Sunday, August 13, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 20

‘‘धर्म का माहात्म्य’’ 
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महाभारत की कथा की 45वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


एक ब्राह्मण कुण्डधार की पूजा कर धन संपादित करने में असफल होने पर कुण्डधार से रुष्ट हो जाता है। उसे धन चाहिए था, किन्तु कुण्डधार ने उसके लिये धर्म को चुना। इससे वह ब्राह्मण बहुत दुःखी हो गया। जब कुण्डधार की कृपा से उसे दिव्य-दृष्टि मिली, तो उसने अनुभव किया कि कुण्डधार ने उसके लिये उचित किया था। ऐसा क्यों हुआ? इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, August 6, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 19

‘‘ऋषियों का धर्म’’
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महाभारत की कथा की 44वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।


एक बार अकाल पड़ जाने पर ऋषियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें प्रलोभन भी दिया जाता है, किन्तु ऋषिगण अपने धर्म का पालन करते हैं और तब ईश्वर न केवल उनकी सहायता करते हैं, बल्कि संकट आने पर उनकी प्राण-रक्षा भी करते हैं। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।  


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विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, August 1, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 18

‘‘मुनि उत्तंक की गुरु-भक्ति’’
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महाभारत की कथा की 43वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा का द्वितीय एवं अंतिम भाग।


मुनि उत्तंक जब अपने गुरु गौतम से आज्ञा लेकर जाने लगे, तब उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात की। गुरु ने गुरु दक्षिणा लेने से मना कर दिया। फिर वे गुरु-पत्नी के पास गये, तो उन्होंने भी गुरु दक्षिणा लेने से मना का दिया। तब उत्तंक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अवश्य कुछ न कुछ लें। तब गुरु-पत्नी उनसे मणिमय कुण्डल लाने को कहा। वे अपने गंतव्य पर पहुँच गये, किन्तु क्या उनके लिये यह आसान होगा। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, July 22, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 17

‘‘मुनि उत्तंक की गुरु-भक्ति’’
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महाभारत की कथा की 42वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा का प्रथम भाग।


गुरु-भक्ति पर एक से एक कथा बनी है और उनमें से एक है मुनि उत्तंक की। मुनि उत्तंक जब अपने गुरु गौतम से आज्ञा लेकर जाने लगे, तब उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात की। गुरु ने गुरु दक्षिणा लेने सक मना कर दिया। फिर वे गुरु-पत्नी के पास गये, तो उन्होंने भी गुरु दक्षिणा लेने से मना का दिया। तब उत्तंक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अवश्य कुछ न कुछ लें, अन्यथा उनके लिये जाना संभव नहीं होगा। तब गुरु-पत्नी उनसे मणिमय कुण्डल लाने को कहा। उसके बाद क्या-क्या हुआ इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Monday, July 17, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 16

‘‘बलवान शत्रु से कभी न करें बैर’’ 
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महाभारत की कथा की 41वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
      
गर्व का कारण कुछ भी हो सकता है, किन्तु घमण्ड नहीं होना चाहिए। घमण्ड बुद्धि को नष्ट कर देता है और तब हमें ज्ञात नहीं होता कि हम क्या कर रहे हैं। इस कथा में एक सेमल के वृक्ष के माध्यम से इस शीर्षक को विस्तार दिया गया है कि अपने से बलवान शत्रु से कभी भी बैर नहीं करना चाहिए, क्योंकि तब हार निश्चित होती है। साथ ही यह भी संदेश है कि घमण्ड नहीं करना चाहिए। एक नाटकीय तरीके से इस रहस्य को और तथ्य को इस कथा में समझाया गया है। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।  


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Thursday, July 6, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 15

‘‘स्त्री-रक्षा परम धर्म है’’ 
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महाभारत की कथा की चालीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘स्त्री-रक्षा परम धर्म है’’

     
देवशर्मा नामक ऋषि ने अपने शिष्य विपुल को गुरुपत्नी की रक्षा करने का आदेश दिया, क्योंकि रुचि पर देवराज इन्द्र आसक्त थे। यह बड़ी चुनौती थी, जिसका विपुल ने अपनी बुद्धि से सामना किया और सफल भी हुआ। तब लज्जित होकर इन्द्र को भागना पड़ा। फिर भी विपुल से एक अपराध हो गया। वह दण्ड का भागीदार हो गया। यह सब कैसे हुआ? क्या उसे दण्ड मिला? इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, June 29, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 14

‘‘त्याग का माहात्म्य’’ 
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महाभारत की कथा की उनचालीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘त्याग का माहात्म्य’’  

   
त्याग का माहात्म्य अर्थात् त्याग की महत्ता। यह कथा दो पक्षियों की है, वे सुख से रह रहे थे। जब उन्होंने एक बहेलिये के दुःख को जाना तो उन्होंने किस प्रकार उसकी सहायता करने का प्रयास किया और किन परिस्थ्तिियों में उन्होंने आपने प्राण देकर उसका भला करना चाहा, इस कथा में वर्णित है। उसके बाद किस प्रकार बहेलिये का जीवन परिवर्तित हुआ, यह भी दर्शनीय है। इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, June 23, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 13

‘‘अपनों से विवाद होता है घातक’’ 
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महाभारत की कथा की अड़तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘अपनों से विवाद होता है घातक’’  

   
यह कथा दो पक्षियों की है, जिनमें अत्यधिक प्रेम था। सभी पशु-पक्षी उनके इस प्रेम का उदाहरण दिया करते थे। फिर एक दिन दैववश वे एक मुसीबत में फँस गये। उन्होंने उस मुसीबत से छुटकारे का प्रयास किया। पहले वे सफल भी रहे, किन्तु एक बार उनके मध्य विवाद हुआ, तो कैसे किसी दूसरे ने इसका लाभ उठाया इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, June 15, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 12

‘‘अच्छा आचरण ही दिलाता है मान-सम्मान’’ 
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महाभारत की कथा की सैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
   
प्राचीन काल की बात है। एक बार इन्द्र का राज्य छिन जाता है। यह राज्य प्रह्लाद नामक एक दैत्य को चला जाता है। उसकी सफलता जानने के प्रयास में इन्द्र उसके पास एक ब्राह्मण बनकर जाते हैं और रहस्य जानकर पुनः अपने पद को प्राप्त करते हैं। इस कथा में आचरण की महत्ता स्थापित की गयी है। इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, June 11, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 11

‘‘कार्य में विलम्ब घातक है’’
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महाभारत की कथा में छत्तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘कार्य में विलम्ब घातक है’’ 

   
प्राचीन काल की बात है। एक घने जंगल में एक तालाब था। उसमें तीन मछलियाँ रहती थीं। तीनों अपने-अपने गुणों के अनुसार कार्य करती थीं। एक बार जब संकट आने का अंदेशा हुआ, तब तीनों ही मछलियों ने अपने-अपने गुणों के अुनसार निर्णय लिया। फिर क्या हुआ, इसे जानने के लिये इस कथा को पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, June 2, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 10

‘‘शरणागत की रक्षा’’
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महाभारत की कथा में पैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत दसवीं लोककथा - ‘‘शरणागत की रक्षा’’  
 
प्राचीन काल की बात है। उशीनगर नामक एक राज्य था। वहाँ का राजा वृषदर्भ बहुत ही न्यायप्रिय एवं दयालु था। जब एक कबूतर उनकी शरण में आया और फिर एक बाज भी उसका पीछा करते हुए आया, तब एक अजीब-सी स्थिति उत्पन्न हो गयी। वाद-विवाद हुआ और अनेक आश्चर्यजनक घटनायें घटीं। इन्हें जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, May 27, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 9

‘‘शत्रु से सदा सावधान रहना चाहिए’’
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महाभारत की कथा में चौंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत नौवीं लोककथा - ‘‘शत्रु से सदा सावधान रहना चाहिए’’
  
प्राचीन काल की बात है। काम्पिल्य नगर के राजा ब्रह्मदत्त बहुत ही न्यायप्रिय राजा थे। उनके महल में पूजनी नामक एक चिड़िया रहती थी, जो उस महल को अपना घर समझती थी। एक दिन उसके अण्डे से एक बच्चा निकला और उसी दिन रानी ने भी एक कुमार को जन्म दिया। दोनों एक साथ पलने और बढ़ने लगे। फिर अचानक एक दिन एक अनहोनी हो गयी। तब क्या होता है, जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, May 19, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 8

‘‘घमण्डी कौआ’’ 
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महाभारत की कथा में तैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत आठवीं लोककथा - ‘‘घमण्डी कौआ’’  

यह कहानी एक कौआ और हंस की है। वह कौआ दूसरों के जूठन पर पलता हुआ, बहुत घमण्डी हो गया था। जब उसने हंस को देखा, तो उसे बहुत ईर्ष्या हुई और उसने हंस को उड़ान भरने की चुनौती दी। वह चाहता था कि जब वह जीत जायेगा, तो लोग उसके उस रूप के बाद भी उसे ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगेंगे। उसे पसंद करने लगेंगे। सारे कौए उसके साथ थे, किन्तु प्रतियोगिता के दिन असल में क्या होता है, इसका विवरण इस कहानी में मिलता है।


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विश्वजीत ‘सपन’