Sunday, August 13, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 20

‘‘धर्म का माहात्म्य’’ 
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महाभारत की कथा की 45वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा। 


एक ब्राह्मण कुण्डधार की पूजा कर धन संपादित करने में असफल होने पर कुण्डधार से रुष्ट हो जाता है। उसे धन चाहिए था, किन्तु कुण्डधार ने उसके लिये धर्म को चुना। इससे वह ब्राह्मण बहुत दुःखी हो गया। जब कुण्डधार की कृपा से उसे दिव्य-दृष्टि मिली, तो उसने अनुभव किया कि कुण्डधार ने उसके लिये उचित किया था। ऐसा क्यों हुआ? इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, August 6, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 19

‘‘ऋषियों का धर्म’’
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महाभारत की कथा की 44वीं कड़ी में प्रस्तुत यह लोककथा।


एक बार अकाल पड़ जाने पर ऋषियों को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। उन्हें प्रलोभन भी दिया जाता है, किन्तु ऋषिगण अपने धर्म का पालन करते हैं और तब ईश्वर न केवल उनकी सहायता करते हैं, बल्कि संकट आने पर उनकी प्राण-रक्षा भी करते हैं। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।  


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विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, August 1, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 18

‘‘मुनि उत्तंक की गुरु-भक्ति’’
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महाभारत की कथा की 43वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा का द्वितीय एवं अंतिम भाग।


मुनि उत्तंक जब अपने गुरु गौतम से आज्ञा लेकर जाने लगे, तब उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात की। गुरु ने गुरु दक्षिणा लेने से मना कर दिया। फिर वे गुरु-पत्नी के पास गये, तो उन्होंने भी गुरु दक्षिणा लेने से मना का दिया। तब उत्तंक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अवश्य कुछ न कुछ लें। तब गुरु-पत्नी उनसे मणिमय कुण्डल लाने को कहा। वे अपने गंतव्य पर पहुँच गये, किन्तु क्या उनके लिये यह आसान होगा। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, July 22, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 17

‘‘मुनि उत्तंक की गुरु-भक्ति’’
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महाभारत की कथा की 42वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा का प्रथम भाग।


गुरु-भक्ति पर एक से एक कथा बनी है और उनमें से एक है मुनि उत्तंक की। मुनि उत्तंक जब अपने गुरु गौतम से आज्ञा लेकर जाने लगे, तब उन्होंने गुरु दक्षिणा देने की बात की। गुरु ने गुरु दक्षिणा लेने सक मना कर दिया। फिर वे गुरु-पत्नी के पास गये, तो उन्होंने भी गुरु दक्षिणा लेने से मना का दिया। तब उत्तंक ने उनसे प्रार्थना की कि वे अवश्य कुछ न कुछ लें, अन्यथा उनके लिये जाना संभव नहीं होगा। तब गुरु-पत्नी उनसे मणिमय कुण्डल लाने को कहा। उसके बाद क्या-क्या हुआ इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Monday, July 17, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 16

‘‘बलवान शत्रु से कभी न करें बैर’’ 
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महाभारत की कथा की 41वीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
      
गर्व का कारण कुछ भी हो सकता है, किन्तु घमण्ड नहीं होना चाहिए। घमण्ड बुद्धि को नष्ट कर देता है और तब हमें ज्ञात नहीं होता कि हम क्या कर रहे हैं। इस कथा में एक सेमल के वृक्ष के माध्यम से इस शीर्षक को विस्तार दिया गया है कि अपने से बलवान शत्रु से कभी भी बैर नहीं करना चाहिए, क्योंकि तब हार निश्चित होती है। साथ ही यह भी संदेश है कि घमण्ड नहीं करना चाहिए। एक नाटकीय तरीके से इस रहस्य को और तथ्य को इस कथा में समझाया गया है। इसे विस्तार में जानने के लिये यह कथा पढ़ें।  


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Thursday, July 6, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 15

‘‘स्त्री-रक्षा परम धर्म है’’ 
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महाभारत की कथा की चालीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘स्त्री-रक्षा परम धर्म है’’

     
देवशर्मा नामक ऋषि ने अपने शिष्य विपुल को गुरुपत्नी की रक्षा करने का आदेश दिया, क्योंकि रुचि पर देवराज इन्द्र आसक्त थे। यह बड़ी चुनौती थी, जिसका विपुल ने अपनी बुद्धि से सामना किया और सफल भी हुआ। तब लज्जित होकर इन्द्र को भागना पड़ा। फिर भी विपुल से एक अपराध हो गया। वह दण्ड का भागीदार हो गया। यह सब कैसे हुआ? क्या उसे दण्ड मिला? इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, June 29, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 14

‘‘त्याग का माहात्म्य’’ 
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महाभारत की कथा की उनचालीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘त्याग का माहात्म्य’’  

   
त्याग का माहात्म्य अर्थात् त्याग की महत्ता। यह कथा दो पक्षियों की है, वे सुख से रह रहे थे। जब उन्होंने एक बहेलिये के दुःख को जाना तो उन्होंने किस प्रकार उसकी सहायता करने का प्रयास किया और किन परिस्थ्तिियों में उन्होंने आपने प्राण देकर उसका भला करना चाहा, इस कथा में वर्णित है। उसके बाद किस प्रकार बहेलिये का जीवन परिवर्तित हुआ, यह भी दर्शनीय है। इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, June 23, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 13

‘‘अपनों से विवाद होता है घातक’’ 
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महाभारत की कथा की अड़तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘अपनों से विवाद होता है घातक’’  

   
यह कथा दो पक्षियों की है, जिनमें अत्यधिक प्रेम था। सभी पशु-पक्षी उनके इस प्रेम का उदाहरण दिया करते थे। फिर एक दिन दैववश वे एक मुसीबत में फँस गये। उन्होंने उस मुसीबत से छुटकारे का प्रयास किया। पहले वे सफल भी रहे, किन्तु एक बार उनके मध्य विवाद हुआ, तो कैसे किसी दूसरे ने इसका लाभ उठाया इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, June 15, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 12

‘‘अच्छा आचरण ही दिलाता है मान-सम्मान’’ 
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महाभारत की कथा की सैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
   
प्राचीन काल की बात है। एक बार इन्द्र का राज्य छिन जाता है। यह राज्य प्रह्लाद नामक एक दैत्य को चला जाता है। उसकी सफलता जानने के प्रयास में इन्द्र उसके पास एक ब्राह्मण बनकर जाते हैं और रहस्य जानकर पुनः अपने पद को प्राप्त करते हैं। इस कथा में आचरण की महत्ता स्थापित की गयी है। इसे विस्तार में जानने के लिये इस कथा को पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, June 11, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 11

‘‘कार्य में विलम्ब घातक है’’
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महाभारत की कथा में छत्तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत एक लोककथा।
‘‘कार्य में विलम्ब घातक है’’ 

   
प्राचीन काल की बात है। एक घने जंगल में एक तालाब था। उसमें तीन मछलियाँ रहती थीं। तीनों अपने-अपने गुणों के अनुसार कार्य करती थीं। एक बार जब संकट आने का अंदेशा हुआ, तब तीनों ही मछलियों ने अपने-अपने गुणों के अुनसार निर्णय लिया। फिर क्या हुआ, इसे जानने के लिये इस कथा को पढ़ें।

 
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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, June 2, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 10

‘‘शरणागत की रक्षा’’
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महाभारत की कथा में पैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत दसवीं लोककथा - ‘‘शरणागत की रक्षा’’  
 
प्राचीन काल की बात है। उशीनगर नामक एक राज्य था। वहाँ का राजा वृषदर्भ बहुत ही न्यायप्रिय एवं दयालु था। जब एक कबूतर उनकी शरण में आया और फिर एक बाज भी उसका पीछा करते हुए आया, तब एक अजीब-सी स्थिति उत्पन्न हो गयी। वाद-विवाद हुआ और अनेक आश्चर्यजनक घटनायें घटीं। इन्हें जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, May 27, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 9

‘‘शत्रु से सदा सावधान रहना चाहिए’’
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महाभारत की कथा में चौंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत नौवीं लोककथा - ‘‘शत्रु से सदा सावधान रहना चाहिए’’
  
प्राचीन काल की बात है। काम्पिल्य नगर के राजा ब्रह्मदत्त बहुत ही न्यायप्रिय राजा थे। उनके महल में पूजनी नामक एक चिड़िया रहती थी, जो उस महल को अपना घर समझती थी। एक दिन उसके अण्डे से एक बच्चा निकला और उसी दिन रानी ने भी एक कुमार को जन्म दिया। दोनों एक साथ पलने और बढ़ने लगे। फिर अचानक एक दिन एक अनहोनी हो गयी। तब क्या होता है, जानने के लिये इस कथा को पढ़ें। 


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विश्वजीत ‘सपन’

Friday, May 19, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 8

‘‘घमण्डी कौआ’’ 
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महाभारत की कथा में तैंतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत आठवीं लोककथा - ‘‘घमण्डी कौआ’’  

यह कहानी एक कौआ और हंस की है। वह कौआ दूसरों के जूठन पर पलता हुआ, बहुत घमण्डी हो गया था। जब उसने हंस को देखा, तो उसे बहुत ईर्ष्या हुई और उसने हंस को उड़ान भरने की चुनौती दी। वह चाहता था कि जब वह जीत जायेगा, तो लोग उसके उस रूप के बाद भी उसे ही सर्वश्रेष्ठ मानने लगेंगे। उसे पसंद करने लगेंगे। सारे कौए उसके साथ थे, किन्तु प्रतियोगिता के दिन असल में क्या होता है, इसका विवरण इस कहानी में मिलता है।


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, May 11, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 7

"करम गति टारै नाहीं टरै"
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महाभारत की कथा में इकतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत छठी लोककथा - ‘‘करम गति टारै नाहीं टरै’’ 

यह कहानी गौतमी नामक एक वृद्धा की है, जिसके इकलौते पुत्र की मृत्यु सर्प के काटने से हो जाती है। एक बहेलिया ने उस सर्प को पकड़ लिया। वह उसे इस कृत्य के लिये दण्डित करना चाहता है। इस पर वाद-विवाद होता है और तब किस प्रकार मृत्यु एवं काल को अपना पक्ष रखना पड़ता है। और अंततः पता चलता है कि किस प्रकार उस बालक के पूर्व कर्म के कारण उसकी मृत्यु हुई है। कर्म का फल हमें इसी संसार में रहते हुए भुगतना पड़ता है। यही इस कथा का मुख्य संदेश है।


एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, May 7, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 6

दृढ़ निश्चय ही दिलाती है सफलता
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महाभारत की कथा में इकतीसवीं कड़ी में प्रस्तुत छठी लोककथा - ‘‘दृढ़ निश्चय ही दिलाती है सफलता’’

एक इंसान के इकलौते पुत्र की मृत्यु हो जाती है। वह शव लेकर श्मशान जाता है। सियार और गिद्ध अपने-अपने प्रयोजन से उन्हें कभी रोकने और कभी जाने के लिये कहते रहते हैं, तब उस व्यक्ति में भी आशा का संचार होता है कि हो सकता हो कि किसी प्रकार उसका पुत्र भी जीवित हो जाये। उसने ईश्वर से प्रार्थना की और उसे सफलता मिली। एक सुन्दर संदेश देती इस कथा को पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Saturday, April 29, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 5

‘‘गुरु की आज्ञा का पालन धर्म समान है’’
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महाभारत की कथा में तीसवीं कड़ी में प्रस्तुत पाँचवीं लोककथा - ‘‘गुरु की आज्ञा का पालन धर्म समान है’’।

तक्षशिला में आयोद धौम्य नामक एक ऋषि थे। उनके गुरुकुल में उनके कई शिष्य गुरुकुल में ही रहकर पढ़ाई करते थे। पढ़ाई के साथ-साथ उन्हें व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिये जाते थे। उनके तीन प्रधान शिष्य थे - आरुणि, उपमन्यु और वेद। तीनों ही एक से बढ़कर गुरुभक्त थे। यह कथा आरुणि की है कि किस प्रकार उसने अपने प्राण की परवाह किये बिना गुरु की आज्ञा का पालन किया और फसल के लिये जल का संरक्षण किया। 


कहानी पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, April 20, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 4

मनुष्य को दीमक की तरह खा जाता है ‘अहंकार’
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महाभारत की कथा की उनतीसवीं कड़ी में यह कहानी प्रस्तुत है। 


यह कहानी देव एवं दानवों के मध्य न केवल युद्ध का है, बल्कि इसमें यह भी बताया गया है कि अहंकारी चाहे कितना भी शक्तिशाली हो, उसने स्वयं को उचित बताने के कितने भी प्रयास कर लिये हों, उसने स्वयं को स्थापित करने के कितने ही प्रयास कर लिये हों, किन्तु एक न एक दिन उसका अहंकार ही उसको ले डूबता है। त्रिपुरों की यह कहानी न केवल रोचक है, बल्कि हमारे जीवन के लिये अति शिक्षाप्रद भी है। 


आशा है कि महाभारत की यह प्रतीकात्मक कथा आप सभी को अवश्य पसंद आयेगी।


इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक के प्रयोग किये जा सकते हैं। साथ ही नीचे एक फोटो के रूप में भी कहानी दी जा रही है। इच्छुक मित्र उससे भी पढ़ सकते हैं।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=2117&page=10&date=17-04-2017


विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, April 13, 2017

महाभारत की लोककथा - भाग 3

जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी

महाभारत की कथा का अट्ठाइवाँ भाग प्रस्तुत है। इसमें महाभारत की तीसरी लोककथा है - ‘‘जननी जन्मभूमिश्च स्वार्गादपि गरीयसी’’। 

यह कहानी एक तोते के कृतज्ञता की है। मरे हुए पेड़ से वह इतना प्रेम करता है कि भगवान् को आकर उसे जीवनदान देना पड़ता है। आज हममें इस कृतज्ञता की अत्यधिक कमी है। आइये पढ़ें और सीखें कि जीवन में जो हमारी रक्षा करते हैं, हमें उनका साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए।

नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा नीचे दिये फोटो में भी इसे पढ़ सकते हैं।


http://pawanprawah.com/admin/photo/up2101.pdf

http://pawanprawah.com/paper.php?news=2101&page=10&date=10-04-2017 



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Tuesday, April 4, 2017

महाभारत की लोककथा - 2


‘‘संकट में घबराना नहीं चाहिए’’


महाभारत की दूसरी लोककथा में इस कहानी को पढ़ें। इस कड़ी में यह सत्ताइसवीं कथा का प्रकाशन हुआ है। यह धारावाहिक आपको कैसा लग रहा है, इस बारे में आपके विचार अपेक्षित हैं।


प्रस्तुत कथा एक बुद्धिमान चूहे पलित की है, जिसने संकट में अपनी बुद्धिमानी से न केवल अपनी जान बचाई, बल्कि एक संदेश भी हम सभी को दे गया कि जब आवश्यकता हो, तो किसी से भी मित्रता कर लेनी चाहिए, किन्तु यदि सबल मित्र है, तो उससे दूरी बनाकर रखनी चाहिए।


नीचे दिये लिंक को क्लिक करें या नीचे दिये चित्र में इस कथा को पढ़ें।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=2077&page=10&date=03-04-2017



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Friday, March 31, 2017

महाभारत की लोककथा - 1 "मित्रता में दरार"


महाभारत की लोककथा का प्रारंभ ‘पवन प्रवाह’ पर हो चुका है। प्रथम कथा का शीर्षक है - ‘मित्रता में दरार’’। यह कथा एक सियार एवं व्याघ्र की मित्रता की है, जिसके माध्यम से बताया गया है कि यदि एक बार मित्रता में दरार आ जाये, तो वह कभी भरता नहीं है। साथ ही यह संदेश भी है कि अपने स्वाभाव वालों के साथ ही मित्रता टिकती है।

इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें अथवा इस चित्र से ही पढ़ सकते हैं जो नीचे है।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=2061&page=10&date=27-03-2017



सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 23, 2017

दमयन्ती और नल का पुनर्मिलन

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथाओं के क्रम में पच्चीसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है ‘‘दमयन्ती और नल का पुनर्मिलन’’। हमने अब तक देखा कि नल एवं दमयन्ती एक-दूसरे से अलग हो गये। उन्हें नाना प्रकार के कष्टों से गुज़रना पड़ा। जहाँ दमयन्ती अभी भी राजा नल की तलाश में थी, वहीं राजा नल युक्ति से अपना राज्य वापस पाने के लिये प्रयासरत थे। तब दमयन्ती ने किस प्रकार राजा नल को पहचाना और उनसे मिली, अब इस कथा में वर्णित है। 


कथा पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, March 16, 2017

नल एवं दमयन्ती की दुर्लभ यात्रायें (भाग - 4)

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथा के रूप में चौबीसवीं कड़ी में प्रस्तुत है - ‘‘राजा नल एवं दमयन्ती’’ की कथा का चतुर्थ भाग - ‘‘नल एवं दमयन्ती की दुर्लभ यात्रायें’’। 


मित्रों, हमने देखा कि राजा नल दमयन्ती को सोती छोड़कर वन में चले जाते हैं कि वह अपने पिता के पास लौट जायेगी, किन्तु दमयन्ती ऐसा नहीं करती और अपनी खोज जारी रखती है। उधर राजा नल भी भटकने लगते हैं और उन्हें कहाँ-कहाँ जाना पड़ता है, क्या-क्या करना पड़ता है, इस भाग में वर्णित है। दैव संयोग से ऐसा हो रहा है, इसका आभास दमयन्ती होता है। 


कथा पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


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विश्वजीत 'सपन'

Thursday, March 2, 2017

दमयन्ती का विरह - भाग 3

सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथाओं में तेईसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - ‘‘दमयन्ती का विरह’’।


देवताओं के होते हुए भी दमयन्ती ने राजा नल का वरण किया और वे सुख से रहने लगे। उधर कलियुग और द्वापर भी उसी स्वयंवर में भाग लेने जा रहे थे, किन्तु जब उन्हें पता चला कि दमयन्ती ने देवताओं को छोड़कर राजा नल से विवाह किया, तो उन्होंने इसे अपमान समझा। वे इसका दण्ड देने की योजना बनाने लगे। उनकी कुटिल योजना क्या बनती है? किस प्रकार राजा नल एवं दमयन्ती के जीवन में कठिनाइयों के दौर प्रारंभ होते हैं। अब इस कथा में पढ़िये। 


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1997&page=10&date=27-02-2017 




सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Sunday, February 26, 2017

दमयन्ती की दुविधा - भाग 2


सम्मानित मित्रो,

महाभारत की कथा के क्रम में बाइसवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है - ‘‘दमयन्ती की दुविधा - भाग 2’’।


हमने पढ़ा था कि राजा नल दमयन्ती के स्वयंवर में जा रहे थे। मार्ग में देवतागण मिले। उन्होंने उन्हें अपना दूत बनकर दमयन्ती के पास जाने को कहा। दूतकार्य समाप्त कर राजा नल पुनः देवताओं के पास गये। जब राजा नल ने भी स्वयंवर में प्रतिभाग करने की अनुमति माँगी, तो देवतागण घबरा गये कि उनके रहते दमयन्ती किसी और का वरण नहीं करेगी, तब देवताओं ने एक चाल चली। पढ़ें और आनंद लें।


नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।


http://pawanprawah.com/paper.php?news=1977&page=6&date=20-02-2017


सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, February 16, 2017

दमयन्ती का स्वयंवर - भाग 1


सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कहानियों के क्रम में प्रस्तुत है इसकी इक्कीसवीं कड़ी, जिसमें प्रस्तुत है ‘‘राजा नल’’ एवं ‘‘दमयन्ती’’ की कथा। यह कथा अत्यंन्त ही रोचक एवं पठनीय है। असल में जब यात्रा के क्रम में युधिष्ठिर महर्षि बृहदश्व से कहते हैं कि उनके जैसा दुर्भाग्यशाली राजा और कौन होगा? उनका राज्य हड़प लिया गया, उन्हें देश निकाला दे दिया गया, वे वन-वन भटक रहे हैं, उनकी पत्नी द्रौपदी को भी अपमानित किया गया आदि। तब महर्षि बृहदाश्व उन्हें सांत्वना देने के लिये नल एवं दमयन्ती की कथा सुनाते हैं कि इनके जीवन में तो अत्यधिक कठिन समय आया था। कथा बड़ी है, अतः इसे कई भागों में प्रस्तुत किया जायेगा। इसी कड़ी में प्रस्तुत है प्रथम भाग - ‘‘दमयन्ती का स्वयंवर - भाग 1’’।


इसे पढ़ने के लिये नीचे दिये लिंक को क्लिक करें।




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सादर
विश्वजीत ‘सपन’

Thursday, February 9, 2017

देवयानी का हठ - भाग 2

सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कहानी के क्रम में बीसवीं कहानी ‘‘देवयानी का हठ’’ का दूसरा एवं अंतिम भाग प्रस्तुत है। हमने पहले भाग में पढ़ा कि देवयानी और शर्मिष्ठा में झगड़ा होता है। देवयानी नगर से जाने की बात करती है और असुरराज वृषपर्वा उसे मनाते हैं। देवयानी इस शर्त पर रुकती है कि शर्मिष्ठा उसकी दासी बनकर रहेगी। 


अब इस भाग में पता चलता है कि राजा ययाति का संबंध शर्मिष्ठा के साथ होता है और किस प्रकार देवयानी को इसका पता चलता है। तब वह क्या करती है? कैसे राजा ययाति अचानक बूढ़े हो जाते हैं और अपने उत्तराधिकारी का चयन करते हैं।


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http://pawanprawah.com/paper.php?news=1949&page=10&date=08-02-2017
 
विश्वजीत ‘सपन’

Friday, February 3, 2017

‘‘देवयानी का हठ’’ (भाग-1)


सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कथाओं में उन्ननीवीं कड़ी के रूप में प्रस्तुत है ‘‘देवयानी का हठ’’ का पहला भाग। महाभारत के आदिपर्व में वैशम्पायन जी जनमेजय से देवताओं एवं असुरों के मध्य युद्धों एवं कच की संजीवनी विद्या को सीखने के बारे में बताया। इसी मध्य उन्होंने देवयानी एवं शमिष्ठा की कहानी भी बताई। देवयानी शुक्राचार्य की पुत्री थी और उसका झगड़ा असुरराज वृषपर्वा की पुत्री शर्मिष्ठा के साथ हुआ करता था। एक दिन अवसर पाकर किस प्रकार देवयानी ने बदला लिया, इस कथा में वर्णित है।


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विश्वजीत 'सपन'

Saturday, January 28, 2017

नागकन्या उलूपी की प्रेमकथा

सम्मानित मित्रगण,

महाभारत की कथाओं के क्रम में इस सप्ताह अठारवीं कथा ‘‘नागकन्या उलूपी की प्रेमकथा’’ का प्रकाशन ‘‘पवन प्रवाह’’ पर। 


किस प्रकार नागकन्या उलूपी को धनुर्धर अर्जुन से अनुराग होता है और उससे प्रेम करने लगती है। उससे विवाह करने के लिये वह क्या उपक्रम करती है तथा किस प्रकार अर्जुन धर्मसंकट में पड़ते हैं, इस कथा में दर्शाया गया है।


पढ़ें और आनंद लें।


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सादर
विश्वजीत ‘सपन’