Friday, May 19, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 8

‘‘घमण्डी कौआ’’ 
============ 

महाभारत की कथा में तैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत आठवीं लोककथा - ‘‘घमण्डी कौआ’’  

यह कहानी एक कौआ और हंस की है। वह कौआ दूसरों के जूठन पर पलता हुआ, बहुत घमण्डी हो गया था। जब उसने हंस को देखा, तो उसे बहुत ईर्ष्या हुई और उसने हंस को उड़ान भरने की चुनौती दी। वह चाहता था कि जब वह जीत जायेगा, तो लोग उसके उस रूप के बाद भी उसे ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगेंगे। उसे पसंद करने लगेंगे। सारे कौए उसके साथ थे, किन्तु प्रतियोगिता के दिन असल में क्या होता है, इसका विवरण इस कहानी में मिलता है।


एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2181.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2181&page=10&date=15-05-2017


विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, May 11, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 7

"करम गति टारै नाहीं टरै"
==================
 
महाभारत की कथा में इकतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत छठी लोककथा - ‘‘करम गति टारै नाहीं टरै’’ 

यह कहानी गौतमी नामक एक वृद्धा की है, जिसके इकलौते पुत्र की मृत्यु सर्प के काटने से हो जाती है। एक बहेलिया ने उस सर्प को पकड़ लिया। वह उसे इस कृत्य के लिये दण्डित करना चाहता है। इस पर वाद-विवाद होता है और तब किस प्रकार मृत्यु एवं काल को अपना पक्ष रखना पड़ता है। और अंततः पता चलता है कि किस प्रकार उस बालक के पूर्व कर्म के कारण उसकी मृत्यु हुई है। कर्म का फल हमें इसी संसार में रहते हुए भुगतना पड़ता है। यही इस कथा का मुख्य संदेश है।


एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2165.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2165&page=10&date=08-05-2017


विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, May 7, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 6

दृढ़ निश्चय ही दिलाती है सफलता
========================

महाभारत की कथा में इकतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत छठी लोककथा - ‘‘दृढ़ निश्चय ही दिलाती है सफलता’’

एक इंसान के इकलौते पुत्र की मृत्यु हो जाती है। वह शव लेकर श्मशान जाता है। सियार और गिद्ध अपने-अपने प्रयोजन से उन्हें कभी रोकने और कभी जाने के लिये कहते रहते हैं, तब उस व्यक्ति में भी आशा का संचार होता है कि हो सकता हो कि किसी प्रकार उसका पुत्र भी जीवित हो जाये। उसने ईश्वर से प्रार्थना की और उसे सफलता मिली। एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2149.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2149&page=10&date=01-05-2017


विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, April 29, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 5

‘‘गुरु की आज्ञा का पालन धर्म समान है’’
====================================== 

महाभारत की कथा में तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत पाँचवीं लोककथा - ‘‘गुरु की आज्ञा का पालन धर्म समान है’’।

तक्षशिला में आयोद धौम्य नामक एक ऋषि थे। उनके गुरुकुल में उनके कई शिष्य गुरुकुल में ही रहकर पढ़ाई करते थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिये जाते थे। उनके तीन प्रधान शिष्य थे - आरुणि, उपमन्यु और वेद। तीनों ही एक से बढ़कर गुरुभक्त थे। यह कथा आरुणि की है कि किस प्रकार उसने अपने प्राण की परवाह किये बिना गुरु की आज्ञा का पालन किया और फसल के लिये जल का संरक्षण किया। 


कहानी पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2133.pdf 

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2133&page=10&date=24-04-2017 



विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, April 20, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 4

मनुष्य को दीमक की तरह खा जाता है ‘अहंकार’
----------------------------------------------------------

महाभारत की कथा की उनतीसवीं कड़ी में यह कहानी प्रस्तुत है। 


यह कहानी देव एवं दानवों के मध्य न केवल युद्ध का है, बल्कि इसमें यह भी बताया गया है कि अहंकारी चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, उसने स्वयं को उचित बताने के कितने भी प्रयास कर लिये हों, उसने स्वयं को स्थापित करने के कितने ही प्रयास कर लिये हों, किन्तु एक न एक दिन उसका अहंकार ही उसको ले डूबता है। त्रिपुरों की यह कहानी न केवल रोचक है, बल्कि हमारे जीवन के लिये अति शिक्षाप्रद भी है। 


आशा है कि महाभारत की यह प्रतीकात्मक कथा आप सभी को अवश्य पसंद आयेगी।


इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक के प्रयोग किये जा सकते हैं। साथ ही नीचे एक फोटो के रूप में भी कहानी दी जा रही है। इच्छुक मित्र उससे भी पढ़ सकते हैं।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2117.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2117&page=10&date=17-04-2017


विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, April 13, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 3

जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी

महाभारत की कथा का अट्ठाइवाँ भाग प्रस्तुत है। इसमें महाभारत की तीसरी लोककथा है - ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी’’। 

यह कहानी एक तोते के कृतज्ञता की है। मरे हुए पेड़ से वह इतना प्रेम करता है कि भगवान् को आकर उसे जीवनदान देना पड़ता है। आज हममें इस कृतज्ञता की अत्यधिक कमी है। आइये पढ़ें और सीखें कि जीवन में जो हमारी रक्षा करते हैं, हमें उनका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा नीचे दिये फोटो में भी इसे पढ़ सकते हैं।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2101.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2101&page=10&date=10-04-2017 



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, April 4, 2017

महाभारत की लोककथा - 2


‘‘संकट में घबराना नहीं चाहिए’’


महाभारत की दूसरी लोककथा में इस कहानी को पढ़ें। इस कड़ी में यह सत्ताइसवीं कथा का प्रकाशन हुआ है। यह धारावाहिक आपको कैसा लग रहा है, इस बारे में आपके विचार अपेक्षित हैं।


प्रस्तुत कथा एक बुद्धिमान चूहे पलित की है, जिसने संकट में अपनी बुद्धिमानी से न केवल अपनी जान बचाई, बल्कि एक संदेश भी हम सभी को दे गया कि जब आवश्यकता हो, तो किसी से भी मित्रता कर लेनी चाहिए, किन्तु यदि सबल मित्र है, तो उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए।


नीचे दिये लिंक को क्लिक करें या नीचे दिये चित्र में इस कथा को पढ़ें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2077.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2077&page=10&date=03-04-2017



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Friday, March 31, 2017

महाभारत की लोककथा - 1 "मित्रता में दरार"


महाभारत की लोककथा का प्रारंभ ‘पवन प्रवाह’ पर हो चुका है। प्रथम कथा का शीर्षक है - ‘मित्रता में दरार’’। यह कथा एक सियार एवं व्याघ्र की मित्रता की है, जिसके माध्यम से बताया गया है कि यदि एक बार मित्रता में दरार आ जाये, तो वह कभी भरता नहीं है। साथ ही यह संदेश भी है कि अपने स्वाभाव वालों के साथ ही मित्रता टिकती है।

इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा इस चित्र से ही पढ़ सकते हैं जो नीचे है।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2061.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2061&page=10&date=27-03-2017



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 23, 2017

दमयन्ती और नल का पुनर्मिलन

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथाओं के क्रम में पच्चीसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है ‘‘दमयन्ती और नल का पुनर्मिलन’’। हमने अब तक देखा कि नल एवं दमयन्ती एक-दूसरे से अलग हो गये। उन्हें नाना प्रकार के कष्टों से गुज़रना पड़ा। जहाँ दमयन्ती अभी भी राजा नल की तलाश में थी, वहीं राजा नल युक्ति से अपना राज्य वापस पाने के लिये प्रयासरत थे। तब दमयन्ती ने किस प्रकार राजा नल को पहचाना और उनसे मिली, अब इस कथा में वर्णित है। 


कथा पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2045.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2045&page=10&date=20-03-2017





सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 16, 2017

नल एवं दमयन्ती की दुर्लभ यात्रायें (भाग - 4)

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथा के रूप में चौबीसवीं कड़ी में प्रस्तुत है - ‘‘राजा नल एवं दमयन्ती’’ की कथा का चतुर्थ भाग - ‘‘नल एवं दमयन्ती की दुर्लभ यात्रायें’’। 


मित्रों, हमने देखा कि राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर वन में चले जाते हैं कि वह अपने पिता के पास लौट जायेगी, किन्तु दमयन्ती ऐसा नहीं करती और अपनी खोज जारी रखती है। उधर राजा नल भी भटकने लगते हैं और उन्हें कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है, क्या-क्या करना पड़ता है, इस भाग में वर्णित है। दैव संयोग से ऐसा हो रहा है, इसका आभास दमयन्ती होता है। 


कथा पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2029.pdf 

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2029&page=10&date=13-03-2017 




विश्वजीत 'सपन'

Thursday, March 2, 2017

दमयन्ती का विरह - भाग 3

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथाओं में तेईसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - ‘‘दमयन्ती का विरह’’।


देवताओं के होते हुए भी दमयन्ती ने राजा नल का वरण किया और वे सुख से रहने लगे। उधर कलियुग और द्वापर भी उसी स्वयंवर में भाग लेने जा रहे थे, किन्तु जब उन्हें पता चला कि दमयन्ती ने देवताओं को छोड़कर राजा नल से विवाह किया, तो उन्होंने इसे अपमान समझा। वे इसका दण्ड देने की योजना बनाने लगे। उनकी कुटिल योजना क्या बनती है? किस प्रकार राजा नल एवं दमयन्ती के जीवन में कठिनाइयों के दौर प्रारंभ होते हैं। अब इस कथा में पढ़िये। 


पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up1997.pdf 

http://pawanprawah.com/paper.php?news=1997&page=10&date=27-02-2017 




सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, February 26, 2017

दमयन्ती की दुविधा - भाग 2


सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथा के क्रम में बाइसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - ‘‘दमयन्ती की दुविधा - भाग 2’’।


हमने पढ़ा था कि राजा नल दमयन्ती के स्वयंवर में जा रहे थे। मार्ग में देवतागण मिले। उन्होंने उन्हें अपना दूत बनकर दमयन्ती के पास जाने को कहा। दूतकार्य समाप्त कर राजा नल पुनः देवताओं के पास गये। जब राजा नल ने भी स्वयंवर में प्रतिभाग करने की अनुमति माँगी, तो देवतागण घबरा गये कि उनके रहते दमयन्ती किसी और का वरण नहीं करेगी, तब देवताओं ने एक चाल चली। पढ़ें और आनंद लें।


नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/paper.php?news=1977&page=6&date=20-02-2017


सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, February 16, 2017

दमयन्ती का स्वयंवर - भाग 1


सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कहानियों के क्रम में प्रस्तुत है इसकी इक्कीसवीं कड़ी, जिसमें प्रस्तुत है ‘‘राजा नल’’ एवं ‘‘दमयन्ती’’ की कथा। यह कथा अत्यंन्त ही रोचक एवं पठनीय है। असल में जब यात्रा के क्रम में युधिष्ठिर महर्षि बृहदश्व से कहते हैं कि उनके जैसा दुर्भाग्यशाली राजा और कौन होगा? उनका राज्य हड़प लिया गया, उन्हें देश निकाला दे दिया गया, वे वन-वन भटक रहे हैं, उनकी पत्नी द्रौपदी को भी अपमानित किया गया आदि। तब महर्षि बृहदाश्व उन्हें सांत्वना देने के लिये नल एवं दमयन्ती की कथा सुनाते हैं कि इनके जीवन में तो अत्यधिक कठिन समय आया था। कथा बड़ी है, अतः इसे कई भागों में प्रस्तुत किया जायेगा। इसी कड़ी में प्रस्तुत है प्रथम भाग - ‘‘दमयन्ती का स्वयंवर - भाग 1’’।


इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।




http://pawanprawah.com/admin/photo/up1961.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=1961&page=6&date=13-02-2017 



सादर
विश्वजीत ‘सपन’