वप्रथम माया से महतत्त्व प्रकट होता है, उससे स्थूल सृष्टि का आधारभूत मन उत्पन्न होता है। सृष्टि से प्रेरित होकर मन नाना प्रकार के आकार धारण करता है, उससे शब्द गुण वाले आकाश की उत्पत्ति होती है। जब आकाश में विकार होता है, तो उससे पवित्र वायुतत्त्व का आविर्भाव होता है। वायु के विकृत होने पर ज्योतिमय अग्नितत्त्व प्रकट होता है। इस तेज में विकार होने पर रसमय जलतत्त्व की उत्पत्ति होती है। फिर जल से पृथ्वी का प्रादुर्भाव होता है।
पंचमहाभूत, दस इन्द्रियाँ एवं मन, इन सोलह तत्त्वों से शरीर का निर्माण हुआ है। इनका आश्रय लेने के कारण ही इसे देह कहते हैं। शरीर के उत्पन्न होने पर उनमें अपने-अपने कर्मों के साथ सूक्ष्म महाभूत प्रवेश करते हैं। समस्त जीव की उत्पत्ति ब्रह्मा ही करते हैं।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘यह काल का स्वरूप क्या है पिताजी?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पंद्रह निमेष की एक काष्ठा, तीस काष्ठा की एक कला, तीस कला तथा तीन काष्ठा का एक मुहूर्त एवं तीस मुहूर्त का एक रात-दिन कहा जाता है। तीस दिन का एक मास एवं बारह मास का एक वर्ष कहा जाता है। एक वर्ष में दो अयन होते हैं - उत्तरायण एवं दक्षिणायन। मनुष्य के एक मास में पितरों का एक दिन-रात होता है। शुक्ल पक्ष उनका दिन और कृष्ण पक्ष उनकी रात्रि होती है। मनुष्यों का एक वर्ष देवताओं का एक दिन-रात होता है अर्थात् उत्तरायण उनका दिन और दक्षिणायन उनकी रात्रि होती है। देवताओं के बारह हजार वर्षों का एक चतुर्युग होता है। एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा का एक दिन होता है। साथ ही एक हजार चतुर्युग की उनकी एक रात्रि होती है। ब्रह्मा अपने दिन के प्रारंभ में सृष्टि की रचना करते हैं और जब प्रलय का समय होता है, तो रात्रि में सबको अपने में लीन करके योगनिद्रा में आश्रय लेकर सो जाते हैं।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘पिताजी, युगों की महत्ता क्या है? उसमें क्या-क्या विभेद हैं?’’
व्यास जी ने बताया - ‘‘देवताओं के चार हजार वर्षों का एक सत्ययुग होता है। इसमें चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या एवं उतने ही का संध्यांश होता है। इस प्रकार सत्ययुग की आयु अड़तालीस सौ दिव्य वर्षों की होती है। त्रेता युग में यह घटकर छत्तीस सौ वर्षों की, द्वापर में चैबीस सौ वर्षों की तथा कलियुग में बारह सौ वर्षों की रह जाती है।
सत्ययुग में धर्म एवं सत्य के चारों चरण उपलब्ध होते हैं एवं इनका पूर्णतः पालन किया जाता है। कोई भी अधर्म में प्रवृत्त नहीं होता। इनमें मनुष्यों की आयु चार सौ वर्षों की होती है। त्रेता में यह आयु घटकर तीन सौ वर्षों की, द्वापर में दो सौ वर्षों की तथा कलियुग में सौ वर्षों की रह जाती है। इसका कारण धीरे-धीरे अधर्म में वृद्धि है। स्वाध्याय एवं वेदाध्ययन कम होता जाता है, कामनाओं की पूर्ति में बाधा आने लगती है। इन युगों में धर्म भी भिन्न-भिन्न होते हैं। सत्ययुग में तप को सबसे बड़ा धर्म माना गया है, त्रेतायुग में ज्ञान को उत्तम बताया गया है, द्वापरयुग में यज्ञ को श्रेष्ठ बताया गया है जबकि कलियुग में एकमात्र दान को ही धर्म बताया गया है।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘पिताजी, तप का इतना प्रभाव क्यों कहा गया है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘बेटे, तप का मूल है शम एवं दम। मनुष्य अपनी जिन-जिन कामनाओं की इच्छा करता है, उन्हें वह तप के माध्यम से पूर्ण कर लेता है। परमात्मा की प्राप्ति भी तप से ही होती है। तपशक्ति से सम्पन्न होकर ही ब्रह्मा जी ने वेद-विद्या का ज्ञान प्राप्त किया तथा उन्हें ऋषि-मुनियों तक फैलाया। तप से कुछ भी हासिल किया जा सकता है।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘परब्रह्म का साक्षात्कार कैसे होता है? युगों में मनुष्यों की कैसी स्थिति रहती है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पुत्र, ब्रह्म के दो स्वरूप होते हैं - एक शब्दब्रह्म एवं दूसरा परब्रह्म। इन दोनों का ज्ञान आवश्यक है। जिसे शब्दब्रह्म का पूर्ण ज्ञान हो जाता है, वह सरलता से परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। सत्ययुग में लोग वेदोक्त धर्मों के अनुसार तप, यज्ञादि करते हैं। उसके बाद त्रेतायुग में भी वेदाध्ययन, यज्ञानुष्ठान एवं वर्ण-आश्रम परम्परा का पालन हुआ करता है, किन्तु द्वापर युग में आयु की न्यनता के कारण इन बातों की कमी होने लगती है तथा कलियुग में अधर्म के कारण यज्ञ, वेदादि लुप्त हो जाते हैं। यही सृष्टि का चक्र है।’’
इस प्रकार महर्षि व्यास ने अपने पुत्र शुकदेव को सृष्टि की उत्पत्ति, काल के स्वरूप के बारे में बताया जो ब्रह्मा के मुख से चलकर ऋषि-मुनियों के पास आया और सम्पूर्ण जगत् में ज्ञान के रूप में व्याप्त हुआ।
विश्वजीत 'सपन'
Sunday, August 18, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग-87)
महाभारत की कथा की 112 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
ध्यान एवं धारणा तथा मोक्ष
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शुकदेव अपने पिता से जीवन के रहस्यों को समझ रहे थे। उनके सभी प्रश्नों के उत्तर व्यास जी सुन्दरता से बताते जा रहे थे। शुकदेव ने पूछा - ‘‘पिताजी, मोक्ष प्राप्ति के लिये मनुष्य को क्या करना चाहिये?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘इस भवसागर को पार करने के लिये हमें ज्ञानरूपी नौका का आश्रय लेना चाहिये। हमें ध्यानयोग की साधना करनी चाहिये और उनके बारह उपायों के आश्रय लेने चाहिये।’’
शुकदेव ने पूछा - ‘‘ध्यानयोग के ये बारह उपाय क्या हैं पिताजी? मुझे थोड़ा विस्तार में बतायें।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘ध्यानयोग की साधना किसी एकान्त, पवित्र एवं समतल स्थान पर करनी चाहिये। इस प्रकार के उपयोगी स्थल को देशयोग कहा जाता है। आहार, विहार, चेष्टा, सोना तथा जागना नियमानुकूल होना चाहिये। इसे कर्मयोग कहा गया है। सदाचारी शिष्य को अपनी सेवा एवं सहायता के लिये रखना अनुरागयोग कहा गया है। आवश्यक सामग्री का संग्रह अर्थयोग कहलाता है। ध्यानोपयोगी आसन में बैठना उपाययोग है। इस संसार के विषयों एवं सगे-सम्बन्धियों से आसक्ति एवं ममता से मुक्त होना अपाययोग कहलाता है। गुरु एवं वेदों के वचनों पर विश्वास रखना निश्चययोग है। इन्द्रियों को वश में रखना चक्षुर्योग है। शुद्ध एवं सात्विक भोजन आहारयोग है। विषयों की ओर स्वाभाविक प्रवृत्तियों को रोकना संहारयोग है। मन के संकल्प, विकल्प को शान्त करने का प्रयास मनोयोग है तथा संसार के दुःखों पर विचार न कर उससे विरक्त होना दर्शनयोग है। इन समस्त उपायों को करते हुए ही ध्यानयोग की साधना करनी चाहिये।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी। इनके आश्रय लेकर किस प्रकार मोक्ष की साधना करनी चाहिये?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘जिसे भी मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा हो, उसे बुद्धि के द्वारा मन एवं वाणी को जीतना चाहिये। इससे मृत्युरूपी सागर को पार किया जा सकता है। उसे तभी शीघ्र सफलता मिल सकती है, यदि वह किसी एक विषय अर्थात् ब्रह्म में अपने चित्त को स्थापित कर लेता है। इस स्थापना को धारणा कहा जाता है तथा यह सात प्रकार का होता है।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी। इस धारणा के प्रकारों को भी थोड़ा विस्तार से बताने की कृपा करें।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पुत्र, शरीर में पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अव्यक्त एवं अहंकार - इन सातों तत्त्वों का चिन्तन किया जाता है। यही सात प्रकार की धारणायें हैं। शरीर में पैर से लेकर घुटने तक का स्थान पृथ्वी का है, घुटने से गुदा तक का स्थान जल का है, गुदा से हृदय तक का स्थान तेज का है, हृदय से दोनों भौहों तक का स्थल वायु का तथा भ्रूमध्य से मूर्धा तक का स्थल आकाश का कहलाता है। इनकी धारणा के बाद नाद का चिन्तन अव्यक्त धारणा है और स्थूल देह की आसक्ति का त्याग अहंकार की धारणा है।
इसकी अनुभूति को जान लेना भी आवश्यक है। जब पृथ्वी की धारणा का प्रारंभ होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि कुहरे के समान कोई सूक्ष्म वस्तु आकाश को आच्छादित कर रही है। यह प्रथम स्वरूप है। इसके उपरान्त जब वह कुहरा निवृत्त हो जाता है, तब दूसरे रूप का दर्शन होता है। इसमें देह के भीतर एवं सम्पूर्ण आकाश में जल ही जल दिखाई देता है। तीसरी स्थिति में सर्वत्र आग की ज्वालायें दिखाई देती हैं। इसके विलीन हो जाने पर आकाश में सर्वत्र वायु का अनुभव होता है। इस समय साधक को शरीर का मात्र ऊपरी भाग ही दिखाई देता है। जब वह तेज का संहार कर वायु पर विजय पाता है, तो वायु का सूक्ष्म रूप आकाश में लीन हो जाता है। इस समय एक छिद्ररूपी नीला आकाश ही विद्यमान रहता है। योगी का शरीर सूक्ष्मता को प्राप्त करता है और उसे स्थूल शरीर का कोई भान नहीं रहता।’’
शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी। इसकी प्रक्रिया क्या है?’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘पृथ्वी भाग में भावना द्वारा प्रणवसहित लं बीज एवं वायु देवता की स्थापना करके चतुर्मुख ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिये। पाँच घड़ी तब इस धारणा से पृथ्वी तत्त्व पर विजय मिलती है। इससे साधक में सृष्टि की शक्ति आ जाती है। जल की धारणा में प्रणवसहित वं बीज एवं वायु देवता की स्थापना करके चतुर्भुज विष्णु का ध्यान करना चाहिये। पाँच घड़ी की साधना से सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है तथा साधक समस्त पृथ्वी को कम्पित करने की क्षमता वाला हो जाता है। अग्नि के स्थान में प्रणवसहित रं बीज एवं वायु देवता की स्थापना से त्रिनेत्रधारी शिव का ध्यान करने से अग्नि से जलने का भय नष्ट हो जाता है। वायु के स्थान में प्रणवसहित वं बीज एवं वायु देवता की स्थापना कर शंकर का ध्यान करने से आकाश में विचरने की शक्ति आ जाती है। तब आकाश तत्त्व के स्थान में प्रणवसहित हं बीज एवं वायु देवता की स्थापना कर शंकर का ध्यान करने से शरीर को अदृश्य करने की क्षमता आ जाती है। इसके बाद अव्यक्त की धारणा में नाद का चिंतन किया जाता है। फिर जब वह अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो समस्त भूत उसके वश में आ जाते हैं। पंचभूत एवं अहंकार इन छः तत्त्वों का आत्मा है बुद्धि। जब वह साधाक इस बुद्धि को जीत लेता है, तो उसे समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति हो जाती है। तब उसे विशुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है। इसी समय योगी को तत्त्व का अथवा यों कहें कि ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। यही मोक्ष है।’’
विश्वजीत 'सपन'
Sunday, August 11, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 86)
महाभारत की कथा की 111 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
प्रलय एवं उसका क्रम
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पूर्वकाल की बात है। महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने अपने पिता से सृष्टि की उत्पत्ति एवं काल के बारे में जानने के बाद पूछा - ‘‘पिताजी, आपने बताया कि ब्रह्मा के दिन प्रारंभ से सृष्टि का प्रारंभ होता है और रात्रि पर प्रलय। सृष्टि की उत्पत्ति मैं समझ गया। यह प्रलय किस प्रकार होता है? कृपया मुझे विस्तार से बतायें।’’
व्यास जी ने कहा - ‘‘तुम जान ही चुके हो कि एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा जी का एक दिन और उतने ही समय की एक रात्रि होती है। ब्रह्मा जी दिन के प्रारंभ में सृष्टि की रचना करते हैं तथा रात्रि के प्रारंभ में सबको स्वयं में लीन करना प्रारंभ करते हैं। ब्रह्मा जी के दिन बीतने पर इस सृष्टि का लय किस प्रकार होता है तथा ब्रह्मा जी इस स्थूल जगत् को सूक्ष्म करके किस प्रकार अपने भीतर लीन कर लेते हैं, उसे तुम सुनो।’’
शुकदेव ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दी।
व्यास जी ने कहना प्रारंभ किया - ‘‘तुम्हें पता ही है कि आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी अपने गुणों को विकसित करके जगत् का निर्माण करते हैं। इन पंचमहाभूतों को सूक्ष्मता किस प्रकार आती है, यह ज्ञान अति अवश्यक है। जब जगत् के प्रलय का समय आता है, तब ऊपर से तेजस्वी सूर्य तथा नीचे से अग्नि की सात ज्वालायें संसार को भस्म करने लगती हैं। सर्वप्रथम पृथ्वी के चराचर प्राणी इन ज्वालाओं से दग्ध होकर नष्ट होने लगते हैं। सभी प्राणी, पादप आदि जल कर राख बन जाते हैं। पृथ्वी इनसे विहीन होकर कछुए की पीठ की भाँति दृष्टिगत होती है, जहाँ श्मशान जैसी वीरानी फैल जाती है। स्थावर-जंगम कुछ भी संसार में बचा नहीं रहता।
उसके बाद यही तेज पृथ्वी के गुण गन्ध को भी ग्रहण कर लेता है। पृथ्वी तब गन्धहीन हो जाती है तथा यही गन्धहीन पृथ्वी अपने कारणभूत जल में लीन हो जाती है। जल में लीन होते समय जल की ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगती हैं। चारों ओर से जल पृथ्वी को घेरने लगते हैं। एक विनाशलीला का प्रारंभ होता है। सम्पूर्ण भूमि, पर्वत आदि डूबने लगते हैं। कुछ समय के उपरान्त सम्पूर्ण विश्व जल में निमग्न हो जाता है।
तदनन्तर तेज जल के गुण रस को ग्रहण कर लेता है तथा रसहीन जल तेज में लीन हो जाता है। जल की धारायें उठ-उठकर तीव्रता से तेज में समाने लगती हैं। यह ऐसा समय होता है, जब सम्पूर्ण आकाश अग्नि की लपटों से आच्छादित-सा दिखाई देता है। जैसे अगस्त्य मुनि ने समुद्र को पी लिया था, ठीक उसी प्रकार समस्त जल का पान हो जाता है।
उसके बाद तेज के गुण रूप को वायुतत्त्व ग्रहण कर लेता है। तेज के वायु के ग्रहण करते ही अग्नि ठण्डी हो जाती है और वायु में मिल जाती है। इस मिलन के कारण वायु अबाध गति से चलने लगती है। चारों ओर विनाश का दृश्य दिखाई देने लगता है। वायु की गति अत्यधिक हो जाती है और हर दिशा में हरहराते हुए चलने लगती है।
उसके उपरान्त आकाश वायु के गुण स्पर्श का ग्रहण कर लेता है। इसके कारण वायु शान्त होकर आकाश में लीन हो जाती है। तदनन्तर शब्द गुण से युक्त मात्र आकाश रह जाता है। इस समय रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श का कुछ भी अंश उपलब्ध नहीं रहता। वे सभी शब्द में लीन हो जाते हैं। इसके उपरान्त इस दृश्य जगत् को व्यक्त करने वाला मन आकाश के गुण शब्द को स्वयं में लीन कर लेता है। मन से ही शब्द की उत्पत्ति होती है तथा वह उसी में पुनः लीन हो जाता है। इस प्रकार इन पंचभौतिक का ब्रह्मा के मन में लीन होना ही प्रलय कहलाता है। इसे ब्राह्म प्रलय भी कहा जाता है। इस प्रकार देखा जाये, तो समस्त भूतों के प्रलय स्थान भी ब्रह्मा जी ही हैं।
यही संक्षेप में प्रलय का वृत्तान्त है। यही सृष्टि एवं प्रलय का क्रम निरन्तर चलता रहता है। इसी प्रकार एक-एक हजार चतुर्युगों के ब्रह्मा जी के दिन एवं रात होते रहते हैं। उनके दिन के आरंभ में सृष्टि एवं रात्रि के आरंभ में प्रलय का यह क्रम सतत् चलता रहता है।’’
कहते हैं कि इसी प्रकार संसार की उत्पत्ति एवं प्रलय का क्रम चलता रहता है। संसार की सृष्टि एवं उसके प्रलय का यह प्राकृतिक नियम कभी भंग नहीं होता। यही जीवन का एक महासत्य है, जिसे प्रत्येक मनुष्य को जानना चाहिये।
विश्वजीत 'सपन'
Sunday, August 4, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 85)
महाभारत की कथा की 110 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
समत्वबुद्धि से ब्रह्मपद-प्राप्ति
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प्राचीन काल की बात है। मुनियों में उपदेश ग्रहण करने की प्रथा थी। वे किसी भी ऋषि-मुनि से अपनी जिज्ञासाओं को शान्त करने का अनुरोध किया करते थे। तब ऋषि-मुनि भी उनकी जिज्ञासाओं का समुचित समाधान किया करते थे। ऐसी ही एक प्राचीन कथा है, जिसमें असित-देवल मुनि जैगीषव्य के आश्रम पहुँचे। उनके मन में ब्रह्मपद प्राप्ति हेतु उपायों को जानने की जिज्ञासा थी। मुनि जैगीषव्य ने उनका अतिथि के समान सत्कार किया और बोले - ‘‘बताइये मुनिवर, आपके मेरे आश्रम में आने का क्या प्रयोजन है? मैं आपकी किस प्रकार सेवा कर सकता हूँ।’’
इस पर असित-देवल ने मुनि को प्रणाम कर कहा - ‘‘मुनिश्रेष्ठ, आप धर्मज्ञानी हैं। आप मुझे बतायें कि एक धर्मज्ञानी की क्या गति होती है।’’
मुनि जैगीषव्य ने कहा - ‘‘धर्मज्ञानी को कभी कोई दुःख नहीं होता। वे इसका अनुभव नहीं करते। वे धर्म के अनुसार अपना जीवन चलाते हैं तथा हमेशा ही सुखी रहते हैं। वास्तव में वे ही जीवन को जीते हैं, शेष तो मात्र जीवन काटते हैं।’’
असित-देवल ने कहा - ‘‘मुनिवर, मैंने सुना है कि यदि कोई आपको प्रणाम करे, तो आपको अधिक प्रसन्नता नहीं होती तथा कोई आपकी निंदा करे, तो भी आप क्रोध नहीं करते। इसका क्या रहस्य है? यह कैसे संभव है?’’
मुनि जैगीषव्य ने कहा - ‘‘मुनिवर, इसे समत्वबृद्धि कहते हैं। महात्मा पुरुष वे होते हैं, जिसकी कोई निंदा करे अथवा प्रशंसा के गीत गाये, चाहे उसके सदाचार एवं पुण्यकर्मों पर परदा डाले, वे सबके प्रति एक समान ही बुद्धि रखते हैं। यही समत्वबुद्धि है। मेरा जीवन इसी के अधीन है, अतः मेरी ऐसी वृत्ति है।’’
असित-देवल ने पूछा - ‘‘किन्तु मुनिवर, निन्दा होने पर अपमान की अनुभूति होती है। एक मानव इसे सहन नहीं कर सकता। इस पर किस प्रकार विजयश्री पायी जा सकती है?’’
मुनि जैगीषव्य ने कहा - ‘‘मुनिवर, एक तत्त्ववेत्ता अपमान को अमृत के समान समझ कर उससे संतुष्ट होते हैं तथा सम्मान को विषतुल्य समझ कर उससे डरते हैं। एक निर्दोष आत्मा को अपमान से कोई चिन्ता नहीं होती। वह इस बात को समझता है कि अपमान करने वाला स्वयं ही अपने अपराध से मारा जाता है। उसकी चिन्ता करने की उसे कोई आवश्यकता नहीं होती। अपमान अथवा सम्मान मात्र भ्रम है। समझने की सबसे बड़ी बात यह है कि निन्दा से न कोई हानि होती है और प्रशंसा से न कोई लाभ। तब इनके बारे में सोचना ही अनुचित जान पड़ता है। इसी कारण धर्मज्ञानी मनुष्य इनसे कभी भी किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं होते।’’
असित-देवल ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर। आपका हार्दिक आभार अनुपम ज्ञान की बातें बताने के लिये। कृपया इस प्रकार की बुद्धि के बारे में मुझे विस्तार से बताने की कृपा करें।’’
जैगीषव्य ने कहा - ‘‘बुराई को कभी बुराई न मानना। उसे भूल जाना। भविष्य की चिन्ता न करना और वर्तमान में जीना। जो बीत चुका है, उसके लिये शोक न करना। किसी भी बात के लिये प्रतिज्ञा न करना। क्रोध को जीतना एवं जितेन्द्रिय बनना। मन, वाणी एवं शरीर से अपराध न करना। मन में ईर्ष्या न रखना। सर्वथा शान्त एवं सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न रहना। हृदय की अज्ञानमयी गाँठ को खोलकर चारों ओर आनन्द से विचरण करना। न किसी को शत्रु मानना और न ही किसी का शत्रु बनना। ये सभी व्यवहार इस बुद्धि के होते हैं। यह बुद्धि समत्व का ज्ञान देती है और किसी भी मनुष्य के लिये सभी प्रकार के सुख का कारण बनती है।’’
असित-देवल ने कहा - ‘‘इस प्रकार की बुद्धि का फल क्या होता है? इसे विस्तार से बताने की कृपा करें, मुनिश्रेष्ठ।’’
जैगीषव्य ने कहा - ‘‘पुण्यकर्म करने वाले मनुष्यों को इस बुद्धि से परम गति की एवं शान्ति की प्राप्ति होती है। यह बुद्धि उन्हें धर्म पालन में संलग्न करती है। वे समस्त प्रकार के इस व्रत के आचरण के कारण सुखी होते हैं। इन्द्रियों को अपने वश में करके अविनाशी ब्रह्मपद को प्राप्त करते हैं। इससे उत्तम गति और क्या हो सकती है। यह देवता, गन्धर्व, पिशाच एवं राक्षस के लिये अति दुर्लभ होती है। अतः शास्त्रों के अनुसार यही सर्वथा उपयुक्त बुद्धि बतायी गयी है। धर्म मार्ग का अवलम्बन करने के कारण इन्हें सदा ही शान्ति का अनुभव होता है।’’
विश्वजीत 'सपन'
Sunday, July 21, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 84)
महाभारत की कथा की 109 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
चराचर प्राणियों की अनित्यता
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दैत्यराज प्रह्लाद देवासुर संग्राम के बाद पराजित होकर एक स्थल पर निर्विकार बैठे हुए थे। उनकी किसी विषय में आसक्ति न थी। वे सत्त्वगुण में स्थित रहते थे। ऐसी परिस्थिति में भी उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र को उनकी बुद्धि को जानने की प्रबल इच्छा हुई। वे उनके पास जाकर बोले - ‘‘तुम्हारे मत में कल्याण का सर्वश्रेष्ठ साधन क्या है?’’
दैत्यराज ने कहा - ‘‘देवराज, जो आत्मा को शुभ एवं अशुभ कर्मों का कर्ता मानता है, वह अज्ञानी है। यदि पुरुष कर्ता होता, तो वह अपने कल्याण के लिये जो कुछ भी करता, वह सब अवश्य सिद्ध हो जाता, किन्तु ऐसा नहीं होता। कार्यों को जानना, किन्तु उनको करने वाली प्रकृति को न जानना ही मोह का कारण होता है। इस बात को समझने वाले को मोह नहीं होता, तब उसका सर्वदा कल्याण होता है।’’
इन्द्र ने कहा - ‘‘तुम रस्सियों में बाँधे गये, राज्य से च्युत हुए, शत्रुओं के वश में पड़े तथा राज्यलक्ष्मी से भी हीन हुए। इस प्रकार की दुर्दशा होने पर भी तुम्हें शोक क्यों नहीं होता?’’
प्रह्लाद ने कहा - ‘‘मैं सम्पूर्ण भूतों की अनित्यता को जानता हूँ। कोई भी वस्तु सदा के लिये नहीं होती, उसको नष्ट होना ही होता है। मैं इन समस्त नाशवान् को समझता हूँ और इसी कारण मुझे इसके न रहने पर कोई शोक नहीं होता। मन एवं इन्द्रियों को अधीन करके तृष्णा एवं कामनाओं का त्याग करके सदा अविनाशी आत्मा पर दृष्टि रखता है, उसे कभी कोई कष्ट नहीं होता। फिर शोक करने से शरीर को कष्ट होता है तथा शत्रु प्रसन्न होते हैं, तो शोक क्यों किया जाये? शोक करने से दुःख दूर नहीं होता।’’
इन्द्र ने समझ लिया कि प्रह्लाद आत्मतत्त्व का ज्ञानी है। इसके बाद भी उन्होंने पूछा - ‘‘तुम्हारी बात उचित है, किन्तु अपने ऊपर संकट देखकर भी तुम निश्चिन्त कैसे हो? तुम्हारी यह स्थिति आत्मज्ञान के कारण है या धैर्य के?’’
दैत्यराज ने कहा - ‘‘मैं ममता, अहंकार तथा कामनाओं का त्याग कर बंधनरहित हो चुका हूँ। मैं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति एवं उनके विनाश को समझता हूँ। वैसे भी संकट पड़ने पर जो धैर्य नहीं खोता है, वही श्रेष्ठ मनुष्य समझा जाता है। जो होना है, वह होकर ही रहेगा। अपने ऊपर जो अवस्था आ पड़ी है, वही होनहार थी, इस तरह का भाव रखकर जो उस परिस्थिति को स्वीकार करता है, उसे कभी मोह नहीं होता। न तो मेरे मन में राग है और न ही द्वेष। न तो मैं किसी को आत्मीय समझता हूँ और न ही द्वेषी। फिर मुझे किस संकट से भय होगा? मुझे किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है। मेरी दृष्टि मात्र अविनाशी आत्मा पर है। इस कारण मुझे जीवन सरल एवं शान्तिमय प्रतीत होता है।’’
इन्द्र ने कहा - ‘‘जिस उपाय से ऐसी शान्ति मिलती है और इस प्रकार की बुद्धि प्राप्त होती है, उसे विस्तार से बताओ।’’
प्रह्लाद ने कहा - ‘‘सरलता, निर्मलता, चित्त की स्थिरता एवं बड़े -बूढ़ों की सेवा करने से ज्ञान को समझने वाली बुद्धि की प्राप्ति होती है। इन गुणों को अपनाने से स्वभाव से ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। स्वभाव से ही शान्ति मिलती है। आप जो कुछ भी देख रहे हैं, वह सब स्वभाव से ही प्राप्त होते हैं।’’
इस प्रकार के उत्तर पाकर इन्द्र को विस्मय हुआ। दैत्यराज होते हुए भी प्रह्लाद निंदा एवं स्तुति को समान समझते थे, मन एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते थे तथा एकान्त निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियों की उत्पत्ति एवं नाश का ज्ञान था। वे अप्रिय हो जाने पर भी कभी क्रोध नहीं करते थे तथा प्रिय होने पर हर्ष नहीं मनाते थे। वे आत्मा का कल्याण करने वाले ज्ञानयोग में स्थित एवं धीर थे। इतना समझने के बाद इन्द्र को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने प्रह्लाद के वचनों की प्रशंसा की तथा उनका पूजन भी किया। उसके उपरान्त वे अपने धाम को लौट गये।
इस संसार में जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म होता है, उसका कर्ता पुरुष नहीं बल्कि करने वाली प्रकृति है। सब तरह के भाव एवं अभाव स्वभाव से ही आते रहते हैं, उनके लिये पुरुष का कोई प्रयत्न नहीं होता तथा प्रयत्न के अभाव में पुरुष उसका कर्ता नहीं हो सकता। जब किसी पुरुष को उसके कर्तापन का अभिमान हो जाता है, तब वह मोह में बँध जाता है।
विश्वजीत 'सपन'
Sunday, July 14, 2019
महाभारत की लोककथा (भाग - 83)
महाभारत की कथा की 108 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
देवी लक्ष्मी का माहात्म्य
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प्राचीन काल की बात है। एक दिन महर्षि नारद गंगा जी में स्नान करने के लिये उनके तट पर गये। उसी समय वज्रधारी इन्द्र भी उसी तट पर पहुँचे। दोनों ने ही एक साथ जल में गोते लगाये और गायत्री मंत्र का जाप किया। उसके उपरान्त वे वहीं रेत पर बैठकर वार्तालाप करने लगे। जब वे वार्तालाप कर ही रहे थे कि सूर्य भगवान् का उदय हुआ। तत्काल ही दोनों ने सूर्य पूजा की।
ठीक उसी समय आकाश से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जो निरन्तर उनके समीप ही आ रही थी। वह एक अनुपम दृश्य था। समस्त जगत् उस प्रकाश-पुंज से आलोकित हो रहा था। निकट आते ही उन्होंने देखा कि वह भगवान् विष्णु का विमान था और उस पर साक्षात् लक्ष्मी माता विराजमान थीं। जब वे उनके समीप आईं, तब दोनों ने उनको प्रमाण किया और इन्द्र बोले - ‘‘माता आज आपके दर्शन से चित्त प्रसन्न हो गया। इस प्रकार आपके आने का कोई न कोई भेद अवश्य है। कृपाकर हमें बतायें कि आपके आने का क्या प्रयोजन है?’’
लक्ष्मी देवी ने कहा - ‘‘इन्द्र, आप तो जानते ही हैं कि मैं सदा धर्मशील पुरुषों के देश में, नगर में एवं आवास पर निवास करती हूँ। वीरता से संघर्ष करने वाले राजाओं के शरीर में सदा उपस्थित रहती हूँ। मैं पहले सत्य और धर्म में बँधकर असुरों के पास रहती थी, किन्तु अब उन्हें धर्म के विपरीत देखकर आपके पास रहने के विचार से आई हूँ।’’
इन्द्र ने कहा - ‘‘देवि, आपका हार्दिक स्वागत है, किन्तु दैत्यों का पहले क्या आचरण था कि आप उनके पास रहती थीं।’’
लक्ष्मी ने कहा - ‘‘पहले दैत्यलोग दान, अध्ययन एवं यज्ञ में संलग्न रहते थे। देवता, पितर, गुरु एवं अतिथियों की पूजा करते थे। उनमें सदा सत्य बोलने की प्रवृत्ति थी। वे घर-द्वार स्वच्छ रखते थे। उनमें श्रद्धा थी एवं क्रोध न था। सबका स्वभाव अच्छा था, सभी दयालु थे, सबमें सरलता एवं भक्तिभाव था। उपवास एवं तप में लगे रहते थे। ब्राह्मणों की पूजा किया करते थे। सदा ही धर्म का आचरण करते थे और इसी कारण मैं सदियों से उनके पास रहती आयी हूँ।’’
इन्द्र ने पूछा - ‘‘देवि, फिर अब ऐसा क्या हो गया कि उन्हें छोड़कर हम देवताओं के पास रहने आयी हैं?’’
लक्ष्मी ने कहा - ‘‘समय के उलट-फेर से उनके गुणों में विपरीतता आयी है। अब उनमें धर्म नहीं रह गया है। गुरुओं का आदर समाप्त हो गया है। बड़े-बूढ़ों का सम्मान समाप्त हो गया है। संतानों के लालन-पालन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। संतान पिता के रहते ही मालिक बन बैठता है। स्वच्छता से उन्हें कोई मतलब नहीं रह गया है। उनके रसोइये भी अपवित्र रहने लगे हैं। स्त्रियों एवं बूढ़ों को अपमानित किया जाता है। यज्ञ, तपादि से उनका कोई नाता नहीं रह गया है। चारों ओर भय का वातावरण बन गया है। पूर्व में दानवों के उत्थान में मैं सहायक थी, किन्तु अब मैं नहीं रही, तो अवश्य ही उनका पतन प्रारंभ हो गया है। मेरे रहते ही उत्थान संभव है। मैं यदि नहीं रही तो पतन होना अवश्यम्भावी है। इसी कारण मैंने निश्चय किया है कि मैं अब आपके पास ही निवास करूँगी। मेरे साथ आठ देवियाँ भी निवास करती हैं - आशा, श्रद्धा, धृति, क्षान्ति, विजिति, संनति, क्षमा तथा जया। अब से इन देवियों का निवास भी आपके पास ही होगा। आप हमें स्वीकार कीजिये।’’
इन्द्र ने उन सभी देवियों को प्रणाम कर कहा - ‘‘हम धन्य हो गये माते, आपका हमारे यहाँ हार्दिक स्वागत है।’’
इन्द्र एवं नारद के ऐसा अभिनन्दन करने के साथ ही शीतल, सुगन्धित एवं सुखद वायु चलने लगी। उनके दर्शन करने के लिये सभी देवी-देवता उपस्थित हो गये। नारद जी ने लक्ष्मी जी के शुभागमन की प्रशंसा की। ब्रह्मा जी के लोक से अमृत वर्षा होने लगी। देवताओं की दुन्दुभि बिना बजाये ही बज उठी। समस्त दिशायें निर्मल एवं श्रीसम्पन्न दिखाई देने लगीं।
लक्ष्मी जी के इस प्रकार आने से संसार में समय पर वर्षा होने लगी। पृथ्वी पर रत्नों की खानें प्रकट हो गयीं। मनुष्य, किन्नर, यक्ष, देवताओं आदि की समृद्धि बढ़ गयी। वे सभी सुख से रहने लगे। गौएँ दूध देने के साथ ही सभी की मनोकामनायें पूर्ण करने लगीं। किसी के मुख से कठोर वाणी नहीं निकलती थी।
कहते हैं कि जो लोग लक्ष्मी देवी की आराधना से सम्बन्ध रखने वाले इस कथा का अध्ययन एवं वाचन ब्राह्मणों की मंडली में करते हैं, यदि वे धन के इच्छुक हों, तो उन्हें प्रचुर मात्रा में धन की प्राप्ति होती है। वे जीवन भर सुखी रहते हैं तथा उन्हें कभी भी दुःख का अनुभव नहीं होता।
विश्वजीत 'सपन'
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