Thursday, May 16, 2013

गंगा का विचित्र आचरण (कथा - 5)

 

 वैशम्पायन जी जनमेजय को कथाक्रम में बताते हैं कि इक्ष्वाकु वंश में महाभिष नामक राजा थे। उन्होंने अश्वमेध और राजसूय यज्ञ करके स्वर्ग प्राप्त किया। एक दिन सभी देवता आदि ब्रह्माजी की सेवा में उपस्थित हुए। वायु ने श्रीगंगाजी के वस्त्र को उनके शरीर से खिसका दिया। तब सबों ने आँखें नीची कर लीं, किन्तु महाभिष उन्हें देखते रहे। तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा कि तुम मृत्युलोक जाओ। जिस गंगा को तुम देखते रहे हो, वह तुम्हारा अप्रिय करेगी। इस प्रकार उनका जन्म प्रतीक के पुत्र शांतनु के रूप में हुआ।

महाभारत, आदिपर्व



प्रतापी राजा प्रतीप के बाद उनके पुत्र शान्तनु हस्तिनापुर के राजा हुए। वे बड़े ही नेकदिल और दयालु थे। उनके राज्य में प्रजा सुखी थी। एक दिन की बात है। राजा शिकार खेलने निकले। शिकार की खोज में जंगल में दूर तक निकल गए। वहीं कहीं जंगल के मध्य बहती गंगा नदी को देखकर उन्होंने आराम करने की सोची। उन्होंने नदी से जल पिया और वहीं एक पेड़ के नीचे आराम करने लगे। तभी उन्होंने नदी के तट पर एक परम सुन्दरी स्त्री को देखा। उसे देखते ही राजा को उससे अनुराग हो गया। थकान भूलकर तुरन्त उसके पास गए और पूछा - 

‘तुम कौन हो सुन्दरी? यहाँ इस वीराने में क्या कर रही हो?’

उस स्त्री ने बिना झिझक के कहा - ‘मैं गंगा हूँ।’

राजा ने पहले अपना परिचय दिया और कहा - ‘तुम बहुत सुन्दर हो। क्या तुम मुझसे विवाह करोगी?’

‘राजन् ! यह मेरे लिए सौभाग्य की बात होगी। लेकिन मेरी एक शर्त है।’ गंगा ने कहा।

‘मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है।’ राजा शान्तनु उसकी मोहिनी सूरत पर मर मिटे थे।

‘ऐसे नहीं राजन्, पहले मेरी शर्त सुन लें।’ गंगा ने आग्रह कर कहा। 

‘देखो गंगे, यह राजा का वचन है। मुझे तुम्हारी हर शर्त मंजूर है।’ शांतनु ने अधीर होते हुए कहा, जैसे तुरन्त उसके मुख से उसकी हाँ सुनने को इच्छुक हों।

‘फिर भी महाराज, आप इसे सुनने के बाद ही हाँ कहें।’ गंगा ने फिर से वही बात बड़ी ही निश्चिंतता से कही।

‘ठीक है प्रिये, यदि तुम इसी समय कहना चाहती हो, तो कहो तुम्हारी क्या शर्त है?’ शांतनु ने गंगा की बात मानकर कहा।
 
‘तो सुनिए राजन् ! मैं चाहे जो करूँ। वह अच्छा हो या बुरा आप मुझे कुछ मत कहिएगा। मुझे रोकिएगा नहीं। जिस दिन आप मुझे रोकेंगे या फिर गुस्सा करेंगे, उसी दिन मैं आपको छोड़कर हमेशा के लिए चली जाऊँगी।’ गंगा ने अपनी शर्त बतलाई।

राजा शांतनु को इस समय गंगा की हाँ से मतलब था। इसलिए उन्होंने कुछ पूछ-ताछ नहीं की और शर्त स्वीकार कर ली। इस शर्त को स्वीकार कर लेने के बाद गंगा ने उनसे विवाह करने के लिए हाँमी भर दी। 

उसके बाद शांतनु गंगा को लेकर हस्तिनापुर चले आए। वहाँ खूब धूमधाम से उनकी शादी हुई। उसके बाद कई वर्षों तक गंगा और शांतनु सुख से रहे। इस बीच गंगा के सात पुत्र हुए, लेकिन कोई भी जीवित नहीं रहा। ज्यों ही पुत्र पैदा होता था गंगा उसे गंगा नदी में फेंक दिया करती थी। राजा शांतनु को बहुत दु:ख होता था, लेकिन वे कुछ कह नहीं पाते थे। उन्हें भय था कि उनके मना करते ही गंगा उन्हें छोड़कर चली जाएगी।

फिर गंगा ने आठवें पुत्र को जन्म दिया। पुत्र के जन्म होते ही गंगा उसे लेकर नदी की ओर जाने लगी तो राजा शांतनु अपने आपको नहीं रोक पाए। उस नन्हें से बच्चे को भी मरना पड़ेगा यह सोचकर वे दुखी हो गए। आखिर कब तक अपने मासूम बच्चों की हत्या देखते रहेंगे।

यह सोचकर उन्होंने गुस्से में कहा - ‘तुम कैसी माँ हो, जो अपने ही पुत्र को जन्म लेते ही नदी में फेंक देती हो। तुम्हें दया नहीं आती। यह कैसा घोर पाप कर रही हो तुम? कम से कम इस नन्हें बालक पर तो दया करो।’

‘ठीक है, जैसा आप कहें। लेकिन अब मेरा यहाँ रहना नहीं हो सकता। शर्त के अनुसार मैं आपको छोड़कर जा रही हूँ।’ गंगा ने बिना किसी दुख या पश्चात्ताप के कहा।

राजा शांतनु को दु:ख हुआ कि उसकी सुन्दरी पत्नी उसे छोड़कर चली जाएगी। लेकिन वे जानना चाहते थे कि आखिर उसने ऐसा क्यों किया?

उन्होंने पूछा - ‘ठीक है, तुम चली जाओ। लेकिन यह तो बताओ कि तुमने ऐसा क्यों किया?’

‘राजन् ! इसके लिए मुझे आपको वसुओं की कहानी सुनानी पड़ेगी।’ ऐसा कहकर गंगा ने वसुओं की कहानी कुछ इस प्रकार सुनाई।

बहुत समय पहले की बात है। वरुण के पुत्र वशिष्ठ मुनि मेरु पर्वत पर तपस्या करते थे। उनके पास कामधेनु की पुत्री नन्दिनी नाम की एक गाय थी, जो यज्ञ के लिए दूध आदि दिया करती थी। जब तक यज्ञ चलता रहता था नन्दिनी के दूध की धार बंद नहीं होती थी। जो भी उसका दूध पीता था, वह दस हजार वर्षों तक जवान और जीवित रहता था। इसलिए नन्दिनी मुनि को बहुत ही प्यारी थी।

एक दिन वसु अपनी पत्नियों के साथ वन में घूमने गए, जहाँ मुनि वशिष्ठ का आश्रम था। द्यौ नाम के वसु की पत्नी की दृष्टि नन्दिनी पर पड़ी। उसे वह बहुत अच्छी लगी। उसे नन्दिनी के बारे में सबकुछ पता था। उसने द्यौ से कहा कि उसे नंदिनी चाहिए। द्यौ ने अपनी पत्नी को बहुत समझाया, लेकिन वह नहीं मानी। तब वसुओं ने नंदिनी का हरण कर लिया।

उधर मुनि वशिष्ठ फल-फूल लेकर आश्रम लौटे तो उन्हें नन्दिनी कहीं दिखाई नहीं दी। जंगल में जगह-जगह जाकर उन्होंने ढूँढा लेकिन वह नहीं मिली। वे चिंतित हो गए। यह पहली बार था जब नंदिनी ऐसे गायब हो गई थी। तब उन्होंने अपनी दिव्य-दृष्टि का प्रयोग किया। उन्हें पता चल गया कि वसुओं ने उनकी नंन्दिनी का हरण किया है। वे बड़े क्रोधित हो गए। उन्होंने वसुओं को शाप दे दिया कि उनको आदमी बनकर पृथ्वी पर जन्म लेना पड़ेगा।

शाप की बात पता चलते ही वसु भागे-भागे मुनि वशिष्ठ के पास गए। उन्होंने अपनी गलती के लिए क्षमा माँगी और शाप से मुक्ति की प्रार्थना की।

वशिष्ठ ने कहा - ‘यह तो होकर ही रहेगा। इसलिए तुम लोगों को पृथ्वी पर जन्म तो लेना ही पड़ेगा। किन्तु, क्षमा मुनियों का धर्म है। इसलिए इतनी छूट देता हूँ कि अन्य सभी वसु तो जन्म के तुरन्त बाद ही मुक्ति पा लेंगे, लेकिन द्यौ को वहीं रह कर अपना कर्म भोगना पड़ेगा। यह वसु पुत्र पैदा नहीं कर सकेगा। पिता की प्रसन्नता के लिए स्त्री सुख से भी इसे दूर रहना पड़ेगा।’

इस प्रकार वसुओं की कहानी समाप्त कर गंगा ने कहा - ‘वशिष्ठ जी की बात सुनकर वे सब के सब मेरे पास आए। उन्होंने मुझसे प्रार्थना की कि वे मेरे गर्भ से जन्म लेना चाहते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि जन्म लेते ही उन्हें जल में फेंक देना। मैंने वैसा ही किया। यह आठवाँ पुत्र द्यौ नामक वसु है, जिसे यहीं धरती पर रहकर अपने कर्म भोगने हैं।’


यह कहकर गंगा अपने पुत्र के साथ वहाँ से चली गई। राजा शांतनु का मन शांत हो गया। लेकिन गंगा के चले जाने का दु:ख रहा। फिर भी वे अपनी प्रजा को सुखी रखते थे। कई वर्षों बाद एक दिन वे गंगा नदी के तट पर घूम रहे थे। उन्होंने देखा कि गंगा का जल नदी में बहुत थोड़ा ही रह गया है। वे चकित रह गए। खोज करने पर उन्हें पता चला कि एक बड़ा ही बलवान् और सुन्दर बालक अपने अस्त्रों का अभ्यास कर रहा है। उसने अपने बाणों से गंगा की धार को बाँध रखा है। वे उस बालक के पास गए। किन्तु, उस बालक ने उन्हें भी मोहित कर दिया और गुम हो गया।


राजा गंगा के पास गए और उससे इस रहस्य को जानने की प्रार्थना की। गंगा ने उनकी प्रार्थना सुन ली। स्त्री के रूप में उस बालक के साथ राजा के पास आई।

राजा ने पूछा - ‘गंगे ! यह कुमार कौन है?’

‘यह आपका ही पुत्र है, देवव्रत। यह सभी विद्याओं में पारंगत है। आप इसे अपने साथ ले जाइए।’ यह कहकर वह गंगा में विलीन हो गई।

राजा देवव्रत को लेकर हस्तिनापुर आ गए। उसे हस्तिनापुर का युवराज बनाया और सुखपूर्वक राज्य करने लगे। 
============================================================ विश्वजीत 'सपन'

10 comments:

  1. विश्वजीत जी ,अद्भुत रचना।महाभारत लिखना अपने आप में एक साहसिक आध्यात्मिक लेखन यात्रा है।ऐसा प्रतीत होता है पठन के पश्चात् जैसे सब कुछ आँखों के सामने घटित हो रहा हो। धृष्टता के लिए क्षमा प्रार्थी एक दो जगह वर्तनी दोष दिखा।
    आपका
    उदय

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  2. उदय जी, सर्वप्रथम तो आपका आभार कि आप ब्लॉग पर आये और आपने गहराई से इस कथा को पढ़ा। मुझे इस बात की भी ख़ुशी है कि आपने वर्तनी के दोष के बारे में बताया। सच कहूँ तो यह मेरे लिए सौभाग्य की बात है क्योंकि मात्र वाहवाही करने वालों से रचना कभी परिमार्जित नहीं होती और साहित्य का भला नहीं होता है। आप बिना झिझक बताएँ ताकि मैं उन्हें शुद्ध कर सकूँ। मैं हिंदी में टाइप करता हूँ और सॉफ्टवेयर से यूनिकोड में परिवर्तित करता हूँ, तब कुछ वर्तनी की अशुद्धियों की संभावना रहती है और मैं उन्हें ठीक भी करता हूँ, फिर भी कहीं-कहीं चूक हो जाने की संभावना है। आपके इस इशारे के बाद मैंने कुछ ठीक भी किया है और यदि आप बता दें तो उन्हें भी ठीक कर लूँगा। यदि संकोच हो तो मेरे ईमेल पर भी बता सकते हैं vishwajeetsapan@yahoo.com । एक बार पुन: आपका बहुत आभार। सादर नमन ।

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  3. विश्वजीत जी ,
    अब मुझे वर्तनी-दोष नहीं दिख रहा है।

    आपका
    उदय

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    1. धन्यवाद उदय जी, दरअसल दफ्तर में पोस्ट किया था और दुबारा नहीं देख पाया था। आपके इशारे के बाद देखा और जहाँ कहीं भी कुछ था उन्हें ठीक किया। इसलिए आपका बहुत-बहुत आभार जो आपने यह इशारा किया क्योंकि मैं निश्चय ही कुछ दिनों के बाद ही देख पाता और गलतियाँ रह जातीं। पुन: एक बार नमन आपको। इसी प्रकार मार्गदर्शन करते रहें। सादर वन्दे ।

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    2. विश्वजीत जी ,
      आज से पहले आपकी जैसी विनम्रता फल से लदे वृक्ष में ही दिखी थी।एक और मेलुहा का मृत्युंजय आता दिख रहा है।
      आपका
      उदय

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    3. उदय जी,
      बहुत-बहुत आभार आपका इस सम्मान के लिए। साहित्य की सेवा का प्रयास है और इस हेतु सीखने की और गलती सुधारने की कोई उम्र नहीं होती। कोई व्यक्ति पूर्ण नहीं होता और यदि वह पूर्ण हो गया तो ईश्वर हो जाएगा। इसलिए मेरा प्रयास यही है कि जहाँ तक संभव हो प्रत्येक विचार का सम्मान करना चाहिए और हर समय सीखने और सुधार को आसरा देना चाहिए। एक बार पुन: आपका हृदय से आभार।
      सादर नमन

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  4. सबसे बड़ी खूबी जो मुझे लगी वो है भाषा की सरलता और उसका चयन । साधुवाद विश्वजीत जी इस अद्भुत लेखन के लिए ।

    सादर आपका
    परिमल

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    1. परिमाज जी,
      आपका बहुत-बहुत आभार। यही मेरा प्रयास है कि सहज एवं सरल भाषा में मौलिक कथाओं को समाज के समक्ष रखना ताकि यह उसी प्रकार प्रचलित हों, जिस प्रकार इनकी अन्य प्रतिकृतियाँ। भाषाई मार से रचना भारी-भरकम दिखती अवश्य है, किन्तु साहित्य में सहजता ही उसकी उन्नति का कारक है। एक बार पुन: आपका बहुत-बहुत आभार इस सुन्दर प्रतिक्रिया के लिए।
      सादर नमन

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  5. विश्वजीत जी, मैंने महाभारत धारावाहिक को बड़े ध्यान से देखा है और इस अद्भुत रचना को समझने का प्रयास किया है। लेकिन धारावाहिकों में महाभारत के प्रारंभ काल के कुछ पहलू अनछूए ही रह जाते हैं लेकिन इस आध्यात्मिक सफर को पूर्ण रूप से समझने के लिए प्रारंभिक तथ्यों का ज्ञान अतिआवश्यक है। आपका यह लेख मेरे लिए मददगार बना है। आपको साधुवाद
    साभार
    विक्रम 'विशेष'

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    1. विक्रम ‘विशेष’ जी, सर्वप्रथम हृदय से आभार आपका इस प्रस्तुति की सराहना के लिये। आपने सही कहा कि महाभारत की कथाओं के मूल स्वरूप से पृथक कथाओं को लोगों को बताया जाता है। ऐसा होने का एक कारण यह रहा कि कालान्तर में आश्चर्य के स्थल पर तर्क ने घर बनाया और कथाओं में तदनुसार परिवर्तन भी हुए, किन्तु मौलिकता को कभी भी चुनौती नहीं दी जा सकती। अतः मेरा प्रयास मौलिक कथाओं से लोगों का परिचय करवाना ही है। साथ ही यह भी कि लोग अपनी संस्कृति एवं सभ्यता में रुचि लें और जानें कि हमारा साहित्य कितना महान् है। अभी गीता को सरल कर लिख रहा हूँ और उसके बाद पुनः महाभारत की कहानियों पर आऊँगा। पुनः ब्लॉग में रुचि लेने के लिये एवं प्रतिक्रिया के लिये सादर आभार।
      सादर नमन

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