Friday, December 14, 2012

One Ghazal on youtube.

Dear Friends Have a Nice Time with this Ghazal of Mine on Youtube. The link is below and Please do let me know your feelings about it.

प्रिय मित्रों, मेरी इस ग़ज़ल का आनंद उठायें और हमें अनुगृहीत करें. नीचे दिए लिंक को दबाएँ और अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराएं ..

http://youtu.be/BWX6Xy5EXd0

Tuesday, June 12, 2012

कुरुवंश की स्थापना (कथा 4)


गंधर्वराज चित्ररथ महापराक्रमी अर्जुन से पराजित हो गए। तब उन्होंने अर्जुन को तपतीनंदन कहकर संबोधित किया। अर्जुन ने उनसे पूछा कि वे तो कुन्ती के पुत्र हैं, फिर तपतीनंदन कैसे हुए। इस पर गंधर्वराज ने सूर्यपुत्री तपती की कथा सुनाई।


महाभारत, आदिपर्व

 

महाभारत में कुरुवंश का बहुत नाम है। अर्जुन के पूछने पर गंधर्वराज ने कुरुवंश की उत्पत्ति की कथा कुछ इस प्रकार सुनाई।



सूर्य भगवान् की पुत्री का नाम तपती था। वह सावित्री की छोटी बहन थी। अपने पिता के समान तेज वाली और बहुत ही सुन्दर थी। उसकी इतनी सुन्दर थी कि उसकी सुंदरता से पाताल, पृथ्वी और स्वर्ग तीनों ही लोकों की स्त्रियाँ जलती थीं। वह मात्र सुन्दर ही नहीं थी, बल्कि नित्य-नियम से पूजा-पाठ भी करती थी। वस्तुत: अपनी तपस्या के कारण ही वह तीनों लोकों में ‘तपती’ के नाम से प्रसिद्ध थी। जब वह शादी करने के योग्य हुई तो उसके पिता सूर्य को इसकी चिंता सताने लगी। वे उसके लिए कोई योग्य वर की तलाश में थे। पुत्री के गुण एवं सुन्दरता के अनुकूल योग्य वर ढूँढना ही पिता की सबसे बड़ी चिंता होती है।

दैवयोग से उस समय पूरी धरती पर पुरुवंश का राज्य था और उसी समय इसी वंश के बड़े ही प्रतापी राजा संवरण का नाम समस्त धरा पर जगमगा रहा था। सौभाग्य से वे सूर्य के सच्चे भक्त थे। प्रतिदिन सूर्यदेव की वंदना बड़ी ही भक्ति-भाव से किया करते थे। सूर्यदेव भी उसकी पूजा से प्रसन्न थे। वे संवरण को अपनी बेटी के लिए योग्य वर भी मानते थे।
 
एक दिन की बात है। संवरण शिकार खेलने वन में निकले। उस दिन कोई अच्छा शिकार नहीं मिल पा रहा था। इसलिए वे आगे बढ़ते गए और पहाड़ की तराइयों में जा पहुँचे। उनकी पूरी सेना पीछे छूट गई। फिर भी वे आगे बढ़ते ही रहे। भूख और प्यास से तड़पकर उनका घोड़ा मर गया। तब वे पैदल ही चलने लगे। काफी देर चलते-चलते थक गए। एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे। चारों तरफ बड़े-बड़े विशालकाय पेड़ थे। पहाड़ियों से घिरा वह निर्जन प्रदेश भयावह लग रहा था। तभी उनकी दृष्टि अद्वितीय सुन्दरी तपती पर पड़ी। उस सुनसान जंगल में इतनी रूपमती कन्या को देखकर उन्हें आश्चर्य हुआ। इस वीराने में यह कौन हो सकती है? उन्होंने जानना चाहा और वे चुपके से उसके पास चले गए तो उसकी सुन्दरता को देखकर हैरान रह गए। अपनी थकान भी भूल गए। कुछ देर निहारने के बाद उन्होंने आवाज़ देकर कहा - ‘हे सुन्दरि ! तुम कौन हो? तुम्हारा नाम क्या है और तुम इस निर्जन वन में क्या कर रही हो?’

तपती राजा की आवाज़ सुनकर चौंकी। उसे वहाँ किसी के होने का अंदेशा नहीं था। उसने मुड़कर संवरण को देखा। कामदेव की तरह सुन्दर संवरण थके-थके से जान पड़ रहे थे। क्षण भर के लिए वह स्तब्ध रह गई और उन्हें देखती ही रह गई। फिर अचानक ही बिना कुछ बोले उड़कर बादलों में गुम हो गई।

पहली बार देखते ही वह संवरण के मन को भा गई थी। उसके इस तरह अचानक गुम हो जाने से राजा को बहुत दु:ख पहुँचा। वे उसे ढूँढने लगे। इधर-उधर हर तरफ उसे पुकारने लगे। किन्तु वह नहीं मिली। कुछ देर बाद निराशा, थकान और भूख-प्यास के कारण वे बहोश होकर गिर पड़े।

तपती बादलों की ओट से उन्हें ही देख रही थी। उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि कोई यहाँ तक कैसे पहुँच सकता था। उसने मन ही मन विचार किया कि अवश्य ही दैवयोग के कारण ऐसा हुआ होगा। वह भी राजा को पसंद करने लगी थी, किन्तु वह नहीं जानती थी कि वे कौन थे, और इसी कारण से छुप गई थी। फिर जब उसने राजा को बेहोश होते देखा तो उसके पास आकर बोली - ‘उठिये राजन् उठिये। जंगल में इस प्रकार अकेले रहना ठीक नहीं।’

उसकी मीठी वाणी ने जैसे औषधि का काम किया और राजा उठ गए। उन्होंने फिर पूछा - ‘हे सुन्दरि ! तुम कौन हो और इस जंगल में क्या कर रही हो?’

तपती ने कहा - ‘मैं तपती हूँ। मेरे पिता सूर्यदेव हैं। मैं यहाँ अक्सर घूमने आती हूँ। लेकिन आप यहाँ कैसे?’

संवरण ने अपने शिकार वाली सारी बातें बता कर कहा - ‘सुन्दरि ! तुम्हें देखने के बाद मेरी थकान दूर हो गई है। अब मैं कोसों चल सकता हूँ। क्या तुम मेरा साथ दोगी?’

‘मैं आपका मतलब नहीं समझी !’ तपती ने पूछा।

‘मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। तुम इंकार मत करना।’ राजा ने स्पष्ट किया।

तपती बोली - ‘राजन् ! मेरे पिता जीवित हैं। इसलिए यह निर्णय लेने के लिए मैं स्वतंत्र नहीं हूँ। यदि आप सचमुच ही मुझसे प्रेम करते हैं तो आप मेरे पिता से कहिए। वे ही इस सम्बन्ध में निर्णय लेने के अधिकारी हैं।’
यह कहकर तपती उड़कर आकाशमार्ग से बादलों में जाकर गुम गई।

राजा संवरण बहुत दु:खी हुए। लेकिन वे अपनी कामना पर अटल रहे। इस बीच उन्हें ढूँढते हुए उनकी सेना भी वहीं आ पहुँची। लेकिन राजा संवरण ने जाने से इंकार कर दिया। वे अब किसी भी कीमत पर तपती से विवाह करने को उत्सुक थे। इसलिए उसी स्थान पर खड़े होकर सूर्यदेव की पूजा करने लगे और मन ही मन उन्होंने अपने पुरोहित महर्षि वशिष्ठ का ध्यान किया। इस प्रकार तपस्या करते हुए बारह दिन बीत गए। बारहवें दिन उनकी इस कठिन तपस्या से प्रसन्न होकर वशिष्ठ उनके पास आए। राजा संवरण को उस अवस्था में देखकर क्षण भर में उनके मन का हाल जान गए। फिर भी राजा ने अपने मन की बात कही तो बोले - ‘चिंता न करो पुत्र। मैं अभी जाकर सूर्यदेव से इस बारे में बात करता हूँ।’

यह कहकर वशिष्ठ सूर्य भगवान् से मिलने गए। सूर्यदेव ने महर्षि का स्वागत किया और आने का कारण पूछा तब उन्होंने सूर्यदेव को अपना परिचय देकर संवरण के मन का हाल और उनकी इच्छा के बारे में बताया। सूर्यदेव को लगा जैसे उन्होंने उनके मुँह की बात छीन ली थी। वे तो पहले से ही संवरण को तपती के लिए योग्य वर मान चुके थे। उन्होंने तुरन्त यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

वशिष्ठ उसी समय तपती को लेकर संवरण के पास आ गए। बड़ी धूमधाम के साथ उनका विवाह हुआ। कुछ वर्षों के बाद उनके एक पुत्र हुआ। उसका नाम था कुरु। इसी राजा कुरु के नाम से ही प्रसिद्ध कुरुवंश की स्थापना हुई।

विश्वजीत 'सपन'

Thursday, April 26, 2012

राजकुमारी अम्बा की प्रतिज्ञा

(महाभारत की कहानियाँ - कथा तीन)

महाभारत युद्ध के समय भीष्म अजेय थे। वे सबों को रोकने में समर्थ भी थे। किन्तु शिखण्डी के सामने आने पर उन्होंने कहा कि वे उस पर शस्त्र नहीं उठायेंगे। यह सुनकर दुर्योधन ने उनसे इसका कारण पूछा। तब भीष्म ने राजकुमारी अम्बा की कथा कुछ इस प्रकार सुनाई।
महाभारत, उद्योगपर्व

महाभारत के युग में काशी राज्य का बहुत नाम था। वह राज्य सुखी और संपन्न था। काशीनरेश की तीन बेटियाँ थीं - अम्बा, अम्बिका और अम्बालिका। सुन्दरता और गुण में तीनों ही एक से बढ़कर एक थीं। काशीनरेश को उनकी शादी की चिंता थी। उस समय राजवंशों में स्वयंवर की प्रथा थी। सभी राजा इसमें भाग लेते थे और राजकुमारी किसी एक को माला पहनाकर उससे शादी करती थी। एक दिन विचार करके काशीनरेश ने भी अपनी तीनों बेटियों के लिए स्वयंवर की घोषणा कर दी।

 स्वयंवर वाले दिन देश-विदेश के राजा अपने मंत्रियों के साथ सज-धजकर भाग लेने आए। राजा शांतनु के पुत्र भीष्म भी वहाँ आए। उस समय तक भीष्म बूढ़े हो चले थे। लोगों ने समझा कि वे अपनी शादी के लिए स्वयंवर में आए थे और उनका मजाक उड़ाने लगे। किन्तु यह सच नहीं था। वास्तव में वे अपने सौतेले भाई विचित्रवीर्य के लिए पत्नी की तलाश करने आए थे। स्वयंवर में आए राजाओं के इस प्रकार के व्यवहार से भीष्म को गुस्सा आ गया और उन्होंने तीनों राजकुमारियों का हरण कर लिया। स्वयंवर में आए उन सभी राजाओं ने मिलकर उन्हें रोकने की कोशिश की, लेकिन वे उन सबों को हराकर उन तीन राजकुमारियों के साथ हस्तिनापुर चले आए। उस समय राजपूतों में हरण करके शादी करने की भी प्रथा थी।

 
जब इन तीनों राजकुमारियों के विवाह की तैयारियाँ हो रही थीं तो राजकुमारी अम्बा इससे प्रसन्न नहीं थी। भीष्म के पूछने पर उसने कहा कि वह राजा शल्य से प्यार करती है। इसलिए विचित्रवीर्य से विवाह नहीं कर सकती। तब भीष्म ने इस पर विचारकर उसे राजा शल्य के पास जाने की अनुमति दे दी। उसके बाद राजकुमारी अम्बा राजा शल्य के पास चली गई।

उधर राजा शल्य को अम्बा के हरण का समाचार मिल चुका था। इसलिए शल्य ने उससे विवाह  करने से इंकार कर दिया। अम्बा ने जब इसका कारण पूछा तो राजा शल्य ने उससे कहा कि जिसने उसका हरण किया है वह उसी से विवाह करे। स्पष्ट था कि राजा शल्य को या तो अम्बा पर विश्वास नहीं रहा था अथवा वे पहले से हरण की गई राजकुमारी के साथ विवाह नहीं करना चाहते थे।

अम्बा ने राजा को सबकुछ बताया। अपनी सारी व्यथा-कथा बताई। बहुत मनाया, लेकिन राजा शल्य का दिल नहीं पसीजा। अम्बा इस स्थिति में पहुँचकर अत्यंत दुखी हुई। उसने अपना घर-बार त्याग दिया और वाह तपस्वियों के आश्रम में रहने लगी। वह दिन-रात अपने भाग्य को कोसती हुई  आश्रम में अपना जीवन बिताने लगी, परन्तु उसके दिल में भीष्म के प्रति क्रोध कम नहीं हुआ। वह अपनी इस दशा के लिए उन्हें ही उत्तरदायी मानती थी।

Monday, March 19, 2012

महाभारत की कथाएँ (२)


देवयानी का हठ


(वैशम्पायन जी ने जनमेजय को देवताओं और असुरों के मध्य युद्धों एवं कच के संजीवनी विद्या सीखने के बारे में बताया। इसी कथा के मध्य उन्होंने देवयानी और शर्मिष्ठा के कलह की कथा भी सुनाई।) महाभारत, आदिपर्व

बहुत दिनों पहले की बात है। उन दिनों देवताओं और असुरों के बीच युद्ध हुआ करते थे। एक बार उनके बीच बहुत ही भयानक युद्ध हुआ। उस युद्ध में देवताओं ने असुरों को बुरी तरह पराजित कर दिया। सारे असुर मारे गए। तब असुरों के गुरु शुक्राचार्य ने अपनी संजीवनी विद्या से सभी असुरों को जीवित कर दिया। उस समय असुरों के रजा वृषपर्वा हुआ करते थे। गुरु शुक्राचार्य राजा वृषपर्वा के राज्य में ही रहने लगे। राजा उनका बहुत सम्मान करते थे।

शुक्राचार्य की एक बेटी थी। उसका नाम देवयानी था। असुरराज वृषपर्वा की भी एक बेटी थी। जिसका नाम शर्मिष्ठा था। उन दोनों की उम्र एक जैसी थी। उनके स्वभाव भी एक जैसे थे। दोनों ही उग्र थीं। और परस्पर एक दूसरे से ईर्ष्या करती थीं। उन्हें हमेशा ऐसा प्रतीत होता था कि वे दूसरे की तुलना में अधिक श्रेष्ठ हैं। इसलिए उनके बीच में मनमुटाव भी आम बात थी।

एक दिन की बात है। देवयानी और शर्मिष्ठा अपनी सखियों के साथ किसी घने वन के एक तालाब में नहाने गए। उसी समय स्वर्ग के राजा इन्द्र उस वन से गुजर रहे थे। उन्होंने इन स्त्रियों को नहाते देखा तो उन्हें शरारत सूझी। अपनी माया से हवा बनकर इन्द्र ने उनके कपड़ों को आपस में मिला दिया। वे स्त्रियाँ जब तालाब से बाहर निकलीं, तो उन्हें पता नहीं चला कि किसके कपड़े कौन-से हैं। भूल से शर्मिष्ठा ने देवयानी के कपड़े पहन लिए। जब देवयानी ने यह देखा तो वह गुस्से से आगबबूला हो गई।

अरे असुर की पुत्री, तुमने मेरे कपड़े कैसे पहन लिए? क्या तुम मेरी बराबरी करना चाहती हो?’ देवयानी ने जोर से कहा ताकि सभी सुन लें। दोनों अक्सर एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयत्न में लगी रहती थीं।

वाह री अकड़वाली, तेरे पिता तो प्रजा की तरह मेरे पिता की स्तुति करते हैं और तेरा इतना घमंड !शर्मिष्ठा भी कम नहीं थी।

देख अभी इसी समय मेरे कपड़े उतारकर दे दे। वरना बहुत बुरा होगा।देवयानी उसकी ओर झपटती हुई बोली।

अरे जा बहुत देखी तेरी जैसी। मैं राजकुमारी हूँ। तुझे किसी ने बताया नहीं कि राजा से बड़ा कोई नहीं होता। और सुन अगर मैंने तेरे कपड़े पहन ही लिए तो कोई अनर्थ नहीं हो गया। अगर तूने मेरे कपड़े को छुआ तो देखना।शर्मिष्ठा पैर पटकती हुई बोली।


शर्मिष्ठा का इतना कहना था कि देवयानी गुस्से से तिलमिला उठी। वह शर्मिष्ठा के कपड़े पकड़कर खींचने लगी। और दोनों में हाथापाई हो गई। तब मौका मिलते ही शर्मिष्ठा ने देवयानी को जोर से धक्का दे दिया। बगल में ही एक कुआँ था। देवयानी संभलते-संभलते भी उस कुएँ में जा गिरी। यह देख सारी लड़कियाँ भाग गईं। शर्मिष्ठा भी देवयानी को मरी समझकर वहाँ से भाग गई।

उस कुएँ में पानी नहीं था। इसलिए देवयानी को चोट तो आई, लेकिन उसकी जान बच गई। वह बहुत देर तक उसी कुएँ में बैठी रोती रही। उसी समय उसने निश्चय किया कि वह शर्मिष्ठा से इसका बदला अवश्य लेगी।  

सौभाग्य से उसी समय राजा ययाति शिकार खेलते-खेलते वन में पहुँचे। थकान और प्यास के मारे घोड़े से उतरकर कुएँ के पास गए। कुएँ में झाँका तो उसमें पानी नहीं था, लेकिन एक सुन्दर स्त्री रोती हुई बैठी थी।

राजा ने पूछा - सुन्दरी ! तुम कौन हो? इस कुएँ में क्या रही हो?’

देवयानी ने विनती के स्वर में कहा - मैं महर्षि शुक्राचार्य की पुत्री हूँ। पैर फिसल जाने से कुएँ में गिर गई। मुझे बाहर निकाल दीजिए। आपका बड़ा उपकार होगा।

ययाति ने उसे कुएँ से बाहर निकाल दिया। देवयानी को कुछ खास चोट नहीं थी। थोड़ी देर बातें कर ययाति शिकार पर निकल गए। देवयानी राजा की सुन्दरता पर मोहित हो गई। लेकिन कुछ बोल न सकी। उसने मन ही मन किसी उपयुक्त समय में बात करने का फैसला किया और घर की ओर चल पड़ी। उसका गुस्सा शांत नहीं हुआ था। घर पहुँचते ही पिता से बोली -पिताजी, मैं अब इस नगर में नहीं रह सकती।

क्यों क्या बात हो गई? मेरी बेटी इतने गुस्से में क्यों है?’ शुक्राचार्य ने देवयानी के सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए कहा।

शुक्राचार्य देवयानी से बहुत प्यार करते थे। उसकी हर बात मानते थे। इस प्रकार प्यार से पूछने पर देवयानी ने उन्हें पूरी घटना बता दी। शुक्राचार्य को लगा कि पूर्वजन्म के किसी कर्म के कारण ही उसकी पुत्री को दुख झेलना पड़ा होगा। अत: उसे तरह-तरह से समझाने लगे। लेकिन देवयानी कुछ भी सुनने को तैयार नहीं थी।

मैं यह सब कुछ नहीं जानती। मुझे उस नगर में नहीं रहना है, जहाँ मेरा और मेरे पिता का अपमान होता हो। अगर आप चलने के लिए राजी नहीं हुए तो मैं अभी इसी समय से खाना-पीना छोड़ दूँगी।देवयानी यह कहकर पैर पटकती हुई घर के अंदर चली गई।

शुक्राचार्य के पास उसकी बात मानने के अलावा और कोई चारा न था। दूसरे ही दिन वे वृषपर्वा की सभा में गए और गुस्से से बोले -राजन् ! ये आपके राज्य कैसा अधर्म हो रहा है?

वृषपर्वा चौंककर बोले – ‘ये आप कैसी बातें कर रहे हैं, मुनिवर? क्या हुआ जिसने आपको इतना क्रोधित कर दिया है?’

शुक्राचार्य ने सारी बातें बताकर कहा – -राजन्, अधर्म के साथ अधिक दिनों तक नहीं रहा जा सकता। पहले तुम लोगों ने बृहस्पति के पुत्र और मेरे शिष्य कच की हत्या का प्रयास किया। अब तुमलोगों ने मेरी ही पुत्री की हत्या का प्रयास किया। अब मैं यहाँ नहीं रह सकता। इसलिए तुम्हें छोड़कर जा रहा हूँ।

असुरराज वृषपर्वा यह सुनकर काँप गए। उनके न रहने पर युद्ध में असुरों की हार निश्चित थी। वे क्षमा माँगते हुए गुरु शुक्राचार्य से रुकने का निवेदन करने लगे। लेकिन शुक्राचार्य नहीं माने। उन्होंने कहा कि जहाँ उनकी बेटी का तिरस्कार हो वहाँ उनका रहना संभव नहीं है।

वृषपर्वा पूरी तरह से निराश हो गए। अंतिम आस लेकर देवयानी के पास गए।

बेटी, तुम जो भी चाहो माँग लो लेकिन यहीं रहो।राजा वृषपर्वा ने अपनी झोली फैलाकर देवयानी से भीख माँगी।

देवयानी इसी अवसर की तलाश में थी। उसने पहले से ही योजना बना राखी थी। वह बोली -राजन् ! शर्मिष्ठा एक सहस्र दासियों के साथ मेरी सेवा करे। मैं जहाँ जाऊँ, वह मेरे पीछे-पीछे चले तो मैं और मेरे पिता आपके राज्य में रुक सकते हैं।

वृषपर्वा खुशी-खुशी तैयार हो गया और उस दिन से शर्मिष्ठा देवयानी की दासी बनकर रहने लगी। देवयानी के मन को बहुत संतोष पहुँचा।

एक दिन देवयानी अपनी दासियों और शर्मिष्ठा के साथ वन में खेलने के लिए गई। राजा ययाति भी उसी वन में घूम रहे थे। इन्हें देखकर परिचय जानने के लिए इनके पास आ गए। देवयानी राजा को देखकर बहुत खुश हुई। वह ऐसे ही किसी अवसर की तलाश में थी, जब राजा से अपनी शादी की बात कर सके। उसने कहा - राजन्, याद है आपको एक दिन आपने मेरी जान बचाई थी, जब मैं कुएँ में गिर पड़ी थी। उसी दिन से मैंने आपको अपना पति चुन लिया था। कृपया मुझे स्वीकार कीजिए।

लेकिन मैं तुम्हारे योग्य नहीं हूँ। तुम एक ब्राह्मण कन्या हो और तुम्हारे पिता क्षत्रिय के साथ विवाह के लिए राजी नहीं होंगे।ययाति ने विनम्रता से कहा।

देवयानी फिर भी हठ करती रही, लेकिन जब राजा ययाति नहीं माने तो वह उन्हें लेकर अपने पिता के पास गई। शुक्राचार्य बेटी के हठ के सामने झुक गए और उन्होंने विवाह की अनुमति दे दी। बड़े धूमधाम से दोनों का विवाह संपन्न हुआ।

विवाह के बाद राजा ययाति देवयानी और शर्मिष्ठा के साथ अपने राज्य लौट गए। देवयानी अन्तःपुर में रही और शर्मिष्ठा के लिए सबसे बड़े बाग में एक घर बनवाया गया। दोनों ही सुख से रहने लगीं। कुछ समय बाद देवयानी के दो पुत्र हुए - यदु और तर्वसु। दोनों ही बालक राज निवास में पलने लगे।

इस बीच एक दिन राजा ययाति बाग में टहलने गए तो शर्मिष्ठा के रूप को देखकर मोहित गए। शर्मिष्ठा भी राजा से प्यार करती थी। उस दिन के बाद दोनों छुप-छुपकर मिलने लगे। कुछ समय बाद शर्मिष्ठा के भी तीन पुत्र हुए - द्रुह्यु, अनु और पुरु।

कई वर्षों के बाद एक दिन देवयानी और ययाति उसी बाग में टहलने निकले, जहाँ शर्मिष्ठा अपने बच्चों के साथ रहती थी। टहलते समय देवयानी ने उन बच्चों को देखा। उन अनजान बच्चों को बाग में देखकर वह हैरान रह गई। वे बहुत ही सुन्दर और बलवान् थे। उनका रंग-रूप राजा ययाति के जैसा था। यह जानने के लिए कि ये कौन हैं, देवयानी ने उन्हें अपने पास बुलाकर पूछा - तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?’

बच्चों ने इशारा कर कहा - हमारी माँ का नाम शर्मिष्ठा है।

देवयानी समझ गई कि वे राजा के ही पुत्र हैं। उसी क्षण उसने शर्मिष्ठा को बुरा-भला कहा और गुस्से से राजमहल पहुँची।

राजा को देखते ही वह बोली - आपने मुझे अपना प्रिय नहीं माना और मेरी दासी को पत्नी के रूप में स्वीकार किया। यह आपने अच्छा नहीं किया। यह मेरा घोर अपमान है, अत: अब मैं यहाँ नहीं रह सकती। मैं अपने पिता के पास जा रही हूँ।

यह कहकर देवयानी अपने पिता के पास चली आई। ययाति भी उसे मनाते हुए पहुँच गए। शुक्राचार्य ने जब यह सुना कि राजा ने देवयानी के साथ अन्याय किया है तो वे गुस्से से पागल हो गए। उन्होंने राजा को शाप दे दिया कि वह बूढ़ा हो जाए। उनके शाप देते ही राजा बूढ़े हो गये। इस घटना से राजा बहुत लज्जित हुए। उन्होंने गुरु शुक्राचार्य से क्षमा माँगी और शाप वापस लेने का आग्रह किया।

शुक्राचार्य ने कहा - मेरी बात झूठी नहीं हो सकती। लेकिन तुमने क्षमा माँगी है तो तुम्हें इतनी छूट देता हूँ कि तुम अपना बुढ़ापा किसी दूसरे को दे सकते हो।

राजा ने देवयानी से भी क्षमा माँगी और उसे लेकर राजमहल आ गए। दूसरे ही दिन उन्होंने अपने सभी पुत्रों को अलग-अलग बुलाकर कहा - तुम मेरे बेटे हो। अपने पिता की बात मानकर मेरा बुढ़ापा ले लो और अपना यौवन मुझे दे दो।

लेकिन उनके चार बेटों ने उनकी नहीं सुनी। केवल पुरु ही ऐसा था, जो अपने पिता की बात मानने के लिए राजी हुआ। राजा ने पुरु को अपना बुढ़ापा देकर उसका यौवन ले लिया।

समय बीतता गया। कई वर्षों तक राजा ययाति पुरु के दिए हुए यौवन से राज्य करते रहे और सुख भोगते रहे। एक दिन उन्होंने पुरु को बुलाकर उसे उसका यौवन लौटा दिया और उसे राजा बनाने की घोषणा कर दी। देवयानी के साथ सारी प्रजा हाहाकार कर उठी कि बड़े बेटे यदु के होते सबसे छोटे बेटे पुरु को राजा बनाना नियम के विरुद्ध था।

तब ययाति ने कहा - जो पुत्र अपने पिता की आज्ञा नहीं मानता वह पुत्र कहलाने योग्य नहीं है। पुत्र वही है, जो अपने माता-पिता की आज्ञा माने, उनका हित करे और उन्हें सुख दे। पुरु ने मेरी आज्ञा मानी और अपना यौवन तक मुझे दे दिया। इसलिए वही मेरा उचित उत्तराधिकारी है।

प्रजा ने राजा की बात समझकर उनकी बात मान ली। शर्मिष्ठा का सिर गर्व से ऊँचा हो गया।
विश्वजीत 'सपन'

Friday, February 17, 2012

शकुंतला का विरह

जनमेजय ने वैशम्पायन जी से देवताओं, दानवों आदि के जन्म की कथा सुनने के बाद कुरुवंश की उत्पत्ति की कथा सुनने की इच्छा प्रकट की। तब वैशम्पायन जी ने इसी क्रम में दुष्यंत एवं शकुन्तला की कथा सुनाई।
महाभारत, आदिपर्व


शकुंतला का विरह



यह उस समय की बात है, जब पुरुवंश के प्रतापी राजा दुष्यंत हस्तिनापुर पर राज किया करते थे। उस समय पशु-पक्षियों का शिकार करना एक मनोरंजन का साधन था। राजसी लोग अक्सर शिकार करने के लिए वनों में जाते रहते थे। 
     एक दिन की बात है। राजा दुष्यंत शिकार खेलने वन में गए। शिकार खेलते-खेलते घने वन में जा पहुँचे। उनकी सेना पीछे छूट गई। किन्तु वे आगे बढ़ते गए। उस वन को पार करने के बाद उन्हें एक उपवन मिला। वह उपवन बहुत ही सुन्दर था। वहाँ चारों ओर फल-फूलों के वृक्ष लगे हुए थे। उन पर तरह-तरह के फल-फूल लदे थे। उनकी सुगंध दूर-दूर तक फैल रही थी। सुन्दर-सुन्दर पक्षी अपने मधुर स्वरों में चहक रहे थे। उस उपवन की शोभा बड़ी निराली थी।
     दुष्यंत को जानने की इच्छा हुई कि वह उपवन किसका था। वे और आगे बढ़े तो सामने ही उन्हें एक आश्रम दिखाई पड़ा। वहाँ जगह-जगह पर ऋषि-मुनि तपस्या कर रहे थे। मालिनी नदी के तट पर बसा वह आश्रम ब्रह्मलोक के समान प्रतीत हो रहा था। उन्होंने आश्रम में प्रवेश किया, किन्तु वहाँ पर कोई दिखाई नहीं दिया। निर्मल एवं शांत उस आश्रम के द्वार पर जाकर उन्होंने पुकार लगाई। कुछ देर बाद अप्सरा के सामान अति-सुंदर एक कन्या तपस्विनी के परिधान में बाहर निकली। अतिथि को देखकर आदर से बोली - "हे अतिथि देव, आपका ऋषि कण्व के आश्रम में स्वागत है।"
     राजा ने अपना परिचय दिया तो उस तपस्विनी कन्या ने उन्हें आदरपूर्वक आसन दिया और  एक अतिथि के समान स्वागत-सत्कार करना प्रारंभ कर दिया। वह बड़े मनोयोग से अतिथि की सेवा करती जा रही थी, जैसे उसका प्रतिदिन का नियम हो। दुष्यंत ने अनुभव किया कि उस कन्या के मुख पर अस्वाभाविक तेज था। वह शांत भाव से एक कुशल स्त्री की भाँति कार्य कर रही थी। राजा दुष्यंत एकटक उस परम सुंदरी को देखते रह गए। वैसा अद्भुत एवं अनुपम सौंदर्य उन्होंने उससे पहले कभी नहीं देखा था। उधर वह स्त्री उन्मुक्त भाव से अतिथि सत्कार में लगी हुई थी। उसे न संकोच था और न ही इस बात का भान कि राजा उसकी सुंदरता पर मोहित होते जा रहे थे। 
     अपने सारे काम निपटा कर उस स्त्री ने राजा से पूछा - "राजन्, हमारा आतिथ्य स्वीकार करने के लिए आपका बहुत-बहुत आभार। कहिए मैं आपके लिए क्या कर सकती हूँ।"
     राजा ने पूछा - "तुम कौन हो देवी? तुम्हारे माता-पिता कौन हैं?"
     "मैं शकुंतला हूँ और मैं महर्षि कण्व की पुत्री हूँ।" 
     राजा चकित हो गये और पूछा - "हे सुन्दरी, महर्षि कण्व तो अखण्ड ब्रह्मचारी हैं। फिर तुम उनकी पुत्री कैसे हो सकती हो?"
     "राजन्, इसके लिए आपको मेरे जन्म की कहानी सुननी पड़ेगी।" तपस्विनी बोली।
     "हे सुन्दरी, मैं जानना चाहता हूँ।" राजा ने कहा।
     "तो सुनिये राजन्।"
     तपस्विनी कन्या उनके पास ही बैठ गई और कहने लगी - "एक ऋषि के पूछने पर मेरे पिता कण्व ने मेरे जन्म की कथा कुछ इस प्रकार सुनाई थी। एक बार परम तपस्वी विश्वामित्र तपस्या कर रहे थे। उनकी तपस्या के कारण इन्द्र का आसन डोलने लगा, तब उनकी तपस्या भंग करने के उद्देश्य से भगवन इन्द्र ने मेनका नामक एक अप्सरा को भेजा था। तपस्वी विश्वामित्र एवं उस अप्सरा के संयोग से मेरा जन्म हुआ। मेरी माता मुझे वन में छोड़कर चली गई। तब शकुन्तों (पक्षियों) ने जंगली पशुओं से मेरी रक्षा की। इसलिए मेरा नाम शकुन्तला पड़ा। सौभाग्य से महर्षि कण्व उस वन में घूम रहे थे। उन्होंने मुझे वहाँ उस हालत में देखा तो उठाकर आश्रम ले आए। उन्होंने ही मुझे पाला-पोसा और बड़ा किया। कहते हैं कि जन्म देने वाले, प्राणों की रक्षा करने वाले और अन्न देने वाले पिता कहे जाते हैं। इसलिए महर्षि कण्व मेरे पिता हैं।"
     तपस्विनी ने बड़ी रोचकता से कहानी बताई।
     दुष्यंत को यह जानकर खुशी हुई कि शकुन्तला क्षत्रिय कन्या थी। वे उसकी सुन्दरता पर पहले से ही मोहित थे। इसलिए अब वे विवाह करने को इच्छुक हो गये। बिना समय नष्ट किए राजा ने शकुंतला के सामने गंधर्व-विवाह का प्रस्ताव रख दिया।
    

Tuesday, February 7, 2012

गीत - सपना कोई आँखों में रहने लगा .....

गीत - पूर्णिमा वर्मन
संगीत - अमित कपूर
स्वर, स्वर रचना, ध्वनि संयोजन, चलचित्र निर्माण एवं निर्देशन - विश्वजीत 'सपन'

यह गीत यूटूब पर भी उपलब्ध है, लिंक है





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Tuesday, January 31, 2012

महाभारत की कहानियाँ

प्रिय मित्रों,

महाभारत एक अद्भुत ग्रन्थ है और इसे पढ़ना एक अविस्मरणीय अनुभव इस ग्रन्थ को जितना पढ़ा जाए, उतना ही लाभान्वित हुआ जा सकता है हर बार नये अनुभवों एवं नये विचारों से परिचय होता जाता है खेद का विषय है कि इस महान ग्रन्थ को इसकी जन्मभूमि भारत में उतनी लोकप्रियता नहीं मिल सकी, जीतनी कि मिलनी चाहिए थी। फिर जो मिली उसे भी मूल रूप से पृथक कर देखने के कारण मिली यह एक ऐसा प्रामाणिक ग्रन्थ है, जिसके मूल रूप को अनदेखा नहीं किया जा सकता है अत: आज आवश्यकता है इसके मौलिक स्वरूप को यथावत रखते हुए इसके प्रचार-प्रसार करने की
     इसी महती उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मैंने इस पुस्तक के विभिन्न अंगों को लगभग यथावत ही पाठकों के समक्ष रखने का प्रयास किया है इस ग्रन्थ से अनेक ग्रंथों कि सृष्टि कि गई और उनमें कई प्रकार के बदलाव भी किये गए यहाँ तक कई विश्व प्रसिद्ध लेखक कालिदास की विश्व प्रसिद्ध कृति 'अभिज्ञान शाकुंतलम' भी इसी ग्रन्थ की एक कथा पर आधारित है और इस कथा में भी कई स्थान पर बदलाव देखे जा सकते हैं हो सकता हो कई ऐसे बदलाव आवश्यक हों अथवा यथासमय के लिए समीचीन हों अथवा अधिक उचित प्रतीत होते हों, किन्तु इसे मूल कहानी नहीं कहा जा सकता है अत: इनके मूल स्वरूप को जानने और उसके संरक्ष्ण कई आवश्यकता है
     इस ग्रन्थ पर आधारित प्रचिलत पुस्तकों की भी कमी नहीं है, यथा पंचतंत्र', 'हितोपदेश' आदि आज हम अन्य भाषाओं में अनेक प्रकार के ग्रंथों के अनुकरण के उदाहरण देखते हैं उन पर टीका-टिप्पणी भी पढ़ते हैं उन पर नये प्रकार की वैचारिक सोचों को उभरते भी देखते हैं, किन्तु उनके मूल को जानने से कतरा जाते हैं अथवा हमें ऐसा अवसर ही नहीं होता कि उन्हें जान पायें ऐसे मैं किसी ऐसे ग्रन्थ की मौलिकता का विशेष महत्त्व हो जाता है उसे संजोकर रखना हमारा कर्तव्य भी हो जाता है अत: यह प्रयास इस ग्रन्थ की मौलिकता को यथावत रखते हुए उन्हें ससम्मान पाठकों के रसास्वादन के लिए उपस्थित करने के लिए किया गया है कथा-कहानियों की सामान्य से लेकर विशेष प्रकारों के समावेश के साथ-साथ इसमें अनन्य प्रकार के विचारों, दर्शनों, सूक्तियों, नैतिकताओं आदि के साक्षात् दर्शन प्रत्येक स्थल पर किये जा सकते हैं अत: ऐसी अद्भुत लेखनी को समाज के लिए उपलब्ध करना और उनकी श्रेष्ठ सीखों से परिचय करवाना ही इस लेखनी का पवित्र उद्देश्य है
     और हाँ, एक और बात. ये बहुत शीघ्र ही पुस्तकों के स्वरूप में पाठकों के सामने होंगीं इसकी पहली कड़ी के रूप में एक पुस्तक "एक थी राजकुमारी" के नाम से प्रकाशनाधीन है, जिसमें इस ग्रन्थ के महिला पात्रों से सम्बंधित बीस कहानियाँ सम्मिलित हैं उन्हीं कहानियों को एक कड़ी के रूप में यहाँ प्रस्तुत किया जा रहा है आशा है की यह आप पाठकों को रुचिकर प्रतीत होंगीं

नोट: ये कहानियाँ एक कड़ी के रूप में एक के बाद एक प्रकाशित की जायेंगीं. प्रति सप्ताह एक कहानी का मेरा प्रयास होगा.

विश्वजीत 'सपन'