Sunday, May 19, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग- 80)




महाभारत की कथा की 105 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 

आश्रमधर्म क्या है?

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प्राचीन काल की बात है। महर्षि भृगु कैलास शिखर पर बैठे हुए थे एवं भरद्वाज मुनि के प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे। उन्होंने संसार एवं जीव का वर्णन किया, उसके बाद जीव की नित्यता एवं चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन किया। तब भरद्वाज मुनि ने पूछा - ‘‘सत्य क्या है? असत्य का दोष क्या है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘मुने, सत्य ही ब्रह्म है, तप है। सत्य पर ही संसार टिका हुआ है। सत्य ज्ञान है, प्रकाश है, जो सुख है। असत्य अधर्म है। दुःख का कारण है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, दान, धर्म, तप, स्वाध्याय एवं अग्निहोत्र का क्या फल है?’’


मुनि भृगु ने कहा - ‘‘दान से भोगों की प्राप्ति होती है। धर्म से सुख प्राप्त होता है। तप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्वाध्याय से शान्ति मिलती है तथा अग्निहोत्र से पाप का नाश होता है।’’


पूरी तरह से संतुष्ट होकर भरद्वाज ने पूछा - ‘‘मुनिश्रेष्ठ, एक अंतिम प्रश्न। ब्रह्मा जी ने चार आश्रम बनाये हैं उनके धर्म क्या-क्या हैं। इसे सविस्तार बताने की कृपा करें।’’


भृगु ऋषि ने कहा - ‘‘तो सुनिये मुनिवर, प्रथम आश्रम है - ब्रह्मचर्य। बालकपन में शिष्य को गुरु के यहाँ रहकर वेदाध्ययन करना पड़ता है। ब्रह्मचारी बनकर वह बाहर-भीतर की शुद्धि, व्रत तथा नियमों के पालन से मन को वश में करता है। प्रातः एवं संध्या अग्निहोत्र के द्वारा अग्निदेव की उपासना करता है। इस समय प्रातः, मध्याह्न एवं सायं स्नान कर पवित्र रहना होता है। गुरु-आज्ञा से भिक्षा लाकर गुरु को अर्पण करना होता है। इस समय बालक को गुरु की सेवा करनी चाहिये तथा वेदाध्ययन के साथ-साथ स्वाध्याय करना चाहिये।


द्वितीय आश्रम है - गार्हस्थ्य। गुरुकुल की अवधि पूर्ण होने के बाद यदि पुत्रादि की इच्छा हो तो, गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का नियम है, क्योंकि इसमें धर्म, अर्थ एवं काम तीनों की प्राप्ति होती है। यह सभी आश्रमों का मूल कहलाता है। इन्हीं के द्वारा संन्यासी आदि को भिक्षा की प्राप्ति होती है। इस आश्रम में उत्तम कर्म के द्वारा धन-संग्रह करके उसे दान, यज्ञादि में खर्च करना चाहिये। इसमें सदाचारी बनकर रहने वाला ही सुख की प्राप्ति करता है। इस आश्रम में यज्ञ करने से देवता, श्राद्ध करने से पितर, शास्त्रों के श्रवण, अभ्यास एवं धारण करने से ऋषि तथा संतान उत्पन्न करने से प्रजापति प्रसन्न होते हैं। गृहस्थ आश्रम के अनेक कर्तव्य हैं, जैसे अतिथि सेवा, दान, दया, सभी का समान आदर, किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं, सत्य बोलना, निंदा न करना, अहंकार न करना आदि।


तृतीय आश्रम है - वानप्रस्थ। एकान्त वन में विचरण करना ही इसका ध्येय होता है। गृहस्थ धर्म में उपयोग किये गये वस्तुओं, विषयों का परित्याग करके थोड़ी मात्रा में फल-फूल खाकर ही जीवन बिताया जाता है। धर्म का पालन, नित्य नियम से स्नान, पूजा आदि करना ही इस आश्रम के नियम हैं। इस समय शरीर का ध्यान नहीं रखा जाता है। उसे मात्र धारण करने का ध्येय होता है, चाहे वह सूखकर काँटा ही क्यों न हो जाये। इस प्रकार से अपने जीवन को एक स्थल पर रहकर बिना किसी सुख की कामना के साथ बिताना ही इस आश्रम का मूल नियम है। ऐसा करने वाले एवं ब्रह्मर्षियों द्वारा बताये गये मार्ग पर चलने वाले ऐसे आश्रमधर्मी दुर्लभ लोकों को प्राप्त करते हैं।


चतुर्थ आश्रम है - संन्यास का। संन्यासी का जीवन एकान्तमय होता है। वह घर-परिवार को छोड़कर, समस्त नाते-रिश्तेदारों का त्याग कर विषय-भोगों का पूर्णतः परित्याग कर देता है। ये वानप्रस्थ ही भाँति कुटि या आश्रम बनाकर नहीं रहते, बल्कि पर्वत, गुफा, नदी का किनारा, वृक्ष के नीचे आदि स्थलों पर अपना जीवन यापन करते हैं। इस समय नगर में पाँच रात एवं गाँव में एक रात से अधिक नहीं रहना चाहिये। बिना माँगे ही पात्र में जितनी भिक्षा मिल जाये, उसे ही स्वीकार कर संतुष्ट होना चाहिये। इस समय काम, क्रोध, दर्प, लोभ, मोह आदि से सर्वथा दूर रहना चाहिये। इस समय समस्त जीवों को एक समान देखना चाहिये।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘बड़ा आभार आपका मुनिश्रेष्ठ। आज मेरे समस्त प्रकार के संदेहों का परिष्कार हो गया। कृपया यह भी बतायें, इन चार आश्रमों के नियम किसने बनाये एवं क्यों?’’


भृगु ने कहा - ‘‘जगत् का कल्याण करने के लिये ब्रह्मा जी ने पूर्वकाल में चार आश्रमों का उपदेश दिया था। जीवन को अर्थपूर्ण एवं लक्ष्यसहित बिताने के लिये ही इन आश्रमों की व्यवस्था की गयी है। व्यक्ति प्रत्येक आयु में सब-कुछ करने में सक्षम नहीं होता, अतः उसकी आयु के अनुसार ये चार आश्रम बनाये गये हैं। साथ ही जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने में इन चारों आश्रमों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। किसी भी एक आश्रम की उपेक्षा से यह चराचर जगत् भ्रमित हो सकता है। अतः शास्त्रों में ऐसे नियम बनाये जाते हैं। मनुष्यों के जीवन को एक निश्चित दिशा देने के लिये ही ब्रह्मा जी ने ये चार आश्रम बताये हैं। सत्य तो यही है कि जो मनुष्य लोक के धर्म-अधर्म को जानता है, वही बृद्धिमान् होता है। धर्म का पालन करते हुए, जो जीवन यापन करता है, वह शान्त एवं ज्योतिर्मय ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।’’


इस प्रकार भृगु ऋषि ने भरद्वाज को इस जीवन एवं संसार की समस्त अवधारणाओं एवं उसमें उपस्थित व्यवस्थाओं को बताया, जो जगत् कल्याण के लिये था। एक मनुष्य को बुद्धिमान् बनकर रहना चाहिये एवं ब्रह्मा के बनाये नियमों के पालन करने चाहिये।


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, May 12, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 79)


महाभारत की कथा की 104 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।  

चार वर्णों की उत्पत्ति

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प्राचीन काल की बात है। महर्षि भृगु कैलास शिखर पर बैठे हुए थे। भरद्वाज मुनि ने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिये उनसे पूछा - ‘‘मुनिवर, मुझे यह बताइये कि चारों वर्णों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? इसकी रचना किसने की?’’


भृगु मुनि ने कहा - ‘‘समस्त सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की है। उन्होंने सृष्टि के आरंभ में अपने तेज से सूर्य एवं अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले ब्राह्मण आदि प्रजापतियों को उत्पन्न किया। उसके बाद स्वर्ग-प्राप्ति के साधनभूत सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद, आचार, शौच आदि के नियम बनाये। तदनन्तर देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प, यक्ष, पिशाच आदि सहित मनुष्यों को उत्पन्न किया। उसके बाद उन्होंने मनुष्यों के चार वर्ण - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का विभाग किया। सभी प्रकार के प्राणियों में जो-जो वर्ण हैं, उनकी भी रचना की। ब्राह्मणों का रंग श्वेत, क्षत्रियों का लाल, वैश्यों का पीला तथा शूद्रों का काला बनाया।’’


भरद्वाज मुनि की उत्सुकता बनी रही। उन्होंने पूछा - ‘‘हे मुनिश्रेष्ठ, इस चराचर जगत् में सभी मनुष्यों को समान रूप से दुःख-सुख, भूख, थकावट आदि का प्रभाव पड़ता है। सभी के शरीर से मल-मूत्र, स्वेद, रक्त आदि निकलते हैं, तो इन्हें रंगों के आधार पर विभाजित कैसे किया गया?’’


तब भृगु जी ने इस प्रकार कहा - ‘‘मुनिवर, सत्य तो यही है कि ब्रह्मा जी ने वर्णों में कोई अंतर पूर्व में नहीं किया था। तब सभी ब्राह्मण ही थे, क्योंकि वे ब्रह्मा जी से उत्पन्न हुए थे। कालान्तर में विभिन्न कर्मों के कारण उसमें वर्णभेद हो गया। जिन लोगों ने ब्राह्मणोचित धर्म का त्याग कर दिया, विषयभोग के प्रेमी बन गये, क्रोधी एवं तीखे होकर वीरता का कार्य करने लगे, तो उनके रंग लाल हो गये, ऐसे ब्राह्मण क्षत्रिय कहलाये। जिन लोगों ने गोऔ की सेवा ही अपनी वृत्ति बना ली एवं खेती को जीविका बनाकर रहने लगे, तो वे पीले पड़ गये एवं ऐसे द्विजों को वैश्य कहा गया। जो लोग शौच एवं सदाचार से भ्रष्ट होकर हिंसा एवं असत्य के प्रेमी बन गये तथा लोभवश सब प्रकार का काम करने लगे, तो ऐसे ब्राह्मण-धर्म से च्युत द्विज शूद्र कहलाये। इस प्रकार अपने-अपने स्वभावों, अपनी वृत्तियों के कारण ब्राह्मण धर्म को त्यागने के कारण ये चार वर्ण बन गये हैं।’’


भरद्वाज मुनि ने पूछा - ‘‘विप्रवर, अब मुझे यह बतलाइये कि कौन-सा काम करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र होता है?’’


भृगु ऋषि ने कहा - ‘‘जो वेदोक्त संस्कारों से सम्पन्न, स्वाध्याय में संलग्न एवं यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान-प्रतिग्रह इन छः कर्मों में स्थित रहते हैं, सत्य-मार्ग का पालन करते हैं, गुरुओं के प्रति श्रद्धा रखते हैं, सबके प्रति कोमल भाव रखतें हैं, जिनमें दया, तप आदि के सद्गुण मिलते हैं, वे ही ब्राह्मण होते हैं। जो वीरोचित कार्य करता है, वेदाध्ययन करता है, युद्ध करता है, ब्राह्मणों को दान करता है, प्रजा की रक्षा करता है, वह क्षत्रिय होता है। जो वेदाध्ययन करते हुए, व्यापार, पशु-पालन तथा खेती आदि का कार्य करता हुआ दान आदि करता है, वह वैश्य होता है। जो वेद एवं सदाचार का त्याग कर सब कुछ खाता है, सब तरह के काम करता हुआ अपवित्र रहता है, वह शूद्र होता है।’’


भरद्वाज ने पूछा - ‘‘मुने, तो क्या वर्णों का आधार उनके कर्म हैं, जन्म नहीं।’’


भृगु मुनि ने कहा - ‘‘आपने उचित कहा विप्रवर। यदि किसी शूद्र में ब्राह्मणोचित सद्गुण दिखाई दें, तो वह शूद्र नहीं रहता। ठीक उसी प्रकार यदि किसी ब्राह्मण में ब्राह्मण गुण न हो, तो वह ब्राह्मण नहीं होता। सर्वदा शौच एवं सदाचार का पालन करना तथा सम्पूर्ण प्राणियों पर दया रखना ब्राह्मण का लक्षण होता है। जो जिस गुण को धारण करता है, वह उसी वर्ण का बन जाता है।’’


भरद्वाज मुनि ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर, इसका अर्थ हुआ कि ब्राह्मण श्रेष्ठ है और उसके गुणों की ओर सभी को तत्पर होना चाहिये।’’


भृगु ने कहा - ‘‘सत्य-वचन मुने। जो सृष्टि को ब्रह्मस्वरूप नहीं जानते, वे द्विज कहलाने के अधिकारी नहीं होते। ऐसे लोगों को नाना प्रकार की योनियों में जन्म लेना पड़ता है। अतः ब्राह्मण अग्रज होने से सर्वश्रेष्ठ हैं। ये आदिदेव ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हैं एवं इनके मूल में ब्रह्मा जी ही हैं। इसके बाद भी ये अपने सद्गुणों के कारण ही ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी होते हैं। ब्राह्मण संसार से परवैराग्य होने के कारण परब्रह्म परमात्मा को अनायास ही प्राप्त कर लेता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘अन्य लोगों को परब्रह्म-प्राप्ति हेतु क्या करना चाहिये। मुझे सविस्तार बतायें मुनिवर।’’


भृगु ने कहा - ‘‘लोभ एवं क्रोध को दबाना ही पवित्र ज्ञान एवं आत्म-संयम है। किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिये, सबके साथ मैत्री का व्यवहार करना चाहिये, स्त्री-पुत्र आदि की ममता का त्याग कर बुद्धि द्वारा इन्द्रियों को वश में करना चाहिये, इस प्रकार वह उस स्थिति को प्राप्त करे, जिससे इहलोक एवं परलोक में निर्भय तथा शोकरहित हो। नित्य तप करने, अनासक्त रहने तथा मन को प्राण में तथा प्राण को ब्रह्म में स्थापित करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है तथा परब्रह्म से साक्षात्कार होता है।’’


इस प्रकार भृगु मुनि ने भरद्वाज की जिज्ञासाओं को शान्त किया एवं जगत् के चार वर्णों के विभेद की विवेचना की। सभी मनुष्य ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण एक समान ही हैं, किन्तु उनके कर्म उन्हें पृथक वर्ण का बना देते हैं।


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, May 4, 2019

महाभारत की लोककथा भाग-78




महाभारत की कथा की 103 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

जीव की नित्यता

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प्राचीन काल की बात है। एक बार भरद्वाज मुनि महर्षि के भृगु के पास गये। वे जीवन के सत्य को जानना चाहते थे। संसार एवं शरीर के मूलतत्त्वों को जानने के बाद उन्होंने महर्षि से इस प्रकार पूछा - ‘‘भगवन्, मृत्यु के समय गो दान किया जाता है, यह सोचकर कि गौ परलोक में उसका कल्याण करेगी। गौ दान करके वह मर जाता है। गौ दान करने वाला, उसे लेने वाला एवं स्वयं गौ भी इसी धरती पर नष्ट हो जाते हैं। परलोक में ये कल्याण का कारण कैसे बनते हैं? जो भी मरता है, वह जलकर भस्म हो जाता है अथवा उसे पक्षी आदि खा जाते हैं। ऐसी अवस्था में उसका पुनः जीवित होना संभव नहीं है, क्योंकि वह सदा के लिये चला जाता है। इसका रहस्य क्या है?’’


भृगु जी ने कहा - ‘‘मुनिवर, यह मात्र आपका प्रश्न नहीं है। इस संसार में मोह में बँधे समस्त प्राणियों का यही सोचना है, किन्तु सत्य यही है कि जीव अथवा उसके किये गये दान या कर्म का कभी नाश नहीं होता है। जीवन की मृत्यु का अर्थ मात्र उसके शरीर का नाश होता है। वह तत्क्षण ही किसी दूसरे शरीर में प्रविष्ट कर जाता है, जिस योनि में उसे जाना होता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘आपकी बात उचित है मुनिवर, किन्तु यदि देहधारियों के शरीरों में मात्र अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश एवं जल तत्त्व ही विद्यमान है, तो उनमें रहने वाले उस जीव का क्या स्वरूप है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘इसे ही अन्तरात्मा कहते हैं। यही देह का संचालन करता है। यह नित्य है, अजर-अमर है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, शरीर को चीर-फाड़ कर देखने पर जीव दिखाई नहीं देता, किन्तु जीवित होने पर उसे दुःख आदि का अनुभव होता है। यह किस प्रकार संभव है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘पंचभूतों के गुणों अर्थात् रूप, रस, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द तथा दूसरे सभी गुणों का अनुभव यही आत्मा करता है। वह पाँचों इन्द्रियों के गुणों को धारण करने वाला मन का द्रष्टा है तथा वही पांचभौतिक देह के प्रत्येक अवयव में व्याप्त होकर सुख-दुःख का अनुभव करता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, जीव कभी किसी की बात सुनता है और कभी नहीं। नेत्र से सब-कुछ देखता है, किन्तु व्याकुल होने पर नहीं देखता। इसी कारण मन के अतिरिक्त जीव की सत्ता मानना व्यर्थ है। नींद में पड़ा प्राणी सभी इन्द्रियों के होते हुए भी न देखता है, न सुनता है, न सूँघता है, न ही बोलता है। उसे स्पर्श एवं रस का भी अनुभव नहीं होता। अतः जिज्ञासा होती है कि इस शरीर में कौन हर्ष एवं विषाद करता है? किसे शोक एवं उद्वेग होता है? इच्छा, ध्यान, द्वेष एवं बातचीत करने वाला कौन है? कृपया इन तथ्यों को विस्तार से बतायें, ताकि भ्रम दूर हो।’’


भृगु ने कहा - ‘‘बड़ा उचित प्रश्न है मुनिवर। कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब किसी प्राणी को किसी भी इन्द्रिय के विषयों का भान नहीं होता है। जब आत्मा का शरीर के साथ सम्बन्ध नहीं रहता, तो इस देह को सुख-दुःख का भान नहीं होता। इसी के कारण मन के अतिरिक्त उसके साक्षी आत्मा की सत्ता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। जब शरीर में स्थित अग्निस्वरूप आत्मा इससे पृथक हो जाता है, तो उस समय शरीर को रूप, स्पर्श तथा अग्नि की गर्मी का अनुभव नहीं होता तथा उस शरीर की मृत्यु हो जाती है। इसे इस प्रकार जानिये कि आत्मा जब प्रकृति के गुणों से युक्त होता है, तब वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है तथा जब वह उन्हीं गुणों से मुक्त हो जाता है, तब परमात्मा कहलाता है। यह आत्मा कमल के पत्ते पर पड़े जल-बिन्दु की भाँति शरीर में रहकर भी पृथक रहता है। वही चेष्टा करता है तथा कराता भी है। देह के नष्ट हो जाने पर भी उसका नाश नहीं होता। असल में शरीर का नाश ही मृत्यु है, जीव का नहीं। वह तो तत्काल ही किसी दूसरे शरीर में चला जाता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, ये ज्ञान की बातें, जीवन को सुखमय बनाने हेतु ही हैं। इसे कौन अनुभव करता है? इस मोह से किस प्रकार छुटकारा संभव है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘मुने, जीवन आनन्द का नाम है। ईश्वर ने इसे आनन्द के लिये ही बनाया है, किन्तु मोह में फँसे लोग इसे जान नहीं पाते हैं, समझ नहीं पाते हैं तथा इसी कारण देह के नष्ट हो जाने पर जीव की मृत्यु बतलाते हैं। यह मिथ्या है, भ्रम है। इसे इस प्रकार जानिये कि यह आत्मा प्राणियों के भीतर छिपा हुआ है। जो कोई भी अविद्या से आच्छादित होते हैं, उनके लिये यह प्रकाश में नहीं आता। मात्र तत्त्वदर्शी महात्मा ही अपनी तीव्र एवं सूक्ष्म बु़िद्ध से उसका साक्षात्कार करते हैं। जो भी विद्वान् परिमित आहार करके, रात के पहले तथा पिछले पहर में सदा ध्यानयोग का अभ्यास करता है, वह चित्त शुद्ध होने पर अपने अन्तःकरण में ही उस आत्मा को देख लेता है तथा उसे पहचान लेता है। अन्तःकरण के शुद्ध हो जाने के कारण वह शुभाशुभ कर्मों के बंधन से भी मुक्त हो जाता है। ऐसा महात्मा जो प्रसन्नचित्त होता है, अपने आत्म-स्वरूप में स्थित होकर अनन्त आनन्द का अनुभव करता है।’’


इस प्रकार भृगु ऋषि ने जीव की नश्वरता एवं शरीर से उसकी पृथक सत्ता का समुचित वर्णन किया। इनको एक मानना अज्ञानता के कारण होता है। यही जीवन-दर्शन है। यही सत्य है।


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, April 27, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 77)


महाभारत की कथा की 102 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

जीव एवं जगत् के मूलतत्त्व

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प्राचीन काल की बात है। परम तेजस्वी महर्षि भृगु कैलाश शिखर पर बैठा करते थे। भरद्वाज मुनि को जीव एवं जगत् के बारे में जानने की इच्छा हुई। एक बार वे महर्षि भृगु के पास गये तथा उनसे पूछा - ‘‘मुनिवर, इस स्थावर-जंगम जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई है और प्रलय आने पर यह कहाँ चला जाता है?’’


भृगु मुनि ने कहा - ‘‘मुने, सुनने में आता है कि प्रारम्भ में एक मानस देव था। वह आदि-अन्त से रहित, अभेद्य एवं अजर-अमर था। वह ‘अव्यक्त’ नाम से प्रसिद्ध था। सब जीवों की उत्पत्ति उसी से होती है तथा मरने के बाद वे उसी में लीन हो जाते हैं।’’


भरद्वाज ने जिज्ञासा की - ‘‘पर्वत, पृथ्वी, समुद्र, आकाश, वायु, अग्नि मेघ सहित इस लोक की किसने रचना की?’’


भृगु ने समझाते हुए कहा - ‘‘यह भी सुना जाता है कि उस स्वयम्भू मानस देव ने सर्वप्रथम एक तेजोमय दिव्य कमल की रचना की। उसी से वेदस्वरूप ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। वह समस्त भूतों का आत्मा तथा उनकी रचना करने वाला है। पंच महाभूत भी उस ब्रह्मा की ही सृष्टि है। पर्वत उसकी अस्थियाँ हैं, पृथ्वी उसका मेद एवं मांस है, समुद्र रुधिर है, आकाश उदर है, वायु श्वास है, अग्नि तेज है, नदियाँ नाड़ियाँ हैं, चन्द्रमा तथा सूर्य उसके नेत्र हैं। इस अचिन्त्य पुरुष को जानना सिद्ध पुरुषों के लिये भी कठिन है। यही भगवान् विष्णु है एवं अनन्त नाम से प्रसिद्ध है। यह समस्त भूतों का आत्मा तथा अन्तर्यामी है। इसे मात्र शुद्ध चित्त वाले ही जान सकते हैं।’’


भरद्वाज ने पूछा - ‘‘भगवन्, इस आकाश, दिशा, पृथ्वी एवं वायु का परिमाण कितना है? मेरा संदेह दूर कीजिये।’’


भृगु ने कहा - ‘‘यह आकाश तो अनन्त है। यह आकाश ही नहीं वरन् अग्नि, वायु, जल आदि का भी परिमाण जानना कठिन है। ऋषियों ने विविध शास्त्रों में त्रिलोकी एवं समुद्र आदि के बारे में कुछ कहा है, किन्तु जो दृष्टि से परे है तथा जिस तक इन्द्रियों की पहुँच नहीं है, उस परमात्मा का परिमाण कोई कैसे बता सकता है? अतः इन्हें अपरिमित ही जानना चाहिये।’’


भरद्वाज ने जिज्ञासा की - ‘‘मुनिश्रेष्ठ, लोक में पाँच धातु ही महाभूत कहलाये, जिन्हें ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में रचा था। इन्हें ही भूत कहना कहाँ तक उचित है, जबकि ब्रह्मा जी ने इसके साथ ही सहस्रों भूतों की सृष्टि की थी?’’


भृगु ने कहा - ‘‘ये पाँचों असीम हैं, अतः इन्हें महाभूत की संज्ञा दी जाती है। मानव शरीर भी इन पाँचों का ही संघात है। जो गति है, वह पवन का अंश है, जो खोखलापन है वह आकाश का अंश है, ऊष्मा अग्नि का अंश है, रक्तादि तरल जल के अंश हैं तथा हड्डी, मांस आदि पृथ्वी के अंश हैं। इस प्रकार समस्त स्थावर-जंगम संसार इन पाँचों महाभूतों से ही बना है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘किन्तु मुनिवर, स्थावर शरीरों में ये पाँचों तत्त्व दृष्टिगत नहीं होते। वृक्ष न सुनते हैं न देखते हैं, न उन्हें रस का आनन्द आता है तथा न ही वे गन्ध ले सकते हैं। फिर इन्हें पंचभौतिक कैसे कहा जा सकता है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘ऐसा नहीं है मुने, वृक्ष ठोस अवश्य जान पड़ते हैं, किन्तु उनमें भी ये पंचतत्त्व होते हैं। इसी कारण वे नित्यप्रति बढ़ते हैं, फल-फूल आदि की उत्पत्ति करते हैं। उनके अंदर जो ऊष्मा होती है, उसी के कारण पत्ते, छाल, फल आदि मुरझा जाते हैं। बिजली कड़कने पर वृक्ष में कम्पन होता है। वृक्ष को स्पर्श होना, सुनना आदि सभी गुणों से सम्पन्न पाया जाता है। वे अपनी जड़ों से जल पीते हैं तथा इसी कारण ‘पादप’ कहलाते हैं। उनमें दुःख-सुख का ज्ञान भी देखा गया है एवं इसी कारण वे अचेतन नहीं, बल्कि जीवयुक्त हैं।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘इन पंचभूतों के बारे में थोड़ा विस्तार से बतायें मुनिवर। इनका हमारे शरीरादि से क्या सम्बन्ध हैं? ये देहधारियों में किस प्रकार समाहित होते हैं?’’


भृगु ने कहा - ‘‘हमारे शरीर में पाँच भूत पूर्णतः समाये रहते हैं। शरीर में अस्थि, त्वचा, मांस, मज्जा एवं स्नायु, ये पाँच पृथ्वीमय हैं। तेज, क्रोध, चक्षु, ऊष्मा एवं जठरानल, ये पाँच अग्निमय हैं। श्रोत्र, घ्राण, मुख, हृदय एवं उदर, ये पाँच आकाशीय अंश हैं। कफ, पित्त, स्वेद, चरबी एवं रुधिर, ये पाँच जलीय अंश हैं। प्राण, अपान, उदान, समान एवं व्यान, ये पाँच वायवीय अंश हैं। जीव भूमि के कारण गन्ध का अनुभव करता है, जल के कारण रस का अनुभव करता है, तेजोमय चक्षु के द्वारा रूप को देखता है तथा वायुमय त्वक् के द्वारा स्पर्श का अनुभव करता है। गन्ध नौ प्रकार के हैं तथा रस मुख्यतः छह प्रकार के हैं। वैसे इसके अनेक प्रकार बताये गये हैं। रूप सोलह प्रकार के हैं तथा स्पर्श बारह प्रकार के होते हैं। शब्द के सात प्रकार बताये गये हैं। जल, अग्नि एवं वायु ये तीन देहधारियों में सर्वदा जाग्रत रहते हैं। ये ही प्राणों के मूल हैं तथा प्राणों में ओत-प्रोत होकर शरीर में स्थित होते हैं।’’


इस प्रकार महर्षि भृगु ने भरद्वाज को इस संसार एवं शरीरों के मूलतत्त्व का वर्णन किया। यही जीव है और यही शरीरधारी है। साथ ही यह भी बताया कि प्रलय के समय वे स्वयम्भू मानस में विलीन हो जाते हैं। 


विश्वजीत 'सपन'

Friday, April 19, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग- 76)



महाभारत की कथा की 101 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

मनुष्य जाति की महत्ता

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प्राचीन काल की बात है। काश्यप नामक एक ब्राह्मण था। वह संयमी एवं तपस्वी था, किन्तु उसके पास धन की कमी थी। इस कारण से उसका अधिक सम्मान न हो पाता था। एक दिन की बात है। वह किसी व्यापारी के साथ उसके रथ में जा रहा था। दोनों के मध्य विवाद हो गया। विवाद बड़ा हो गया और क्रोध में आकर उस धनिक ने काश्यप को रथ से धक्का दे दिया। काश्यप नीचे गिर गया और उसके पैर में चोट लगी। वह विचार करने लगा कि उसका जीवन कितना अधम है। एक धनिक भी उससे अधिक सुखी है। उसे लगा कि उसका जीवन व्यर्थ है, अतः उसने आत्मघात करने की सोची। उसकी ऐसी सोच को जानकर इन्द्र एक सियार का रूप धर कर उसके पास आये और बोले - ‘‘हे ब्राह्मण देवता, आपको क्या कष्ट है?’’


    काश्यप ने अपने मन की बात बता दी और कहा कि उसका जीवन व्यर्थ है। तब उस सियार ने कहा - ‘‘ये आप क्या कह रहे हैं? मनुष्य योनि पाने के लिये तो सभी प्राणी उत्सुक रहते हैं। ऐसा दुर्लभ शरीर पाकर आप उसे ही नष्ट करना चाहते हैं? यह कदापि उचित नहीं है।’’


    काश्यप ने कहा - ‘‘किन्तु जब जीवन व्यर्थ लगे, तो क्या करना चाहिये। ऐसे जीवन से जीवन का न होना ही श्रेयस्कर होता है।’’


    सियार ने कहा - ‘‘हे द्विववर, सबके पास किसी न किसी वस्तु की कमी होती ही है। अब देखिये मेरे हाथ नहीं हैं। मेरे शरीर में काँटे चुभे हुए हैं, किन्तु हाथ न होने के कारण मैं उन्हें निकाल नहीं सकता। मुझे कीड़े काट रहे हैं, किन्तु हाथ न होने के कारण उनसे छुटकारा पाना मेरे लिये संभव नहीं है। जिनके हाथ होते हैं, वे वर्षा, घाम या शीत से स्वयं की रक्षा कर सकते हैं। आपके भी हैं, किन्तु आप इस पर दुःखी हैं?’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘तुम नहीं समझोगे। मुझसे अच्छा जीवन तो तुम्हारा है, एक कीड़ा-मकौड़ा भी मुझसे अच्छा जीवन बिताता है।’’


    सियार ने कहा - ‘‘ये आप क्या कह रहे हैं, ब्राह्मण देवता। सभी प्राणी मनुष्य योनि में उत्पन्न होना चाहते हैं। आप न केवल मनुष्य है, बल्कि आप ब्राह्मण भी हैं। ब्राह्मण तो सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ होते हैं। आप वेदवेत्ता भी हैं। इस कारण आप पर ईश्वर की कृपा भी हमेशा ही बनी रहती है। इससे अधिक किसी की क्या कामना हो सकती है? आत्महत्या करना पाप है। मुझे देखिये मैं शृगाल योनि में हूँ। यह नीच है, किन्तु कितने इससे भी नीच हैं। भंगी और चाण्डाल भी अपनी योनियों में प्रसन्न रहते हैं तथा अपना शरीर नहीं छोड़ना चाहते।’’


    काश्यप ने कहा - ‘‘यह सब तो ठीक है, किन्तु धन भी तो होना चाहिये?’’


    सियार ने कहा - ‘‘बिल्कुल, किन्तु उतना ही जितना कि आवश्यक हो, अन्यथा धनी हो जाने पर व्यक्ति राज्य चाहने लगता है। एक बार उसे राज्य प्राप्त हो जाये, तो वह देवत्व प्राप्त करने की कामना करने लगता है। यह एक ऐसी तृष्णा है, जो निरन्तर बढ़ती ही जाती है। इस तृष्णा की अग्नि जल से नहीं बुझती, बल्कि ईंधन से अग्नि के समान वह और भी प्रज्वलित हो जाती है। बुद्धि एवं इन्द्रियाँ ही समस्त कामनाओं एवं कर्मों के मूल में होती हैं। उन्हें ही नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है।’’


    काश्यप ने सियार की बात मान ली और पूछा - ‘‘तो फिर आप ही बताइये कि मुझे क्या करना चाहिये?’’


    सियार ने कहा - ‘‘आपका शरीर नीरोग है एवं आप पूर्णांग हैं। यदि जातिच्युत करने वाला कोई सच्चा कलंक भी लगा हो, तो भी आपको प्राणत्याग का विचार नहीं करना चाहिये, अपितु आपको धर्म पालन करना चाहिये। आप सावधानी से स्वाध्याय एवं अग्निहोत्र कीजिये, सत्य बोलिये, इन्द्रियों को वश में रखिये, दान दीजिये तथा किसी से भी स्पर्धा मत कीजिये। मैं पूर्वजन्म में एक पण्डित था। मैं कुतर्क करके वेद की निंदा किया करता था। वेदों में मेरी आस्था न थी। मैं बातें बनाया करता था तथा अनावश्यक कुतर्क किया करता था। यह शृगाल योनि मेरे उन्हीं कुकर्मों का फल है। अब मैं दिन-रात विचार करता रहता हूँ कि मुझे किस प्रकार मनुष्य योनि की प्राप्ति हो तथा जानने योग्य वस्तुओं को जान सकूँ एवं त्याज्य को त्याग सकूँ। आप एक श्रेष्ठ प्राणी हैं। आप स्वयं विचार कीजिये कि जो बात मैंने कही वह उचित है अथवा नहीं?’’


    काश्यप एक अनुभवी तपस्वी था। उसे प्रतीत हुआ कि वह सियार कोई साधारण प्राणी नहीं था। उसने प्रणाम किया तो इन्द्र अपने स्वरूप में आ गये। काश्यप ने उनको पुनः प्रणाम कर पूजा की तथा उपदेश ग्रहण कर घर आ गया। उसके मन से सभी विकार मिट गये थे। आत्महत्या का विचार भी अब उसे स्पर्श नहीं कर पा रहा था। उस दिन के बाद से उसने धर्म में अपना मन लगा लिया एवं सुख से रहने लगा।

 
    कहा गया है कि मनुष्य जाति बड़ी कठिनाई से मिलती है। इसे प्राप्त करने के बाद सद्कर्मों से इसका लालन-पालन करना चाहिये, ताकि भविष्य में इससे इतर योनि में जन्म न हो, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति हो। 


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, April 13, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 75)





महाभारत की कथा की 100 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 

अजगर व्रत का आचरण

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प्राचीन काल की बात है। समस्त प्रकार के राग, भय, लोभ, मोह एवं क्रोध को त्याग करने वाले एक मुनि हुए। उनका नाम अजगर था। वे अत्यन्त ही शुद्धचित्त एवं निर्विकार थे। उनकी इस वृत्ति को अजगर-वृत्ति के नाम से भी जाना जाता था। एक दिन की बात है। असुरराज प्रह्लाद ने उन्हें देखा और वे उनके बारे में जानने को उत्सुक हो गये। उन्होंने उनके आश्रम में जाकर उन्हें प्रणाम किया, तो अजगर मुनि ने उनसे कहा - ‘‘दैत्यराज, आपका मेरे आश्रम में आने का प्रयोजन क्या है? बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’


    असुरराज प्रह्लाद ने कहा - ‘‘मुनिवर, हम सभी इतना कुछ प्राप्त करने के बाद भी आनन्द का अनुभव नहीं करते, किन्तु आपके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी आप आनन्दित रहते हैं। यह कैसे संभव है?’’


    मुनि ने अपनी मधुर वाणी में कहा - ‘‘इस जगत् के उत्पत्ति, ह्रास, वृद्धि और नाश का कारण प्रकृति ही है। यह जानकर न मैं हर्षित होता हूँ और न ही व्यथित। जितने भी संयोग हैं, उन्हें आप वियोग में समाप्त होने वाले ही समझिये। साथ ही जितने भी संचय हैं, उनका अंत भी विनाश में समझिये। आप देखिये और अनुभव कीजिये कि पृथ्वी पर जितने भी स्थावर एवं जंगम प्राणी हैं, उनकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखती है। गगन में जो समस्त तारे हैं, वे भी एक न एक दिन गिरते ही प्रतीत होते हैं। इस प्रकार समस्त प्रणियों को मृत्यु के अधीन देखकर सबमें समान भाव रखते हुए मैं आनन्द से सोता हूँ। जीवन आनन्द का नाम ही है।’’


    प्रह्लाद की जिज्ञासा बढ़ गयी। उन्होंने पूछा - ‘‘मुनिवर, आपकी वृत्ति क्या है? मुझे थोड़ा विस्तार से बतायें।’’


    मुनि अजगर ने कहा - ‘‘असुरराज, यह जीवन जीने का एक उपाय भर है। अनेक लोग इसे अनेक प्रकार से जीते हैं, किन्तु मेरा अपना मानना है कि यदि अनायास कुछ मिल जाये, तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, तब अधिक भोजन भी हो जाये, तो कोई हानि नहीं और यदि कभी न भी मिले तो कई दिनों तक भूखा रह जाना भी कोई अनुचित नहीं। जब जैसा जो होता है, उसे उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिये। 


मुझे कभी मूल्यवान वस्त्र मिल जाये, तो उसे स्वीकार कर लेता हूँ तथा नहीं मिले तो सन या चर्म के वस्त्र ही धारण कर लेता हूँ। इससे मुझे कोई अन्तर नहीं पड़ता। दैववश कुछ भी पदार्थ प्राप्त होता है, तो उसका कभी त्याग नहीं करता, किन्तु कभी किसी दुर्लभ वस्तु की कामना नहीं रखता। मेरे सोने-बैठने का कोई स्थान नियत नहीं है। मैं स्वभाग से ही यम, नियम, व्रत, सत्य एवं शौच का पालन करता हूँ। यही अजगर वृत्ति है। यह अत्यन्त सुदृढ़, कल्याणमय, शोकहीन, पवित्र एवं अतुलनीय है। मैं सर्वथा अन्तःकरण से इस अजगर-वृत्ति का पालन करता हूँ।’’


    प्रह्लाद ने पूछा - ‘‘हे मुनिश्रेष्ठ, सच में आपने दुर्लभ गति पायी है। आपको किसी लाभ की इच्छा नहीं है और हानि होने पर भी आपको कोई चिन्ता नहीं होती। आप सदा ही तृप्त जान पड़ते हैं। आपके पास ऐसी क्या बुद्धि है अथवा शास्त्रज्ञान है, जिससे आप ऐसा कर पाते हैं? कृपा कर मुझे बताने का कष्ट करें।’’


जन्म-मरण और सुख-दुःख आदि तो विधाता के हाथ में है, ऐसा जानकर ही मैंने भय, राग, मोह एवं अभिमान का त्याग कर दिया है। साथ ही धैर्य एवं बुद्धि को अपनाया है। मन एवं वाणी की उपेक्षा करके इन्द्रियों को वश में कर लिया है। मैं अपने धर्म से कभी च्युत नहीं होता। मुझे किसी फल की इच्छा भी नहीं है। मूढ़मति लोगों को ऐसी बुद्धि दुष्कर प्रतीत होती है, किन्तु इसे सर्वथा निर्दोष तथा अविनाशी मानता हूँ। सबसे बड़ी बात है कि मैं सब प्रकार के दोषों एवं तृष्णाओं को नष्ट कर देता हूँ। इसी कारण मेरी गति परिमित है, मति अविचल है एवं मैं पूर्णतया शान्त हूँ। इस प्रकार मैं बड़े आनन्द से अजगर व्रत का आचरण करता हूँ। यही रहस्य है।’’


कहा जाता है कि जो कोई मनुष्य राग-द्वेष आदि का त्याग कर अजगर वृत्ति का पालन करता है, वह इस लोक में आनन्द से विचरण करता है। उसे शोक एवं दुःख स्पर्श भी नहीं कर पाता है। 


विश्वजीत 'सपन'

Wednesday, April 3, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 74)


महाभारत की कथा की 99 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

गुरुओं से सीख

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पूर्वकाल की बात है। बोध्य नामक एक ऋषि हुआ करते थे। वे परम तपस्वी एवं पूर्णतः विरक्त थे। उनकी ख्याति धरती पर दूर-दूर तक फैली हुई थी। राजा-महाराजा सहित सभी उनके दर्शन करने आते थे एवं उनसे शिक्षा तथा उपदेश ग्रहण करते थे। 


    उसी समय धरती पर राजा नहुष के पुत्र ययाति का राज्य था। राजा ययाति उनसे उपदेश ग्रहण करने की इच्छा से उनके आश्रम गये। बोध्य ने उनका अतिथि के समान स्वागत किया और फल आदि देने के उपरान्त उनसे पूछा - ‘‘राजन्! आपका मेरे आश्रम में स्वागत है। आप किस प्रयोजन से यहाँ पधारे हैं, कृपया मुझे बतायें।’’


    राजा ययाति ने मुनि को प्रणाम करके कहा - ‘‘मुनिवर, आप ज्ञानी हैं एवं संसार के मोहों से मुक्त हैं। आप मुझे उपदेश दें, ताकि मैं भी अपने कर्तव्य का पालन कर सकूँ।’’


    बोध्य मुनि स्पष्टवक्ता एवं अभिमान रहित थे। उन्होंने कहा - ‘‘राजन्! मैं किसी को उपदेश नहीं देता, अपितु मैं स्वयं ही दूसरों के उपदेश के अनुसार आचरण करता हूँ।’’


    राजा ययाति ने कहा - ‘‘मुनिश्रेष्ठ! आप जैसे गुरु की बातें सुनकर ही मनुष्य धन्य हो जाता है। आप मुझ पर कृपा करें एवं बतायें कि ऐसी कौन-सी बुद्धि है जिसका आश्रय लेकर आप शान्त एवं सानन्द रहते हैं।’’


    बोध्य ऋषि ने कहा - ‘‘राजन्! मनुष्य में सीखने की प्रवृत्ति होनी चाहिये। वह कभी भी तथा किसी से भी सीख सकता है। आपकी सीखने की प्रवृत्ति को देखते हुए मैं अपने गुरुओं की बातें आपसे साझा करना चाहता हूँ।’’


    राजा ययाति ने कहा - ‘‘आपके समस्त गुरुओं को मेरा सादर प्रणाम है गुरुवर। आपकी कही एक-एक बात मेरे लिये जीवन-यापन का साधन बनेगा।’’


    बोध्य ने कहा - ‘‘तो सुनिये महाराज! आप किसी को भी अपना गुरु बना सकते हैं, क्योंकि सबसे बड़ी वस्तु सीख होती है। यही जीवन को दिशा प्रदान करती है। मेरे छः गुरु हैं - पिंगला, कुरुरपक्षी, सर्प, सारंग, बाण बनाने वाला एवं कुमारी। आपको पिंगला के जीवन का पता ही होगा।’’


    राजा ने कहा - ‘‘जी गुरुदेव, आपके श्रीमुख से सुनने से अवश्य मेरा कल्याण होगा।’’


    बोध्य ऋषि ने कहा - ‘‘पिंगला निराशा में जीती थी। आशा प्रबल होती है, किन्तु सुख निराशा में होता है। पिंगला एक वेश्या थी, जिसे किसी से प्रेम हो गया था। एक दिन उसकी बाट जोह रही थी, किन्तु वह न आया। उस समय उसने सोचा कि आशा करना व्यर्थ है और वह सुख से रहने लगी। आशा को निराशा में बदलकर जीवन को सुखमय किया जा सकता है।’’


    राजा ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर, यह करुरपक्षी का क्या दृष्टान्त है?’’


    बोध्य ने कहा - ‘‘एक दिन की बात है। एक करुरपक्षी को मांस का एक टुकड़ा मिला। यह अन्य पक्षियों ने देख लिया। उस एक मांस के टुकड़े को पाने के लिये सभी पक्षी उस करुरपक्षी पर झपट पड़े, उसे मारने लगे। तब विचारकर उस करुरपक्षी ने उस मांस के टुकड़े को फेंक दिया। उसे बड़ा चैन मिला। जीवन में यह सीख बड़ी महत्त्वपूर्ण होती है। वस्तु को छोड़ देने से सुख की प्राप्ति होती है, जबकि उसे पकड़े रहने से दुःख होता है।’’


    राजा ययाति ध्यानपूर्वक ऋषि बोध्य की बातें सुन रहे थे। ऋषि ने कहना जारी रखा - ‘‘राजन्! एक सर्प को देखिये, वह अपना बिल कभी नहीं बनाता। वह दूसरे के बिल में जाकर चैन से रहता है। उसे अपना घर बनाने का झंझट ही नहीं है। अपना-अपना से ही दुःख मिलता है। सुख तो तब मिलता है, जब हमें जो है, वही उचित है की संतुष्टि मिलती है, तब सुख प्राप्त होता है। सारंग पक्षी को देखिये। वे अहिंसावृत्ति से कंद, बीज, अनाज आदि ग्रहण करके अपना जीवन यापन करते हैं। वे कभी भी किसी को कोई कष्ट नहीं पहुँचाते। इसी प्रकार का जीवन एक मनुष्य को जीना चाहिये।’’


    राजा ययाति की उत्सुकता बढ़ती जा रही थी कि जीवन को देखने का दृष्टिकोण मुनिवर का कितना निराला था। वे विचार भी कर रहे थे तथा ध्यान से सुन भी रहे थे।


    बोध्य ने कहा - ‘‘एक दिन की बात है। मैंने एक बाण बनाने वाले को देखा। वह अपने कार्य में पूर्णतः निमग्न था। उसी समय उसके पास से राजा की सवारी निकली। उस बाण बनाने वाले को पता भी न चला कि कुछ हो भी रहा था। वह अपने कार्य में दत्तचित्त था। इसी प्रकार प्रत्येक मनुष्य को अपना कार्य करना चाहिये। निमग्नता से कार्यसिद्धि होती है।’’


    राजा ययाति जीवन के रहस्य को समझते जा रहे थे। छोटे-छोटे उदाहरण से ऋषि बोध्य उनको जीवन का ज्ञान प्रदान कर रहे थे।


    बोध्य ने आगे कहा - ‘‘राजन्! मेरे छठे गुरु हैं एक कुमारी कन्या। यह कन्या धान कूट रही थी। उसके हाथ में चूड़ियाँ थीं। जब वह धान कूटती, तो उन चूड़ियों से ध्वनि निकलती थी। इससे उसे बाधा आ रही थी। उसने चूड़ियाँ तोड़ दीं और दोनों हाथों में एक-एक रहने दिया। अब ध्वनि आनी बंद हो गयी। इससे सीख मिलती है कि अधिक लोग एक साथ रहते हैं, तो कलह होती ही है। दो-दो भी रहें, तो भी बातचीत होती ही है, अतः मैं भी जीवन में अकेला रहूँगा एवं विचरण करूँगा, यह निर्णय मैंने लिया। इन छः गुरुओं के अनुसार ही मैं आचरण करता हूँ।’’


    राजा ययाति को अब कुछ पूछने की आवश्यकता न थी। वे सीख चुके थे कि छोटी-छोटी वस्तुयें भी जीवन में सीख प्रदान करती हैं। उचित दृष्टिकोण हो, तो जीवन को सदा के लिये सुखमय बनाया जा सकता है। गुरु मात्र मानव-शरीरधारी नहीं होते, वे कुछ भी तथा कोई भी हो सकते हैं।   


Sunday, March 24, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग-73)




महाभारत की कथा की 98 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

कामत्याग की महिमा

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पुरातन काल की बात है। मंकि नामक एक व्यक्ति था। वह धन प्राप्त करना चाहता था, किन्तु उसका प्रत्येक प्रयास असफल हो जाता था। इस प्रकार उसका जीवन कष्टमय था। बार-बार के प्रयास के असफल हो जाने से वह बड़ा दुःखी रहता था और हमेशा कुछ नया करने पर विचार करता रहता था। बड़ा सोच-विचारकर उसने निर्णय लिया कि वह दो बछड़ों को खरीदेगा। उन बछड़ों को पाल-पोसकर बड़ा करेगा और फिर उनसे धनोपार्जन करेगा। ऐसा विचार कर उसने अपने बचे-खुचे धन से दो बछड़े खरीद लिये। उन्हें बड़े स्नेह से पालने लगा। समय बीतता गया।


एक दिन उसने सोचा कि क्यों न अब इन्हें प्रशिक्षित किया जाये, ताकि धन उपार्जित करने का अवसर मिले। यही सोचकर उसने उन्हें साधने के लिये जुए में जोत दिया। मार्ग में चलते समय उसने देखा कि कुछ दूरी पर एक ऊँट बैठा हुआ था। बछड़े पहली बार जुए में जुते थे। उन्हें इस तरह बँधना अच्छा नहीं लग रहा था। पता नहीं उन्हें क्या सूझाी कि वे उस ऊँट को बीच में करके उसकी ओर दौड़ने लगे। मंकि को लगा कि वे ऊँट से टकरा जायेंगे। उसने बड़ा प्रयास किया कि बछड़ों की दिशा ठीक हो, किन्तु वे बछड़े भी हठ में थे और माने नहीं। जब वे ऊँट की गर्दन के पास आये, तो ऊँट भी घबरा गया। वह उठ गया और भागने लगा। इस प्रकार वे दोनों बछड़े ऊँट की गर्दन में लटक गये। बछड़ों के इस प्रकार के अपहरण से एवं गर्दन दबने से उनको मरते देखकर मंकि ने कहा - ‘‘मनुष्य कितना भी चतुर क्यों न हो, किन्तु जो उसके भाग्य में नहीं होता तो प्रयत्न करने पर भी उसे धन की प्राप्ति नहीं हो सकती।’’


बेचारा मंकि बस देख रहा था। वह ऊँट उसके दो बछड़ों को अपने गले में लटकाये इधर-उधर भागा जा रहा था। बछड़ों के गले की घण्टी से और भी घबरा रहा था। मंकि यह सब देखकर विचार करने लगा कि यह सब दैव-लीला ही है। यदि किसी को कुछ मिलता है, तो खोजने पर दैव का ही किया जान पड़ता है। यदि कुछ नहीं मिलता तो उनकी ही कृपा के कारण होता है। दैव ने मुझे धन से मुक्ति लेने का संदेश दिया है। मुझे इस इच्छा से मुक्ति पा लेनी चाहिये। कहते हैं कि यदि सुख की इच्छा हो तो वैराग्य का आश्रय लेना चाहिये। जो मनुष्य धन की इच्छा त्याग देता है, वही सुख की नींद सोता है। सही है, शुकदेव मुनि ने कहा था - ‘जो मनुष्य अपनी समस्त कामनाओं को पा लेता है और जो उसका सर्वथा त्याग कर देता है, तो उन दोनों में कामनाओं को पाने वाले की अपेक्षा त्याग करने वाला ही श्रेष्ठ होता है।’


मंकि अपने घर वापस लौट गया और विचार करने लगा कि उसे अब क्या करना चाहिये? उसे शुकदेव जी की उक्ति के अनुसार ही विषयासक्ति को छोड़ देनी चाहिये, क्योंकि उसने बार-बार प्रयास किया, किन्तु उसकी अर्थवासना ने मात्र छकाया ही। उसे प्रतीत होने लगा कि अर्थवासना का वह खिलौना बना हुआ है। धन निश्चय ही संकल्प से उपजता है, तो उसे इस संकल्प को ही छोड़ देना चाहिये, ताकि वह समूल नष्ट हो जाये। उसे आज समझ आया कि यह संकल्प ही दुःख का कारण है। यदि प्राप्त हो जाये तो चिंता बनी रहती है और बढ़ती भी रहती है। यदि मिल जाये तो और भी पाने की तृष्णा बढ़ती जाती है। इसका कोई अंत नहीं है। फिर यदि धन होने का संदेह हो तो लुटेरे उस धन को पाने के लिये मार डालते हैं अथवा नाना प्रकार की पीड़ायें देते हैं। इससे तो धन का न होना ही श्रेयस्कर जान पड़ता है। 


मंकि ने निश्चय किया और मन ही मन कहा - ‘‘अरे काम, तेरा पेट भरना बड़ा कठिन कार्य है। तू पाताल से समान दुष्पूर है। तू मुझे दुःखों में फँसाना चाहता है। मैं तेरे बनाये इस जाल में नहीं फँस सकता। आज दैववश मेरे धन का नाश हो गया, किन्तु आज ही मुझे वैराग्य प्राप्त हुआ। मैं जान गया कि भोगों की इच्छा ने मुझे बाँध रखा था, किन्तु अब नहीं। आज के बाद से मैं तृप्त और स्वस्थचित्त रहूँगा। जो कुछ अनायास ही प्राप्त होगा, उसी से निर्वाह कर लूँगा। अब काम, लोभ, तृष्ण या कृपणता का प्रभाव मुझ पर नहीं हो सकता। मैं आज से ही सत्त्वगुण में स्थित हो गया हूँ। मैं अब अज्ञानियों की भाँति लोभ में पड़कर दुःख नहीं पाऊँगा। सच तो यही है कि मनुष्य जिस-जिस कामना को छोड़ देता है, उसी की ओर से सुखी हो जाता है और कामना के वशीभूत होकर ही दुःख पाता है। आज से मैं परब्रह्म में प्रतिष्ठित हूँ, पूर्णतया शान्त हूँ। मुझे असीम आनन्द का अनुभव हो रहा है।’’


इस प्रकार की बुद्धि पाकर मंकि विरक्त हो गया। उसने सभी प्रकार की कामनाओं का त्याग कर दिया एवं ब्रह्मानन्द को प्राप्त किया। दो बछड़ों के नाश से ही उसे अमरत्व की प्राप्ति हुई। उसने काम की जड़ें काट दीं और अत्यन्त सुखी हो गया।


यदि मनुष्य को नाना प्रकार से उद्योग करने पर भी धन की प्राप्ति न हो, तो उसे इन पाँच बातों का अनुसरण करना चाहिये - सबके प्रति समताभाव रखना, धनादि के लिये विशेष उपक्रम न करना, सत्य भाषण करना, भोगों से विरक्त रहना एवं कर्म में आसक्त न होना। ऐसा करने से उसे सर्वथा सुख की प्राप्ति होती है। यही शास्त्र कहते हैं।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, March 14, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 72)




महाभारत की कथा की 97 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

जीवन क्या है?

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एक प्रचीन इतिहास है। किसी स्वाध्यायशील ब्राह्मण का मेधावी नामक एक पुत्र था। मेधावी अपने नाम के गुणों वाला था। वह धर्म, अर्थ एवं मोक्ष को भली-भाँति जानने-समझने वाला था। एक दिन की बात है। उसने अपने पिता से कहा - ‘‘पिताजी, मनुष्य की आयु बड़ी तेजी से बीतती जा रही है। उसके पास कम समय होता है। ऐसे में उसे धर्माचरण के लिये क्या करना चाहिये?’’


    पिता ने समझाते हुए कहा - ‘‘बेटा, मनुष्य को चारों आश्रमों का पालन करना चाहिये। सर्वप्रथम उसे ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए वेदाध्ययन करना चाहिये, उसके उपरान्त गृहस्थ आश्रम में प्रवेश कर अपने पितरों की सद्गति के लिये पुत्र उत्पन्न करना चाहिये, फिर यज्ञादि करना चाहिए। कुछ समय बाद उसे वानप्रस्थ आश्रम का पालन करना चाहिये तथा अंत में संन्यास ग्रहण कर वन-गमन करना चाहिये। यही जगत का नियम है एवं शास्त्रों के अनुसार जीवन यापन करने का मूल सिद्धान्त हैं।’’


    मेधावी इस अनित्य जगत् को सत्य नहीं मानता था। उसने पूछा - ‘‘पिताजी, आपकी बात शास्त्रों के अनुसार उचित है, किन्तु मुझे तो यह लोक बड़ा ही ताड़ित तथा सब ओर से घिरा हुआ प्रतीत होता है। इसमें अमोघ वस्तुओं का पतन हो रहा है। इस प्रकार की बातों से जीवन-यापन कैसे किया जा सकता है?’’


    पुत्र की बात सुनकर पिता को आश्चर्य भी हुआ एवं गर्व भी। पिता ने कहा - ‘‘पुत्र, तुमको यह लोक ताड़ित कैसे लग रहा है?’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘पिताजी, मृत्यु को देखिये वह किसी को नहीं छोड़ती। प्रत्येक रात्रि के बीतने पर आयु क्षीण हो रही है। मेरे अथवा आपके कहने पर भी मृत्यु नहीं रुक सकती। हम निरन्तर भोगों के संग्रह में लगे रहते हैं, किन्तु मृत्यु हमें उठाकर ले जाती है। बुढ़ापा सबको आना ही है। अमोघ रात्रियाँ नित्य ही आती हैं एवं चली जाती हैं। पिताजी, इस जगत में मृत्यु, जरा, व्याधि तथा अनेक प्रकार होने वाले दुःखों का ताँता लगा ही रहता है, तो यह लोक इतना अधिक ताड़ित है। यह जीवन की विधि नहीं हो सकती। हम तो सब ओर से घिरे हुए लगते हैं।’’


    पिता ने पूछा - ‘‘और ऐसा क्या है, जो हमें सब ओर से घेरे हुए हैं? इनमें कौन-कौन-सी अमोघ वस्तुओं के पतन हो रहे हैं? इसे थोड़ा विस्तार से बताओ।’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘पिताजी, मनुष्य मोह में घिरा रहता है। उसे भोग की इच्छा घेरे रहती है। उसके पास पुत्र एवं पशुओं की अधिकता होती है तथा उन्हीं में उसका मन आसक्त रहता है। अनेक प्रकार की वस्तुओं की लालसा उसे पूर्णतः घेरे रहती है। स्त्री एवं पुत्रों में आसक्ति तो जीव को बाँधने वाली रस्सी के समान ही है। मात्र पुण्यात्मा पुरुष ही इसे काटकर निकल पाते हैं। पापी पुरुष इसे काट नहीं सकते। यह संसार जैसा दिखाई देता है, वैसा कदापि नहीं है।’’


    पिता ने पुत्र की बात को समझकर पूछा - ‘‘तुम्हारी बात उचित है पुत्र, किन्तु तब एक मनुष्य को क्या करना चाहिये? उसे किस प्रकार का जीवन जीना चाहिये? शास्त्रगत जीवन ही तो उचित होना चाहिये।’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘सत्य ही जीवन का आधार होना चाहिये। मनुष्य को सत्ययोग में तत्पर रहना चाहिये, क्योंकि सत्य में ही अमृततत्त्व है। उसे अपनी इन्द्रियों का दमन करना चाहिये। अमृत एवं मृत्यु दोनों ही एक शरीर में विद्यमान होते हैं। मोह से मृत्यु प्राप्त होती है, जबकि सत्य से अमरत्व प्राप्त होता है। हमें हमेशा ही सत्य की खोज करनी चाहिये। हिंसा से दूर रहना चाहिये। काम एवं क्रोध को मन से निकाल देना चाहिये। सुख-दुःख में समान रहना चाहिये। जिसमें दूसरों को सुख मिले, ऐसा आचरण करना चाहिये, तब वह मृत्यु के भय से मुक्त हो सकता है। यह भय से मुक्ति ही समस्त प्रकार के अज्ञान के अंधकार को दूर कर देता है। यही जीवन का मूल आधार है।’’


    पिता ने कहा - ‘‘यह सब जानते हुए भी मनुष्य ऐसा आचरण क्यों नहीं करता?’’


    मेधावी ने कहा - ‘‘पिताजी, यह सब अज्ञानता के कारण होता है। ज्ञान के समान कोई नेत्र नहीं एवं सत्य के समान कोई तप नहीं। राग के समान कोई दुःख नहीं एवं त्याग के समान कोई सुख नहीं। सत्य तो यही है कि एक ब्राह्मण के लिये एकान्तवास, समता, सत्य-भाषण, सदाचार, अहिंसा, सरलता तथा सब प्रकार के काम्य कर्मों से निवृत्ति से बढ़कर कोई धन नहीं होता। ऐसे में किसी अन्य प्रकार के धन की प्रवृत्त होना ही अनुचित है।


    एक बार सोचिये। कल जो थे, आज नहीं हैं। आज जो हैं, वे कल नहीं रहेंगे। फिर धन, स्वजन, स्त्री, पुत्र आदि से हमें क्या लेना-देना? हमें तो अपने अन्तःकरण में स्थित आत्मा को खोजना चाहिये। यही एक ब्राह्मण एवं किसी भी मनुष्य का ध्येय होना चाहिये।’’ 


    इस प्रकार मेधावी ने अपने पिता को बताया कि वास्तविक जीवन क्या है तथा हमें किस प्रकार का जीवन जीना चाहिये। प्रत्येक मनुष्य का कर्तव्य है कि वह जीवन को समझे तथा सत्य की खोज करते हुए जीवन को उचित मार्ग पर लेकर चले, ताकि मृत्यु जैसे सत्य का भय दूर हो सके एवं जीवन का सुख प्राप्त हो सके। मनुष्य जीवन ईश्वर का वरदान है। इसे ईश्वर को समर्पित कर देना चाहिये।


विश्वजीत 'सपन'

Thursday, February 28, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 71)



महाभारत की कथा की 96 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

शोकाकुल चित्त की शान्ति

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    प्राचीन काल की बात है। सेनजित् नामक एक राजा था। उसका जीवन बड़ा सुखमय था। दैवयोग से एक दिन उसे पुत्र वियोग हो गया। उसका पुत्र कहीं चला गया। प्रयास करने पर भी न मिला। तब वह शोकातुर हो गया। इस प्रकार उसे देखकर एक ब्राह्मण ने उससे कहा - ‘‘राजन्! आप एक मूढ़ मनुष्य की भाँति मोहित हो रहे हैं। यह किसी भी बुद्धिमान व्यक्ति के लक्षण नहीं हैं। आपको शोक नहीं करना चाहिये।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘आपकी बात उचित जान पड़ी है ब्राह्मण देवता, किन्तु मनुष्य इस शोक से कैसे छुटकारा पा सकता है? आप ही कुछ उपाय बतायें।’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘सुनिये राजन्, मैं इस शरीर अथवा पृथ्वी को अपनी नहीं मानता। यह जैसी दूसरों की है, वैसे ही मेरी भी है। इस प्रकार सोचने से मुझे व्यथा नहीं होती।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘किन्तु, मेरा पुत्र मुझसे बिछड़ गया है। वह मेरा अपना है। इस दुःख से कैसे छुटकारा मिल सकता है?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘जिस प्रकार समुद्र में दो लकड़ियाँ मिलती हैं और पुनः अलग-अलग हो जाती हैं, ठीक उसी प्रकार मानव के जीवन में अनेक लोग आते हैं और अलग हो जाते हैं। यह क्रम चलता रहता है। आपका पुत्र किसी अज्ञात स्थान से आया था और किसी अज्ञात स्थान को चला गया। यही नियम है। संसार में विषयतृष्णा से जो व्याकुलता होती है, उसी का नाम दुःख है। इस दुःख का नाश ही सुख है।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘ऐसी स्थिति क्यों होती है देव? क्या यह सभी के साथ होती है अथवा किसी विशेष कारण से होती है?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘मनुष्य अनेक प्रकार के बंधनों में फँसे होते हैं। जल में बालू का पुल बनाने वालों की भाँति अपने कार्यों में असफल होने दुःख पाते हैं। जिस प्रकार एक बूढ़ा हाथी दलदल में फँसकर अपने प्राण खो बैठता है, ठीक उसी प्रकार मानव पुत्र, स्त्री, कुटुम्ब आदि की आसक्ति में फँसकर शोक के समुद्र में डूबे रहते हैं। जब पुत्र, धन अथवा बन्धु-बान्धवों का नाश होता है, तो वे दुःख के सागर में गोते लगाने लगते हैं। उसे जान लेना चाहिये कि सुख-दुःख एवं जीवन-मृत्यु सब दैव के अधीन होता है।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘इसे कैसे समझें और इसे समझने वाली आप जैसी बुद्धि हमें किस प्रकार आ सकती है? कृपया विस्तार से बतायें।’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘राजन्! आपने उचित कहा। संसार की गति को कोई बुद्धिमान ही समझ सकता है। बुद्धियोग का सुख जिन्हें प्राप्त है, उन्हें हर्ष अथवा शोक छू भी नहीं सकता। शोक के सहस्रों स्थल हैं, भय के सैंकड़ों अवसर हैं, किन्तु बुद्धिमानों पर इनका प्रभाव नहीं पड़ता। जो बुद्धिमान, विचारशील, शास्त्राभ्यासी, ईर्ष्याहीन, संयमी एवं जितेन्द्रिय होता है, उसे शोक स्पर्श भी नहीं कर सकता।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘इस प्रकार शोकहीन बनने के लिये हमें क्या करना चाहिये ब्राह्मण देवता?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘राजन्! एक बुद्धिमान पुरुष को चाहिये कि वह सुख या दुःख, प्रिय अथवा अप्रिय जो-जो भी प्राप्त हो उनका सामना उत्साह से करे, कभी भी हिम्मत न हारे। उसे अपने निश्चय पर डटा रहना चाहिये एवं संयत चित्त से व्यवहार करना चाहिये। जब सत्य एवं असत्य, शोक एवं आनन्द, भय एवं अभय तथा प्रिय एवं अप्रिय इन सभी का कोई त्याग कर देता है, तब वह परम शान्तचित्त हो जाता है।’’


सेनजित् ने कहा - ‘‘आपने उचित कहा ब्राह्मण देवता, किन्तु ऐसा दुःख हमें होता ही क्यों है? इसका अंत कब होता है?’’


ब्राह्मण ने कहा - ‘‘सुनिये राजन्, मनुष्य बु़िद्धमान हो अथवा मूर्ख, शूरवीर हो अथवा कायर, उसे अपने पूर्वजन्म के कर्मों के कारण शुभ एवं अशुभ दोनों प्रकार के फल भोगने ही होते हैं। इस प्रकार जीवों को प्रिय एवं अप्रिय तथा सुख एवं दुःख बारी-बारी से प्राप्त होते ही रहते हैं। जब दुःख का नाश होता है, तब सुख का उदय होता है। इस सुख-दुःख का चक्र हमेशा ही घूमता रहता है। आज आपको दुःख है, तो कल आपको सुख मिलेगा। यह निश्चित है। सबसे बड़ी बात है कि जो प्राणों के साथ जाने वाला रोग है, उस तृष्णा का जो त्याग देता है, वह सुखी हो जाता है। इस सम्बन्ध में पिंगला की गाथा प्रसिद्ध है। उसे सुनिये आपका दुःख दूर हो जायेगा।


पिंगला नाम की एक वेश्या थी। वह एक बार अपने प्रेमी की प्रतीक्षा में बड़ी देर तक बैठी रही। उसका प्रेमी नहीं आया। तब उसने विचार किया कि इतने दिनों तक मैं अपने प्रेम को पहचान न सकी। मेरा प्रेमी मेरे पास था, किन्तु मुझे ज्ञात न हो सका। तो यह कामना ही व्यर्थ है। आज से मैं समस्त कामनाओं को तिलांजलि देती हूँ। भोगों का रूप धारण करके ये नरकरूपी धूर्त मनुष्य अब मुझे धोखा नहीं दे सकते। मुझे अब कोई आशा नहीं रह गयी। अब मैं सुख की नींद सो सकती हूँ। इस प्रकार विचारकर पिंगला ने अपना जीवन सुखमय कर लिया था। ठीक उसी प्रकार आपको भी समस्त आशाओं का त्याग कर अपने जीवन को सुखमय बनाना होगा।’’


ब्राह्मण की बातें सुनकर सेनजित् का दुःख सदा के लिये चला गया। कहते हैं कि मानव-जीवन में शोक होना अवश्यम्भावी होता है, किन्तु उससे संतप्त होने वाला कभी सुखी नहीं रहता। अतः दुःख का त्याग करना ही मनुष्य का लक्ष्य होना चाहिये।


विश्वजीत 'सपन'

Wednesday, February 20, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 70)


महाभारत की कथा की 95 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

प्रायश्चित्त ही पाप का निवारण

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पूर्वकाल की बात है। राजा परिक्षित का पुत्र जनमेजय बड़ा पराक्रमी राजा था। एक दिन की बात है, उसे बिना जाने ही ब्रह्महत्या का पाप लग गया। पुरोहित एवं ब्राह्मणों ने उसका त्याग कर दिया। इस प्रकार वह अकेला हो गया। उससे राज्य का कार्य भी अच्छी तरह से देखा न जाता था। वह पाप की अग्नि में जलने लगा। कुछ उपाय न जानकर इस पाप से मुक्ति के लिये वह वन में जाकर तप करने लगा। अनेक वर्षों तक उसने तप किया, किन्तु उसे संतुष्टि न मिली। तदुपरान्त वह इधर-उधर भटकने लगा। उसने इस दौरान अनेक लोगों से अपने पाप के प्रायश्चित्त के बारे में पूछा, किन्तु उसे कोई समाधान न मिला। हाँ एक सुझाव मिला कि वह महातपस्वी शुनकवंशी इन्द्रोक्त मुनि के पास जाये। वही उनका कल्याण कर सकते थे। तब वह दीन-हीन बनकर मुनि इन्द्रोक्त के आश्रम गया।


मुनि ने उसे देखते ही कहा - ‘‘अरे महापापी, ब्राह्मण को मारने के कारण तेरा चित्त अशुद्ध हो गया है। तुम्हारा जीवन व्यर्थ है। तू अभी यहाँ से चला जा। तेरे जैसे पापी का इस आश्रम में कोई कार्य नहीं। तू नीच है, पापी है।’’


जनमेजय ने कहा - ‘‘मुने! मैं अवश्य ही धिक्कार के योग्य हूँ। मैं पापी हूँ, किन्तु इसकी चिंता करते हुए मुझे तनिक भी चैन नहीं है। आपके पास इस कारणवश आया हूँ कि आप इससे मुक्ति का कोई उपाय बतायें। मेरी रक्षा कीजिये। आप तो ज्ञानी हैं। आपको मेरे जैसे पापी को क्षमा कर देना चाहिये। मुनियों का धर्म ही क्षमा करना होता है।’’
इन्द्रोक्त मुनि कुछ शान्त हुए तथा बोले - ‘‘ठीक है, तुमने उचित कहा। यदि तुम सच में इससे मुक्ति की कामना रखते हो, तो जाओ ब्राह्मणों की शरण लो। उनसे ही तुम्हारे परलोक की रक्षा होगी। यदि तुम अपने पापों का पश्चात्ताप करते हो, तो अपनी गति धर्म में रखो। ऐसे कर्म करो जिससे तुम्हें शान्ति मिले।’’


जनमेजय ने कहा - ‘‘उचित कहा आपने मुनिवर। मैं अपने पापकर्म से संतप्त हूँ। मैं आज के बाद से कभी भी धर्म का लोप नहीं करूँगा। किसी भी अवस्था में धर्म का पालन करूँगा। मुझे कल्याण की इच्छा है तथा इसी कारण आपकी शरण में आया हूँ। मुझ पर कृपा कीजिये। आपकी कृपा के बिना मेरा जीवन व्यर्थ है। इस पाप के कारण मेरा जीना भी व्यर्थ है।’’


इन्दोक्त मुनि कहा - ‘‘तुम बदल गये लगते हो। इसी कारण मैं तुम्हें स्वीकार करता हूँ। तुम समस्त प्राणियों के हित में तत्पर रहो। धर्म को कभी न छोड़ो। ब्राह्मणों के प्रति हमेशा सद्भव रखो। आज यह प्रतिज्ञा करो कि ब्राह्मणों से कभी द्रोह न करूँगा।’’


जनमेजय ने कहा - ‘‘हे गुरुवर, मैं आपके चरणों को स्पर्श करके प्रतिज्ञा करता हूँ कि अब कभी भी मन, वचन या कर्म से ब्राह्मणों के प्रति द्रोह नहीं करूँगा।’’


मुनि इन्द्रोक्त ने राजा के चरण-स्पर्श पर उसको आशीर्वाद देते हुए कहा - ‘‘राजन्! तुम्हारा चित्त बदल गया है। अतः अब मैं तुम्हें धर्म का उपदेश दूँगा। इसे ध्यान से सुनो।


यदि राजा दुश्चरित्र हो तो वह समस्त राज्य को संतप्त कर डालता है। एक मनुष्य उदार, सम्पन्न अथवा कृपण या तपस्वी कुछ भी हो सकता है। इस बात का ध्यान रखना आवश्यक है कि बिना विचार के किये गये कर्म से दुःख ही मिलता है। यज्ञ, दान, दया, वेद एवं सत्य - ये पाँचों पवित्र हैं। इसके अलावा विधिपूर्वक किया गया तप परम-पवित्र है। यही किसी राजा को पूर्णतः पवित्र करने वाला होता है। पवित्र स्थलों की यात्रा से भी पुण्य मिलता है। सरस्वती नदी सबसे पवित्र है। इसमें स्नान करो एवं स्वयं को पवित्र करो। नियम बना लो कि तुम कभी ब्राह्मणों का तिरस्कार न करोगे। तुमने पश्चात्ताप किया, तो तुम्हें उस पाप से आवश्य मुक्ति मिलेगी। कभी दुबारा पाप हो जाये, तो पुनः उचित रूप से उसका पश्चात्ताप करना चाहिये। अग्नि की उपासना एक वर्ष तक करो। तुम्हारा पाप दूर हो जायेगा। कहा गया है कि जिस मनुष्य ने जितने प्राणियों की हिंसा की हो, यदि वह उतने प्राणियों की प्राण-रक्षा करता है, वह पापमुक्त हो जाता है। मनु जी का कहना है कि जल में डुबकी लगाकर तीन बार अघमर्षण मन्त्र का जाप करने से उसी प्रकार पाप नष्ट हो जाता है, जिस प्रकार अश्वमेध यज्ञ के बाद अवभृथ स्नान करने से होता है। बृहस्वति जी का कहना है कि यदि कोई मनुष्य बिना जाने कोई पाप कर देता है, तो उसे बुद्धिपूर्वक पुण्यकर्म करने चाहिये। इस प्रकार उसका पूर्व का पाप नष्ट हो जाता है।’’


इस प्रकार समाधान बताने के बाद मुनि इन्द्रोक्त ने राजा जनमेजय से विधिपूर्वक अश्वमेध यज्ञ करवाया, जिससे उसके सारे पाप धुल गये। उसके बाद उसने धर्म में अपनी गति रखी तथा अनेक वर्षों तक सच्ची निष्ठा से प्रजा की सेवा करते रहे।


पाप चाहे जान-बूझकर हो अथवा अनजाने में, उसका निवारण करना ही उचित होता है। पाप धुलने के उपरान्त पुनः पापकर्म न हो, तभी जीवन सुखमय रहता है तथा ईश्वर की कृपा बनी रहती है। 


विश्वजीत 'सपन'

Friday, February 8, 2019

महाभारत की लोककथा - (भाग 69)




महाभारत की कथा की 94 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

पाप का निवारण
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प्राचीन काल की बात है। तब राजा को यदि कुछ शंका होती थी, तो वे अपने राज्य के ऋषि-मुनियों से उसका समाधान पूछते थे। वे ऋषि-मुनि भी उनकी समस्याओं अथवा पृच्छाओं के उचित समाधान किया करते थे। एक बार राजा अंगरिष्ठ को इसी प्रकार की शंका हुई, तो कामन्दक ऋषि के पास गये। ऋषि ने आश्रम पर उनका अतिथि के समान उचित स्वागत एवं सत्कार किया और बोले - ‘‘कहिये राजन्, हमारे आश्रम पर आपके आने का प्रयोजन क्या है? मैं आपकी क्या सहायता कर सकता हूँ।’’


राजा ने कहा - ‘‘मुनिवर! आप सभी तो जीवन से विलग होकर अपना जीवन यापन करते हैं, अतः आपसे कोई अनुचित कर्म नहीं होता, किन्तु हम सभी एक सामान्य जीवन जीते हैं, ऐसे में अनेक स्थितियों का सामना करना पड़ता है। तब निर्णय लेना कठिन हो जाता है।’’


ऋषि ने कहा - ‘‘आपकी बात उचित है महाराज। आपने जीवन की सच्चाई का अनुभव किया है। बताइये आपकी शंका क्या है?’’


राजा ने कहा - ‘‘धर्म, अर्थ एवं काम का निर्णय कैसे करना चाहिये? ये कहीं एक साथ मिले हुए एवं कहीं अलग-अलग क्यों रहते हैं?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘जब मनुष्यों का चित्त शुद्ध होता है तथा वे धर्मपूर्वक किसी अर्थ की प्राप्ति में प्रवृत्त होते हैं, तो उस समय धर्म, अर्थ एवं काम तीनों ही एक साथ मिले हुए प्रतीत होते हैं। धर्म, अर्थ का कारण होता है एवं काम, अर्थ का फल कहा जाता है। यहाँ दर्शनीय बात यह है कि इन तीनों का मूल कारण संकल्प होता है। संकल्प ही विषय होते हैं, जो इन्द्रियों के उपभोग करने के लिये बने होते हैं। फल की इच्छा धर्म का मल होता है। साथ ही छुपाकर धन को रखना, उसका कोई उपयोग न करना, स्वार्थ-सिद्धि हेतु उपभोग कराना आदि अर्थ का मल होता है। संतान की उत्पत्ति के आलावा आमोद-प्रमोद करना काम का मल होता है। इनसे मुक्ति पाना ही मनुष्यों का कर्तव्य होना चाहिये।’’


राजा ने पूछा - ‘‘धर्म, अर्थ एवं काम से जीवन का उद्देश्य किस प्रकार साधा जा सकता है?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘फलेच्छा को त्यागना आवश्यक होता है राजन्। जब बिना परिणाम की इच्छा करते हुए इस त्रिवर्ग का सेवन किया जाये, तो अंतिम लक्ष्य मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस बात का अवश्य ध्यान रखें कि अर्थ के लिये धर्मानुष्ठान करने पर कभी अर्थ की सिद्धि होती है तथा कभी नहीं। कभी-कभी कामों से भी अर्थ की सिद्धि संभव है, किन्तु अर्थ नष्ट भी होते रहते हैं। नष्ट नहीं होने वाला कार्य मोक्ष है। इसी को ध्यान में रखकर जीवन जीना चाहिये।’’


राजा ने कहा - ‘‘जीवन में हमें किस प्रकार की सावधानी रखनी चाहिये कि पाप न हो?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘राजन्! जो धर्म एवं अर्थ का परित्याग कर देता है तथा मात्र काम का ही सेवन करने लगता है, तब उसकी बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है। यही मोह है, जो धर्म एवं अर्थ दोनों को नष्ट कर देता है। इसी कारण से व्यक्ति में नास्तिकता आ जाती है तथा वह दुराचारी हो जाता है। अतः सभी प्रकार के मोहों से बचने की आवश्यकता होती है।’’
राजा ने कहा - ‘‘मुनिवर, हम सावधानी रखें, फिर भी पाप हो जाता है। ऐसे में हमें क्या उपाय करना चाहिये?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘उचित है महाराज, मनुष्य इन्द्रियों का दास होता है। यदि हमने अपनी इन्द्रियों को वश में नहीं किया, तो पापाचार होने की संभावना बनी ही रहती है। एक मनुष्य को चाहिये कि कभी भी इन्द्रियों का दास न बने।’’


राजा ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर, मान लीजिये कि कभी एक राजा काम एवं मोह के वशीभूत होकर पाप कर बैठे, किन्तु बाद में उसे पश्चात्ताप भी हो, तो ऐसे पाप को दूर करने का क्या उपाय हो सकता है?’’


ऋषि ने कहा - ‘‘सर्वप्रथम तो एक राजा को इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि यदि वह पापाचार करता है, तो प्रजा उसका साथ नहीं देती। साधु एवं ब्राह्मण भी उसका साथ छोड़ देते हैं। उसका अंत कभी भी भला नहीं होता। अतः उसे अपने पापों की निंदा करनी चाहिये। उसे निरन्तर वेदों का अध्ययन करना चाहिये तथा ब्राह्मणों का सत्कार करना चाहिये। उसे अपना मन धर्म में लगाना चाहिये। उसे उदार एवं क्षमाशील बनकर प्रजा की सेवा करनी चाहिये। जल में खड़ा होकर गायत्री मंत्र का जाप करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करनी चाहिये। उसे पापियों को राज्य से बाहर निकलवाकर धर्मात्माओं के साथ सत्संग करना चाहिये। मीठी वाणी एवं उत्तम कर्म के द्वारा सभी को प्रसन्न करना चाहिये। गुणवान् लोगों की प्रशंसा करनी चाहिये तथा गुणहीनों की निन्दा। राजन्, जो भी राजा अपना आचारण इस प्रकार का बना लेता है, उसे शीघ्र ही प्रजा का सम्मान प्राप्त हो जाता है। ऐसा आचरण करते रहने से वह निष्पाप हो जाता है एवं प्रजावत्सल कहलाता है।’’ 


इसके बाद राजा अंगरिष्ठ ने मुनि को प्रणाम किया और अपनी राजधानी लौट गये। उनकी शंका का समाधान हो चुका था। उन्होंने मुनि के बताये गये मार्ग का पालन किया और अनेक वर्षों तक सुख से प्रजा-पालन करते रहे।
 

विश्वजीत 'सपन'

Friday, February 1, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 68)




महाभारत की कथा की 93 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

दण्ड की उत्पत्ति
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    प्राचीन काल की बात है। अंगदेश के राजा वसुहोम थे। वे बड़े ही धर्मात्मा थे। उनका ध्यान हमेशा धर्म में लगा रहता था। एक बार वे हिमालय पर मुंजपृष्ठ नामक स्थल पर गये। यह वही शिखर है, जहाँ कभी परशुराम ने अपनी जटायें बाँधी थी। इसी कारण इसका नाम ‘मुंजपृष्ठ’ पड़ा। वहाँ जाकर उन्होंने वेदोक्त गुणों को अपनाया एवं अपनी रानी के साथ रहने लगे। उनके तप का प्रताप दूर-दूर तक फैलने लगा। वे महर्षि के तुल्य हो गये।


    एक दिन की बात है। राजा मन्धाता उनके दर्शन करने के लिये गये। उन्हें दण्ड की उत्पत्ति के बारे में जानने की बड़ी उत्सुकता थी। महाराज वसुहोम उस समय ध्यानमग्न थे। राजा मन्धाता विनीत होकर वहीं खड़े होकर प्रतीक्षा करने लगे। जब वसुहोम का ध्यान टूटा, तो उन्होंने मन्धाता को देखा। उनको पूरा सम्मान देकर उनसे कुशल-क्षेम पूछा। समस्त प्रजा का हाल पूछने के उपरान्त उन्होंने मन्धाता से कहा - ‘‘महाराज! मुझे बताइये कि मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ? आप किस प्रयोजन से यहाँ आये हैं?’’


    मन्धाता ने कहा - ‘‘राजन्! आपने बृहस्पति के सिद्धान्तों का अध्ययन किया है, साथ ही शुक्राचार्य की नीति का भी। कृपया मुझे यह बताने की कृपा करें कि दण्ड की उत्पत्ति कैसे हुई?’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘महाराज! कहा जाता है कि एक बार पितामह ब्रह्मा जी ने यज्ञ की इच्छा की, किन्तु उन्हें कोई योग्य ऋत्विज् दिखाई न पड़े। तब उन्होंने मस्तक पर एक गर्भ धारण किया। वह गर्भ हजार वर्षों तक उनके मस्तक पर रहा। हजारवें वर्ष के पूर्ण होने पर ब्रह्मा जी को छींक आई। उस छींक के साथ ही वह गर्भ भी नाक के मार्ग से बाहर आ गिरा। उससे एक बालक प्रकट हुआ, जो प्रजापति क्षुप के नाम से विख्यात हुए एवं ब्रह्मा जी के यज्ञ के ऋत्विज् बने। यज्ञ प्रारम्भ हुआ तथा ब्रह्मा जी ने दीक्षा ली। दीक्षा लेने पर ब्रह्मा जी विनीत हो गये। उनमें शान्ति के गुण आ गये। तब उनके शासन में उग्रता न रही। इसी कारण दण्ड अदृश्य हो गया। दण्ड के लुप्त होते ही प्रजा में व्यभिचार बढ़ने लगा। बलवान् निर्बल को सताने लगे। चारों ओर अराजकता फैल गयी। स्थिति दिन-प्रतिदिन बिगड़ने लगी। ब्रह्मा जी को चिंता हुई कि अब क्या होगा? फिर उन्होंने विचारकर वरदानी भोलेनाथ के पास जाकर कहा - ‘‘भगवन्! अब आप ही कृपा कीजिये एवं प्रजा को इस वर्णसंकरता से छुटकारा दिलाइये, अन्यथा अनर्थ हो जायेगा।’’


    कुछ देर विचार कर महादेव ने एक दण्ड प्रकट किया। कुछ ही समय में दण्ड ने अपना प्रभाव दिखाना प्रारम्भ किया। प्रजा में धर्माचरण होने लगा, जिसे देखकर माता सरस्वती ने दण्डनीति की रचना की। तब शिवशंकर ने एक-एक समूह का राजा बनाया। इन्द्र को देवताओं का, यम को पितरों का, कुबेर को धन एवं राक्षसों का, मेरु को पर्वतों का, समुद्र को सरिताओं का, वरुण को जल एवं असुरों का, मृत्यु को प्राणों का, वसिष्ठ को ब्राह्मणों का, अग्नि को वसुओं का, सूर्य को तेज का, चन्द्रमा को ताराओं एवं औषधियों का, कार्तिकेय को भूतों का तथा काल को सबका राजा बना दिया। स्वयं महादेव रुद्रों के राजा हुए। बृहस्पति पुत्र क्षुप को समस्त प्रजाओं का राजा बना दिया। यज्ञ समाप्त होने के बाद महादेव ने विष्णु का स्मरण कर वह दण्ड उन्हें सौंप दिया।’’


    मन्धाता ने पूछा - ‘‘उसके बाद क्या हुआ महाराज?’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘उसके बाद विष्णु ने उसे अंगिरा को दिया। अंगिरा ने इन्द्र एवं मरीचि को, मरीचि ने भृगु को, भृगु ने ऋषियों को, ऋषियों ने लोकपालों को, लोकपालों ने क्षुप को तथा क्षुप ने वैवस्वत मनु को वह दण्ड सौंपा। मनु ने धर्म की रक्षा के लिये उसे अपने पुत्रों को दिया। इस प्रकार यह दण्ड निरन्तर चलता जा रहा है।’’


    मन्धाता की जिज्ञासा बढ़ती जा रही थी। उसने पूछा - ‘‘इस दण्ड का उद्देश्य क्या है? इसका कार्य क्या है? किस कारण से इसे बनाया गया? इसे भी विस्तार से बतायें।’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘महाराज! दण्ड सम्पूर्ण जगत् को नियम के अन्दर रखने का कार्य करता है। यह धर्म का सनातन आत्मा है। इसका उद्देश्य प्रजा को उद्दण्डता से बचाना है। दुष्टों का दमन करना भी इसका एक उद्देश्य है। दण्ड ही सबको वश में रखता है। यह कालरूप दण्ड सृष्टि के आदि, मध्य एवं अंत में सतत् जागरुक रहता है। यही वस्तुतः सम्पूर्ण लोकों का ईश्वर है, उसका प्रजापति है। बस इतना समझ लीजिये कि यह साक्षात् भगवान् शंकर का स्वरूप है।’’


    मन्धाता ने पूछा - ‘‘किन्तु महाराज, यह अंततः क्षत्रियों के पास कैसे पहुँचा?’’


    वसुहोम ने कहा - ‘‘वैवस्वत मनु ने प्रजा की रक्षा में इसका उपयोग किया और अपने पुत्रों को दिया। तब ब्राह्मण ही लोकरक्षा किया करते थे। उसके उपरान्त राज्य की रक्षा का भार क्षत्रियों पर आया, तब ब्राह्मणों ने यह दण्ड क्षत्रियों को दिया। उसके बाद से आज तक यह क्षत्रियों के पास ही रहता आया है और वे ही इसके पालक रहे हैं।’’


     कहते हैं कि जो भी वसुहोम एवं मन्धाता के सम्वाद के रूप में दण्ड के सिद्धान्त को सुनता एवं तदनुसार धर्माचरण करता है, उसकी सभी मनोकामनायें पूर्ण होती हैं।




विश्वजीत 'सपन'