Sunday, August 18, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग-87)




महाभारत की कथा की 112 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

ध्यान एवं धारणा तथा मोक्ष
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    शुकदेव अपने पिता से जीवन के रहस्यों को समझ रहे थे। उनके सभी प्रश्नों के उत्तर व्यास जी सुन्दरता से बताते जा रहे थे। शुकदेव ने पूछा - ‘‘पिताजी, मोक्ष प्राप्ति के लिये मनुष्य को क्या करना चाहिये?’’


    व्यास जी ने कहा - ‘‘इस भवसागर को पार करने के लिये हमें ज्ञानरूपी नौका का आश्रय लेना चाहिये। हमें ध्यानयोग की साधना करनी चाहिये और उनके बारह उपायों के आश्रय लेने चाहिये।’’


    शुकदेव ने पूछा - ‘‘ध्यानयोग के ये बारह उपाय क्या हैं पिताजी? मुझे थोड़ा विस्तार में बतायें।’’


    व्यास जी ने कहा - ‘‘ध्यानयोग की साधना किसी एकान्त, पवित्र एवं समतल स्थान पर करनी चाहिये। इस प्रकार के उपयोगी स्थल को देशयोग कहा जाता है। आहार, विहार, चेष्टा, सोना तथा जागना नियमानुकूल होना चाहिये। इसे कर्मयोग कहा गया है। सदाचारी शिष्य को अपनी सेवा एवं सहायता के लिये रखना अनुरागयोग कहा गया है। आवश्यक सामग्री का संग्रह अर्थयोग कहलाता है। ध्यानोपयोगी आसन में बैठना उपाययोग है। इस संसार के विषयों एवं सगे-सम्बन्धियों से आसक्ति एवं ममता से मुक्त होना अपाययोग कहलाता है। गुरु एवं वेदों के वचनों पर विश्वास रखना निश्चययोग है। इन्द्रियों को वश में रखना चक्षुर्योग है। शुद्ध एवं सात्विक भोजन आहारयोग है। विषयों की ओर स्वाभाविक प्रवृत्तियों को रोकना संहारयोग है। मन के संकल्प, विकल्प को शान्त करने का प्रयास मनोयोग है तथा संसार के दुःखों पर विचार न कर उससे विरक्त होना दर्शनयोग है। इन समस्त उपायों को करते हुए ही ध्यानयोग की साधना करनी चाहिये।’’


    शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी। इनके आश्रय लेकर किस प्रकार मोक्ष की साधना करनी चाहिये?’’


    व्यास जी ने कहा - ‘‘जिसे भी मोक्ष प्राप्त करने की इच्छा हो, उसे बुद्धि के द्वारा मन एवं वाणी को जीतना चाहिये। इससे मृत्युरूपी सागर को पार किया जा सकता है। उसे तभी शीघ्र सफलता मिल सकती है, यदि वह किसी एक विषय अर्थात् ब्रह्म में अपने चित्त को स्थापित कर लेता है। इस स्थापना को धारणा कहा जाता है तथा यह सात प्रकार का होता है।’’


    शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी। इस धारणा के प्रकारों को भी थोड़ा विस्तार से बताने की कृपा करें।’’


    व्यास जी ने कहा - ‘‘पुत्र, शरीर में पृथ्वी, जल, तेज, वायु, आकाश, अव्यक्त एवं अहंकार - इन सातों तत्त्वों का चिन्तन किया जाता है। यही सात प्रकार की धारणायें हैं। शरीर में पैर से लेकर घुटने तक का स्थान पृथ्वी का है, घुटने से गुदा तक का स्थान जल का है, गुदा से हृदय तक का स्थान तेज का है, हृदय से दोनों भौहों तक का स्थल वायु का तथा भ्रूमध्य से मूर्धा तक का स्थल आकाश का कहलाता है। इनकी धारणा के बाद नाद का चिन्तन अव्यक्त धारणा है और स्थूल देह की आसक्ति का त्याग अहंकार की धारणा है।


    इसकी अनुभूति को जान लेना भी आवश्यक है। जब पृथ्वी की धारणा का प्रारंभ होता है, तो ऐसा प्रतीत होता है कि कुहरे के समान कोई सूक्ष्म वस्तु आकाश को आच्छादित कर रही है। यह प्रथम स्वरूप है। इसके उपरान्त जब वह कुहरा निवृत्त हो जाता है, तब दूसरे रूप का दर्शन होता है। इसमें देह के भीतर एवं सम्पूर्ण आकाश में जल ही जल दिखाई देता है। तीसरी स्थिति में सर्वत्र आग की ज्वालायें दिखाई देती हैं। इसके विलीन हो जाने पर आकाश में सर्वत्र वायु का अनुभव होता है। इस समय साधक को शरीर का मात्र ऊपरी भाग ही दिखाई देता है। जब वह तेज का संहार कर वायु पर विजय पाता है, तो वायु का सूक्ष्म रूप आकाश में लीन हो जाता है। इस समय एक छिद्ररूपी नीला आकाश ही विद्यमान रहता है। योगी का शरीर सूक्ष्मता को प्राप्त करता है और उसे स्थूल शरीर का कोई भान नहीं रहता।’’


    शुकदेव ने कहा - ‘‘जी पिताजी। इसकी प्रक्रिया क्या है?’’


    व्यास जी ने कहा - ‘‘पृथ्वी भाग में भावना द्वारा प्रणवसहित लं बीज एवं वायु देवता की स्थापना करके चतुर्मुख ब्रह्मा का ध्यान करना चाहिये। पाँच घड़ी तब इस धारणा से पृथ्वी तत्त्व पर विजय मिलती है। इससे साधक में सृष्टि की शक्ति आ जाती है। जल की धारणा में प्रणवसहित वं बीज एवं वायु देवता की स्थापना करके चतुर्भुज विष्णु का ध्यान करना चाहिये। पाँच घड़ी की साधना से सभी प्रकार के रोगों से मुक्ति मिलती है तथा साधक समस्त पृथ्वी को कम्पित करने की क्षमता वाला हो जाता है। अग्नि के स्थान में प्रणवसहित रं बीज एवं वायु देवता की स्थापना से त्रिनेत्रधारी शिव का ध्यान करने से अग्नि से जलने का भय नष्ट हो जाता है। वायु के स्थान में प्रणवसहित वं बीज एवं वायु देवता की स्थापना कर शंकर का ध्यान करने से आकाश में विचरने की शक्ति आ जाती है। तब आकाश तत्त्व के स्थान में प्रणवसहित हं बीज एवं वायु देवता की स्थापना कर शंकर का ध्यान करने से शरीर को अदृश्य करने की क्षमता आ जाती है। इसके बाद अव्यक्त की धारणा में नाद का चिंतन किया जाता है। फिर जब वह अहंकार पर विजय प्राप्त कर लेता है, तो समस्त भूत उसके वश में आ जाते हैं। पंचभूत एवं अहंकार इन छः तत्त्वों का आत्मा है बुद्धि। जब वह साधाक इस बुद्धि को जीत लेता है, तो उसे समस्त ऐश्वर्यों की प्राप्ति हो जाती है। तब उसे विशुद्ध ज्ञान प्राप्त होता है। इसी समय योगी को तत्त्व का अथवा यों कहें कि ब्रह्म का साक्षात्कार होता है। यही मोक्ष है।’’


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, August 11, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 86)




महाभारत की कथा की 111 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
 

प्रलय एवं उसका क्रम
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    पूर्वकाल की बात है। महर्षि व्यास के पुत्र शुकदेव ने अपने पिता से सृष्टि की उत्पत्ति एवं काल के बारे में जानने के बाद पूछा - ‘‘पिताजी, आपने बताया कि ब्रह्मा के दिन प्रारंभ से सृष्टि का प्रारंभ होता है और रात्रि पर प्रलय। सृष्टि की उत्पत्ति मैं समझ गया। यह प्रलय किस प्रकार होता है? कृपया मुझे विस्तार से बतायें।’’


    व्यास जी ने कहा - ‘‘तुम जान ही चुके हो कि एक हजार चतुर्युग का ब्रह्मा जी का एक दिन और उतने ही समय की एक रात्रि होती है। ब्रह्मा जी दिन के प्रारंभ में सृष्टि की रचना करते हैं तथा रात्रि के प्रारंभ में सबको स्वयं में लीन करना प्रारंभ करते हैं। ब्रह्मा जी के दिन बीतने पर इस सृष्टि का लय किस प्रकार होता है तथा ब्रह्मा जी इस स्थूल जगत् को सूक्ष्म करके किस प्रकार अपने भीतर लीन कर लेते हैं, उसे तुम सुनो।’’


    शुकदेव ने सिर हिलाकर अपनी सहमति दी। 


व्यास जी ने कहना प्रारंभ किया - ‘‘तुम्हें पता ही है कि आकाश, वायु, अग्नि, जल एवं पृथ्वी अपने गुणों को विकसित करके जगत् का निर्माण करते हैं। इन पंचमहाभूतों को सूक्ष्मता किस प्रकार आती है, यह ज्ञान अति अवश्यक है। जब जगत् के प्रलय का समय आता है, तब ऊपर से तेजस्वी सूर्य तथा नीचे से अग्नि की सात ज्वालायें संसार को भस्म करने लगती हैं। सर्वप्रथम पृथ्वी के चराचर प्राणी इन ज्वालाओं से दग्ध होकर नष्ट होने लगते हैं। सभी प्राणी, पादप आदि जल कर राख बन जाते हैं। पृथ्वी इनसे विहीन होकर कछुए की पीठ की भाँति दृष्टिगत होती है, जहाँ श्मशान जैसी वीरानी फैल जाती है। स्थावर-जंगम कुछ भी संसार में बचा नहीं रहता। 


उसके बाद यही तेज पृथ्वी के गुण गन्ध को भी ग्रहण कर लेता है। पृथ्वी तब गन्धहीन हो जाती है तथा यही गन्धहीन पृथ्वी अपने कारणभूत जल में लीन हो जाती है। जल में लीन होते समय जल की ऊँची-ऊँची लहरें उठने लगती हैं। चारों ओर से जल पृथ्वी को घेरने लगते हैं। एक विनाशलीला का प्रारंभ होता है। सम्पूर्ण भूमि, पर्वत आदि डूबने लगते हैं। कुछ समय के उपरान्त सम्पूर्ण विश्व जल में निमग्न हो जाता है। 


तदनन्तर तेज जल के गुण रस को ग्रहण कर लेता है तथा रसहीन जल तेज में लीन हो जाता है। जल की धारायें उठ-उठकर तीव्रता से तेज में समाने लगती हैं। यह ऐसा समय होता है, जब सम्पूर्ण आकाश अग्नि की लपटों से आच्छादित-सा दिखाई देता है। जैसे अगस्त्य मुनि ने समुद्र को पी लिया था, ठीक उसी प्रकार समस्त जल का पान हो जाता है।


उसके बाद तेज के गुण रूप को वायुतत्त्व ग्रहण कर लेता है। तेज के वायु के ग्रहण करते ही अग्नि ठण्डी हो जाती है और वायु में मिल जाती है। इस मिलन के कारण वायु अबाध गति से चलने लगती है। चारों ओर विनाश का दृश्य दिखाई देने लगता है। वायु की गति अत्यधिक हो जाती है और हर दिशा में हरहराते हुए चलने लगती है। 


उसके उपरान्त आकाश वायु के गुण स्पर्श का ग्रहण कर लेता है। इसके कारण वायु शान्त होकर आकाश में लीन हो जाती है। तदनन्तर शब्द गुण से युक्त मात्र आकाश रह जाता है। इस समय रूप, रस, गन्ध तथा स्पर्श का कुछ भी अंश उपलब्ध नहीं रहता। वे सभी शब्द में लीन हो जाते हैं। इसके उपरान्त इस दृश्य जगत् को व्यक्त करने वाला मन आकाश के गुण शब्द को स्वयं में लीन कर लेता है। मन से ही शब्द की उत्पत्ति होती है तथा वह उसी में पुनः लीन हो जाता है। इस प्रकार इन पंचभौतिक का ब्रह्मा के मन में लीन होना ही प्रलय कहलाता है। इसे ब्राह्म प्रलय भी कहा जाता है। इस प्रकार देखा जाये, तो समस्त भूतों के प्रलय स्थान भी ब्रह्मा जी ही हैं।


यही संक्षेप में प्रलय का वृत्तान्त है। यही सृष्टि एवं प्रलय का क्रम निरन्तर चलता रहता है। इसी प्रकार एक-एक हजार चतुर्युगों के ब्रह्मा जी के दिन एवं रात होते रहते हैं। उनके दिन के आरंभ में सृष्टि एवं रात्रि के आरंभ में प्रलय का यह क्रम सतत् चलता रहता है।’’


कहते हैं कि इसी प्रकार संसार की उत्पत्ति एवं प्रलय का क्रम चलता रहता है। संसार की सृष्टि एवं उसके प्रलय का यह प्राकृतिक नियम कभी भंग नहीं होता। यही जीवन का एक महासत्य है, जिसे प्रत्येक मनुष्य को जानना चाहिये। 


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, August 4, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 85)




महाभारत की कथा की 110 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

समत्वबुद्धि से ब्रह्मपद-प्राप्ति

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    प्राचीन काल की बात है। मुनियों में उपदेश ग्रहण करने की प्रथा थी। वे किसी भी ऋषि-मुनि से अपनी जिज्ञासाओं को शान्त करने का अनुरोध किया करते थे। तब ऋषि-मुनि भी उनकी जिज्ञासाओं का समुचित समाधान किया करते थे। ऐसी ही एक प्राचीन कथा है, जिसमें असित-देवल मुनि जैगीषव्य के आश्रम पहुँचे। उनके मन में ब्रह्मपद प्राप्ति हेतु उपायों को जानने की जिज्ञासा थी। मुनि जैगीषव्य ने उनका अतिथि के समान सत्कार किया और बोले - ‘‘बताइये मुनिवर, आपके मेरे आश्रम में आने का क्या प्रयोजन है? मैं आपकी किस प्रकार सेवा कर सकता हूँ।’’


    इस पर असित-देवल ने मुनि को प्रणाम कर कहा - ‘‘मुनिश्रेष्ठ, आप धर्मज्ञानी हैं। आप मुझे बतायें कि एक धर्मज्ञानी की क्या गति होती है।’’


    मुनि जैगीषव्य ने कहा - ‘‘धर्मज्ञानी को कभी कोई दुःख नहीं होता। वे इसका अनुभव नहीं करते। वे धर्म के अनुसार अपना जीवन चलाते हैं तथा हमेशा ही सुखी रहते हैं। वास्तव में वे ही जीवन को जीते हैं, शेष तो मात्र जीवन काटते हैं।’’


    असित-देवल ने कहा - ‘‘मुनिवर, मैंने सुना है कि यदि कोई आपको प्रणाम करे, तो आपको अधिक प्रसन्नता नहीं होती तथा कोई आपकी निंदा करे, तो भी आप क्रोध नहीं करते। इसका क्या रहस्य है? यह कैसे संभव है?’’


    मुनि जैगीषव्य ने कहा - ‘‘मुनिवर, इसे समत्वबृद्धि कहते हैं। महात्मा पुरुष वे होते हैं, जिसकी कोई निंदा करे अथवा प्रशंसा के गीत गाये, चाहे उसके सदाचार एवं पुण्यकर्मों पर परदा डाले, वे सबके प्रति एक समान ही बुद्धि रखते हैं। यही समत्वबुद्धि है। मेरा जीवन इसी के अधीन है, अतः मेरी ऐसी वृत्ति है।’’


    असित-देवल ने पूछा - ‘‘किन्तु मुनिवर, निन्दा होने पर अपमान की अनुभूति होती है। एक मानव इसे सहन नहीं कर सकता। इस पर किस प्रकार विजयश्री पायी जा सकती है?’’


    मुनि जैगीषव्य ने कहा - ‘‘मुनिवर, एक तत्त्ववेत्ता अपमान को अमृत के समान समझ कर उससे संतुष्ट होते हैं तथा सम्मान को विषतुल्य समझ कर उससे डरते हैं। एक निर्दोष आत्मा को अपमान से कोई चिन्ता नहीं होती। वह इस बात को समझता है कि अपमान करने वाला स्वयं ही अपने अपराध से मारा जाता है। उसकी चिन्ता करने की उसे कोई आवश्यकता नहीं होती। अपमान अथवा सम्मान मात्र भ्रम है। समझने की सबसे बड़ी बात यह है कि निन्दा से न कोई हानि होती है और प्रशंसा से न कोई लाभ। तब इनके बारे में सोचना ही अनुचित जान पड़ता है। इसी कारण धर्मज्ञानी मनुष्य इनसे कभी भी किसी भी प्रकार से प्रभावित नहीं होते।’’


    असित-देवल ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर। आपका हार्दिक आभार अनुपम ज्ञान की बातें बताने के लिये। कृपया इस प्रकार की बुद्धि के बारे में मुझे विस्तार से बताने की कृपा करें।’’


    जैगीषव्य ने कहा - ‘‘बुराई को कभी बुराई न मानना। उसे भूल जाना। भविष्य की चिन्ता न करना और वर्तमान में जीना। जो बीत चुका है, उसके लिये शोक न करना। किसी भी बात के लिये प्रतिज्ञा न करना। क्रोध को जीतना एवं जितेन्द्रिय बनना। मन, वाणी एवं शरीर से अपराध न करना। मन में ईर्ष्या न रखना। सर्वथा शान्त एवं सम्पूर्ण प्राणियों के हित में संलग्न रहना। हृदय की अज्ञानमयी गाँठ को खोलकर चारों ओर आनन्द से विचरण करना। न किसी को शत्रु मानना और न ही किसी का शत्रु बनना। ये सभी व्यवहार इस बुद्धि के होते हैं। यह बुद्धि समत्व का ज्ञान देती है और किसी भी मनुष्य के लिये सभी प्रकार के सुख का कारण बनती है।’’


    असित-देवल ने कहा - ‘‘इस प्रकार की बुद्धि का फल क्या होता है? इसे विस्तार से बताने की कृपा करें, मुनिश्रेष्ठ।’’


    जैगीषव्य ने कहा - ‘‘पुण्यकर्म करने वाले मनुष्यों को इस बुद्धि से परम गति की एवं शान्ति की प्राप्ति होती है। यह बुद्धि उन्हें धर्म पालन में संलग्न करती है। वे समस्त प्रकार के इस व्रत के आचरण के कारण सुखी होते हैं। इन्द्रियों को अपने वश में करके अविनाशी ब्रह्मपद को प्राप्त करते हैं। इससे उत्तम गति और क्या हो सकती है। यह देवता, गन्धर्व, पिशाच एवं राक्षस के लिये अति दुर्लभ होती है। अतः शास्त्रों के अनुसार यही सर्वथा उपयुक्त बुद्धि बतायी गयी है। धर्म मार्ग का अवलम्बन करने के कारण इन्हें सदा ही शान्ति का अनुभव होता है।’’


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, July 21, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 84)

महाभारत की कथा की 109 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 
 

चराचर प्राणियों की अनित्यता

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दैत्यराज प्रह्लाद देवासुर संग्राम के बाद पराजित होकर एक स्थल पर निर्विकार बैठे हुए थे। उनकी किसी विषय में आसक्ति न थी। वे सत्त्वगुण में स्थित रहते थे। ऐसी परिस्थिति में भी उन्हें इस प्रकार देखकर इन्द्र को उनकी बुद्धि को जानने की प्रबल इच्छा हुई। वे उनके पास जाकर बोले - ‘‘तुम्हारे मत में कल्याण का सर्वश्रेष्ठ साधन क्या है?’’


    दैत्यराज ने कहा - ‘‘देवराज, जो आत्मा को शुभ एवं अशुभ कर्मों का कर्ता मानता है, वह अज्ञानी है। यदि पुरुष कर्ता होता, तो वह अपने कल्याण के लिये जो कुछ भी करता, वह सब अवश्य सिद्ध हो जाता, किन्तु ऐसा नहीं होता। कार्यों को जानना, किन्तु उनको करने वाली प्रकृति को न जानना ही मोह का कारण होता है। इस बात को समझने वाले को मोह नहीं होता, तब उसका सर्वदा कल्याण होता है।’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘तुम रस्सियों में बाँधे गये, राज्य से च्युत हुए, शत्रुओं के वश में पड़े तथा राज्यलक्ष्मी से भी हीन हुए। इस प्रकार की दुर्दशा होने पर भी तुम्हें शोक क्यों नहीं होता?’’


    प्रह्लाद ने कहा - ‘‘मैं सम्पूर्ण भूतों की अनित्यता को जानता हूँ। कोई भी वस्तु सदा के लिये नहीं होती, उसको नष्ट होना ही होता है। मैं इन समस्त नाशवान् को समझता हूँ और इसी कारण मुझे इसके न रहने पर कोई शोक नहीं होता। मन एवं इन्द्रियों को अधीन करके तृष्णा एवं कामनाओं का त्याग करके सदा अविनाशी आत्मा पर दृष्टि रखता है, उसे कभी कोई कष्ट नहीं होता। फिर शोक करने से शरीर को कष्ट होता है तथा शत्रु प्रसन्न होते हैं, तो शोक क्यों किया जाये? शोक करने से दुःख दूर नहीं होता।’’


    इन्द्र ने समझ लिया कि प्रह्लाद आत्मतत्त्व का ज्ञानी है। इसके बाद भी उन्होंने पूछा - ‘‘तुम्हारी बात उचित है, किन्तु अपने ऊपर संकट देखकर भी तुम निश्चिन्त कैसे हो? तुम्हारी यह स्थिति आत्मज्ञान के कारण है या धैर्य के?’’


    दैत्यराज ने कहा - ‘‘मैं ममता, अहंकार तथा कामनाओं का त्याग कर बंधनरहित हो चुका हूँ। मैं समस्त प्राणियों की उत्पत्ति एवं उनके विनाश को समझता हूँ। वैसे भी संकट पड़ने पर जो धैर्य नहीं खोता है, वही श्रेष्ठ मनुष्य समझा जाता है। जो होना है, वह होकर ही रहेगा। अपने ऊपर जो अवस्था आ पड़ी है, वही होनहार थी, इस तरह का भाव रखकर जो उस परिस्थिति को स्वीकार करता है, उसे कभी मोह नहीं होता। न तो मेरे मन में राग है और न ही द्वेष। न तो मैं किसी को आत्मीय समझता हूँ और न ही द्वेषी। फिर मुझे किस संकट से भय होगा? मुझे किसी वस्तु की अभिलाषा नहीं है। मेरी दृष्टि मात्र अविनाशी आत्मा पर है। इस कारण मुझे जीवन सरल एवं शान्तिमय प्रतीत होता है।’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘जिस उपाय से ऐसी शान्ति मिलती है और इस प्रकार की बुद्धि प्राप्त होती है, उसे विस्तार से बताओ।’’


    प्रह्लाद ने कहा - ‘‘सरलता, निर्मलता, चित्त की स्थिरता एवं बड़े -बूढ़ों की सेवा करने से ज्ञान को समझने वाली बुद्धि की प्राप्ति होती है। इन गुणों को अपनाने से स्वभाव से ही ज्ञान प्राप्त हो जाता है। स्वभाव से ही शान्ति मिलती है। आप जो कुछ भी देख रहे हैं, वह सब स्वभाव से ही प्राप्त होते हैं।’’


    इस प्रकार के उत्तर पाकर इन्द्र को विस्मय हुआ। दैत्यराज होते हुए भी प्रह्लाद निंदा एवं स्तुति को समान समझते थे, मन एवं इन्द्रियों पर नियंत्रण रखते थे तथा एकान्त निवास करते थे। उन्हें चराचर प्राणियों की उत्पत्ति एवं नाश का ज्ञान था। वे अप्रिय हो जाने पर भी कभी क्रोध नहीं करते थे तथा प्रिय होने पर हर्ष नहीं मनाते थे। वे आत्मा का कल्याण करने वाले ज्ञानयोग में स्थित एवं धीर थे। इतना समझने के बाद इन्द्र को बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने प्रह्लाद के वचनों की प्रशंसा की तथा उनका पूजन भी किया। उसके उपरान्त वे अपने धाम को लौट गये।


    इस संसार में जो भी शुभ अथवा अशुभ कर्म होता है, उसका कर्ता पुरुष नहीं बल्कि करने वाली प्रकृति है। सब तरह के भाव एवं अभाव स्वभाव से ही आते रहते हैं, उनके लिये पुरुष का कोई प्रयत्न नहीं होता तथा प्रयत्न के अभाव में पुरुष उसका कर्ता नहीं हो सकता। जब किसी पुरुष को उसके कर्तापन का अभिमान हो जाता है, तब वह मोह में बँध जाता है।


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, July 14, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 83)



महाभारत की कथा की 108 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

देवी लक्ष्मी का माहात्म्य

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    प्राचीन काल की बात है। एक दिन महर्षि नारद गंगा जी में स्नान करने के लिये उनके तट पर गये। उसी समय वज्रधारी इन्द्र भी उसी तट पर पहुँचे। दोनों ने ही एक साथ जल में गोते लगाये और गायत्री मंत्र का जाप किया। उसके उपरान्त वे वहीं रेत पर बैठकर वार्तालाप करने लगे। जब वे वार्तालाप कर ही रहे थे कि सूर्य भगवान् का उदय हुआ। तत्काल ही दोनों ने सूर्य पूजा की। 


    ठीक उसी समय आकाश से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई, जो निरन्तर उनके समीप ही आ रही थी। वह एक अनुपम दृश्य था। समस्त जगत् उस प्रकाश-पुंज से आलोकित हो रहा था। निकट आते ही उन्होंने देखा कि वह भगवान् विष्णु का विमान था और उस पर साक्षात् लक्ष्मी माता विराजमान थीं। जब वे उनके समीप आईं, तब दोनों ने उनको प्रमाण किया और इन्द्र बोले - ‘‘माता आज आपके दर्शन से चित्त प्रसन्न हो गया। इस प्रकार आपके आने का कोई न कोई भेद अवश्य है। कृपाकर हमें बतायें कि आपके आने का क्या प्रयोजन है?’’


    लक्ष्मी देवी ने कहा - ‘‘इन्द्र, आप तो जानते ही हैं कि मैं सदा धर्मशील पुरुषों के देश में, नगर में एवं आवास पर निवास करती हूँ। वीरता से संघर्ष करने वाले राजाओं के शरीर में सदा उपस्थित रहती हूँ। मैं पहले सत्य और धर्म में बँधकर असुरों के पास रहती थी, किन्तु अब उन्हें धर्म के विपरीत देखकर आपके पास रहने के विचार से आई हूँ।’’


    इन्द्र ने कहा - ‘‘देवि, आपका हार्दिक स्वागत है, किन्तु दैत्यों का पहले क्या आचरण था कि आप उनके पास रहती थीं।’’


    लक्ष्मी ने कहा - ‘‘पहले दैत्यलोग दान, अध्ययन एवं यज्ञ में संलग्न रहते थे। देवता, पितर, गुरु एवं अतिथियों की पूजा करते थे। उनमें सदा सत्य बोलने की प्रवृत्ति थी। वे घर-द्वार स्वच्छ रखते थे। उनमें श्रद्धा थी एवं क्रोध न था। सबका स्वभाव अच्छा था, सभी दयालु थे, सबमें सरलता एवं भक्तिभाव था। उपवास एवं तप में लगे रहते थे। ब्राह्मणों की पूजा किया करते थे। सदा ही धर्म का आचरण करते थे और इसी कारण मैं सदियों से उनके पास रहती आयी हूँ।’’


    इन्द्र ने पूछा - ‘‘देवि, फिर अब ऐसा क्या हो गया कि उन्हें छोड़कर हम देवताओं के पास रहने आयी हैं?’’


    लक्ष्मी ने कहा - ‘‘समय के उलट-फेर से उनके गुणों में विपरीतता आयी है। अब उनमें धर्म नहीं रह गया है। गुरुओं का आदर समाप्त हो गया है। बड़े-बूढ़ों का सम्मान समाप्त हो गया है। संतानों के लालन-पालन पर ध्यान नहीं दिया जा रहा। संतान पिता के रहते ही मालिक बन बैठता है। स्वच्छता से उन्हें कोई मतलब नहीं रह गया है। उनके रसोइये भी अपवित्र रहने लगे हैं। स्त्रियों एवं बूढ़ों को अपमानित किया जाता है। यज्ञ, तपादि से उनका कोई नाता नहीं रह गया है। चारों ओर भय का वातावरण बन गया है। पूर्व में दानवों के उत्थान में मैं सहायक थी, किन्तु अब मैं नहीं रही, तो अवश्य ही उनका पतन प्रारंभ हो गया है। मेरे रहते ही उत्थान संभव है। मैं यदि नहीं रही तो पतन होना अवश्यम्भावी है। इसी कारण मैंने निश्चय किया है कि मैं अब आपके पास ही निवास करूँगी। मेरे साथ आठ देवियाँ भी निवास करती हैं - आशा, श्रद्धा, धृति, क्षान्ति, विजिति, संनति, क्षमा तथा जया। अब से इन देवियों का निवास भी आपके पास ही होगा। आप हमें स्वीकार कीजिये।’’


    इन्द्र ने उन सभी देवियों को प्रणाम कर कहा - ‘‘हम धन्य हो गये माते, आपका हमारे यहाँ हार्दिक स्वागत है।’’


    इन्द्र एवं नारद के ऐसा अभिनन्दन करने के साथ ही शीतल, सुगन्धित एवं सुखद वायु चलने लगी। उनके दर्शन करने के लिये सभी देवी-देवता उपस्थित हो गये। नारद जी ने लक्ष्मी जी के शुभागमन की प्रशंसा की। ब्रह्मा जी के लोक से अमृत वर्षा होने लगी। देवताओं की दुन्दुभि बिना बजाये ही बज उठी। समस्त दिशायें निर्मल एवं श्रीसम्पन्न दिखाई देने लगीं। 


    लक्ष्मी जी के इस प्रकार आने से संसार में समय पर वर्षा होने लगी। पृथ्वी पर रत्नों की खानें प्रकट हो गयीं। मनुष्य, किन्नर, यक्ष, देवताओं आदि की समृद्धि बढ़ गयी। वे सभी सुख से रहने लगे। गौएँ दूध देने के साथ ही सभी की मनोकामनायें पूर्ण करने लगीं। किसी के मुख से कठोर वाणी नहीं निकलती थी। 


     कहते हैं कि जो लोग लक्ष्मी देवी की आराधना से सम्बन्ध रखने वाले इस कथा का अध्ययन एवं वाचन ब्राह्मणों की मंडली में करते हैं, यदि वे धन के इच्छुक हों, तो उन्हें प्रचुर मात्रा में धन की प्राप्ति होती है। वे जीवन भर सुखी रहते हैं तथा उन्हें कभी भी दुःख का अनुभव नहीं होता। 


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, June 29, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 82)


महाभारत की कथा की 107 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।
 


काल की महिमा
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    देवासुर संग्राम में दैत्यों का संहार हो चुका था। वामनरूपधारी श्रीविष्णु ने अपने पैरों से तीनों लोकों को नाप कर अपने अधिकार में ले लिया था। देवराज इन्द्र प्रसन्न थे। उस समय देवताओं के लिये अति प्रसन्नता की बात थी। एक दिन की बात है। इन्द्र ने निश्चय किया कि वे तीनों लोकों का भ्रमण करेंगे। अश्विनी कुमार, ऋषि, गन्धर्वों आदि के साथ अपने वाहन ऐरावत पर बैठकर वे निकल पड़े। घूमते-घूमते समुद्र तट पर जा पहुँचे। वहीं एक गुफा में दैत्यराज बलि बैठे हुए थे। उन पर दृष्टि पड़ते ही इन्द्र अपना वज्र लिये उनके पास पहुँच गये।


    दैत्यराज बलि ने उन्हें देखा, किन्तु उन्हें किसी भी प्रकार का न भय हुआ न ही शोक। वे निर्विकार बैठे रहे। इन्द्र को विस्मय हुआ कि उसके प्रताप को देखकर भी दैत्यराज को न क्रोध आया और न ही किसी प्रकार का भय। उन्होंने पूछा - ‘‘तुम पहले बाप-दादाओं के राज्य पर बैठकर सबके महाराज बने हुए थे और अब तुम्हारे पास कुछ भी नहीं है। तुम्हें यह देखकर शोक नहीं होता?’’


    बलि ने कहा - ‘‘आप अभी विजेता हैं। जो कुछ भी कहेंगे, वह आपको उचित ही प्रतीत होगा। अभी मैं काल के कारागार में हूँ। हमेशा सभी का समय ठीक नहीं होता। समय-समय पर जीव को सुख-दुःख मिलता ही रहता है। मुझे अभी दुःख है, किन्तु यह जानकर कि कल पुनः सुख होगा, प्रसन्न हूँ। आपकी दशा अभी अच्छी और मेरी इसके ठीक विपरीत, अतः आप कुछ भी कहने में तत्पर हैं, किन्तु काल हमेशा इसका उत्तर देता रहता है। कभी आपको भी इसका उत्तर मिल जायेगा।’’


    इन्द्र ने व्यंग्य से कहा - ‘‘तुम्हें हमारा पराक्रम दिखाई नहीं देता, जिसके कारण तुम इस चिंतित स्थिति में पड़े हुए हो? मैंने और मेरी सेना के कारण ही तुम्हारी यह दुर्गति हुई है।’’


    बलि ने कहा - ‘‘यह सब काल का किया धरा है। आपका इसमें कुछ भी नहीं है। कल आप भी उसी काल का शिकार हो सकते हैं। इसमें आपका कोई पराक्रम नहीं है। विचार कीजिये कि अब तक देवताओं के सहस्रों इन्द्र काल के साथ आये और चले गये। आप भी कल नहीं रहेंगे। काल पर किसी का वश नहीं चलता। आपका भी नहीं चलेगा। आप उस मूर्ख की भाँति बोल रहे हैं, जो स्वयं को किसी एक स्थिति का कर्ता मान लेता है। यह अभिमान ही आपके दुःख का कारण बनेगा।’’


    इन्द्र ने दुत्कारते हुए कहा - ‘‘तुम आज राजा नहीं रहे, इसी कारण ऐसी बातें कर रहे हो। कल जब तुम्हारे पास सब-कुछ था, तब तुम्हें भी अभिमान होता होगा। आज मुझे शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हो?’’


    बलि ने कहा - ‘‘मुझे कभी अभिमान न रहा। यह सब-कुछ होने का भ्रम ही किसी को दुःख देता है। इसका कारण है कि आप भी काल के घेरे में हो। जिस राज्यलक्ष्मी को आप अपना मानते हैं, वह न आपकी है और ही मेरी और न किसी दूसरे की। यह किसी के पास स्थिर नहीं रहती। आपके पास भी कहीं से आई है और पूर्व में भी थी, अतः इस पर घमण्ड उचित नहीं है।’’


    इन्द्र ने गर्व से कहा - ‘‘मैंने न केवल युद्ध जीता, बल्कि सौ यज्ञों का अनुष्ठान भी किया। मेरे कारण त्रिभुवन का उदय हो रहा है। मैं अभी तीनों लोकों में सबसे अधिक बलवान् हूँ।’’


    बलि ने शान्त होकर कहा - ‘‘सबसे बलवान् तो काल ही है। आप अपनी तुलना उससे न करें, तो ही उचित है। फिर ऐसा भी नहीं है कि मात्र आपने सौ यज्ञों के अनुष्ठान किये हैं। अनेक धर्मात्मा राजाओं ने यज्ञ एवं अनुष्ठान किये हैं। वे भी आकाश में विचरण करते थे, किन्तु काल ने उनका भी संहार कर डाला। आप भी याद रखिये कि जिस काल ने मुझ पर धावा किया है, वही आप पर भी कभी चढ़ाई करेगा।’’
    इन्द्र ने उलाहना देते हुए कहा - ‘‘अभी तुम हारे हुए राजा हो, इस कारण बड़ी-बड़ी बातें कर रहे हो। कल युद्ध में तुमने अपना पराक्रम क्यों नहीं दिखाया?’’


    बलि ने कहा - ‘‘ऐसा नहीं है। कई बार देवासुर संग्राम हो चुके हैं और आपने कई बार मेरा पराक्रम भी देखा है। कभी मैंने अकेले ही समस्त आदित्यों, रुद्रों, वसुओं, साध्यों तथा मरुद्गणों को परास्त किया था। मेरे वेग से देवताओं में भी खलबली मच गयी थी, किन्तु अभी पराक्रम दिखाने का समय नहीं है और इसी कारण आपकी प्रत्येक उलाहना को सह रहा हूँ। इसका कारण यह है कि जिस प्रकार एक मनुष्य रस्सी से एक पशु को बाँध लेता है, ठीक उसी प्रकार यह भयंकार काल मुझे बाँधे खड़ा है। मैं इस काल के प्रभाव को जानता हूँ, अतः शान्त बैठा हुआ हूँ।’’


    इन्द्र ने सब-कुछ सुनकर एवं शान्त होकर उसकी प्रशंसा करते हुए कहा - ‘‘सही कहा तुमने। वास्तव में काल का कोई परिहार नहीं होता। यह किसी को नहीं छोड़ता। कब किस पर गिर जाये, किसी को भी पता नहीं होता। सत्य यही है कि ऊँचे चढ़ने का अन्त है नीचे गिरना और जन्म का अन्त है मृत्यु। इससे कोई नहीं बच पाया है। अवश्य ही तुम्हारी बुद्धि तत्त्व को जानने वाली तथा स्थिर है। इसी कारण मुझे वज्रसहित देखकर भी तुमकों कोई घबराहट नहीं हुई। तुम्हारे बारे में जानने के बाद मुझमें दया का संचार हो गया है। मैं तुम्हारे जैसे ज्ञानी व्यक्ति का वध नहीं करना चाहता। अब मेरी ओर से तुम्हें कोई बाधा नहीं आयेगी, तुम मुक्त हो। सुखपूर्वक अपने जीवन को स्वस्थ होकर जी सकते हो।’’


    ऐसा कहकर देवराज इन्द्र वहाँ से चले आये। उन्होंने सम्पूर्ण असुर साम्राज्य को जीत लिया था और वे सुखपूर्वक देवताओं के सम्राट बनकर रहने लगे।
 

विश्वजीत ‘सपन’

Friday, June 21, 2019

महाभारत की लोककथा - (भाग 81)

 महाभारत की कथा की 106 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा



एक जापक ब्राह्मण की कथा

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    पूर्वकाल की बात है। हिमालय की कंदराओं में कौशिक वंश में उत्पन्न एक महायशस्वी ब्राह्मण रहता था। वह वेदों का महाज्ञाता था। एक बार गायत्री का जाप करते हुए सैंकड़ों वर्षों तक उसने तपस्या की। प्रसन्न होकर सावित्री देवी ने उसे दर्शन दिये और कहा - ‘‘हे ब्राह्मण देवता, मैं प्रसन्न हूँ। बताइये आपकी मनोकामना क्या है?’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘शुभे, इस मन्त्र के जप में मेरी इच्छा निरन्तर बढ़ती रहे तथा मन की एकाग्रता में प्रतिदिन वृद्धि हो।’’


    गायत्री ने कहा - ‘‘तथाऽस्तु। तुम एकाग्रचित्त होकर नियमपूर्वक जप करो। धर्म स्वयं तुम्हारे पास आयेगा।’’


    यह कहकर सावित्री देवी चली गयीं। वह ब्राह्मण पुनः जप करने लगा। लगभग सौ वर्षों तक उसने पुनः जप किया, तो एक दिन धर्म ने आकर कहा - ‘‘मुने, तुम्हारा संकल्प पूर्ण हुआ। तुम्हें जप का फल मिल चुका है। मनुष्यों एवं देवताओं को प्राप्त होने वाले जितने भी लोक हैं, उन्हें तुमने जीत लिया है। अब तुम देह-त्याग कर उन लोकों का भोग करो।’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘मुझे इन लोकों से क्या काम? यह मेरा संकल्प नहीं है।’’


    धर्म ने कहा - ‘‘किन्तु, तुम्हें अपने शरीर का त्याग करना ही चाहिये। उसकेे बाद तुम स्वर्गलोक जा सकते हो।’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘हे धर्म, शरीर के बिना स्वर्ग में रहने की इच्छा नहीं है। आप जाइये, मैं यहीं प्रसन्न हूँ।’’


    उसी समय यम, काल एवं मृत्यु भी उसके पास आये और उन्होंने अपना परिचय दिया, तो ब्राह्मण ने कहा - ‘‘सूर्यपुत्र यम, महात्मा काल, मृत्यु एवं धर्म का मैं सादर स्वागत करता हूँ, किन्तु वह नहीं चाहिये, जो आप चाहते हैं।’’


    ऐसा कहकर उस ब्राह्मण ने पाद्य-अर्घ्य आदि का निवेदन किया और कहा - ‘‘आपलोगों से मिलकर मुझे अति प्रसन्नता हुई। अब मुझे क्या आज्ञा है?’’


    दैवयोग से उसी समय यात्रा को निकले राजा इक्ष्वाकु भी वहाँ आ पहुँचे। उस ब्राह्मण ने उनका आदर-सत्कार किया तथा कुशल-क्षेम पूछने के बाद कहा - ‘‘महाराज, आपका स्वागत है। कहिये मैं आपके लिये कौन-सा कार्य सिद्ध करूँ?’’


    राजा इक्ष्वाकु ने कहा - ‘‘मुनिवर, पहले मेरा प्रणाम स्वीकार करें। तदनन्तर मेरा अनुरोध है कि मैं आपको दान देना चाहता हूँ। आपको जितने धन की इच्छा है माँग लीजिये।’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘ब्राह्मण दो प्रकार के होते हैं - निवृत्तिमार्ग पर चलने वाले एवं प्रवृत्तिमार्ग पर चलने वाले। मैं अब प्रतिग्रह से निवृत्त हूँ, अतः आप उन्हें दान दीजिये, तो प्रवृत्तिमार्ग पर चलने वाले हों। हाँ, यदि आपकी कोई इच्छा हो, तो अवश्य बतायें।’’


    राजा ने कहा - ‘‘मुनिवर, यदि आप कुछ देना ही चाहते हैं, तो आपने जो सौ वर्षों तक जप करके फल प्राप्त किये हैं, उन्हें दे दीजिये।’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘एवमस्तु, आप मेरे जप का उत्तम फल स्वीकार कीजिये।’’


    राजा ने कहा - ‘‘आपने फल दे दिया, किन्तु यह तो बताइये कि इस जप का फल क्या है?’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘वह फल क्या होगा, यह तो मैं नहीं जानता, किन्तु अब आपको प्रदान कर दिया है। ये धर्म, काल, यम एवं मृत्यु भी इसके साक्षी हैं।’’


    राजा ने कहा - ‘‘मुनिवर, यदि फल अज्ञात है, तो ऐसे फल को लेकर मैं क्या करूँगा। यह आप ही अपने पास रखिये और मुझे आज्ञा दीजिये।’’


    ब्राह्मण बोला - ‘‘राजन्, मैंने फल प्राप्त करने की इच्छा से जप नहीं किया था, अतः नहीं जान सकता कि फल क्या होगा। आपने माँगा और मैंने दे दिया। अब आप पीछे नहीं हट सकते। इस बात का ध्यान रखें कि जो कोई प्रतिज्ञा करके देना नहीं चाहता तथा जो याचना करके लेना नहीं चाहता, वे दोनों ही मिथ्यावादी होते हैं। आपको सत्य का साथ देना चाहिये।’’


    तब राजा ने कहा - ‘‘उचित है मुने, किन्तु क्षत्रिय तो प्रजा की रक्षा करता है और दाता है, वह दान कैसे ले सकता है?’’


    ब्राह्मण बोला - ‘‘राजन्, मैंने दान लेने की प्रार्थना नहीं की थी। आपने ही माँगा था, अतः आपको स्वीकार करना ही होगा।’’


    राजा ने कहा - ‘‘तब ठीक है मुनिवर, एक उपाय है कि हम दोनों ही एक साथ इस एकत्र फल को भोगें। इसका कारण है कि क्षत्रिय दान लेते नहीं, बल्कि देते हैं। यदि ऐसा नहीं, तो आप भी मेरे शुभ कर्मों के फल को स्वीकार करें।’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘आपने जो माँगा, वह मेरे पास धरोहर है, उसे आपको लेना ही होगा अन्यथा मैं आपको शाप दे दूँगा।’’


    राजा को बड़ा दुःख हुआ और वह बोला - ‘‘आज तक मैंने हाथ नहीं फैलाया, किन्तु आज आपसे कहता हूँ कि मेरी धरोहर मुझे दे दीजिये।’’


    तब उस ब्राह्मण ने तथा राजा ने संकल्प जल ले लिया। ब्राह्मण ने कहा कि मेरे समस्त पुण्यों का फल आप ग्रहण करें और तभी राजा ने कहा - ‘‘मैंने ग्रहण किया, किन्तु मेरे हाथ में भी संकल्प का जल है, अतः हमलोग साथ-साथ रहकर समान फल के भागी हों।’’


    तब उस ब्राह्मण ने भी उसे स्वीकार कर लिया। इसके बाद देवराज इन्द्र भी समस्त देवी-देवताओं के साथ उपस्थित हुए। आकाश में तुरही आदि बजने लगे। फूलों की वर्षा होने लगी। उसके बाद उन दोनों ने अपने मन से विषयों को निकाल दिया। फिर मूलाधार चक्र से कुण्डलिनी को उठाकर प्राण वायुओं को स्थापित किया। फिर मन को प्राण एवं अपान के साथ मिलाकर नासिका के अग्रभाग पर दृष्टि साधे हुए दोनों भौहों के मध्य आज्ञाचक्र में स्थिर किया। उसके बाद उन्होंने मन को जीकर दृष्टि को एकाग्र करके प्राणसहित मन को मूर्धा में स्थापित किया तथा वे समाधिस्थ हो गये। तभी उस महात्मा ब्राह्मण के ब्रह्मरन्ध्र का भेदन करके एक प्रकाश निकला और स्वर्ग की ओर चल पड़ा। ब्रह्मा जी ने उसका स्वागत किया और बोले - ‘‘जप करने वालों को भी वही फल मिलता है, जो योगियों को मिलता है। तुम अब मुझमें निवास करो।’’


    ब्रह्मा जी की आज्ञा लेकर वह प्रकाश ब्रह्मा जी के मुख में प्रवेश कर गया। इसी प्रकार राजा इक्ष्वाकु भी भगवान् ब्रह्मा जी में लीन हो गया।


    देवताओं की पृच्छा पर ब्रह्मा जी ने कहा - ‘‘जो महास्मृति एवं अनुस्मृति का पाठ करता तथा योग में अनुरक्त रहता है, वह भी इसी प्रकार शरीर त्याग करके उत्तम गति को प्राप्त करता है।’’


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, May 19, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग- 80)




महाभारत की कथा की 105 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 

आश्रमधर्म क्या है?

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प्राचीन काल की बात है। महर्षि भृगु कैलास शिखर पर बैठे हुए थे एवं भरद्वाज मुनि के प्रश्नों के उत्तर दे रहे थे। उन्होंने संसार एवं जीव का वर्णन किया, उसके बाद जीव की नित्यता एवं चार वर्णों की उत्पत्ति का वर्णन किया। तब भरद्वाज मुनि ने पूछा - ‘‘सत्य क्या है? असत्य का दोष क्या है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘मुने, सत्य ही ब्रह्म है, तप है। सत्य पर ही संसार टिका हुआ है। सत्य ज्ञान है, प्रकाश है, जो सुख है। असत्य अधर्म है। दुःख का कारण है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, दान, धर्म, तप, स्वाध्याय एवं अग्निहोत्र का क्या फल है?’’


मुनि भृगु ने कहा - ‘‘दान से भोगों की प्राप्ति होती है। धर्म से सुख प्राप्त होता है। तप से स्वर्ग की प्राप्ति होती है। स्वाध्याय से शान्ति मिलती है तथा अग्निहोत्र से पाप का नाश होता है।’’


पूरी तरह से संतुष्ट होकर भरद्वाज ने पूछा - ‘‘मुनिश्रेष्ठ, एक अंतिम प्रश्न। ब्रह्मा जी ने चार आश्रम बनाये हैं उनके धर्म क्या-क्या हैं। इसे सविस्तार बताने की कृपा करें।’’


भृगु ऋषि ने कहा - ‘‘तो सुनिये मुनिवर, प्रथम आश्रम है - ब्रह्मचर्य। बालकपन में शिष्य को गुरु के यहाँ रहकर वेदाध्ययन करना पड़ता है। ब्रह्मचारी बनकर वह बाहर-भीतर की शुद्धि, व्रत तथा नियमों के पालन से मन को वश में करता है। प्रातः एवं संध्या अग्निहोत्र के द्वारा अग्निदेव की उपासना करता है। इस समय प्रातः, मध्याह्न एवं सायं स्नान कर पवित्र रहना होता है। गुरु-आज्ञा से भिक्षा लाकर गुरु को अर्पण करना होता है। इस समय बालक को गुरु की सेवा करनी चाहिये तथा वेदाध्ययन के साथ-साथ स्वाध्याय करना चाहिये।


द्वितीय आश्रम है - गार्हस्थ्य। गुरुकुल की अवधि पूर्ण होने के बाद यदि पुत्रादि की इच्छा हो तो, गृहस्थ आश्रम में प्रवेश का नियम है, क्योंकि इसमें धर्म, अर्थ एवं काम तीनों की प्राप्ति होती है। यह सभी आश्रमों का मूल कहलाता है। इन्हीं के द्वारा संन्यासी आदि को भिक्षा की प्राप्ति होती है। इस आश्रम में उत्तम कर्म के द्वारा धन-संग्रह करके उसे दान, यज्ञादि में खर्च करना चाहिये। इसमें सदाचारी बनकर रहने वाला ही सुख की प्राप्ति करता है। इस आश्रम में यज्ञ करने से देवता, श्राद्ध करने से पितर, शास्त्रों के श्रवण, अभ्यास एवं धारण करने से ऋषि तथा संतान उत्पन्न करने से प्रजापति प्रसन्न होते हैं। गृहस्थ आश्रम के अनेक कर्तव्य हैं, जैसे अतिथि सेवा, दान, दया, सभी का समान आदर, किसी भी प्रकार की हिंसा नहीं, सत्य बोलना, निंदा न करना, अहंकार न करना आदि।


तृतीय आश्रम है - वानप्रस्थ। एकान्त वन में विचरण करना ही इसका ध्येय होता है। गृहस्थ धर्म में उपयोग किये गये वस्तुओं, विषयों का परित्याग करके थोड़ी मात्रा में फल-फूल खाकर ही जीवन बिताया जाता है। धर्म का पालन, नित्य नियम से स्नान, पूजा आदि करना ही इस आश्रम के नियम हैं। इस समय शरीर का ध्यान नहीं रखा जाता है। उसे मात्र धारण करने का ध्येय होता है, चाहे वह सूखकर काँटा ही क्यों न हो जाये। इस प्रकार से अपने जीवन को एक स्थल पर रहकर बिना किसी सुख की कामना के साथ बिताना ही इस आश्रम का मूल नियम है। ऐसा करने वाले एवं ब्रह्मर्षियों द्वारा बताये गये मार्ग पर चलने वाले ऐसे आश्रमधर्मी दुर्लभ लोकों को प्राप्त करते हैं।


चतुर्थ आश्रम है - संन्यास का। संन्यासी का जीवन एकान्तमय होता है। वह घर-परिवार को छोड़कर, समस्त नाते-रिश्तेदारों का त्याग कर विषय-भोगों का पूर्णतः परित्याग कर देता है। ये वानप्रस्थ ही भाँति कुटि या आश्रम बनाकर नहीं रहते, बल्कि पर्वत, गुफा, नदी का किनारा, वृक्ष के नीचे आदि स्थलों पर अपना जीवन यापन करते हैं। इस समय नगर में पाँच रात एवं गाँव में एक रात से अधिक नहीं रहना चाहिये। बिना माँगे ही पात्र में जितनी भिक्षा मिल जाये, उसे ही स्वीकार कर संतुष्ट होना चाहिये। इस समय काम, क्रोध, दर्प, लोभ, मोह आदि से सर्वथा दूर रहना चाहिये। इस समय समस्त जीवों को एक समान देखना चाहिये।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘बड़ा आभार आपका मुनिश्रेष्ठ। आज मेरे समस्त प्रकार के संदेहों का परिष्कार हो गया। कृपया यह भी बतायें, इन चार आश्रमों के नियम किसने बनाये एवं क्यों?’’


भृगु ने कहा - ‘‘जगत् का कल्याण करने के लिये ब्रह्मा जी ने पूर्वकाल में चार आश्रमों का उपदेश दिया था। जीवन को अर्थपूर्ण एवं लक्ष्यसहित बिताने के लिये ही इन आश्रमों की व्यवस्था की गयी है। व्यक्ति प्रत्येक आयु में सब-कुछ करने में सक्षम नहीं होता, अतः उसकी आयु के अनुसार ये चार आश्रम बनाये गये हैं। साथ ही जीवन के अंतिम लक्ष्य को प्राप्त करने में इन चारों आश्रमों की अपनी-अपनी विशेषतायें हैं। किसी भी एक आश्रम की उपेक्षा से यह चराचर जगत् भ्रमित हो सकता है। अतः शास्त्रों में ऐसे नियम बनाये जाते हैं। मनुष्यों के जीवन को एक निश्चित दिशा देने के लिये ही ब्रह्मा जी ने ये चार आश्रम बताये हैं। सत्य तो यही है कि जो मनुष्य लोक के धर्म-अधर्म को जानता है, वही बृद्धिमान् होता है। धर्म का पालन करते हुए, जो जीवन यापन करता है, वह शान्त एवं ज्योतिर्मय ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है।’’


इस प्रकार भृगु ऋषि ने भरद्वाज को इस जीवन एवं संसार की समस्त अवधारणाओं एवं उसमें उपस्थित व्यवस्थाओं को बताया, जो जगत् कल्याण के लिये था। एक मनुष्य को बुद्धिमान् बनकर रहना चाहिये एवं ब्रह्मा के बनाये नियमों के पालन करने चाहिये।


विश्वजीत 'सपन'

Sunday, May 12, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 79)


महाभारत की कथा की 104 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।  

चार वर्णों की उत्पत्ति

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प्राचीन काल की बात है। महर्षि भृगु कैलास शिखर पर बैठे हुए थे। भरद्वाज मुनि ने अपनी जिज्ञासा शान्त करने के लिये उनसे पूछा - ‘‘मुनिवर, मुझे यह बताइये कि चारों वर्णों की उत्पत्ति किस प्रकार हुई? इसकी रचना किसने की?’’


भृगु मुनि ने कहा - ‘‘समस्त सृष्टि की रचना ब्रह्मा जी ने की है। उन्होंने सृष्टि के आरंभ में अपने तेज से सूर्य एवं अग्नि के समान प्रकाशित होने वाले ब्राह्मण आदि प्रजापतियों को उत्पन्न किया। उसके बाद स्वर्ग-प्राप्ति के साधनभूत सत्य, धर्म, तप, सनातन वेद, आचार, शौच आदि के नियम बनाये। तदनन्तर देवता, दानव, गन्धर्व, सर्प, यक्ष, पिशाच आदि सहित मनुष्यों को उत्पन्न किया। उसके बाद उन्होंने मनुष्यों के चार वर्ण - ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र का विभाग किया। सभी प्रकार के प्राणियों में जो-जो वर्ण हैं, उनकी भी रचना की। ब्राह्मणों का रंग श्वेत, क्षत्रियों का लाल, वैश्यों का पीला तथा शूद्रों का काला बनाया।’’


भरद्वाज मुनि की उत्सुकता बनी रही। उन्होंने पूछा - ‘‘हे मुनिश्रेष्ठ, इस चराचर जगत् में सभी मनुष्यों को समान रूप से दुःख-सुख, भूख, थकावट आदि का प्रभाव पड़ता है। सभी के शरीर से मल-मूत्र, स्वेद, रक्त आदि निकलते हैं, तो इन्हें रंगों के आधार पर विभाजित कैसे किया गया?’’


तब भृगु जी ने इस प्रकार कहा - ‘‘मुनिवर, सत्य तो यही है कि ब्रह्मा जी ने वर्णों में कोई अंतर पूर्व में नहीं किया था। तब सभी ब्राह्मण ही थे, क्योंकि वे ब्रह्मा जी से उत्पन्न हुए थे। कालान्तर में विभिन्न कर्मों के कारण उसमें वर्णभेद हो गया। जिन लोगों ने ब्राह्मणोचित धर्म का त्याग कर दिया, विषयभोग के प्रेमी बन गये, क्रोधी एवं तीखे होकर वीरता का कार्य करने लगे, तो उनके रंग लाल हो गये, ऐसे ब्राह्मण क्षत्रिय कहलाये। जिन लोगों ने गोऔ की सेवा ही अपनी वृत्ति बना ली एवं खेती को जीविका बनाकर रहने लगे, तो वे पीले पड़ गये एवं ऐसे द्विजों को वैश्य कहा गया। जो लोग शौच एवं सदाचार से भ्रष्ट होकर हिंसा एवं असत्य के प्रेमी बन गये तथा लोभवश सब प्रकार का काम करने लगे, तो ऐसे ब्राह्मण-धर्म से च्युत द्विज शूद्र कहलाये। इस प्रकार अपने-अपने स्वभावों, अपनी वृत्तियों के कारण ब्राह्मण धर्म को त्यागने के कारण ये चार वर्ण बन गये हैं।’’


भरद्वाज मुनि ने पूछा - ‘‘विप्रवर, अब मुझे यह बतलाइये कि कौन-सा काम करने से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य एवं शूद्र होता है?’’


भृगु ऋषि ने कहा - ‘‘जो वेदोक्त संस्कारों से सम्पन्न, स्वाध्याय में संलग्न एवं यजन-याजन, अध्ययन-अध्यापन, दान-प्रतिग्रह इन छः कर्मों में स्थित रहते हैं, सत्य-मार्ग का पालन करते हैं, गुरुओं के प्रति श्रद्धा रखते हैं, सबके प्रति कोमल भाव रखतें हैं, जिनमें दया, तप आदि के सद्गुण मिलते हैं, वे ही ब्राह्मण होते हैं। जो वीरोचित कार्य करता है, वेदाध्ययन करता है, युद्ध करता है, ब्राह्मणों को दान करता है, प्रजा की रक्षा करता है, वह क्षत्रिय होता है। जो वेदाध्ययन करते हुए, व्यापार, पशु-पालन तथा खेती आदि का कार्य करता हुआ दान आदि करता है, वह वैश्य होता है। जो वेद एवं सदाचार का त्याग कर सब कुछ खाता है, सब तरह के काम करता हुआ अपवित्र रहता है, वह शूद्र होता है।’’


भरद्वाज ने पूछा - ‘‘मुने, तो क्या वर्णों का आधार उनके कर्म हैं, जन्म नहीं।’’


भृगु मुनि ने कहा - ‘‘आपने उचित कहा विप्रवर। यदि किसी शूद्र में ब्राह्मणोचित सद्गुण दिखाई दें, तो वह शूद्र नहीं रहता। ठीक उसी प्रकार यदि किसी ब्राह्मण में ब्राह्मण गुण न हो, तो वह ब्राह्मण नहीं होता। सर्वदा शौच एवं सदाचार का पालन करना तथा सम्पूर्ण प्राणियों पर दया रखना ब्राह्मण का लक्षण होता है। जो जिस गुण को धारण करता है, वह उसी वर्ण का बन जाता है।’’


भरद्वाज मुनि ने कहा - ‘‘उचित है मुनिवर, इसका अर्थ हुआ कि ब्राह्मण श्रेष्ठ है और उसके गुणों की ओर सभी को तत्पर होना चाहिये।’’


भृगु ने कहा - ‘‘सत्य-वचन मुने। जो सृष्टि को ब्रह्मस्वरूप नहीं जानते, वे द्विज कहलाने के अधिकारी नहीं होते। ऐसे लोगों को नाना प्रकार की योनियों में जन्म लेना पड़ता है। अतः ब्राह्मण अग्रज होने से सर्वश्रेष्ठ हैं। ये आदिदेव ब्रह्मा से उत्पन्न हुए हैं एवं इनके मूल में ब्रह्मा जी ही हैं। इसके बाद भी ये अपने सद्गुणों के कारण ही ब्राह्मण कहलाने के अधिकारी होते हैं। ब्राह्मण संसार से परवैराग्य होने के कारण परब्रह्म परमात्मा को अनायास ही प्राप्त कर लेता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘अन्य लोगों को परब्रह्म-प्राप्ति हेतु क्या करना चाहिये। मुझे सविस्तार बतायें मुनिवर।’’


भृगु ने कहा - ‘‘लोभ एवं क्रोध को दबाना ही पवित्र ज्ञान एवं आत्म-संयम है। किसी भी प्राणी की हिंसा नहीं करनी चाहिये, सबके साथ मैत्री का व्यवहार करना चाहिये, स्त्री-पुत्र आदि की ममता का त्याग कर बुद्धि द्वारा इन्द्रियों को वश में करना चाहिये, इस प्रकार वह उस स्थिति को प्राप्त करे, जिससे इहलोक एवं परलोक में निर्भय तथा शोकरहित हो। नित्य तप करने, अनासक्त रहने तथा मन को प्राण में तथा प्राण को ब्रह्म में स्थापित करने से ब्रह्मत्व की प्राप्ति होती है तथा परब्रह्म से साक्षात्कार होता है।’’


इस प्रकार भृगु मुनि ने भरद्वाज की जिज्ञासाओं को शान्त किया एवं जगत् के चार वर्णों के विभेद की विवेचना की। सभी मनुष्य ब्रह्मा से उत्पन्न होने के कारण एक समान ही हैं, किन्तु उनके कर्म उन्हें पृथक वर्ण का बना देते हैं।


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, May 4, 2019

महाभारत की लोककथा भाग-78




महाभारत की कथा की 103 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

जीव की नित्यता

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प्राचीन काल की बात है। एक बार भरद्वाज मुनि महर्षि के भृगु के पास गये। वे जीवन के सत्य को जानना चाहते थे। संसार एवं शरीर के मूलतत्त्वों को जानने के बाद उन्होंने महर्षि से इस प्रकार पूछा - ‘‘भगवन्, मृत्यु के समय गो दान किया जाता है, यह सोचकर कि गौ परलोक में उसका कल्याण करेगी। गौ दान करके वह मर जाता है। गौ दान करने वाला, उसे लेने वाला एवं स्वयं गौ भी इसी धरती पर नष्ट हो जाते हैं। परलोक में ये कल्याण का कारण कैसे बनते हैं? जो भी मरता है, वह जलकर भस्म हो जाता है अथवा उसे पक्षी आदि खा जाते हैं। ऐसी अवस्था में उसका पुनः जीवित होना संभव नहीं है, क्योंकि वह सदा के लिये चला जाता है। इसका रहस्य क्या है?’’


भृगु जी ने कहा - ‘‘मुनिवर, यह मात्र आपका प्रश्न नहीं है। इस संसार में मोह में बँधे समस्त प्राणियों का यही सोचना है, किन्तु सत्य यही है कि जीव अथवा उसके किये गये दान या कर्म का कभी नाश नहीं होता है। जीवन की मृत्यु का अर्थ मात्र उसके शरीर का नाश होता है। वह तत्क्षण ही किसी दूसरे शरीर में प्रविष्ट कर जाता है, जिस योनि में उसे जाना होता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘आपकी बात उचित है मुनिवर, किन्तु यदि देहधारियों के शरीरों में मात्र अग्नि, वायु, पृथ्वी, आकाश एवं जल तत्त्व ही विद्यमान है, तो उनमें रहने वाले उस जीव का क्या स्वरूप है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘इसे ही अन्तरात्मा कहते हैं। यही देह का संचालन करता है। यह नित्य है, अजर-अमर है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, शरीर को चीर-फाड़ कर देखने पर जीव दिखाई नहीं देता, किन्तु जीवित होने पर उसे दुःख आदि का अनुभव होता है। यह किस प्रकार संभव है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘पंचभूतों के गुणों अर्थात् रूप, रस, गन्ध, स्पर्श एवं शब्द तथा दूसरे सभी गुणों का अनुभव यही आत्मा करता है। वह पाँचों इन्द्रियों के गुणों को धारण करने वाला मन का द्रष्टा है तथा वही पांचभौतिक देह के प्रत्येक अवयव में व्याप्त होकर सुख-दुःख का अनुभव करता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, जीव कभी किसी की बात सुनता है और कभी नहीं। नेत्र से सब-कुछ देखता है, किन्तु व्याकुल होने पर नहीं देखता। इसी कारण मन के अतिरिक्त जीव की सत्ता मानना व्यर्थ है। नींद में पड़ा प्राणी सभी इन्द्रियों के होते हुए भी न देखता है, न सुनता है, न सूँघता है, न ही बोलता है। उसे स्पर्श एवं रस का भी अनुभव नहीं होता। अतः जिज्ञासा होती है कि इस शरीर में कौन हर्ष एवं विषाद करता है? किसे शोक एवं उद्वेग होता है? इच्छा, ध्यान, द्वेष एवं बातचीत करने वाला कौन है? कृपया इन तथ्यों को विस्तार से बतायें, ताकि भ्रम दूर हो।’’


भृगु ने कहा - ‘‘बड़ा उचित प्रश्न है मुनिवर। कभी-कभी ऐसा भी होता है, जब किसी प्राणी को किसी भी इन्द्रिय के विषयों का भान नहीं होता है। जब आत्मा का शरीर के साथ सम्बन्ध नहीं रहता, तो इस देह को सुख-दुःख का भान नहीं होता। इसी के कारण मन के अतिरिक्त उसके साक्षी आत्मा की सत्ता स्वतः प्रमाणित हो जाती है। जब शरीर में स्थित अग्निस्वरूप आत्मा इससे पृथक हो जाता है, तो उस समय शरीर को रूप, स्पर्श तथा अग्नि की गर्मी का अनुभव नहीं होता तथा उस शरीर की मृत्यु हो जाती है। इसे इस प्रकार जानिये कि आत्मा जब प्रकृति के गुणों से युक्त होता है, तब वह क्षेत्रज्ञ कहलाता है तथा जब वह उन्हीं गुणों से मुक्त हो जाता है, तब परमात्मा कहलाता है। यह आत्मा कमल के पत्ते पर पड़े जल-बिन्दु की भाँति शरीर में रहकर भी पृथक रहता है। वही चेष्टा करता है तथा कराता भी है। देह के नष्ट हो जाने पर भी उसका नाश नहीं होता। असल में शरीर का नाश ही मृत्यु है, जीव का नहीं। वह तो तत्काल ही किसी दूसरे शरीर में चला जाता है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘मुनिवर, ये ज्ञान की बातें, जीवन को सुखमय बनाने हेतु ही हैं। इसे कौन अनुभव करता है? इस मोह से किस प्रकार छुटकारा संभव है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘मुने, जीवन आनन्द का नाम है। ईश्वर ने इसे आनन्द के लिये ही बनाया है, किन्तु मोह में फँसे लोग इसे जान नहीं पाते हैं, समझ नहीं पाते हैं तथा इसी कारण देह के नष्ट हो जाने पर जीव की मृत्यु बतलाते हैं। यह मिथ्या है, भ्रम है। इसे इस प्रकार जानिये कि यह आत्मा प्राणियों के भीतर छिपा हुआ है। जो कोई भी अविद्या से आच्छादित होते हैं, उनके लिये यह प्रकाश में नहीं आता। मात्र तत्त्वदर्शी महात्मा ही अपनी तीव्र एवं सूक्ष्म बु़िद्ध से उसका साक्षात्कार करते हैं। जो भी विद्वान् परिमित आहार करके, रात के पहले तथा पिछले पहर में सदा ध्यानयोग का अभ्यास करता है, वह चित्त शुद्ध होने पर अपने अन्तःकरण में ही उस आत्मा को देख लेता है तथा उसे पहचान लेता है। अन्तःकरण के शुद्ध हो जाने के कारण वह शुभाशुभ कर्मों के बंधन से भी मुक्त हो जाता है। ऐसा महात्मा जो प्रसन्नचित्त होता है, अपने आत्म-स्वरूप में स्थित होकर अनन्त आनन्द का अनुभव करता है।’’


इस प्रकार भृगु ऋषि ने जीव की नश्वरता एवं शरीर से उसकी पृथक सत्ता का समुचित वर्णन किया। इनको एक मानना अज्ञानता के कारण होता है। यही जीवन-दर्शन है। यही सत्य है।


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, April 27, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 77)


महाभारत की कथा की 102 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

जीव एवं जगत् के मूलतत्त्व

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प्राचीन काल की बात है। परम तेजस्वी महर्षि भृगु कैलाश शिखर पर बैठा करते थे। भरद्वाज मुनि को जीव एवं जगत् के बारे में जानने की इच्छा हुई। एक बार वे महर्षि भृगु के पास गये तथा उनसे पूछा - ‘‘मुनिवर, इस स्थावर-जंगम जगत् की उत्पत्ति कैसे हुई है और प्रलय आने पर यह कहाँ चला जाता है?’’


भृगु मुनि ने कहा - ‘‘मुने, सुनने में आता है कि प्रारम्भ में एक मानस देव था। वह आदि-अन्त से रहित, अभेद्य एवं अजर-अमर था। वह ‘अव्यक्त’ नाम से प्रसिद्ध था। सब जीवों की उत्पत्ति उसी से होती है तथा मरने के बाद वे उसी में लीन हो जाते हैं।’’


भरद्वाज ने जिज्ञासा की - ‘‘पर्वत, पृथ्वी, समुद्र, आकाश, वायु, अग्नि मेघ सहित इस लोक की किसने रचना की?’’


भृगु ने समझाते हुए कहा - ‘‘यह भी सुना जाता है कि उस स्वयम्भू मानस देव ने सर्वप्रथम एक तेजोमय दिव्य कमल की रचना की। उसी से वेदस्वरूप ब्रह्मा की उत्पत्ति हुई। वह समस्त भूतों का आत्मा तथा उनकी रचना करने वाला है। पंच महाभूत भी उस ब्रह्मा की ही सृष्टि है। पर्वत उसकी अस्थियाँ हैं, पृथ्वी उसका मेद एवं मांस है, समुद्र रुधिर है, आकाश उदर है, वायु श्वास है, अग्नि तेज है, नदियाँ नाड़ियाँ हैं, चन्द्रमा तथा सूर्य उसके नेत्र हैं। इस अचिन्त्य पुरुष को जानना सिद्ध पुरुषों के लिये भी कठिन है। यही भगवान् विष्णु है एवं अनन्त नाम से प्रसिद्ध है। यह समस्त भूतों का आत्मा तथा अन्तर्यामी है। इसे मात्र शुद्ध चित्त वाले ही जान सकते हैं।’’


भरद्वाज ने पूछा - ‘‘भगवन्, इस आकाश, दिशा, पृथ्वी एवं वायु का परिमाण कितना है? मेरा संदेह दूर कीजिये।’’


भृगु ने कहा - ‘‘यह आकाश तो अनन्त है। यह आकाश ही नहीं वरन् अग्नि, वायु, जल आदि का भी परिमाण जानना कठिन है। ऋषियों ने विविध शास्त्रों में त्रिलोकी एवं समुद्र आदि के बारे में कुछ कहा है, किन्तु जो दृष्टि से परे है तथा जिस तक इन्द्रियों की पहुँच नहीं है, उस परमात्मा का परिमाण कोई कैसे बता सकता है? अतः इन्हें अपरिमित ही जानना चाहिये।’’


भरद्वाज ने जिज्ञासा की - ‘‘मुनिश्रेष्ठ, लोक में पाँच धातु ही महाभूत कहलाये, जिन्हें ब्रह्मा ने सृष्टि के आरम्भ में रचा था। इन्हें ही भूत कहना कहाँ तक उचित है, जबकि ब्रह्मा जी ने इसके साथ ही सहस्रों भूतों की सृष्टि की थी?’’


भृगु ने कहा - ‘‘ये पाँचों असीम हैं, अतः इन्हें महाभूत की संज्ञा दी जाती है। मानव शरीर भी इन पाँचों का ही संघात है। जो गति है, वह पवन का अंश है, जो खोखलापन है वह आकाश का अंश है, ऊष्मा अग्नि का अंश है, रक्तादि तरल जल के अंश हैं तथा हड्डी, मांस आदि पृथ्वी के अंश हैं। इस प्रकार समस्त स्थावर-जंगम संसार इन पाँचों महाभूतों से ही बना है।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘किन्तु मुनिवर, स्थावर शरीरों में ये पाँचों तत्त्व दृष्टिगत नहीं होते। वृक्ष न सुनते हैं न देखते हैं, न उन्हें रस का आनन्द आता है तथा न ही वे गन्ध ले सकते हैं। फिर इन्हें पंचभौतिक कैसे कहा जा सकता है?’’


भृगु ने कहा - ‘‘ऐसा नहीं है मुने, वृक्ष ठोस अवश्य जान पड़ते हैं, किन्तु उनमें भी ये पंचतत्त्व होते हैं। इसी कारण वे नित्यप्रति बढ़ते हैं, फल-फूल आदि की उत्पत्ति करते हैं। उनके अंदर जो ऊष्मा होती है, उसी के कारण पत्ते, छाल, फल आदि मुरझा जाते हैं। बिजली कड़कने पर वृक्ष में कम्पन होता है। वृक्ष को स्पर्श होना, सुनना आदि सभी गुणों से सम्पन्न पाया जाता है। वे अपनी जड़ों से जल पीते हैं तथा इसी कारण ‘पादप’ कहलाते हैं। उनमें दुःख-सुख का ज्ञान भी देखा गया है एवं इसी कारण वे अचेतन नहीं, बल्कि जीवयुक्त हैं।’’


भरद्वाज ने कहा - ‘‘इन पंचभूतों के बारे में थोड़ा विस्तार से बतायें मुनिवर। इनका हमारे शरीरादि से क्या सम्बन्ध हैं? ये देहधारियों में किस प्रकार समाहित होते हैं?’’


भृगु ने कहा - ‘‘हमारे शरीर में पाँच भूत पूर्णतः समाये रहते हैं। शरीर में अस्थि, त्वचा, मांस, मज्जा एवं स्नायु, ये पाँच पृथ्वीमय हैं। तेज, क्रोध, चक्षु, ऊष्मा एवं जठरानल, ये पाँच अग्निमय हैं। श्रोत्र, घ्राण, मुख, हृदय एवं उदर, ये पाँच आकाशीय अंश हैं। कफ, पित्त, स्वेद, चरबी एवं रुधिर, ये पाँच जलीय अंश हैं। प्राण, अपान, उदान, समान एवं व्यान, ये पाँच वायवीय अंश हैं। जीव भूमि के कारण गन्ध का अनुभव करता है, जल के कारण रस का अनुभव करता है, तेजोमय चक्षु के द्वारा रूप को देखता है तथा वायुमय त्वक् के द्वारा स्पर्श का अनुभव करता है। गन्ध नौ प्रकार के हैं तथा रस मुख्यतः छह प्रकार के हैं। वैसे इसके अनेक प्रकार बताये गये हैं। रूप सोलह प्रकार के हैं तथा स्पर्श बारह प्रकार के होते हैं। शब्द के सात प्रकार बताये गये हैं। जल, अग्नि एवं वायु ये तीन देहधारियों में सर्वदा जाग्रत रहते हैं। ये ही प्राणों के मूल हैं तथा प्राणों में ओत-प्रोत होकर शरीर में स्थित होते हैं।’’


इस प्रकार महर्षि भृगु ने भरद्वाज को इस संसार एवं शरीरों के मूलतत्त्व का वर्णन किया। यही जीव है और यही शरीरधारी है। साथ ही यह भी बताया कि प्रलय के समय वे स्वयम्भू मानस में विलीन हो जाते हैं। 


विश्वजीत 'सपन'

Friday, April 19, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग- 76)



महाभारत की कथा की 101 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।

मनुष्य जाति की महत्ता

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प्राचीन काल की बात है। काश्यप नामक एक ब्राह्मण था। वह संयमी एवं तपस्वी था, किन्तु उसके पास धन की कमी थी। इस कारण से उसका अधिक सम्मान न हो पाता था। एक दिन की बात है। वह किसी व्यापारी के साथ उसके रथ में जा रहा था। दोनों के मध्य विवाद हो गया। विवाद बड़ा हो गया और क्रोध में आकर उस धनिक ने काश्यप को रथ से धक्का दे दिया। काश्यप नीचे गिर गया और उसके पैर में चोट लगी। वह विचार करने लगा कि उसका जीवन कितना अधम है। एक धनिक भी उससे अधिक सुखी है। उसे लगा कि उसका जीवन व्यर्थ है, अतः उसने आत्मघात करने की सोची। उसकी ऐसी सोच को जानकर इन्द्र एक सियार का रूप धर कर उसके पास आये और बोले - ‘‘हे ब्राह्मण देवता, आपको क्या कष्ट है?’’


    काश्यप ने अपने मन की बात बता दी और कहा कि उसका जीवन व्यर्थ है। तब उस सियार ने कहा - ‘‘ये आप क्या कह रहे हैं? मनुष्य योनि पाने के लिये तो सभी प्राणी उत्सुक रहते हैं। ऐसा दुर्लभ शरीर पाकर आप उसे ही नष्ट करना चाहते हैं? यह कदापि उचित नहीं है।’’


    काश्यप ने कहा - ‘‘किन्तु जब जीवन व्यर्थ लगे, तो क्या करना चाहिये। ऐसे जीवन से जीवन का न होना ही श्रेयस्कर होता है।’’


    सियार ने कहा - ‘‘हे द्विववर, सबके पास किसी न किसी वस्तु की कमी होती ही है। अब देखिये मेरे हाथ नहीं हैं। मेरे शरीर में काँटे चुभे हुए हैं, किन्तु हाथ न होने के कारण मैं उन्हें निकाल नहीं सकता। मुझे कीड़े काट रहे हैं, किन्तु हाथ न होने के कारण उनसे छुटकारा पाना मेरे लिये संभव नहीं है। जिनके हाथ होते हैं, वे वर्षा, घाम या शीत से स्वयं की रक्षा कर सकते हैं। आपके भी हैं, किन्तु आप इस पर दुःखी हैं?’’


    ब्राह्मण ने कहा - ‘‘तुम नहीं समझोगे। मुझसे अच्छा जीवन तो तुम्हारा है, एक कीड़ा-मकौड़ा भी मुझसे अच्छा जीवन बिताता है।’’


    सियार ने कहा - ‘‘ये आप क्या कह रहे हैं, ब्राह्मण देवता। सभी प्राणी मनुष्य योनि में उत्पन्न होना चाहते हैं। आप न केवल मनुष्य है, बल्कि आप ब्राह्मण भी हैं। ब्राह्मण तो सभी मनुष्यों में श्रेष्ठ होते हैं। आप वेदवेत्ता भी हैं। इस कारण आप पर ईश्वर की कृपा भी हमेशा ही बनी रहती है। इससे अधिक किसी की क्या कामना हो सकती है? आत्महत्या करना पाप है। मुझे देखिये मैं शृगाल योनि में हूँ। यह नीच है, किन्तु कितने इससे भी नीच हैं। भंगी और चाण्डाल भी अपनी योनियों में प्रसन्न रहते हैं तथा अपना शरीर नहीं छोड़ना चाहते।’’


    काश्यप ने कहा - ‘‘यह सब तो ठीक है, किन्तु धन भी तो होना चाहिये?’’


    सियार ने कहा - ‘‘बिल्कुल, किन्तु उतना ही जितना कि आवश्यक हो, अन्यथा धनी हो जाने पर व्यक्ति राज्य चाहने लगता है। एक बार उसे राज्य प्राप्त हो जाये, तो वह देवत्व प्राप्त करने की कामना करने लगता है। यह एक ऐसी तृष्णा है, जो निरन्तर बढ़ती ही जाती है। इस तृष्णा की अग्नि जल से नहीं बुझती, बल्कि ईंधन से अग्नि के समान वह और भी प्रज्वलित हो जाती है। बुद्धि एवं इन्द्रियाँ ही समस्त कामनाओं एवं कर्मों के मूल में होती हैं। उन्हें ही नियंत्रित करने की आवश्यकता होती है।’’


    काश्यप ने सियार की बात मान ली और पूछा - ‘‘तो फिर आप ही बताइये कि मुझे क्या करना चाहिये?’’


    सियार ने कहा - ‘‘आपका शरीर नीरोग है एवं आप पूर्णांग हैं। यदि जातिच्युत करने वाला कोई सच्चा कलंक भी लगा हो, तो भी आपको प्राणत्याग का विचार नहीं करना चाहिये, अपितु आपको धर्म पालन करना चाहिये। आप सावधानी से स्वाध्याय एवं अग्निहोत्र कीजिये, सत्य बोलिये, इन्द्रियों को वश में रखिये, दान दीजिये तथा किसी से भी स्पर्धा मत कीजिये। मैं पूर्वजन्म में एक पण्डित था। मैं कुतर्क करके वेद की निंदा किया करता था। वेदों में मेरी आस्था न थी। मैं बातें बनाया करता था तथा अनावश्यक कुतर्क किया करता था। यह शृगाल योनि मेरे उन्हीं कुकर्मों का फल है। अब मैं दिन-रात विचार करता रहता हूँ कि मुझे किस प्रकार मनुष्य योनि की प्राप्ति हो तथा जानने योग्य वस्तुओं को जान सकूँ एवं त्याज्य को त्याग सकूँ। आप एक श्रेष्ठ प्राणी हैं। आप स्वयं विचार कीजिये कि जो बात मैंने कही वह उचित है अथवा नहीं?’’


    काश्यप एक अनुभवी तपस्वी था। उसे प्रतीत हुआ कि वह सियार कोई साधारण प्राणी नहीं था। उसने प्रणाम किया तो इन्द्र अपने स्वरूप में आ गये। काश्यप ने उनको पुनः प्रणाम कर पूजा की तथा उपदेश ग्रहण कर घर आ गया। उसके मन से सभी विकार मिट गये थे। आत्महत्या का विचार भी अब उसे स्पर्श नहीं कर पा रहा था। उस दिन के बाद से उसने धर्म में अपना मन लगा लिया एवं सुख से रहने लगा।

 
    कहा गया है कि मनुष्य जाति बड़ी कठिनाई से मिलती है। इसे प्राप्त करने के बाद सद्कर्मों से इसका लालन-पालन करना चाहिये, ताकि भविष्य में इससे इतर योनि में जन्म न हो, बल्कि मोक्ष की प्राप्ति हो। 


विश्वजीत 'सपन'

Saturday, April 13, 2019

महाभारत की लोककथा (भाग - 75)





महाभारत की कथा की 100 वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 

अजगर व्रत का आचरण

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प्राचीन काल की बात है। समस्त प्रकार के राग, भय, लोभ, मोह एवं क्रोध को त्याग करने वाले एक मुनि हुए। उनका नाम अजगर था। वे अत्यन्त ही शुद्धचित्त एवं निर्विकार थे। उनकी इस वृत्ति को अजगर-वृत्ति के नाम से भी जाना जाता था। एक दिन की बात है। असुरराज प्रह्लाद ने उन्हें देखा और वे उनके बारे में जानने को उत्सुक हो गये। उन्होंने उनके आश्रम में जाकर उन्हें प्रणाम किया, तो अजगर मुनि ने उनसे कहा - ‘‘दैत्यराज, आपका मेरे आश्रम में आने का प्रयोजन क्या है? बताइये मैं आपकी क्या सेवा कर सकता हूँ?’’


    असुरराज प्रह्लाद ने कहा - ‘‘मुनिवर, हम सभी इतना कुछ प्राप्त करने के बाद भी आनन्द का अनुभव नहीं करते, किन्तु आपके पास कुछ भी नहीं है, फिर भी आप आनन्दित रहते हैं। यह कैसे संभव है?’’


    मुनि ने अपनी मधुर वाणी में कहा - ‘‘इस जगत् के उत्पत्ति, ह्रास, वृद्धि और नाश का कारण प्रकृति ही है। यह जानकर न मैं हर्षित होता हूँ और न ही व्यथित। जितने भी संयोग हैं, उन्हें आप वियोग में समाप्त होने वाले ही समझिये। साथ ही जितने भी संचय हैं, उनका अंत भी विनाश में समझिये। आप देखिये और अनुभव कीजिये कि पृथ्वी पर जितने भी स्थावर एवं जंगम प्राणी हैं, उनकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखती है। गगन में जो समस्त तारे हैं, वे भी एक न एक दिन गिरते ही प्रतीत होते हैं। इस प्रकार समस्त प्रणियों को मृत्यु के अधीन देखकर सबमें समान भाव रखते हुए मैं आनन्द से सोता हूँ। जीवन आनन्द का नाम ही है।’’


    प्रह्लाद की जिज्ञासा बढ़ गयी। उन्होंने पूछा - ‘‘मुनिवर, आपकी वृत्ति क्या है? मुझे थोड़ा विस्तार से बतायें।’’


    मुनि अजगर ने कहा - ‘‘असुरराज, यह जीवन जीने का एक उपाय भर है। अनेक लोग इसे अनेक प्रकार से जीते हैं, किन्तु मेरा अपना मानना है कि यदि अनायास कुछ मिल जाये, तो उसे स्वीकार कर लेना चाहिये, तब अधिक भोजन भी हो जाये, तो कोई हानि नहीं और यदि कभी न भी मिले तो कई दिनों तक भूखा रह जाना भी कोई अनुचित नहीं। जब जैसा जो होता है, उसे उसी प्रकार स्वीकार करना चाहिये। 


मुझे कभी मूल्यवान वस्त्र मिल जाये, तो उसे स्वीकार कर लेता हूँ तथा नहीं मिले तो सन या चर्म के वस्त्र ही धारण कर लेता हूँ। इससे मुझे कोई अन्तर नहीं पड़ता। दैववश कुछ भी पदार्थ प्राप्त होता है, तो उसका कभी त्याग नहीं करता, किन्तु कभी किसी दुर्लभ वस्तु की कामना नहीं रखता। मेरे सोने-बैठने का कोई स्थान नियत नहीं है। मैं स्वभाग से ही यम, नियम, व्रत, सत्य एवं शौच का पालन करता हूँ। यही अजगर वृत्ति है। यह अत्यन्त सुदृढ़, कल्याणमय, शोकहीन, पवित्र एवं अतुलनीय है। मैं सर्वथा अन्तःकरण से इस अजगर-वृत्ति का पालन करता हूँ।’’


    प्रह्लाद ने पूछा - ‘‘हे मुनिश्रेष्ठ, सच में आपने दुर्लभ गति पायी है। आपको किसी लाभ की इच्छा नहीं है और हानि होने पर भी आपको कोई चिन्ता नहीं होती। आप सदा ही तृप्त जान पड़ते हैं। आपके पास ऐसी क्या बुद्धि है अथवा शास्त्रज्ञान है, जिससे आप ऐसा कर पाते हैं? कृपा कर मुझे बताने का कष्ट करें।’’


जन्म-मरण और सुख-दुःख आदि तो विधाता के हाथ में है, ऐसा जानकर ही मैंने भय, राग, मोह एवं अभिमान का त्याग कर दिया है। साथ ही धैर्य एवं बुद्धि को अपनाया है। मन एवं वाणी की उपेक्षा करके इन्द्रियों को वश में कर लिया है। मैं अपने धर्म से कभी च्युत नहीं होता। मुझे किसी फल की इच्छा भी नहीं है। मूढ़मति लोगों को ऐसी बुद्धि दुष्कर प्रतीत होती है, किन्तु इसे सर्वथा निर्दोष तथा अविनाशी मानता हूँ। सबसे बड़ी बात है कि मैं सब प्रकार के दोषों एवं तृष्णाओं को नष्ट कर देता हूँ। इसी कारण मेरी गति परिमित है, मति अविचल है एवं मैं पूर्णतया शान्त हूँ। इस प्रकार मैं बड़े आनन्द से अजगर व्रत का आचरण करता हूँ। यही रहस्य है।’’


कहा जाता है कि जो कोई मनुष्य राग-द्वेष आदि का त्याग कर अजगर वृत्ति का पालन करता है, वह इस लोक में आनन्द से विचरण करता है। उसे शोक एवं दुःख स्पर्श भी नहीं कर पाता है। 


विश्वजीत 'सपन'