Thursday, September 14, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 25

‘‘तप की महिमा’’ अंतिम भाग 
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महाभारत की कथा की 50वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


यह कहानी एक ब्राह्मण की है, जो वेदाध्ययन कर स्वयं को ज्ञानवान मानता है। किन्तु जीवन के क्रम में उसे पता चलता है कि उसका ज्ञान अभी भी अधूरा है। वह इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने की इच्छा में मिथिलानगरी जाता है। अब वह एक धर्मव्याध से मिलता है। बातों के क्रम में वह धर्मव्याध उसे जीवन के तप को करने का सुझाव देता है। वह तप क्या है?  


इसे विस्तार से जानने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, September 9, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 24

‘‘तप की महिमा’’ (प्रथम भाग)
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महाभारत की कथा की 49वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


यह कहानी एक ब्राह्मण की है, जो वेदाध्ययन कर स्वयं को ज्ञानवान मानता है। किन्तु जीवन के क्रम में उसे पता चलता है कि उसका ज्ञान अभी भी अधूरा है। वह इस अधूरे ज्ञान को पूर्ण करने की इच्छा में मिथिलानगरी जाता है। उसे किस प्रकार इस ज्ञान की प्राप्ति होती है, इस कथा में बताया गया है। साथ वह क्या ज्ञान है, यह भी बताया गया है। 


इसे विस्तार से जानने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, September 1, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 23

‘‘गृहस्थ-धर्म की महिमा’’
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महाभारत की कथा की 48वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


हमारी संस्कृति में चार आश्रम बताये गये हैं - ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ एवं संन्यास। उनमें सबसे महत्त्वपूर्ण गृहस्थाश्रम को बताया गया है। यह असल में जीवन-कर्म करने का सबसे उपयुक्त समय बताया गया है। बिना इन कर्मों को किये जीवन के अंतिम लक्ष्य तक नहीं पहुँचा जा सकता। इस कथा में इसी गृहस्थ-धर्म की महत्ता बतायी गयी है। बिना इसकी यात्रा किये सभी प्रकार के तप भी विफल माने गये हैं। 


इस मनभावन कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, August 25, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 22

‘‘अन्न-दान की महत्ता’’ 
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महाभारत की कथा की 47वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


हमारे शास्त्रों में न केवल दान की महत्ता है, बल्कि अन्न-दान की भी अत्यधिक महत्ता है। अपना जीवन सभी जीते हैं, किन्तु जो मनुष्य अपने से अधिक दूसरे के लिये जीता है, असल में वही मनुष्य कहलाने की योग्यता रखता है। इस कथा में एक ब्राह्मण और उसके परिवार की इस बड़े त्याग के बारे में बड़े ही रोचक ढंग से कथाकार ने बताया है। अतिथि के लिये अपने भोजन की वस्तुओं का पूर्णतः दान कर देना मात्र भारतीय संस्कृति में ही संभव है। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Monday, August 21, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 21

‘‘क्षमादान ही महादान’’
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महाभारत की कथा की 46वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


एक बार शक्ति मुनि एवं कल्माषपाद के मध्य झगड़ा हो जाता है। राजा कल्माष्पाद ने क्रोध में आकर शक्ति मुनि को चाबुक दे मारा। मुनि ने उन्हें राक्षस बनने का शाप दे दिया। तब कल्माषपाद ने उन्हें ही खा लिया। मुनि के पुत्र पराशर ने उन्हें नष्ट करने का बीड़ा उठाया। उसके बाद क्या हुआ, यह जानने के लिये इस कथा को पढ़ें और देखें कि क्षमादान का महत्त्व हमारे शास्त्रों में कितना प्रबल है। 

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, August 13, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 20

‘‘धर्म का माहात्म्य’’ 
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महाभारत की कथा की 45वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


एक ब्राह्मण कुण्डधार की पूजा कर धन संपादित करने में असफल होने पर कुण्डधार से रुष्ट हो जाता है। उसे धन चाहिए था, किन्तु कुण्डधार ने उसके लिये धर्म को चुना। इससे वह ब्राह्मण बहुत दुःखी हो गया। जब कुण्डधार की कृपा से उसे दिव्य-दृष्टि मिली, तो उसने अनुभव किया कि कुण्डधार ने उसके लिये उचित किया था। ऐसा क्यों हुआ? इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, August 6, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 19

‘‘ऋषियों का धर्म’’
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महाभारत की कथा की 44वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।


एक बार अकाल पड़ जाने पर ऋषियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें प्रलोभन भी दिया जाता है, किन्तु ऋषिगण अपने धर्म का पालन करते हैं और तब ईश्वर न केवल उनकी सहायता करते हैं, बल्कि संकट आने पर उनकी प्राण-रक्षा भी करते हैं। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।  


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विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, August 1, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 18

‘‘मुनि उत्तंक की गुरु-भक्ति’’
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महाभारत की कथा की 43वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा का द्वितीय एवं अंतिम भाग।


मुनि उत्तंक जब अपने गुरु गौतम से आज्ञा लेकर जाने लगे, तब उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात की। गुरु ने गुरु दक्षिणा लेने से मना कर दिया। फिर वे गुरु-पत्नी के पास गये, तो उन्होंने भी गुरु दक्षिणा लेने से मना का दिया। तब उत्तंक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अवश्य कुछ न कुछ लें। तब गुरु-पत्नी उनसे मणिमय कुण्डल लाने को कहा। वे अपने गंतव्य पर पहुँच गये, किन्तु क्या उनके लिये यह आसान होगा। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, July 22, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 17

‘‘मुनि उत्तंक की गुरु-भक्ति’’
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महाभारत की कथा की 42वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा का प्रथम भाग।


गुरु-भक्ति पर एक से एक कथा बनी है और उनमें से एक है मुनि उत्तंक की। मुनि उत्तंक जब अपने गुरु गौतम से आज्ञा लेकर जाने लगे, तब उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात की। गुरु ने गुरु दक्षिणा लेने सक मना कर दिया। फिर वे गुरु-पत्नी के पास गये, तो उन्होंने भी गुरु दक्षिणा लेने से मना का दिया। तब उत्तंक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अवश्य कुछ न कुछ लें, अन्यथा उनके लिये जाना संभव नहीं होगा। तब गुरु-पत्नी उनसे मणिमय कुण्डल लाने को कहा। उसके बाद क्या-क्या हुआ इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें। 


एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Monday, July 17, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 16

‘‘बलवान शत्रु से कभी न करें बैर’’ 
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महाभारत की कथा की 41वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
      
गर्व का कारण कुछ भी हो सकता है, किन्तु घमण्ड नहीं होना चाहिए। घमण्ड बुद्धि को नष्ट कर देता है और तब हमें ज्ञात नहीं होता कि हम क्या कर रहे हैं। इस कथा में एक सेमल के वृक्ष के माध्यम से इस शीर्षक को विस्तार दिया गया है कि अपने से बलवान शत्रु से कभी भी बैर नहीं करना चाहिए, क्योंकि तब हार निश्चित होती है। साथ ही यह भी संदेश है कि घमण्ड नहीं करना चाहिए। एक नाटकीय तरीके से इस रहस्य को और तथ्य को इस कथा में समझाया गया है। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।  


एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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Thursday, July 6, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 15

‘‘स्त्री-रक्षा परम धर्म है’’ 
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महाभारत की कथा की चालीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘स्त्री-रक्षा परम धर्म है’’

     
देवशर्मा नामक ऋषि ने अपने शिष्य विपुल को गुरुपत्नी की रक्षा करने का आदेश दिया, क्योंकि रुचि पर देवराज इन्द्र आसक्त थे। यह बड़ी चुनौती थी, जिसका विपुल ने अपनी बुद्धि से सामना किया और सफल भी हुआ। तब लज्जित होकर इन्द्र को भागना पड़ा। फिर भी विपुल से एक अपराध हो गया। वह दण्ड का भागीदार हो गया। यह सब कैसे हुआ? क्या उसे दण्ड मिला? इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, June 29, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 14

‘‘त्याग का माहात्म्य’’ 
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महाभारत की कथा की उनचालीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘त्याग का माहात्म्य’’  

   
त्याग का माहात्म्य अर्थात् त्याग की महत्ता। यह कथा दो पक्षियों की है, वे सुख से रह रहे थे। जब उन्होंने एक बहेलिये के दुःख को जाना तो उन्होंने किस प्रकार उसकी सहायता करने का प्रयास किया और किन परिस्थ्तिियों में उन्होंने आपने प्राण देकर उसका भला करना चाहा, इस कथा में वर्णित है। उसके बाद किस प्रकार बहेलिये का जीवन परिवर्तित हुआ, यह भी दर्शनीय है। इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, June 23, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 13

‘‘अपनों से विवाद होता है घातक’’ 
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महाभारत की कथा की अड़तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘अपनों से विवाद होता है घातक’’  

   
यह कथा दो पक्षियों की है, जिनमें अत्यधिक प्रेम था। सभी पशु-पक्षी उनके इस प्रेम का उदाहरण दिया करते थे। फिर एक दिन दैववश वे एक मुसीबत में फँस गये। उन्होंने उस मुसीबत से छुटकारे का प्रयास किया। पहले वे सफल भी रहे, किन्तु एक बार उनके मध्य विवाद हुआ, तो कैसे किसी दूसरे ने इसका लाभ उठाया इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’