Thursday, April 20, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 4

मनुष्य को दीमक की तरह खा जाता है ‘अहंकार’
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महाभारत की कथा की उनतीसवीं कड़ी में यह कहानी प्रस्तुत है। 


यह कहानी देव एवं दानवों के मध्य न केवल युद्ध का है, बल्कि इसमें यह भी बताया गया है कि अहंकारी चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, उसने स्वयं को उचित बताने के कितने भी प्रयास कर लिये हों, उसने स्वयं को स्थापित करने के कितने ही प्रयास कर लिये हों, किन्तु एक न एक दिन उसका अहंकार ही उसको ले डूबता है। त्रिपुरों की यह कहानी न केवल रोचक है, बल्कि हमारे जीवन के लिये अति शिक्षाप्रद भी है। 


आशा है कि महाभारत की यह प्रतीकात्मक कथा आप सभी को अवश्य पसंद आयेगी।


इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक के प्रयोग किये जा सकते हैं। साथ ही नीचे एक फोटो के रूप में भी कहानी दी जा रही है। इच्छुक मित्र उससे भी पढ़ सकते हैं।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=2117&page=10&date=17-04-2017


विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, April 13, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 3

जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी

महाभारत की कथा का अट्ठाइवाँ भाग प्रस्तुत है। इसमें महाभारत की तीसरी लोककथा है - ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी’’। 

यह कहानी एक तोते के कृतज्ञता की है। मरे हुए पेड़ से वह इतना प्रेम करता है कि भगवान् को आकर उसे जीवनदान देना पड़ता है। आज हममें इस कृतज्ञता की अत्यधिक कमी है। आइये पढ़ें और सीखें कि जीवन में जो हमारी रक्षा करते हैं, हमें उनका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा नीचे दिये फोटो में भी इसे पढ़ सकते हैं।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=2101&page=10&date=10-04-2017 



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, April 4, 2017

महाभारत की लोककथा - 2


‘‘संकट में घबराना नहीं चाहिए’’


महाभारत की दूसरी लोककथा में इस कहानी को पढ़ें। इस कड़ी में यह सत्ताइसवीं कथा का प्रकाशन हुआ है। यह धारावाहिक आपको कैसा लग रहा है, इस बारे में आपके विचार अपेक्षित हैं।


प्रस्तुत कथा एक बुद्धिमान चूहे पलित की है, जिसने संकट में अपनी बुद्धिमानी से न केवल अपनी जान बचाई, बल्कि एक संदेश भी हम सभी को दे गया कि जब आवश्यकता हो, तो किसी से भी मित्रता कर लेनी चाहिए, किन्तु यदि सबल मित्र है, तो उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए।


नीचे दिये लिंक को क्लिक करें या नीचे दिये चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=2077&page=10&date=03-04-2017



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Friday, March 31, 2017

महाभारत की लोककथा - 1 "मित्रता में दरार"


महाभारत की लोककथा का प्रारंभ ‘पवन प्रवाह’ पर हो चुका है। प्रथम कथा का शीर्षक है - ‘मित्रता में दरार’’। यह कथा एक सियार एवं व्याघ्र की मित्रता की है, जिसके माध्यम से बताया गया है कि यदि एक बार मित्रता में दरार आ जाये, तो वह कभी भरता नहीं है। साथ ही यह संदेश भी है कि अपने स्वाभाव वालों के साथ ही मित्रता टिकती है।

इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा इस चित्र से ही पढ़ सकते हैं जो नीचे है।


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सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 23, 2017

दमयन्ती और नल का पुनर्मिलन

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथाओं के क्रम में पच्चीसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है ‘‘दमयन्ती और नल का पुनर्मिलन’’। हमने अब तक देखा कि नल एवं दमयन्ती एक-दूसरे से अलग हो गये। उन्हें नाना प्रकार के कष्टों से गुज़रना पड़ा। जहाँ दमयन्ती अभी भी राजा नल की तलाश में थी, वहीं राजा नल युक्ति से अपना राज्य वापस पाने के लिये प्रयासरत थे। तब दमयन्ती ने किस प्रकार राजा नल को पहचाना और उनसे मिली, अब इस कथा में वर्णित है। 


कथा पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 16, 2017

नल एवं दमयन्ती की दुर्लभ यात्रायें (भाग - 4)

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथा के रूप में चौबीसवीं कड़ी में प्रस्तुत है - ‘‘राजा नल एवं दमयन्ती’’ की कथा का चतुर्थ भाग - ‘‘नल एवं दमयन्ती की दुर्लभ यात्रायें’’। 


मित्रों, हमने देखा कि राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर वन में चले जाते हैं कि वह अपने पिता के पास लौट जायेगी, किन्तु दमयन्ती ऐसा नहीं करती और अपनी खोज जारी रखती है। उधर राजा नल भी भटकने लगते हैं और उन्हें कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है, क्या-क्या करना पड़ता है, इस भाग में वर्णित है। दैव संयोग से ऐसा हो रहा है, इसका आभास दमयन्ती होता है। 


कथा पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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विश्वजीत 'सपन'

Thursday, March 2, 2017

दमयन्ती का विरह - भाग 3

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथाओं में तेईसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - ‘‘दमयन्ती का विरह’’।


देवताओं के होते हुए भी दमयन्ती ने राजा नल का वरण किया और वे सुख से रहने लगे। उधर कलियुग और द्वापर भी उसी स्वयंवर में भाग लेने जा रहे थे, किन्तु जब उन्हें पता चला कि दमयन्ती ने देवताओं को छोड़कर राजा नल से विवाह किया, तो उन्होंने इसे अपमान समझा। वे इसका दण्ड देने की योजना बनाने लगे। उनकी कुटिल योजना क्या बनती है? किस प्रकार राजा नल एवं दमयन्ती के जीवन में कठिनाइयों के दौर प्रारंभ होते हैं। अब इस कथा में पढ़िये। 


पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, February 26, 2017

दमयन्ती की दुविधा - भाग 2


सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथा के क्रम में बाइसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - ‘‘दमयन्ती की दुविधा - भाग 2’’।


हमने पढ़ा था कि राजा नल दमयन्ती के स्वयंवर में जा रहे थे। मार्ग में देवतागण मिले। उन्होंने उन्हें अपना दूत बनकर दमयन्ती के पास जाने को कहा। दूतकार्य समाप्त कर राजा नल पुनः देवताओं के पास गये। जब राजा नल ने भी स्वयंवर में प्रतिभाग करने की अनुमति माँगी, तो देवतागण घबरा गये कि उनके रहते दमयन्ती किसी और का वरण नहीं करेगी, तब देवताओं ने एक चाल चली। पढ़ें और आनंद लें।


नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/paper.php?news=1977&page=6&date=20-02-2017


सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, February 16, 2017

दमयन्ती का स्वयंवर - भाग 1


सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कहानियों के क्रम में प्रस्तुत है इसकी इक्कीसवीं कड़ी, जिसमें प्रस्तुत है ‘‘राजा नल’’ एवं ‘‘दमयन्ती’’ की कथा। यह कथा अत्यंन्त ही रोचक एवं पठनीय है। असल में जब यात्रा के क्रम में युधिष्ठिर महर्षि बृहदश्व से कहते हैं कि उनके जैसा दुर्भाग्यशाली राजा और कौन होगा? उनका राज्य हड़प लिया गया, उन्हें देश निकाला दे दिया गया, वे वन-वन भटक रहे हैं, उनकी पत्नी द्रौपदी को भी अपमानित किया गया आदि। तब महर्षि बृहदाश्व उन्हें सांत्वना देने के लिये नल एवं दमयन्ती की कथा सुनाते हैं कि इनके जीवन में तो अत्यधिक कठिन समय आया था। कथा बड़ी है, अतः इसे कई भागों में प्रस्तुत किया जायेगा। इसी कड़ी में प्रस्तुत है प्रथम भाग - ‘‘दमयन्ती का स्वयंवर - भाग 1’’।


इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।




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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1961&page=6&date=13-02-2017 



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, February 9, 2017

देवयानी का हठ - भाग 2

सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कहानी के क्रम में बीसवीं कहानी ‘‘देवयानी का हठ’’ का दूसरा एवं अंतिम भाग प्रस्तुत है। हमने पहले भाग में पढ़ा कि देवयानी और शर्मिष्ठा में झगड़ा होता है। देवयानी नगर से जाने की बात करती है और असुरराज वृषपर्वा उसे मनाते हैं। देवयानी इस शर्त पर रुकती है कि शर्मिष्ठा उसकी दासी बनकर रहेगी। 


अब इस भाग में पता चलता है कि राजा ययाति का संबंध शर्मिष्ठा के साथ होता है और किस प्रकार देवयानी को इसका पता चलता है। तब वह क्या करती है? कैसे राजा ययाति अचानक बूढ़े हो जाते हैं और अपने उत्तराधिकारी का चयन करते हैं।


पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1949&page=10&date=08-02-2017
 
विश्वजीत ‘सपन’

Friday, February 3, 2017

‘‘देवयानी का हठ’’ (भाग-1)


सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कथाओं में उन्ननीवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है ‘‘देवयानी का हठ’’ का पहला भाग। महाभारत के आदिपर्व में वैशम्पायन जी जनमेजय से देवताओं एवं असुरों के मध्य युद्धों एवं कच की संजीवनी विद्या को सीखने के बारे में बताया। इसी मध्य उन्होंने देवयानी एवं शमिष्ठा की कहानी भी बताई। देवयानी शुक्राचार्य की पुत्री थी और उसका झगड़ा असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा के साथ हुआ करता था। एक दिन अवसर पाकर किस प्रकार देवयानी ने बदला लिया, इस कथा में वर्णित है।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1933&page=10&date=30-01-2017

विश्वजीत 'सपन'

Saturday, January 28, 2017

नागकन्या उलूपी की प्रेमकथा

सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कथाओं के क्रम में इस सप्ताह अठारवीं कथा ‘‘नागकन्या उलूपी की प्रेमकथा’’ का प्रकाशन ‘‘पवन प्रवाह’’ पर। 


किस प्रकार नागकन्या उलूपी को धनुर्धर अर्जुन से अनुराग होता है और उससे प्रेम करने लगती है। उससे विवाह करने के लिये वह क्या उपक्रम करती है तथा किस प्रकार अर्जुन धर्मसंकट में पड़ते हैं, इस कथा में दर्शाया गया है।


पढ़ें और आनंद लें।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1900&page=10&date=23-01-2017

सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, January 21, 2017

क्षत्राणी विदुला का उद्बोधन

सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कथा की कड़ी में सत्रहवीं कथा का प्रकाशन।


‘‘क्षत्राणी विदुला का उद्बोधन’’


सिंधुराज संजय के पराजित हो जाने पर वह भयभीत हो जाता है। युद्धभूमि छोड़कर भाग जाता है। उसकी माता विदुला को यह पसंद नहीं आता। तब वह किस प्रकार अपने पुत्र को प्रेरित करती है, ताकि संधुराज अपने खोये राज्य को प्राप्त कर सके। कर्तव्य से विमुख को अपने कर्तव्य पथ पर लाने की यह कथा सभी के जीवन के लिये बहुत महत्त्वपूर्ण है। 



इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1884&page=10&date=16-01-2017 

सादर
विश्वजीत ‘सपन’